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के०सी० एस० पणिक्कर | K.C.S.Panikkar

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के०सी० एस० पणिक्कर

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तमिलनाडु प्रदेश की कला काफी पिछड़ी हुई है। मन्दिरों से उसका अभिन्न सम्बन्ध होते हुए भी आधुनिक जीवन पर उसकी कोई छाप नहीं है। इसी प्रदेश के कायेम्बतूर नामक स्थान पर एक मध्यवर्गीय डाक्टर परिवार में पणिक्कर का जन्म (30 मई 1911-16 जनवरी 1977) हुआ था।  ⏰ जून 2026 से पहले LT Grade Art की तैयारी ...

के०सी० एस० पणिक्कर

तमिलनाडु प्रदेश की कला काफी पिछड़ी हुई है। मन्दिरों से उसका अभिन्न सम्बन्ध होते हुए भी आधुनिक जीवन पर उसकी कोई छाप नहीं है। इसी प्रदेश के कायेम्बतूर नामक स्थान पर एक मध्यवर्गीय डाक्टर परिवार में पणिक्कर का जन्म (30 मई 1911-16 जनवरी 1977) हुआ था। 

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इनकी प्रारम्भिक शिक्षा केरल में हुई। बचपन से ही इनकी प्राकृतिक दृश्य-चित्रण में रूचि थी। 1922 से 1926 तक इन्होंने ब्रिटिश दृश्य चित्रकारों को आदर्श मानकर चित्रांकन किया। 

1928 से 1930 के मध्य इन्होंने मदारा आर्ट सोसाइटी की अखिल भारतीय प्रदर्शनी में भाग लिया। कुछ समय तक मद्रास क्रिश्चियन कालेज में पढ़ने के बाद परिस्थितिवश इन्हें भारतीय तार विभाग तथा एक बीमा कम्पनी में नौकरी करनी पड़ी। 

1936 में देवीप्रसाद रायचौधुरी के निर्देशन में इन्होंने मद्रास कला विद्यालय में अपनी शिक्षा आरम्भ की और 1940 में डिप्लोमा तथा परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। 

1941 में महास कला -विद्यालय में ही इनकी नियुक्ति हो गयी और 1965 में उप-प्रधानाचार्य तथा 1957 में प्रधानाचार्य के पद को सम्भाला । 1955 में ही इन्हें केन्द्रीय ललित कला अकादमी का सदस्य मनोनीत कर लिया गया।

पणिक्कर के सहयोग से मदास के कलाकारों ने 1960 में प्रोग्रेसिव पेण्टर्स ऐसोसियेशन की स्थापना की थी। इन कलाकारों ने 1961 में एक पत्रिका भी निकाली थी। 

श्री पणिक्कर की प्रेरणा और सक्रिय सहयोग से मदास के लगभग 40 कलाकारों ने 1966 में चोलमण्डल सागर तट पर महाबलिपुरम के सामने कलाकारों के एक ग्राम की स्थापना की थी। शिल्पग्राम के विचार का यह विश्वभर में प्रथम प्रयोग था । यह गाँव सारे विश्व में निराला है। 

यहाँ सामूहिक जीवन नई दृष्टि प्रदान करता है। और कलाकार ऐच्छिक ढंग से पूर्ण स्वतंत्र होकर कार्य करता है, साथ ही वह मिलकर इस ग्राम को चलाता भी है। 1967 में पणिक्कर ने कला विद्यालय से अवकाश ले लिया।

इनके चित्रों का प्रथम प्रदर्शन 1926 में फाइन आर्टस सोसाइटी मद्रास की अखिल भारतीय प्रदर्शनी के साथ हुआ । 1938 में इन्हें फाइन आर्ट्स सोसाइटी पश्चिम बंगाल का पुरस्कार प्राप्त हुआ। इसके पश्चात् देश-विदेश में इनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियों आयोजित की गयीं।

पणिक्कर ने जीवन और समाज के अनुभवों को वैयक्तिक विधि से प्रस्तुत किया है जिसमें व्यंग्य का भी समावेश है विकृतियों में कहीं-कहीं फॉव कला आन्दोलन का भी प्रभाव झलकता है।

आरम्भ में पणिक्कर भावावेश का उद्रेक करने वाले दृश्यों का अंकन करते थे। मद्रास कला-विद्यालय में नियुक्त होने के पश्चात् इसे छोड़ दिया। फिर ये रेखा की संगीतात्मकता, प्रतीकों के साहचर्य तथा विचार की सहजता पर बल देने लगे। उनके चित्रों में रंग-संगतियों, प्रतीकों तथा रेखाओं का समन्वयात्मक सहज सौन्दर्य आने लगा।

1- गीता कपूर ने इसका आरम्भ 1944 में तथा विनायक पुरोहित ने 1948 में बताया है ।

जिनमें संघर्ष अथवा विरोध की स्थितियाँ उत्पन्न नहीं होती। पणिक्कर का कुछ कार्य तान्त्रिक कला से मिलता-जुलता भी है। उन्होंने रेखात्मक ज्यामितीय प्रतीकों, रंगों के ज्यामितीय क्षेत्रों तथा पढ़ी न जा सकने वाली लिपि के समान रेखात्मक चिन्हों के संयोग से कुछ ऐसे चित्र बनाये हैं जो किसी रहस्यात्मक तंत्र-साधना की पुस्तक के गूढ़ अर्थ वाले पृष्ठों के समान प्रतीत होते हैं। 

इनमें धरातल बहुत हल्के रंग के (प्रायः हल्के या फीके पीले) होते हैं। उनमें कहीं-कहीं हल्के रंगों से कुछ क्षेत्र बना दिये जाते हैं या रेखाओं या रंगों से छोटे-छोटे ज्यामितीय आकार बनाकर शेष स्थान में बारीक रेखाओं के द्वारा अस्पष्ट लिपि के समान चिन्ह बना दिये जाते हैं। 

चित्र के निचले भाग में गहरे रंग की क्षैतिज पट्टी होती है जिसमें श्वेत या श्वेत मिश्रित किसी अन्य रंग के कुछ चिन्ह चित्र के ऊपरी भाग के समान ही अंकित रहते हैं।

आदम और हव्वा, ईसा, बसन्त तथा पीला चित्र आदि आपकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। “धन्य हैं शान्ति दूत” नामक चित्र में अजन्ता तथा सितन्नवासल के समान विशाल संयोजन किया गया है। पणिक्कर के बसन्त (तैल, 1960) चित्र में आकृति की गोलाइयों का अत्यन्त कोमल प्रभाव उत्पन्न किया गया है। 

चित्र के डिजाइन में यद्यपि किंचित् विचित्रता है तथापि अत्यन्त प्रभावशाली है । चित्र तल के विस्तार का कुशलता से उपयोग किया गया है तथा रेखाओं का कम से कम प्रयोग है। 

तूलिका से अंकित रेखाओं में शरीर के कोमल स्थानों का सुन्दर संकेत दिया गया है। शरीर के अनुपात में शिर बड़े हैं जो लोक कला का प्रभाव दर्शाते हैं। मुखाकृतियों को बड़े आकार में तथा तिरछी भंगिमा में अंकित करना पणिक्कर की एक खास पहचान है। इनमें ग्रीवा कहीं-कहीं बहुत मुड़ी हुई हैं। 

बड़े-बड़े मत्स्याकृति नेत्रों में पुतलियों कटाक्ष की ओर चित्रित हुई हैं। यहाँ तक कि पशु आकृतियों में भी इसी प्रकार के नेत्र बनाये गये हैं जो राजपूत कलाकी परम्परागत प्रवृति के अनुसार है। ईसा की आकृति में भी यही विशेषताएँ मिल जाती हैं। अनेक चित्रों में मुखाकृति की तुलना में शरीर बहुत छोटा अंकित है जो बाल-कला की प्रवृत्ति है।

पणिक्कर की अनेक मानवाकृतियों में धड़ एक दण्ड की भांति है। दो आकृतियाँ, बसन्त, काली लड़की, पतिता तथा ईव आदि चित्रों में इसी का प्रयोग हुआ है। उनके शान्ति कर्ताओं के चित्र में पाश्चात्य एकेडेमिक शरीर शास्त्रीय नियमों का पर्याप्त प्रभाव है।

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