ए. रामचंद्रन: भारतीय समकालीन कला के महान चित्रकार

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ए. रामचंद्रन भारतीय समकालीन कला के महान चित्रकार

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प्रारंभिक जीवन और शिक्षा अचुतन रामचंद्रन नायर, जिन्हें ए. रामचंद्रन के नाम से जाना जाता है, का जन्म 1935 में केरल के अट्टिंगल में हुआ था। भारतीय समकालीन कला जगत में उनका नाम एक विशिष्ट स्थान रखता है। बचपन से ही कला में रुचि रखने वाले रामचंद्रन ने पहले 1957 में मलयालम साहित्य में स्नातकोत्तर ...

ए. रामचंद्रन भारतीय समकालीन कला के महान चित्रकार

प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

अचुतन रामचंद्रन नायर, जिन्हें ए. रामचंद्रन के नाम से जाना जाता है, का जन्म 1935 में केरल के अट्टिंगल में हुआ था। भारतीय समकालीन कला जगत में उनका नाम एक विशिष्ट स्थान रखता है। बचपन से ही कला में रुचि रखने वाले रामचंद्रन ने पहले 1957 में मलयालम साहित्य में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त की। लेकिन कला के प्रति उनका आकर्षण इतना प्रबल था कि उन्होंने शांतिनिकेतन के कलाभवन में दाखिला लिया।

शांतिनिकेतन में उन्होंने रामकिंकर बैज और बिनोद बिहारी मुखर्जी जैसे महान गुरुओं के सान्निध्य में 1961 में कला की शिक्षा पूरी की। 1961 से 1964 के बीच उन्होंने केरल की भित्तिचित्र परंपरा पर अपना शोध कार्य किया, जो उनकी कलात्मक यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ। 1960 के दशक के मध्य में वे दिल्ली चले गए और 1965 में जामिया मिलिया इस्लामिया में कला शिक्षा के व्याख्याता के रूप में नियुक्त हुए। बाद में वे प्रोफेसर बने और 1992 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति तक इसी विश्वविद्यालय से जुड़े रहे।

कला यात्रा का प्रारंभिक चरण: अभिव्यक्तिवाद का दौर

रामचंद्रन की कलात्मक यात्रा का प्रारंभिक दौर 1960 और 1970 के दशक में अभिव्यक्तिवादी शैली में था। इस काल में उनकी कृतियां शहरी जीवन की पीड़ा, सामाजिक हिंसा और मानवीय संघर्ष को दर्शाती थीं। शांतिनिकेतन में रहते हुए उन्होंने विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान से आए शरणार्थियों की दुर्दशा को करीब से देखा था, जिसका गहरा प्रभाव उनकी कला पर पड़ा।

इस दौर की उनकी पेंटिंग्स में विकृत, चेहरारहित मानव आकृतियां दिखाई देती थीं जो शहरी जीवन की त्रासदी और मानवीय अपमान को व्यक्त करती थीं। उनकी रचनाओं में राजनीतिक व्यंग्य और काला हास्य का समावेश था। “एनकाउंटर” (1967) और “पपेट सीरीज” (1981) जैसी कृतियां इस दौर की प्रतिनिधि रचनाएं हैं।

महत्वपूर्ण परिवर्तन: ययाति और नई शैली का उदय

1984 एक निर्णायक वर्ष था। रामचंद्रन ने 1984 के सिख विरोधी दंगों को करीब से देखा। एक सिख व्यक्ति की भीड़ द्वारा हत्या का दृश्य देखकर वे बुरी तरह विचलित हो गए। उन्हें महसूस हुआ कि हिंसा और अमानवीयता को दर्शाने वाली उनकी पेंटिंग्स का मानव चेतना पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है। उन्होंने निर्णय लिया कि अब वे कभी भी हिंसा की छवि नहीं बनाएंगे।

इसी दौरान उनकी एक आंख की दृष्टि लगभग जाने के कगार पर थी। व्यक्तिगत और सामाजिक त्रासदियों ने उन्हें अपनी कला की दिशा बदलने के लिए प्रेरित किया। 1980 के दशक में उनकी कला में एक समुद्री परिवर्तन आया। शहरी यथार्थ अब उनकी चिंता का विषय नहीं रहा। राजस्थान की जनजातीय संस्कृति और केरल के मंदिरों की भित्तिचित्र परंपरा ने उनकी कल्पना को नई दिशा दी।

ययाति: एक महाकाव्यात्मक कृति

इस नई शैली की पहली और सबसे महत्वपूर्ण रचना थी “ययाति” (1984-86)। यह महाभारत की कथा पर आधारित एक विशाल कलाकृति थी, जिसे केरल के मंदिर के गर्भगृह की तरह परिकल्पित किया गया था। इस स्मारकीय कृति में 60 फीट लंबी और 8 फीट ऊंची 12 पैनल वाली भित्तिचित्र थी, जिसके केंद्र में 13 कांस्य मूर्तियां स्थापित थीं।

ययाति को पूरा करने में दो साल लगे। यह कृति तीन भागों में विभाजित थी – उषा, मध्याह्न और संध्या – जो मानव जीवन के विभिन्न कालखंडों का प्रतीक थे। केरल की भित्तिचित्र परंपरा के रंगों और रूपों से प्रभावित इस कृति में पौराणिक कथाओं, प्रकृति और मानवीय सौंदर्य का अद्भुत समन्वय था।

हालांकि जब 1986 में ययाति को पहली बार प्रदर्शित किया गया, तो कला समीक्षकों ने इसकी कड़ी आलोचना की। इसे बहुत संवेदनशील, काल्पनिक और रंगीन माना गया। 18 वर्षों तक यह कृति छिपी रही। 2002 में जब इसे फिर से प्रदर्शित किया गया, तो इसे रामचंद्रन की सर्वश्रेष्ठ कृति के रूप में स्वीकार किया गया।

राजस्थान की जनजातीय संस्कृति और प्रकृति का उत्सव

1980 के दशक के मध्य से रामचंद्रन उदयपुर के पास स्थित भील और गौड़िया लोहार जनजातियों के गांवों में जाने लगे। वहां की जीवंत संस्कृति, लोक परंपराओं और प्राकृतिक परिवेश ने उनकी कला को नया आयाम दिया। वे दिनों तक इन गांवों में रहते और स्केच बनाते। ग्रामीण महिलाओं, प्रकृति के विभिन्न रूपों, कमल के तालाबों, पक्षियों, तितलियों और वनस्पतियों को उन्होंने अपनी कला का विषय बनाया।

उनकी बाद की कृतियां प्रकृति और जीवन के विविध रूपों का उत्सव बन गईं। पहले की अंधेरी और पीड़ादायक छवियों की जगह अब रंग-बिरंगी, संवेदनशील और काव्यात्मक रचनाएं दिखाई देने लगीं। चेहरारहित विकृत पुरुष आकृतियों की जगह अब ग्रामीण महिलाओं की मनमोहक छवियां थीं।

भारतीय शास्त्रीय कला परंपरा का समावेश

रामचंद्रन की कला में भारतीय शास्त्रीय परंपरा के विभिन्न तत्वों का अद्भुत समन्वय दिखता है। उन्होंने केरल के भित्तिचित्रों, राजस्थानी लघु चित्रों, अजंता की गुफाओं की संवेदनशील आकृतियों, होयसल मूर्तिकला और नाथद्वारा चित्रकला से प्रेरणा ली। उनकी रचनाओं में यौगिक आकृतियां, सजावटी तत्व और रंगों की प्रचुरता दिखाई देती है।

वे भारतीय चित्रकला की परंपरागत भाषा को समकालीन संदर्भ में प्रस्तुत करने में सफल रहे। उन्होंने यूरोपीय मानदंडों से हटकर भारतीय सौंदर्यशास्त्र के अनुसार अपनी कला को विकसित किया। उनका मानना था कि भारतीय कला की अपनी एक विशिष्ट भाषा, रंग योजना और अवधारणाएं हैं, जिन्हें समझना और उनका उपयोग करना आवश्यक है।

बहुआयामी प्रतिभा

रामचंद्रन केवल चित्रकार ही नहीं थे। वे एक बहुआयामी कलाकार थे जिन्होंने विभिन्न माध्यमों में काम किया:

मूर्तिकला

उन्होंने अनेक कांस्य मूर्तियां बनाईं जो वनस्पति और जीव-जंतुओं के आकृतियों से सजी थीं। 2003 में उन्होंने चेन्नई के पास श्रीपेरंबदूर में राजीव गांधी स्मारक के लिए ग्रेनाइट का बेस-रिलीफ स्कल्प्चर बनाया, जो 125 फीट लंबा और लगभग 20 फीट ऊंचा है। यह आधुनिक भारत में सार्वजनिक कला का सबसे बड़ा कमीशन माना जाता है।

जल रंग और रेखाचित्र

रामचंद्रन ने हजारों पेन और स्याही के रेखाचित्र बनाए। उनके जल रंग चित्र भी विविध रंगों, जटिल संरचना और संवेदनशील रूप-रेखाओं के लिए प्रसिद्ध हैं। वे बड़े पैमाने की भित्तिचित्रों और लघु चित्रों दोनों में समान रूप से कुशल थे।

बाल साहित्य

उन्होंने बच्चों के लिए अनेक चित्र पुस्तकें लिखीं और उनमें चित्र बनाए, जो भारत, जापान, ब्रिटेन और अमेरिका में प्रकाशित हुईं। इसके लिए उन्हें 1978 और 1980 में नोमा कॉनकोर्स पुरस्कार मिला। इन पुस्तकों के मूल चित्र जापान के मियाज़ाकी में बच्चों की पुस्तकों के संग्रहालय में स्थायी प्रदर्शन के लिए रखे गए हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकों में “हनुमान” और “गोल्डन सिटी” शामिल हैं।

लेखन और अनुसंधान

रामचंद्रन ने केरल के मंदिर भित्तिचित्रों पर एक व्यापक अध्ययन “एबोड ऑफ गॉड्स: म्यूरल ट्रेडिशंस ऑफ केरल” लिखा। उन्होंने अंग्रेजी में कई लेख लिखे जिनका जापानी और मलयालम सहित विभिन्न भाषाओं में अनुवाद हुआ। मलयालम में “आन्नोट्टम” (पुरुष दृष्टि) उनकी एक महत्वपूर्ण पुस्तक है।

शिक्षण

तीन दशकों तक कला शिक्षण से जुड़े रहने के साथ-साथ उन्होंने कला पर व्याख्यान दिए और डाक टिकट तथा सिरेमिक की डिजाइनिंग भी की।

कलात्मक विशेषताएं

रामचंद्रन की कला की कुछ विशिष्ट पहचान थीं:

  1. रेखाओं पर मजबूत नियंत्रण: उनकी पेंटिंग्स में रेखाओं का बेहद कुशल प्रयोग दिखता है।
  2. रंगों की प्रचुरता: उनके कैनवास जीवंत रंगों से भरे होते थे जो जीवन की बहुलता को दर्शाते थे।
  3. व्यंग्यात्मक दृष्टि: उनकी रचनाओं में एक विशिष्ट व्यंग्यात्मक और विनोदी भाव होता था।
  4. आत्म-प्रस्तुति: लगभग हर पेंटिंग में कलाकार स्वयं को किसी न किसी रूप में प्रस्तुत करते – कभी विष्णु के रूप में, कभी मछली या पक्षी के रूप में, या वर्षा देवता के रूप में।
  5. प्रकृति और मानव का सहजीवी संबंध: उनकी कृतियों में प्रकृति और मानव के बीच एक अटूट और अविच्छिन्न संबंध दिखाई देता है।

सम्मान और पुरस्कार

रामचंद्रन को उनके योगदान के लिए अनेक सम्मान मिले:

  • 2005: पद्म भूषण (भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान)
  • 2002: ललित कला अकादमी का फेलो चुने गए
  • 2013: महात्मा गांधी विश्वविद्यालय, केरल से मानद डॉक्टरेट
  • 1991: केरल ललिता कला अकादमी के मानद अध्यक्ष नियुक्त
  • 1978 और 1980: नोमा कॉनकोर्स पुरस्कार (बाल पुस्तकों के लिए)

प्रदर्शनियां और विरासत

2003 में नेशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट, नई दिल्ली में उनकी कृतियों की एक बड़ी पूर्वव्यापी प्रदर्शनी आयोजित की गई। प्रोफेसर शिव कुमार द्वारा लिखित दो खंडों की व्यापक पुस्तक “ए. रामचंद्रन: ए रेट्रोस्पेक्टिव” भी इसी समय जारी की गई।

उनकी कृतियों की नीलामी में कीमतें 216 अमेरिकी डॉलर से लेकर 5,67,478 अमेरिकी डॉलर तक रही हैं। 2024 में “विजन्स ऑफ रामदेव, सॉन्ग ऑफ द शिंबुल ट्री” नामक डिप्टिक (युग्म चित्र) उनकी सबसे महंगी बिकने वाली कृति बनी।

2023 में केरल सरकार ने कोल्ला में उनके सम्मान में एक संग्रहालय स्थापित करने का प्रस्ताव रखा। रामचंद्रन ने व्यक्तिगत रूप से अपने करियर की प्रमुख कृतियों का चयन किया। संग्रहालय में बारह तैल चित्र, पांच जल रंग, दस पेन-एंड-इंक रेखाचित्र और अन्य महत्वपूर्ण रचनाएं शामिल हैं।

अंतिम दिन

10 फरवरी 2024 को 89 वर्ष की आयु में नई दिल्ली में रामचंद्रन का निधन हो गया। अंतिम समय तक वे राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों की यात्रा करते रहे और प्रकृति के विभिन्न रूपों को अपनी कला में समेटते रहे। उनका यह दुख था कि ग्रामीण परिवेश और जनजातीय जीवन धीरे-धीरे लुप्त हो रहा है। अपनी कला के माध्यम से उन्होंने एक काल्पनिक ब्रह्मांड की रचना की जो इन्हें सौंदर्य, शुद्धता और स्थायित्व प्रदान करता है।

कला जगत में योगदान

ए. रामचंद्रन भारतीय समकालीन कला के उन दुर्लभ कलाकारों में से थे जिन्होंने पश्चिमी आधुनिकतावाद से हटकर भारतीय कला परंपरा को समकालीन संदर्भ में पुनर्स्थापित किया। उन्होंने साबित किया कि यूरोपीय मानदंडों का अनुसरण किए बिना भी महत्वपूर्ण और प्रभावी कला रचना संभव है।

उनकी पांच दशकों की कलात्मक यात्रा भारतीय कला के विकास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। अभिव्यक्तिवाद से लेकर काव्यात्मक यथार्थवाद तक, शहरी पीड़ा से लेकर ग्रामीण सौंदर्य के उत्सव तक – उनकी कला ने निरंतर विकास और प्रयोग किया।

रामचंद्रन ने अपनी कला को “बहुरूपी” कहा था क्योंकि उन्होंने कभी खुद को किसी सीमा में बांधा नहीं। वे भारतीय सौंदर्यशास्त्र के महान आचार्य थे जिन्होंने परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत समन्वय किया। उनकी विरासत आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।

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