श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की शिष्य मण्डली के प्रमुख साधक नन्दलाल बसु थे ये कलाकार और विचारक दोनों थे।
उनके व्यक्तित्व में कलाकार और तपस्वी का अद्भुत सम्मिश्रण था चिन्तन के क्षणों में उन्होंने जो कुछ कहा या लिखा था, उसका उतना ही महत्व है जितना उनके चित्रों का उनके व्यक्तित्व पर अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, श्री राम कृष्ण परमहंस, महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का प्रभाव पड़ा।
नन्दलाल बसु का जन्म बिहार प्रदेश के मुंगेर जिले में हवेली खड़गपुर नामक ग्राम में 3 दिसम्बर सन् 1882 ई० को हुआ था। उनके पिता पूर्णचन्द्र वसु दरभंगा राज्य में इन्जीनियर थे।
उनकी माँ क्षेत्रमणि देवी करुणह्रदया एवं भक्त महिला थीं। माता-पिता के अकलुष और पवित्र स्वभाव का प्रभाव उन पर पड़ा। बचपन से ही उनमें कला के प्रति रुझान था।
📲 FREE Art History PDF Notes पाएं! 👉 💬 WhatsApp Join करें | ✈️ Telegram Join करेंआरम्भिक शिक्षा अपने ग्राम में ही प्राप्त कर 1897 ई० में उन्होंने कलकत्ता के खुदीराम बसु के माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ अध्ययन-काल में उन्होंने अनेक रेखाचित्रों का अंकन किया।
1902 ई० में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त ही वे तूलिका के जादू की ओर मुड़ गये। 1903 ई० में उनका विवाह हो गया।
1905 ई० में उन्हें राजकीय कला-विद्यालय कलकत्ता में प्रवेश की आज्ञा मिल गई और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की देख-रेख में उन्होंने अपना कला अभ्यास आगे बढ़ाया।
1910 ई० तक उन्हें 60 रु० मासिक की छात्रवृत्ति मिलती रही। इसी अवधि में उन्होंने रामायण की कथा वस्तु पर चित्र बनाना आरम्भ किया जिसमें से “सती का देहत्याग’ शीर्षक चित्र पर 1908 ई० में इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरियन्टल आर्ट की प्रथम प्रदर्शनी में 500 रु० का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
1909- 10 ई० में लेडी हेरिंघम की अध्यक्षता में अजन्ता की अनुकृतियाँ करने के लिये भी अवनी बाबू ने उन्हें भेजा। 1914 तक नन्दलाल बसु ने अपना अध्ययन पूरा कर लिया। इसके पश्चात् पर्सी ब्राउन महोदय ने उन्हें कला विद्यालय में अध्यापन के लिये आमन्त्रित किया किन्तु नन्द बाबू ने इसे स्वीकार नहीं किया।
अवनी बाबू ने उन्हें 60 रु० मासिक खर्चा अपनी ओर से देना जारी रखा। इस अवधि में ये अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सिस्टर निवेदिता, आनन्द कुमार स्वामी तथा मुकुल दे के विभिन्न कला- सम्बन्धी क्रियाकलापों में उनकी सहायता करते रहे।
इस समय में वे ओकाकुरा तथा काम्पो आराई नामक जापानी चित्रकारों के सम्पर्क में भी आये और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के काव्य संग्रहों तथा सर जगदीश चन्द्र बसु के विज्ञान भवन के लिये चित्रांकन किया।
1918 में इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएण्टल आर्ट में कुछ समय तक कला शिक्षण किया। 1919 से उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा शान्ति निकेतन में स्थापित विश्व भारती के कला विभाग में कार्य करना प्रारम्भ किया और 1922 में कला भवन के अध्यक्ष के रूप में उनकी विधिवत् नियुक्ति हो गयी।
1921 में उन्होंने बाघ गुफा चित्रों की भी अनुकृति की 1924 में नन्द बाबू रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ वर्मा, मलाया, चीन तथा जापान की यात्रा पर गये। 1934 में वे लंका गये।
1937 में उन्होंने फैजपुर काँग्रेस के पंडाल की सज्जा में सहयोग दिया तथा 1937- 38 की हरिपुरा कांग्रेस के पंडाल के लिये पोस्टर बनाये।
1939 में बड़ौदा के महाराज ने उन्हें कीर्ति मन्दिर की सज्जा के लिये आमन्त्रित किया। 1944 में उनकी पुस्तक “शिल्प कथा” प्रकाशित हुई।
1950 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय ने उन्हें डी० लिट् की उपाधि से सम्मानित किया। 1951 में उन्होंने शान्ति निकेतन से अवकाश ग्रहण किया।
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💬 WhatsApp Join करें✈️ Telegram Join करेंइसके पश्चात् भी वे निरन्तर चित्र-सृजन करते रहे। उन्हें देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया।
1952 में विश्व भारती ने “देशिकोत्तम, 1954 में भारत सरकार ने “पद्म विभूषण”, 1957 में कलकत्ता विश्व विद्यालय ने डी० लिट्, 1958 में कलकत्ता ललित कला अकादमी ने रजत जयन्ती पदक, 1963 में रवीन्द्र भारती विश्व विद्यालय ने डी० लिट् तथा 1965 में एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता ने रवीन्द्र-शताब्दी पदक से सम्मानित किया। कला जगत् की निरन्तर सेवा करते तथा अन्तिम क्षणों तक कला की साधना में लगे हुए उन्होंने 16 अप्रैल 1966 ई० को इस संसार से विदा ली।
नन्दलाल बसु की कला
बसु महोदय ने लगभग दस सहस्र चित्रों की सृष्टि की है। आधुनिक कलाकारों में वे ही अजन्ता के सर्वाधिक निकट हैं किन्तु उनकी मौलिकता उन्हें अजन्ता से पृथक भी कर देती है।
उनकी चित्रकारी के विषय अधिकांशतः पौराणिक तथा धार्मिक कथानकों एवं बुद्ध जीवन से लिए गए हैं। आरम्भ में कुछ कृतियाँ जल-रंगों में बनाई जिनमें हल्का- गहरा प्रभाव भी उत्पन्न किया गया। बाद में उन्होंने टैम्परा विधि से चित्रांकन किया।
बसु विज्ञान मन्दिर, शान्ति निकेतन के पुरातन पुस्तकालय भवन एवं चीना भवन तथा बड़ौदा के कीर्ति मन्दिर में भित्ति चित्रण टेकनीक का प्रयोग किया।
1928 में इटालियन भित्ति-लेप पद्धति से भी “दूल्हे की सवारी” नामक एक विशाल भित्ति चित्र बनाया। चीन जापान आदि की यात्रा से उनकी कला पर वहाँ का प्रभाव भी पड़ा जिसने उन्हें कला के मूल तत्वों की खोज के लिये प्रेरित किया।
इसी के आधार पर उन्होंने कहा था कि हम प्राणों के पुजारी है। आगे चलकर उन पर दीन-हीन श्रमिकों और महात्मा गांधी का बहुत प्रभाव पड़ा।
उन्होंने इनके आधार पर चित्रांकन किया और कांग्रेस अधिवेशनों के पण्डालों के लिये पोस्टर बनाये। इनके अतिरिक्त उन्होंने कीट पतंगों, पक्षियों, जन्तुओं, पशुओं, पौधों, पुष्पो, पर्वतों, कोहरे, वर्षा, बादल आदि का भी बड़ा ही मार्मिक अंकन किया है।
उनकी कला कार्डों के रूप में भारत के कोने-कोने में बिखरी हुई है। उनकी तूलिका स्पर्श (टच) अंकन की पद्धति में वस्तु की आकृति, भाव, मुद्रा के सूक्ष्म अध्ययन और तूलिका पर अधिकार का अद्भुत समन्वय है।
टच पद्धति के विषय में उनका कथन था कि टेम्परा विलम्बित है, टच द्रुत है। पर यह उस्ताद का काम है। वे ‘टच’ वर्क करते थे पर शिष्यों को मना करते थे क्योंकि इसके लिये ‘फार्म’ तथा ड्राइंग का सूक्ष्य ज्ञान आवश्यक है।
“पाण्डवों का हिमालय आरोहण’ नामक पन्द्रह फुट लम्बा चित्र उन्होंने एक घण्टे में बनाया था। उसमें उन्हें कहीं भी कुछ बदलना या सुधारना नहीं पड़ा।
उनका विलक्षण रेखांकन देखकर उनका नया छात्र कह उठता था कि ‘मास्टर महाशय, मुझे मालूम नहीं था कि गधा भी इतना सुन्दर होता है।
किन्तु कहीं-कहीं वे अलंकरणात्मक विवरणों में खो गये हैं जैसे “गंगावतरण” नामक चित्र में जो बड़ौदा के कीर्ति मन्दिर में अंकित है, अन्यथा उनकी रेखाओं में अत्यधिक जीवन प्रवाह है और कार्य में विविधता मानव शरीर की भंगिमाओं के जितने विविध रूप बसु महोदय में दिखाई पड़ते हैं उतने किसी अन्य कलाकार में नहीं।
एक सच्चे साधक के रूप में एक ओर वे कला के द्वारा परमानन्द की प्राप्ति मानते हैं तो दूसरी ओर कला को जन-साधारण के निम्न स्तर पर उतारने के बजाय जन साधारण को कला के उच्च स्तर तक उठाने तथा उनमें सौन्दर्य-दृष्टि उत्पन्न करने के पक्षपाती थे; जिसके अभाव में न भावात्मक उन्नयन हो सकता है। और न आनन्द की प्राप्ति ही हो सकती है; बल्कि जिसके अभाव में शारीरिक और मानसिक विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं।
अपने छात्रों के प्रति भी बसु महोदय का व्यवहार अत्यन्त स्नेहपूर्ण था। वे उनको अपनी मौलिकता का विकास करने हेतु ही प्रोत्साहित करते थे।
उनका विचार था कि चित्रकला प्रकृति की अनुकृति नहीं हैं नकल का न कोई अर्थ होता है और न कोई प्रयोजन कला एक सृजनात्मक क्रिया है जो चित्रकार के अपने स्वभाव तथा अर्न्तदृष्टि पर निर्भर करती है।
कला में वे सरलता और लयात्मकता का गुण परमावश्यक मानते थे। छात्रो के लिए लिखी गयी सचित्र पुस्तक रूपावलि की भूमिका में भी नन्द बाबू ने छन्द योजना पर बहुत बल दिया है।
सती का देह त्याग, भीष्म प्रतिज्ञा, धृतराष्ट्र और गांधारी, मीराबाई, कृष्ण और अर्जुन, उमा का तप, बसन्त, डांडी मार्च, गंगावतरण, महाभारत, युधिष्ठिर की अन्तिम यात्रा, चण्डालिका, शतरंज खेलते हुए कौरव पाण्डव तथा पर्वत का कोहरा आदि उनके कुछ प्रमुख चित्र हैं। नन्द बाबू की कला के विकास का निम्नलिखित स्वरूप है-
नन्द बाबू अवनीन्द्रनाथ के शिष्य थे। उनका सम्पर्क ई० बी० हैवेल, सिस्टर निवेदिता तथा आनन्द कुमारस्वामी से भी था।
उन्होंने रवीन्द्र नाथ ठाकुर के साथ पद्मा नदी की यात्रा की थी और बंगाल की प्राकृतिक सुषमा के दर्शन किये थे। उन्हें जापानी स्याही चित्रों की तकनीक का भी ज्ञान था।
आरम्भ में नन्दलाल ने अपने गुरु अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की वाश शैली का अनुकरण किया। 1920 से 1930 तक उन्होंने टेम्परा में आकृतियां बनाईं जिनके पीछे दृश्यों की पृष्ठभूमि भी चित्रित की।
इसके उपरान्त (1940) से उन्होंने आकृति चित्रण छोड़ दिया और प्रकृति-चित्रण में रम गये।
उनके आरम्भिक चित्रों में अजन्ता का प्रभाव है। श्रीकृष्ण-अर्जुन चित्र इसका अच्छा उदाहरण है। इसके पश्चात् उन्होंने अजन्ता की आकृति रचना एवं जापानी तकनीक मिला दिया। “उमा का दुःख” इस प्रकार का सुन्दर चित्र है।
शान्ति निकेतन के उनके चित्र बंगाल के पट चित्रों की भाँति सपाट हैं। “राधा का विरह” इसी प्रकार का चित्र है। अवनी बाबू के काम में जहाँ नाजुकपन था वहाँ नन्दबाबू के काम में ओज तथा भारीपन है।
इसी समय उन्होंने कुछ आलंकारिक ढंग के चित्र बनाये महिषासुर मर्दिनी में यह विशेषता देखी जा सकती है। ऐसे चित्र उन्होंने अधिक नहीं बनाये गंगावतरण भी ऐसा ही है।
अन्तिम युग में उन्होंने रंगीन चित्र अधिक नहीं बनाये। इनमें ‘टच वर्क” अधिक है। फैज़पुर तथा हरिपुरा अधिवेशनो के पोस्टरों में बंगाल की पट चित्रकला तथा गुजरात की सचित्र पाण्डुलिपियों का प्रभाव है।
वे वस्तुओं के बाह्य स्वरूप के बजाय उनके आन्तरिक गुणों पर अधिक बल देते थे।
- उनके चित्रों के विषयों को निम्न प्रकार रखा जा सकता है-
रामायण तथा महाभारत
श्री रामचन्द्र परिणय, सती का देह त्याग, उमा का तप, अहिल्योद्धार, भीष्म प्रतिज्ञा, शतरंज खेलते हुए कौरव-पांडव, कृष्ण और अर्जुन, कुरुक्षेत्र, धृतराष्ट्र और गान्धारी आदि। 2- धार्मिक पौराणिक बुद्ध और मेमना, शिव का विषपान, वीणा वादिनी, गंगावतरण, महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा, मछुआरों के मध्य ईसा आदि ।
ऐतिहासिक
पद्मिनी और भीमसिंह, मीराबाई का जीवन, राजगृह आदि ।
ऋतुएँ, पर्व तथा उत्सव- शीत काल में पद्मा पर, ग्रीष्म, सन्ध्या, बसन्त, रात्रि, बसन्तोत्सव, तूफान, पर्वत का कोहरा, नटीर पूजा आदि। 5- राजनीतिक- (भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से सम्बन्धित) डौंडी मार्च – गाँधी की डांडी यात्रा आदि।
जन-जीवन
ग्राम्य कुटी, संथाल युवती, चण्डालिका, दो महिलायें, सारंगी वादन, सपेरा आदि।
जीव-जन्तु तथा वृक्ष वनस्पति
जावा पुष्प, जलता हुआ चीड़ का वृक्ष सिंह, ऊँट, लोमड़ी, टिड्डा, गुलदाऊदी और स्लेटी पक्षी, भैंसों का झुण्ड, अरहर का पौधा, एक गधा आदि।
व्यक्ति चित्र
सी०एफ० एण्ड्रयूज के० एन० मजमूदार, वीरेन गोस्वामी, हीरे मुखर्जी, अब्दुल गफ्फार खाँ आदि।
वन्य प्रकृति- हरमुख गंगोत्री, पारसनाथ पहाड़ी आदि ।
जलीय दृश्य
जलाशय, गंगा नदी में नाव, जलधारा में मछलियाँ आदि। श्री रतन परिमू का विचार है कि नन्द बाबू को उनके द्वारा किये गये कार्यों की अपेक्षा बहुत अधिक सम्मान मिल गया। उनकी कला का आधुनिक भारत पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं है उनका अधिकांश कार्य वर्णनात्मक है।
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