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TGT Art परीक्षा 2026 — 50 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर

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TGT Art परीक्षा 2026 — 50 महत्वपूर्ण प्रश्न और उत्तर

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TGT Art परीक्षा 2026 की तैयारी के लिए 50 महत्वपूर्ण प्रश्न और विस्तृत उत्तर। भारतीय कला इतिहास, चित्रकला शैलियाँ, वास्तुकला और लोक कला पर आधारित प्रश्नोत्तर। परिचय- TGT Art परीक्षा 2026 TGT (Trained Graduate Teacher) Art परीक्षा उन अभ्यर्थियों के लिए आयोजित की जाती है जो सरकारी विद्यालयों में कला विषय के शिक्षक बनना चाहते ...

TGT Art परीक्षा 2026

TGT Art परीक्षा 2026 की तैयारी के लिए 50 महत्वपूर्ण प्रश्न और विस्तृत उत्तर। भारतीय कला इतिहास, चित्रकला शैलियाँ, वास्तुकला और लोक कला पर आधारित प्रश्नोत्तर।

परिचय- TGT Art परीक्षा 2026

TGT (Trained Graduate Teacher) Art परीक्षा उन अभ्यर्थियों के लिए आयोजित की जाती है जो सरकारी विद्यालयों में कला विषय के शिक्षक बनना चाहते हैं। यह परीक्षा राज्य लोक सेवा आयोगों तथा अधीनस्थ सेवा चयन बोर्डों द्वारा संचालित की जाती है। परीक्षा में भारतीय कला का इतिहास, चित्रकला की विभिन्न शैलियाँ, मूर्तिकला, वास्तुकला, लोक कला, आधुनिक कला, कला के तत्व एवं सिद्धांत, तथा पाश्चात्य कला का इतिहास जैसे विषय सम्मिलित होते हैं। 2026 की TGT Art परीक्षा की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यहाँ 50 अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न और उनके विस्तृत उत्तर प्रस्तुत किए जा रहे हैं। ये प्रश्न परीक्षा के पाठ्यक्रम पर आधारित हैं और पिछले वर्षों के प्रश्नपत्रों के विश्लेषण के बाद तैयार किए गए हैं।

खंड 1 — भारतीय कला का इतिहास एवं प्रागैतिहासिक कला

भारतीय कला का इतिहास एवं प्रागैतिहासिक कला
भारतीय कला का इतिहास एवं प्रागैतिहासिक कला

प्रश्न 1: भारत में प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की सबसे महत्वपूर्ण स्थली कौन सी है और वहाँ किस प्रकार के चित्र पाए जाते हैं?

उत्तर: भारत में प्रागैतिहासिक शैलचित्रों की सबसे महत्वपूर्ण स्थली भीमबेटका (मध्य प्रदेश) है। यह स्थल रायसेन जिले में विंध्याचल की पहाड़ियों में स्थित है और इसे 2003 में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया। यहाँ लगभग 700 से अधिक शैलाश्रयों में हजारों चित्र मिले हैं जो पाषाण युग से लेकर ऐतिहासिक काल तक के हैं। इन चित्रों में मुख्यतः पशु आकृतियाँ जैसे बाइसन, हाथी, बाघ, हिरण; मानव आकृतियाँ; आखेट के दृश्य; युद्ध के दृश्य; नृत्य और धार्मिक अनुष्ठान के दृश्य चित्रित हैं। इन चित्रों में प्रयुक्त रंग मुख्यतः लाल गेरू, सफेद चूना, हरा और पीला थे। इन रंगों को पशुओं की चर्बी, पौधों के रस और खनिजों के साथ मिलाकर बनाया जाता था। भीमबेटका के अतिरिक्त होशंगाबाद, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश), सिंगनपुर, रायगढ़ (छत्तीसगढ़) में भी महत्वपूर्ण शैलचित्र पाए गए हैं।


प्रश्न 2: सिंधु घाटी सभ्यता की कला की प्रमुख विशेषताएँ क्या थीं?

उत्तर: सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग 2500-1500 ईसा पूर्व) की कला अत्यंत समृद्ध और विकसित थी। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं — पहली विशेषता यह है कि यहाँ की मूर्तिकला अत्यंत सूक्ष्म और यथार्थवादी थी। मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी की कांस्य प्रतिमा और योगी की पाषाण प्रतिमा (पुजारी राजा) इसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं। दूसरी विशेषता है कि यहाँ की मुहरें (Seals) अत्यंत कलात्मक थीं जो मुख्यतः साबुनपत्थर (Steatite) से बनाई जाती थीं। इन पर पशु आकृतियाँ, मानव आकृतियाँ और एक अज्ञात लिपि उत्कीर्ण थी। तीसरी विशेषता है कि मृद्भांड कला अत्यंत विकसित थी और मिट्टी के बर्तनों पर ज्यामितीय, पुष्पीय और पशु आकृतियाँ बनाई जाती थीं। चौथी विशेषता है कि यहाँ की नगर योजना भी एक प्रकार की वास्तुकला कला थी जो आधुनिक नगर नियोजन के समान थी। इसके अलावा यहाँ के आभूषण, खिलौने और लघु मूर्तियाँ भी उच्च कलात्मक स्तर की थीं।


प्रश्न 3: मौर्यकालीन कला की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? अशोक स्तंभों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मौर्यकाल (322-185 ईसा पूर्व) भारतीय कला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। इस काल में राजकीय संरक्षण में अत्यंत उत्कृष्ट कला का विकास हुआ। अशोक स्तंभ मौर्यकालीन कला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। ये स्तंभ चुनार के बलुआ पत्थर से निर्मित हैं और इनकी पालिश इतनी चमकदार है कि इसे आज भी दोहराया नहीं जा सका। प्रत्येक स्तंभ एकाश्म (एक ही पाषाण खंड से निर्मित) है। स्तंभों के शीर्ष पर पशु मूर्तियाँ हैं — सारनाथ स्तंभ पर चार सिंह हैं जो भारत का राष्ट्रीय चिह्न है। रामपुरवा स्तंभ पर बैल की आकृति है। इन स्तंभों की ऊँचाई 12 से 15 मीटर तक थी। मौर्यकालीन कला में गुफा वास्तुकला भी महत्वपूर्ण है — बराबर की गुफाएँ इसके उदाहरण हैं। यक्ष और यक्षी की मूर्तियाँ भी इस काल की महत्वपूर्ण विशेषता हैं जो पूर्णतः गोलाकार और जीवंत भावनाओं से परिपूर्ण हैं।


प्रश्न 4: गांधार शैली और मथुरा शैली में क्या अंतर है?

उत्तर: गांधार शैली और मथुरा शैली दोनों कुषाण काल (प्रथम-तृतीय शताब्दी ई.) में विकसित हुईं किंतु दोनों में मूलभूत अंतर है। गांधार शैली — यह शैली वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान क्षेत्र में विकसित हुई। इस पर यूनानी-रोमन (Greco-Roman) कला का गहरा प्रभाव था। यहाँ की मूर्तियाँ ग्रे स्लेट पत्थर से बनाई जाती थीं। बुद्ध की आकृतियाँ यूनानी देवता अपोलो के समान थीं — लहरदार बाल, मूँछें, गहरी आँखें और पतली नाक। वस्त्र शरीर पर पड़ी सलवटों सहित यथार्थवादी थे। इसमें आध्यात्मिकता की अपेक्षा भौतिक सौंदर्य अधिक था। मथुरा शैली — यह शैली मथुरा (उत्तर प्रदेश) में विकसित हुई और पूर्णतः भारतीय परंपरा पर आधारित थी। यहाँ चित्तीदार लाल बलुआ पत्थर का उपयोग होता था। बुद्ध की आकृतियाँ भारतीय यक्ष परंपरा से प्रेरित थीं — घुँघराले बाल, मुंडित सिर, पतले वस्त्र जो शरीर से चिपके होते थे। इसमें आध्यात्मिक भाव और शारीरिक शक्ति का सुंदर समन्वय था। मथुरा शैली ने ही आगे चलकर गुप्तकालीन कला को प्रेरित किया।


प्रश्न 5: गुप्तकाल को भारतीय कला का स्वर्णयुग क्यों कहा जाता है?

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उत्तर: गुप्तकाल (320-550 ई.) को भारतीय कला का स्वर्णयुग इसलिए कहा जाता है क्योंकि इस काल में कला के प्रत्येक क्षेत्र में असाधारण उत्कर्ष हुआ। मूर्तिकला में सारनाथ की बुद्ध प्रतिमा इस काल की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाती है। इसमें गांधार और मथुरा दोनों शैलियों का सर्वोत्तम समन्वय हुआ। बुद्ध की आकृति में आध्यात्मिक शांति, करुणा और दिव्य तेज का अद्भुत संयोग है। चित्रकला में अजंता की गुफाओं के चित्र गुप्तकालीन कला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इनमें रेखाओं की कोमलता, रंगों की विविधता और भावों की गहराई अतुलनीय है। वास्तुकला में दशावतार मंदिर (देवगढ़), भूमरा मंदिर, नचना-कुठारा मंदिर इस काल के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। इन मंदिरों में पंचायतन शैली और शिखर वास्तुकला का विकास हुआ। धातु कला में मेहरौली का लौह स्तंभ गुप्तकालीन धातु तकनीक का अद्भुत उदाहरण है जो आज भी जंग नहीं खाता। इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान सभी क्षेत्रों में एक साथ उत्कर्ष हुआ इसलिए इसे स्वर्णयुग कहा जाता है।


खंड 2 — चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ


प्रश्न 6: अजंता की गुफाओं की चित्रकला की विशेषताओं का विस्तार से वर्णन कीजिए।

उत्तर: अजंता की गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में वाघुर नदी के किनारे स्थित हैं। यहाँ कुल 30 गुफाएँ हैं जिनमें से 5 चैत्य (प्रार्थना कक्ष) और 25 विहार (आवास) हैं। यहाँ के चित्रों का काल मुख्यतः दो खंडों में बँटा है — पहला खंड हीनयान काल (200 ईसा पूर्व से 200 ई.) और दूसरा खंड महायान काल (400-650 ई.) जो गुप्त और वाकाटक काल का है। तकनीक — यहाँ फ्रेस्को-सेको (Fresco-Secco) तकनीक का प्रयोग किया गया। पहले दीवार पर मिट्टी, गोबर, भूसा और चूने का प्लास्टर किया गया, फिर उस पर चित्र बनाए गए। रंग — लाल गेरू, पीली गेरू, हरित मृत्तिका, लाजवर्द (नीला), काला कार्बन और सफेद चूने का उपयोग किया गया। विषयवस्तु — जातक कथाएँ, बुद्ध के जीवन प्रसंग, बोधिसत्व आकृतियाँ, दरबारी दृश्य, प्रकृति चित्रण। गुफा 1 की बोधिसत्व पद्मपाणि और बोधिसत्व वज्रपाणि की आकृतियाँ अजंता की सर्वश्रेष्ठ कृतियाँ मानी जाती हैं। इन चित्रों में त्रिभंग मुद्रा, रेखाओं की सुकोमलता और छाया-प्रकाश का अद्भुत प्रयोग किया गया है। अजंता के चित्रों को 1983 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया।


प्रश्न 7: राजपूत चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ कौन सी हैं? मेवाड़ शैली का विशेष वर्णन कीजिए।

उत्तर: राजपूत चित्रकला मुख्यतः दो भागों में विभाजित है — राजस्थानी शैली और पहाड़ी शैली। राजस्थानी शैली की प्रमुख उपशैलियाँ हैं — मेवाड़, मारवाड़, बूँदी, कोटा, जयपुर, किशनगढ़ और बीकानेर। मेवाड़ शैली — यह राजस्थानी चित्रकला की सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण शैली है। इसका उद्भव 15वीं शताब्दी में हुआ। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं — चटकीले और गाढ़े रंगों का प्रयोग जैसे लाल, पीला, हरा और नीला; पृष्ठभूमि में सरल प्राकृतिक दृश्य; मानव आकृतियों में लंबी गर्दन, बड़ी आँखें और कमानी जैसी भौंहें; रेखाओं की दृढ़ता। 1605 ई. में चित्रित “रागमाला” श्रृंखला मेवाड़ शैली की महत्वपूर्ण कृति है। चित्रकार नसीरुद्दीन और साहिबदीन मेवाड़ शैली के प्रमुख चित्रकार थे। साहिबदीन ने “रामायण” और “रसिकप्रिया” के चित्र बनाए। मेवाड़ शैली में भगवान कृष्ण की लीलाएँ, रागमाला, नायिका भेद और राजदरबार के दृश्य प्रमुख विषय थे।


विभिन्न मुगल शासकों के अधीन चित्रकला का विकास
विभिन्न मुगल शासकों के अधीन चित्रकला का विकास

प्रश्न 8: मुगल चित्रकला का उद्भव और विकास किस प्रकार हुआ? अकबर कालीन चित्रकला की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: मुगल चित्रकला का उद्भव 16वीं शताब्दी में हुआ। हुमायूँ ईरान से दो फारसी चित्रकारों मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस समद को भारत लाए। इन्होंने मुगल चित्रकला की नींव रखी। अकबर कालीन चित्रकला (1556-1605) — अकबर ने हमजानामा के चित्रण का आदेश दिया जिसमें 1400 पृष्ठ थे और इसे पूरा करने में 15 वर्ष लगे। इसमें लगभग 100 चित्रकारों ने भाग लिया। अकबरकालीन चित्रकला में फारसी और भारतीय शैलियों का अद्भुत समन्वय हुआ। दसवंत और बसावन इस काल के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार थे। अकबरकालीन चित्रों की प्रमुख विशेषताएँ हैं — विशाल आकार के चित्र, गतिशील और जीवंत आकृतियाँ, युद्ध और दरबारी दृश्यों की प्रधानता, भारतीय जन-जीवन का यथार्थ चित्रण, और बोल्ड रेखाएँ। इस काल में महाभारत (रज्मनामा), रामायण, अकबरनामा और बाबरनामा के चित्र बनाए गए।


प्रश्न 9: किशनगढ़ शैली की विशेषताएँ क्या हैं और “बनी-ठनी” चित्र क्यों प्रसिद्ध है?

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उत्तर: किशनगढ़ शैली राजस्थान की एक अत्यंत विशिष्ट चित्रकला शैली है जिसका विकास 18वीं शताब्दी में राजा सावंत सिंह (नागरीदास) के काल में हुआ। इस शैली के प्रमुख चित्रकार निहालचंद थे। किशनगढ़ शैली की विशेषताएँ — नायिकाओं की आकृतियाँ अत्यंत सुंदर और आदर्शीकृत हैं जिनमें कमान जैसी भौंहें, कमल की पंखुरी जैसी आँखें, लंबी और पतली नाक, पतले होंठ और लंबी गर्दन होती है। पृष्ठभूमि में कमल सरोवर, चाँदनी रात और प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण होता है। “बनी-ठनी” चित्र — यह निहालचंद की सर्वश्रेष्ठ कृति है जिसे भारतीय चित्रकला की “मोनालिसा” कहा जाता है। इसमें एक स्त्री आकृति को कृष्ण की प्रेमिका राधा के रूप में चित्रित किया गया है। यह वास्तव में राजा सावंत सिंह की प्रिय दासी और प्रेमिका “बनी-ठनी” का चित्रण है। इस चित्र में किशनगढ़ शैली की सभी विशेषताएँ अपने चरमोत्कर्ष पर हैं। भारत सरकार ने 1973 में इस चित्र पर एक डाक टिकट जारी किया था।


प्रश्न 10: पहाड़ी चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ कौन सी हैं? काँगड़ा शैली की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: पहाड़ी चित्रकला हिमालय की तलहटी में स्थित छोटी-छोटी रियासतों में 17वीं से 19वीं शताब्दी के बीच विकसित हुई। इसकी प्रमुख शैलियाँ हैं — बसोहली, गुलेर, काँगड़ा, चंबा, मंडी, कुल्लू और गढ़वाल। काँगड़ा शैली — यह पहाड़ी चित्रकला की सबसे प्रसिद्ध और विकसित शैली है। इसका उद्भव हिमाचल प्रदेश के काँगड़ा क्षेत्र में हुआ। राजा संसारचंद (1775-1823) के काल में यह शैली अपने चरम पर थी। काँगड़ा शैली की विशेषताएँ — इस शैली में श्रृंगार रस की प्रधानता है। प्रकृति चित्रण अत्यंत कोमल और सुंदर है — हिमालय की हरी-भरी वादियाँ, झरने, नदियाँ। नायिकाओं की आकृतियाँ अत्यंत कोमल और सुंदर हैं। रंगों में हल्के और पारदर्शी रंगों का प्रयोग होता है। गीत-गोविंद, रसिकप्रिया, बिहारी सतसई के दृश्यों का चित्रण प्रमुख है। नयनसुख काँगड़ा शैली के महत्वपूर्ण चित्रकार थे।


खंड 3 — भारतीय वास्तुकला


प्रश्न 11: भारतीय मंदिर वास्तुकला की नागर, द्रविड़ और वेसर शैलियों में क्या अंतर है?

उत्तर: भारतीय मंदिर वास्तुकला मुख्यतः तीन शैलियों में विभाजित है। नागर शैली — यह उत्तर भारत की मंदिर शैली है। इसमें मंदिर का शिखर ऊँचा, घुमावदार और रेखीय होता है जो ऊपर जाकर आँवले के आकार के आमलक में समाप्त होता है। मंदिर का तल-विन्यास वर्गाकार होता है। गर्भगृह के ऊपर शिखर होता है। खजुराहो, भुवनेश्वर, कोणार्क के मंदिर इस शैली के उदाहरण हैं। द्रविड़ शैली — यह दक्षिण भारत की मंदिर शैली है। इसमें शिखर के स्थान पर विमान होता है जो पिरामिड की तरह सीढ़ीनुमा होता है। मंदिर परिसर बड़े प्रांगण से घिरा होता है जिसमें गोपुरम (प्रवेश द्वार) होते हैं। ये गोपुरम विमान से भी ऊँचे और अत्यंत अलंकृत होते हैं। तंजावुर, मदुरई के मंदिर इसके उदाहरण हैं। वेसर शैली — यह नागर और द्रविड़ शैलियों का मिश्रण है और मुख्यतः कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में पाई जाती है। चालुक्य और होयसल मंदिर इसके उदाहरण हैं। होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिड) वेसर शैली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।


प्रश्न 12: खजुराहो के मंदिरों की स्थापत्य एवं मूर्तिकला विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: खजुराहो के मंदिर मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित हैं और इन्हें चंदेल राजाओं ने 950-1050 ई. के बीच बनवाया था। यूनेस्को ने इन्हें 1986 में विश्व धरोहर स्थल घोषित किया। मूलतः यहाँ 85 मंदिर थे जिनमें से अब केवल 25 अवशेष हैं। स्थापत्य विशेषताएँ — मंदिर ऊँचे जगती (चबूतरे) पर निर्मित हैं। शिखर पंचायतन शैली का है जिसमें मुख्य शिखर के चारों ओर छोटे-छोटे उपशिखर होते हैं। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में होता है। अर्धमंडप, मंडप, महामंडप, अंतराल और गर्भगृह का क्रमिक विभाजन होता है। मूर्तिकला विशेषताएँ — मंदिरों की बाहरी दीवारों पर अत्यंत विस्तृत मूर्तिकला है जिसमें देवी-देवताओं, अप्सराओं, मिथुन मूर्तियों और सांसारिक जीवन के दृश्यों का चित्रण है। मिथुन मूर्तियाँ भारतीय दर्शन में काम (इच्छा) को मोक्ष की ओर बढ़ने का एक मार्ग मानती हैं। कंदारिया महादेव मंदिर खजुराहो का सबसे बड़ा और सुंदर मंदिर है।


प्रश्न 13: मुगल वास्तुकला की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? ताजमहल का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मुगल वास्तुकला भारतीय और फारसी-इस्लामिक वास्तुकला का अद्भुत संयोग है। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं — बड़े गुंबद, मेहराबें, मीनारें, विशाल प्रांगण, बगीचों का उपयोग (चारबाग शैली), संगमरमर और लाल बलुआ पत्थर का उपयोग, पित्रा दुरा (Pietra Dura) अर्थात पत्थरों में रंगीन पत्थर जड़ने की कला। ताजमहल — यह आगरा में यमुना नदी के किनारे स्थित है। इसे मुगल सम्राट शाहजहाँ ने अपनी प्रिय बेगम मुमताज महल की याद में 1632-1653 ई. के बीच बनवाया। इसे “श्वेत संगमरमर की स्वप्नकथा” और “प्रेम का प्रतीक” कहा जाता है। यह यूनेस्को विश्व धरोहर है और विश्व के सात आश्चर्यों में से एक है। ताजमहल की मुख्य इमारत 57 मीटर ऊँची है। इसके चारों कोनों पर 40 मीटर ऊँची मीनारें हैं। मुख्य गुंबद प्याज के आकार का (Bulbous Dome) है। इसके निर्माण में उस्ताद अहमद लाहौरी मुख्य वास्तुकार थे। पित्रा दुरा की नक्काशी, जालीदार काम और कुरान की आयतों का सुंदर अंकन ताजमहल को अतुलनीय बनाता है।


प्रश्न 14: बौद्ध वास्तुकला के प्रमुख तत्व कौन से हैं? सांची स्तूप का वर्णन कीजिए।

उत्तर: बौद्ध वास्तुकला के प्रमुख तत्व हैं — स्तूप (अर्धगोलाकार टीला जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे जाते थे), चैत्यगृह (प्रार्थना कक्ष), विहार (भिक्षुओं के आवास) और स्तंभ। सांची स्तूप — यह मध्य प्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है। महान स्तूप (स्तूप संख्या 1) का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक ने तृतीय शताब्दी ईसा पूर्व में आरंभ किया था और बाद में शुंग, सातवाहन और गुप्त शासकों ने इसे विस्तार दिया। इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं — अंड (अर्धगोलाकार टीला), हर्मिका (अंड के ऊपर चौकोर बाड़ा), यष्टि (छत्र लगाने के लिए केंद्रीय स्तंभ), वेदिका (परिक्रमा मार्ग की रेलिंग) और तोरण (प्रवेश द्वार)। सांची के चारों तोरण (उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम) अत्यंत सुंदर मूर्तिकला से सजाए हुए हैं। इनमें जातक कथाएँ, बुद्ध के जीवन प्रसंग और प्रतीकात्मक चित्रण है। प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानवीय रूप में नहीं बल्कि बोधि वृक्ष, पादचिह्न, छत्र, धर्मचक्र आदि प्रतीकों के रूप में दर्शाया गया। सांची को 1989 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया।


खंड 4 — लोक कला और जनजातीय कला


प्रश्न 15: मधुबनी चित्रकला की उत्पत्ति, विशेषताएँ और विषयवस्तु का वर्णन कीजिए।

उत्तर: मधुबनी चित्रकला बिहार के मिथिला क्षेत्र में उत्पन्न हुई है और इसे मिथिला चित्रकला भी कहते हैं। यह परंपरागत रूप से महिलाओं द्वारा घर की दीवारों और आँगन में विशेष अवसरों पर बनाई जाती थी। उत्पत्ति — इसकी उत्पत्ति की कथा रामायण काल से जोड़ी जाती है जब राजा जनक ने अपनी पुत्री सीता के विवाह के अवसर पर इस क्षेत्र के लोगों को घर सजाने के लिए चित्र बनाने को कहा था। विशेषताएँ — प्राकृतिक रंगों का उपयोग (हल्दी, पलाश फूल, नील, कालिख आदि से बनाए गए रंग); दोहरी रूपरेखा; ज्यामितीय और पुष्पीय आकृतियों की भरमार; रिक्त स्थान न छोड़ना (प्रत्येक खाली स्थान को भरना); अत्यंत सुंदर और जटिल रेखाकारी। विषयवस्तु — हिंदू देवी-देवता, रामायण और महाभारत के प्रसंग, प्रकृति के तत्व (सूर्य, चंद्र, वृक्ष, पशु-पक्षी), विवाह और अन्य संस्कारों के दृश्य। इसमें पाँच उपशैलियाँ हैं — भारनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर। 1969 में बिहार के सूखे के समय इसे कागज पर उतारा गया और तब से यह व्यावसायिक स्तर पर भी बनाई जाने लगी।


प्रश्न 16: वारली चित्रकला क्या है? इसकी प्रमुख विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: वारली चित्रकला महाराष्ट्र की वारली जनजाति की पारंपरिक चित्रकला है जो मुख्यतः पालघर, थाणे और नासिक जिलों में प्रचलित है। यह चित्रकला घरों की दीवारों पर विशेषकर विवाह और अन्य अनुष्ठानों के अवसर पर बनाई जाती है। विशेषताएँ — यह श्वेत रंग (चावल के लेप से) को लाल-भूरी पृष्ठभूमि (गाय के गोबर और मिट्टी) पर बनाई जाती है। इसमें केवल ज्यामितीय आकृतियों का उपयोग होता है — वृत्त, त्रिभुज और वर्ग। मानव आकृतियाँ दो त्रिभुजों से बनती हैं जो एक बिंदु पर मिलते हैं। इसमें सामूहिक जीवन के दृश्य — नृत्य, शिकार, खेती, त्योहार — का चित्रण होता है। तारपा नृत्य (वारली जनजाति का पारंपरिक नृत्य) इस चित्रकला का मुख्य विषय है। जीव सोमा म्हसे और उनकी पत्नी बाळू म्हसे ने 1970 के दशक में इस कला को देशव्यापी पहचान दिलाई। आज यह कला कैनवास, कागज और वस्त्रों पर भी बनाई जाती है।


प्रश्न 17: पट्टचित्र क्या है? ओडिशा की पट्टचित्र शैली की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: पट्टचित्र ओडिशा की एक प्राचीन और समृद्ध चित्रकला परंपरा है। “पट्ट” का अर्थ है कपड़ा या कैनवास और “चित्र” का अर्थ है चित्रकारी। यह मुख्यतः पुरी जिले के रघुराजपुर गाँव में बनाई जाती है जो इस कला का प्रमुख केंद्र है। विशेषताएँ — कपड़े पर इमली के बीज का लेप लगाकर तैयार किया गया कैनवास प्रयुक्त होता है। खनिजों और प्राकृतिक स्रोतों से तैयार रंगों का उपयोग होता है। चटकीले और गहरे रंग जैसे लाल, पीला, नीला, सफेद, काला और हरा। रेखाएँ अत्यंत बारीक और दृढ़ होती हैं। विषयवस्तु — भगवान जगन्नाथ की लीलाएँ, दशावतार, महाभारत और रामायण के प्रसंग, राधा-कृष्ण। पट्टचित्र में एक विशेष बॉर्डर होती है जो प्रत्येक चित्र को घेरती है। श्रेय और श्रेयस्कर परिवारों के चित्रकार इस कला के प्रमुख वाहक हैं। इस कला को GI (भौगोलिक संकेत) टैग प्राप्त है।


प्रश्न 18: गोंड चित्रकला की उत्पत्ति और विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: गोंड चित्रकला मध्य प्रदेश की गोंड जनजाति की पारंपरिक कला है। गोंड जनजाति मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में पाई जाती है। डिंडोरी जिला गोंड चित्रकला का प्रमुख केंद्र है। उत्पत्ति — गोंड मान्यता के अनुसार अच्छे दर्शन से शुभ होता है इसलिए वे अपने घरों की दीवारों और फर्श पर सुंदर चित्र बनाते थे। विशेषताएँ — इस चित्रकला में बिंदुओं और रेखाओं (Dots and Dashes) का अत्यधिक उपयोग होता है जो आकृतियों को भरने के काम आते हैं। प्रकृति (पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, नदी, पहाड़) गोंड चित्रकला का प्रमुख विषय है। रंग चटकीले और विविध होते हैं। जंगल की कथाएँ और लोक देवता इसके प्रमुख विषय हैं। जनगढ़ सिंह श्याम गोंड चित्रकला के सबसे प्रसिद्ध और आधुनिक चित्रकार हैं जिन्होंने इसे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनके बाद भज्जू श्याम, दुर्गा बाई व्याम ने भी इस कला को आगे बढ़ाया।


खंड 5 — कला के तत्व और सिद्धांत


प्रश्न 19: कला के मूलभूत तत्व कौन से हैं? रेखा और रूप का महत्व समझाइए।

उत्तर: कला के मूलभूत तत्व (Elements of Art) निम्नलिखित हैं — रेखा (Line), रूप/आकार (Shape/Form), रंग (Color), मूल्य/टोन (Value/Tone), बनावट (Texture), अवकाश/स्थान (Space) और रेखा-संरचना (Line-composition)। रेखा — रेखा कला का सबसे मौलिक तत्व है। यह दो बिंदुओं के बीच की दूरी है। रेखाएँ कई प्रकार की होती हैं — क्षैतिज रेखाएँ (शांति और स्थिरता का भाव), ऊर्ध्वाधर रेखाएँ (शक्ति और ऊँचाई का भाव), विकर्ण रेखाएँ (गति और गतिशीलता का भाव), वक्र रेखाएँ (कोमलता और लय का भाव)। रेखा किसी भी आकृति की परिसीमा बनाती है, गति दिखाती है और भावनाएँ व्यक्त करती है। रूप/आकार — द्विआयामी (2D) को आकार (Shape) कहते हैं और त्रिआयामी (3D) को रूप (Form) कहते हैं। आकार दो प्रकार के होते हैं — ज्यामितीय (वृत्त, वर्ग, त्रिभुज) और जैविक (अनियमित, प्राकृतिक)। रूप में ऊँचाई, चौड़ाई और गहराई तीनों आयाम होते हैं जैसे मूर्तिकला और वास्तुकला।


प्रश्न 20: रंग सिद्धांत क्या है? प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक रंगों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: रंग सिद्धांत (Color Theory) कला और डिजाइन का एक महत्वपूर्ण आधार है। प्राथमिक रंग (Primary Colors) — ये वे मूल रंग हैं जो किसी अन्य रंग को मिलाकर नहीं बनाए जा सकते। ये तीन हैं — लाल (Red), नीला (Blue) और पीला (Yellow)। इन्हें RYB भी कहते हैं। द्वितीयक रंग (Secondary Colors) — दो प्राथमिक रंगों को समान मात्रा में मिलाने से द्वितीयक रंग बनते हैं — लाल + पीला = नारंगी (Orange), पीला + नीला = हरा (Green), नीला + लाल = बैंगनी (Violet)। तृतीयक रंग (Tertiary Colors) — एक प्राथमिक और एक द्वितीयक रंग को मिलाने से बनते हैं जैसे लाल-नारंगी, पीला-हरा आदि। रंग चक्र (Color Wheel) — यह 12 रंगों का चक्र है। पूरक रंग (Complementary Colors) — रंग चक्र में आमने-सामने के रंग (जैसे लाल और हरा) पूरक होते हैं। अनुरूप रंग (Analogous Colors) — रंग चक्र में पास-पास के रंग। गर्म रंग (Warm Colors) — लाल, नारंगी, पीला — उत्तेजना और ऊर्जा के भाव। ठंडे रंग (Cool Colors) — नीला, हरा, बैंगनी — शांति और शीतलता के भाव।


प्रश्न 21: कला के सिद्धांत कौन से हैं? संतुलन और अनुपात का महत्व बताइए।

उत्तर: कला के सिद्धांत (Principles of Art/Design) निम्नलिखित हैं — संतुलन (Balance), अनुपात (Proportion), लय (Rhythm), एकता (Unity), वैविध्य (Variety), बल (Emphasis/Dominance), गति (Movement) और सामंजस्य (Harmony)। संतुलन (Balance) — यह किसी चित्र या रचना में दृश्य भार का समान वितरण है। यह तीन प्रकार का होता है — सममित संतुलन (Symmetrical) जिसमें दोनों पक्ष समान होते हैं; असममित संतुलन (Asymmetrical) जिसमें दोनों पक्ष असमान किंतु दृश्यतः संतुलित होते हैं; और रेडियल संतुलन (Radial) जिसमें तत्व एक केंद्र से चारों ओर फैले होते हैं जैसे पहिया। अनुपात (Proportion) — यह किसी रचना के विभिन्न तत्वों के बीच आकार का संबंध है। गोल्डन रेशियो (1:1.618) कला और प्रकृति में आदर्श अनुपात माना जाता है। मानव शरीर के अनुपात को कैनन (Canon) कहते हैं। भारतीय शास्त्रीय कला में तालमान पद्धति से मूर्तियों के अनुपात निर्धारित किए जाते थे।


खंड 6 — आधुनिक एवं समकालीन भारतीय कला


प्रश्न 22: राजा रवि वर्मा को भारतीय आधुनिक चित्रकला का जनक क्यों कहा जाता है?

उत्तर: राजा रवि वर्मा (1848-1906) केरल के एक राजपरिवार में जन्मे थे। उन्हें भारतीय आधुनिक चित्रकला का जनक इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने पहली बार भारतीय परंपरागत विषयों को पाश्चात्य यथार्थवादी (Realistic) तकनीक और तैल रंग (Oil Colors) से चित्रित किया। उन्होंने कैनवास पर काम किया जो भारत में उस समय अपेक्षाकृत नया था। उनके चित्रों में भारतीय देवी-देवताओं और पौराणिक कथाओं का ऐसा यथार्थवादी चित्रण हुआ जो आम जनता को बहुत पसंद आया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — “शकुंतला”, “दमयंती और हंस”, “लक्ष्मी”, “सरस्वती”। उन्होंने लिथोग्राफी प्रेस स्थापित करके अपने चित्रों की छपाई करवाई जिससे सस्ते मूल्य पर छपी देवी-देवताओं की तस्वीरें आम घरों तक पहुँचीं। इससे भारतीय धार्मिक कैलेंडर कला (Calendar Art) का उद्भव हुआ। हालाँकि अवनींद्रनाथ ठाकुर जैसे कलाकारों ने रवि वर्मा की पाश्चात्य शैली की आलोचना की और वे बंगाल स्कूल के माध्यम से भारतीय कला परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास किए।


प्रश्न 23: बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट क्या था? अवनींद्रनाथ ठाकुर और नंदलाल बसु का योगदान बताइए।

उत्तर: बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में स्थापित भारतीय राष्ट्रवादी कला आंदोलन था। यह ब्रिटिश उपनिवेशवाद के दौरान भारतीय कला परंपरा को पुनर्जीवित करने का प्रयास था। अवनींद्रनाथ ठाकुर (1871-1951) — वे रवींद्रनाथ ठाकुर के भतीजे थे और बंगाल स्कूल के संस्थापक थे। उन्होंने वाश तकनीक (Wash Technique) का उपयोग करके अजंता और राजपूत चित्रकला से प्रेरित एक नई शैली विकसित की। उनका सबसे प्रसिद्ध चित्र “भारत माता” है जिसमें भारत को एक साड़ी पहने देवी के रूप में दिखाया गया है जो चार हाथों में पुस्तक, अन्न, माला और श्वेत वस्त्र धारण करती हैं। नंदलाल बसु (1882-1966) — वे अवनींद्रनाथ के प्रमुख शिष्य थे और शांतिनिकेतन में कला शिक्षक थे। उन्होंने भारतीय संविधान की मूल पांडुलिपि को चित्रों से सजाया। हड़प्पा कन्या, दुर्गा, अर्धनारीश्वर उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। बंगाल स्कूल ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को सांस्कृतिक पहचान दी।


प्रश्न 24: प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (PAG) का भारतीय आधुनिक कला में क्या महत्व है?

उत्तर: प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (PAG) की स्थापना 1947 में मुंबई में फ्रांसिस न्यूटन सूजा (F.N. Souza) ने की। इसके अन्य संस्थापक सदस्यों में सैयद हैदर रजा (S.H. Raza), मकबूल फिदा हुसैन (M.F. Husain), के.एच. आरा, एच.ए. गाडे और सदानंद बाकरे शामिल थे। इस समूह का उद्देश्य भारतीय कला को पाश्चात्य आधुनिकतावाद (क्यूबिज्म, एक्सप्रेशनिज्म आदि) से प्रेरणा लेकर नई दिशा देना था। एम.एफ. हुसैन — भारत के सबसे प्रसिद्ध और विवादास्पद आधुनिक चित्रकार। उन्हें “पिकासो ऑफ इंडिया” भी कहा जाता है। घोड़ों की श्रृंखला उनकी पहचान बनी। एस.एच. रजा — उनकी “बिंदु” (Bindu) श्रृंखला विश्वप्रसिद्ध है। वे मुख्यतः अमूर्त (Abstract) कला के लिए जाने जाते हैं। एफ.एन. सूजा — उनके चित्रों में मानव आकृतियाँ विकृत और अभिव्यंजनावादी (Expressionist) शैली में हैं। PAG ने भारतीय आधुनिक कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई।


खंड 7 — पाश्चात्य कला का इतिहास


प्रश्न 25: पुनर्जागरण कला (Renaissance Art) की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? लियोनार्डो दा विंची का योगदान बताइए।

उत्तर: पुनर्जागरण (Renaissance) 14वीं से 17वीं शताब्दी के बीच यूरोप में हुआ सांस्कृतिक और बौद्धिक आंदोलन था जिसका उद्भव इटली में हुआ। विशेषताएँ — यथार्थवाद (Realism) और मानवतावाद (Humanism) पर बल; परिप्रेक्ष्य (Perspective) का वैज्ञानिक प्रयोग जिससे चित्रों में त्रिआयामी गहराई आई; शारीरिक सौंदर्य और अनुपात पर ध्यान; धार्मिक विषयों के साथ-साथ धर्मनिरपेक्ष और पौराणिक विषयों का चित्रण; प्राचीन यूनानी-रोमन कला से प्रेरणा। लियोनार्डो दा विंची (1452-1519) — वे “Renaissance Man” कहलाते थे क्योंकि वे चित्रकार, मूर्तिकार, वास्तुकार, वैज्ञानिक और आविष्कारक सभी थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — “मोनालिसा” (Mona Lisa) — जो विश्व की सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग है और जिसमें “Sfumato” तकनीक (धुँधली और नरम रूपरेखाएँ) का उपयोग है; “द लास्ट सपर” (The Last Supper) — जो मिलान में एक चर्च की दीवार पर बनी है और जिसमें यीशु और उनके 12 शिष्यों का अंतिम भोज दर्शाया गया है। लियोनार्डो का “विट्रुवियन मैन” मानव शरीर के आदर्श अनुपात का चित्रण है।


प्रश्न 26: प्रभाववाद (Impressionism) क्या है? इसके प्रमुख चित्रकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: प्रभाववाद (Impressionism) 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में फ्रांस में उत्पन्न एक कला आंदोलन था। इस शैली के चित्रकार प्रकृति में खुले वातावरण (Plein Air) में काम करते थे और प्रकाश के क्षणिक प्रभाव को पकड़ने की कोशिश करते थे। विशेषताएँ — छोटी-छोटी और दृश्यमान ब्रशस्ट्रोक (Visible Brushstrokes); रंगों को मिलाने की बजाय उन्हें एक-दूसरे के पास रखना; प्राकृतिक प्रकाश और उसके परिवर्तनों पर ध्यान; रोजमर्रा के जीवन के दृश्य। इस आंदोलन को इसका नाम क्लॉड मोने (Claude Monet) की पेंटिंग “Impression, Sunrise” से मिला। प्रमुख चित्रकार — क्लॉड मोने (1840-1926) — जल के प्रतिबिंबों और प्रकाश परिवर्तन के लिए प्रसिद्ध (Waterlilies श्रृंखला); पियरे-ऑगस्त रेनुआर (Pierre-Auguste Renoir) — मानव आकृतियों और सामाजिक जीवन के लिए प्रसिद्ध; एडगर देगा (Edgar Degas) — नर्तकियों के चित्रण के लिए प्रसिद्ध; कैमिल पिसारो (Camille Pissarro) — ग्रामीण जीवन के चित्रण के लिए जाने जाते थे।


प्रश्न 27: क्यूबिज्म (Cubism) क्या है? पाब्लो पिकासो का योगदान बताइए।

उत्तर: क्यूबिज्म (Cubism) 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में पेरिस में विकसित एक क्रांतिकारी कला आंदोलन था। इसे पाब्लो पिकासो और जॉर्ज ब्राक ने मिलकर विकसित किया। विशेषताएँ — किसी वस्तु को एक साथ कई दृष्टिकोणों से दिखाना; वस्तुओं को ज्यामितीय रूपों (घन, त्रिभुज, गोले) में तोड़ना; परंपरागत परिप्रेक्ष्य को नकारना। क्यूबिज्म दो चरणों में था — विश्लेषणात्मक क्यूबिज्म (Analytic Cubism) जिसमें वस्तुओं को तोड़ा जाता था और संश्लेषणात्मक क्यूबिज्म (Synthetic Cubism) जिसमें कोलाज का उपयोग होता था। पाब्लो पिकासो (1881-1973) — उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं — “Les Demoiselles d’Avignon” (1907) — यह क्यूबिज्म की पहली और सबसे महत्वपूर्ण कृति मानी जाती है जिसमें पाँच महिला आकृतियाँ विकृत और कोणीय रूपों में हैं। “Guernica” (1937) — स्पेनिश गृहयुद्ध में बमबारी की त्रासदी को दर्शाता यह विशाल चित्र युद्ध-विरोधी कला का प्रतीक बन गया। पिकासो ने अपने जीवन में लगभग 20,000 से अधिक कलाकृतियाँ बनाईं।


प्रश्न 28: अतियथार्थवाद (Surrealism) क्या है? साल्वाडोर डाली का वर्णन कीजिए।

उत्तर: अतियथार्थवाद (Surrealism) 1920 के दशक में फ्रांस में उत्पन्न एक कला और साहित्यिक आंदोलन था। इसकी स्थापना आंद्रे ब्रेटन (Andre Breton) ने की। यह सिगमंड फ्रायड के अचेतन मन (Subconscious Mind) और स्वप्न विश्लेषण के सिद्धांतों से प्रेरित था। विशेषताएँ — स्वप्न और कल्पना की यथार्थ से अधिक यथार्थवादी प्रस्तुति; असंबंधित वस्तुओं का अजीब संयोजन; तार्किकता का अभाव। साल्वाडोर डाली (Salvador Dali, 1904-1989) — स्पेनिश अतियथार्थवादी चित्रकार। उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति है “The Persistence of Memory” (1931) जिसमें पिघलती घड़ियाँ एक उजाड़ परिदृश्य में दिखाई गई हैं — यह समय की तरलता और सपनों की दुनिया का प्रतीक है। डाली की कृतियाँ अत्यंत विस्तृत, फोटोग्राफिक और विचित्र संयोगों से भरी होती थीं। रेने मैग्रिट (Rene Magritte) बेल्जियन अतियथार्थवादी चित्रकार थे जो दार्शनिक प्रश्न उठाने के लिए जाने जाते थे। उनकी “The Treachery of Images” (पाइप का चित्र जिस पर लिखा है “यह पाइप नहीं है”) अत्यंत प्रसिद्ध है।


खंड 8 — मूर्तिकला और धातुकला


प्रश्न 29: दक्षिण भारत की चोल कालीन कांस्य मूर्तिकला की विशेषताएँ बताइए।

उत्तर: चोल काल (9वीं-13वीं शताब्दी) भारतीय धातु मूर्तिकला का स्वर्णयुग था। इस काल में बनी कांस्य मूर्तियाँ विश्व के श्रेष्ठतम मूर्तिकला उदाहरणों में गिनी जाती हैं। तकनीक — चोल मूर्तियाँ “मधुच्छिष्ट विधि” (Lost Wax Process / Cire Perdue) से बनाई जाती थीं। इसमें पहले मोम से मूर्ति बनाई जाती थी, फिर उस पर मिट्टी का लेप चढ़ाया जाता था। मिट्टी को पकाने पर मोम बाहर निकल जाता था और बने साँचे में पिघला हुआ काँसा (ताँबा, टिन और जस्ते का मिश्रण) डाला जाता था। विशेषताएँ — शरीर की सुंदर गोलाई, कोमल और तरल भाव-भंगिमाएँ, आभूषणों और वस्त्रों का अत्यंत सूक्ष्म और विस्तृत अंकन। नटराज की मूर्ति चोलकालीन धातु मूर्तिकला की सर्वोच्च उपलब्धि है। इसमें शिव ताण्डव नृत्य की मुद्रा में हैं, चारों ओर आग की लपटें (आनन्दतांडव का अग्नि मंडल), एक पैर के नीचे अपस्मार (अज्ञान का प्रतीक बौना) है। पार्वती, उमा महेश्वर और कल्याण सुंदर की मूर्तियाँ भी इस काल की महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं।


प्रश्न 30: एलोरा की गुफाओं की कला और वास्तुकला का वर्णन कीजिए।

उत्तर: एलोरा की गुफाएँ महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित हैं और इन्हें 1983 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यहाँ कुल 34 गुफाएँ हैं जो तीन धर्मों — बौद्ध, हिंदू और जैन — से संबंधित हैं। बौद्ध गुफाएँ (1-12) — ये मुख्यतः विहार हैं। गुफा 10 (विश्वकर्मा गुफा) एक भव्य चैत्य है। हिंदू गुफाएँ (13-29) — इनमें कैलाश मंदिर (गुफा 16) सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। यह मंदिर ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया गया है (Rock-cut) और यह एकाश्म (एक ही चट्टान से) निर्मित दुनिया का सबसे बड़ा मंदिर है। इसका निर्माण राष्ट्रकूट राजा कृष्ण प्रथम ने 8वीं शताब्दी में करवाया था। इसकी दीवारों पर रावण द्वारा कैलाश उठाना, महिषासुरमर्दिनी, नटराज आदि के अत्यंत भव्य मूर्ति-पटल हैं। जैन गुफाएँ (30-34) — इनमें अत्यंत सुंदर और सूक्ष्म मूर्तिकला है। गुफा 32 (इंद्रसभा) और 33 (जगन्नाथ सभा) सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।


खंड 9 — कला शिक्षा और अन्य महत्वपूर्ण विषय


प्रश्न 31: भारत के प्रमुख कला संस्थानों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: भारत में कई महत्वपूर्ण कला संस्थान हैं जो कला शिक्षा और संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। 1. सर जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुंबई (1857) — यह भारत का सबसे पुराना कला विद्यालय है जिसकी स्थापना ब्रिटिश काल में हुई। 2. कला भवन, विश्वभारती, शांतिनिकेतन (1919) — इसकी स्थापना रवींद्रनाथ ठाकुर ने की और नंदलाल बसु इसके प्रमुख थे। यह भारतीय कला परंपरा और आधुनिक शिक्षा का अद्भुत संगम है। 3. राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय (NGMA), नई दिल्ली (1954) — यह भारत का सबसे बड़ा आधुनिक कला संग्रहालय है। 4. ललित कला अकादमी, नई दिल्ली (1954) — यह भारत सरकार का कला संस्थान है जो कला को प्रोत्साहन देता है। 5. राष्ट्रीय कला एवं शिल्प संग्रहालय (IGNCA), नई दिल्ली — यह भारतीय सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण के लिए कार्य करता है। 6. MS विश्वविद्यालय, बड़ौदा (1950) — यह भारत का एक प्रमुख कला विश्वविद्यालय है।


प्रश्न 32: टेम्पेरा, फ्रेस्को और तैल चित्रण में क्या अंतर है?

उत्तर: टेम्पेरा (Tempera) — यह एक प्राचीन चित्रण माध्यम है जिसमें रंगद्रव्य (Pigment) को अंडे की जर्दी (Egg Yolk) या गोंद के साथ मिलाया जाता है। यह शीघ्र सूखता है और रंग टिकाऊ होते हैं। अजंता के कुछ चित्र और यूरोपीय मध्यकालीन चित्रकला में इसका प्रयोग हुआ। फ्रेस्को (Fresco) — इसमें गीले प्लास्टर पर रंग लगाए जाते हैं। दो प्रकार होते हैं — बुओन फ्रेस्को (Buon Fresco) जिसमें गीले प्लास्टर पर पानी में घुले रंग लगाए जाते हैं और फ्रेस्को-सेको (Fresco-Secco) जिसमें सूखे प्लास्टर पर रंग लगाए जाते हैं। अजंता के चित्र फ्रेस्को-सेको तकनीक में हैं। माइकेलएंजेलो का सिस्टिन चैपल बुओन फ्रेस्को का उत्कृष्ट उदाहरण है। तैल चित्रण (Oil Painting) — इसमें रंगद्रव्य को अलसी का तेल (Linseed Oil) या अन्य वनस्पति तेल के साथ मिलाया जाता है। यह धीरे सूखता है जिससे सुधार और मिश्रण की सुविधा रहती है। पुनर्जागरण काल से यह पाश्चात्य कला का प्रमुख माध्यम बना। राजा रवि वर्मा ने भारत में इस माध्यम को लोकप्रिय बनाया।


प्रश्न 33: मुद्रण कला (Printmaking) की प्रमुख तकनीकें कौन सी हैं?

उत्तर: मुद्रण कला में चित्र को एक माध्यम पर उकेरकर उसकी एकाधिक प्रतिकृतियाँ बनाई जाती हैं। प्रमुख तकनीकें हैं — 1. उभरी मुद्रण (Relief Printing) — इसमें उभरे हिस्सों पर स्याही लगाई जाती है। इसके प्रकार हैं — काष्ठखोदाई (Woodcut/Wood Block Printing) और लिनोकट (Linocut)। 2. धँसी मुद्रण (Intaglio) — इसमें धँसे हिस्सों में स्याही भरी जाती है। इसके प्रकार हैं — एचिंग (Etching) — तेजाब से धातु पर रेखाएँ बनाना; एनग्रेविंग (Engraving) — बूरिन से धातु पर रेखाएँ खोदना; एक्वाटिंट (Aquatint) — टोन बनाने के लिए। 3. समतल मुद्रण (Planographic) — इसमें सतह न उभरी न धँसी होती है। लिथोग्राफी (Lithography) — इसमें पत्थर या धातु की समतल सतह पर तेल-आधारित स्याही से चित्र बनाया जाता है। 4. स्क्रीन प्रिंटिंग / सिल्क-स्क्रीन (Screen Printing) — इसमें जाली के माध्यम से स्याही धकेली जाती है। 5. मोनोटाइप (Monotype) — इसमें केवल एक ही प्रतिकृति बनती है।


प्रश्न 34: कोलकाता (कलकत्ता) कलम और पटना कलम में क्या अंतर है?

उत्तर: कलकत्ता कलम (Company Style) — यह चित्रकला शैली 18वीं-19वीं शताब्दी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के काल में विकसित हुई। इसे “कंपनी पेंटिंग” भी कहते हैं। भारतीय चित्रकारों ने यूरोपीय व्यापारियों और अधिकारियों के लिए भारतीय विषयों को पाश्चात्य जलरंग (Watercolor) तकनीक में बनाया। इसमें भारतीय व्यवसायों, पशु-पक्षियों, वनस्पतियों और दरबारी दृश्यों का चित्रण होता था। पटना कलम (Patna Style) — यह शैली पटना (बिहार) में 18वीं-19वीं शताब्दी में विकसित हुई। यह मुगल चित्रकला का एक स्थानीय रूप था। इसमें मुख्यतः बाजार के दृश्य, पेशेवर लोगों के दृश्य (कारीगर, व्यापारी, नाई, धोबी आदि) का चित्रण होता था। शिवलाल और हुलास लाल पटना कलम के प्रमुख चित्रकार थे। दोनों शैलियों में पाश्चात्य और भारतीय परंपराओं का मिश्रण है किंतु पटना कलम अधिक भारतीय है जबकि कलकत्ता कलम में यूरोपीय प्रभाव अधिक है।


प्रश्न 35: भारतीय लघु चित्रकला की सामान्य विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: भारतीय लघु चित्रकला (Miniature Painting) छोटे आकार पर अत्यंत बारीक और विस्तृत चित्रण की कला है। इसकी सामान्य विशेषताएँ हैं — आधार — मुख्यतः हाथी दाँत, कागज, कपड़ा या ताड़पत्र। आकार — सामान्यतः बहुत छोटा। रेखाएँ — अत्यंत बारीक और सटीक, महीन बालों से बनी तूलिका (गिलहरी के बालों से) का उपयोग। रंग — खनिज और वनस्पति रंगों का उपयोग; सोने और चाँदी के वर्क (Foil) का प्रयोग। परिप्रेक्ष्य — इसमें पाश्चात्य वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य (Linear Perspective) के बजाय ऊर्ध्वाधर परिप्रेक्ष्य का उपयोग होता है — ऊपर जो है वह दूर है। पृष्ठभूमि — एकवर्णीय या सजावटी। विषयवस्तु — पौराणिक कथाएँ, रागमाला, बारहमासा (बारह महीनों के दृश्य), नायिका भेद, प्रेम-प्रसंग। भारत में लघु चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ हैं — मुगल, राजपूत (राजस्थानी) और पहाड़ी।


प्रश्न 36: बौद्ध कला में प्रतीकों का क्या महत्व है? प्रमुख बौद्ध प्रतीकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: प्रारंभिक बौद्ध कला में बुद्ध को मानवीय रूप में नहीं बल्कि प्रतीकों के माध्यम से दर्शाया जाता था। प्रमुख बौद्ध प्रतीक — बोधि वृक्ष (Bodhi Tree) — ज्ञान प्राप्ति का प्रतीक; धर्मचक्र (Dharmachakra) — बुद्ध के प्रथम उपदेश का प्रतीक, अष्टांगिक मार्ग का प्रतीक; पादचिह्न (Footprints) — बुद्ध की उपस्थिति का प्रतीक; सिंहासन (Empty Throne) — बुद्ध की महिमा का प्रतीक; छत्र (Parasol) — महानता और राजसत्ता का प्रतीक; स्तूप — परिनिर्वाण का प्रतीक; कमल (Lotus) — पवित्रता का प्रतीक; मृग (Deer) — सारनाथ में प्रथम उपदेश का स्मरण। बाद में महायान काल में बुद्ध को मानवीय रूप में दिखाया जाने लगा। बुद्ध की मूर्तियों में 32 महापुरुष लक्षण होते हैं जैसे उष्णीष (सिर पर उभार), उर्णा (माथे पर बिंदी), लंबे कान आदि।


प्रश्न 37: भारत में वस्त्र और हस्तशिल्प कला के प्रमुख केंद्र कौन से हैं?

उत्तर: भारत में वस्त्र और हस्तशिल्प की एक अत्यंत समृद्ध परंपरा है। वस्त्र कला — बनारसी साड़ी (वाराणसी) — रेशम पर सोने-चाँदी की जरी; कांचीपुरम साड़ी (तमिलनाडु) — रेशम की बुनावट; पटोला (पाटण, गुजरात) — इकत बुनावट; चंदेरी और महेश्वरी (मध्य प्रदेश); बंधनी (राजस्थान, गुजरात) — बाँधकर रंगाई; कशीदाकारी (Phulkari) (पंजाब); कासव काम (कश्मीर) — ऊनी शॉल। हस्तशिल्प — बीदरी कला (बीदर, कर्नाटक) — काले धातु पर चाँदी की जड़ाई; धोकरा धातुशिल्प (बस्तर, छत्तीसगढ़) — मधुच्छिष्ट विधि; ब्लू पॉटरी (जयपुर); टेराकोटा (मोलेला, राजस्थान); चंदन की लकड़ी नक्काशी (मैसूर, कर्नाटक); पिछवाई (नाथद्वारा, राजस्थान) — कपड़े पर कृष्ण-लीला के विशाल चित्र। इनमें से कई को GI (भौगोलिक संकेत) टैग प्राप्त है।


प्रश्न 38: अमूर्त कला (Abstract Art) क्या है? इसके प्रमुख कलाकारों का वर्णन कीजिए।

उत्तर: अमूर्त कला (Abstract Art) वह कला है जिसमें प्रकृति या वास्तविकता का प्रत्यक्ष चित्रण न होकर रंगों, रेखाओं और रूपों के माध्यम से भाव और विचार व्यक्त किए जाते हैं। यह 20वीं शताब्दी में विकसित हुई। प्रमुख शैलियाँ — एब्सट्रैक्ट एक्सप्रेशनिज्म (Abstract Expressionism) जो अमेरिका में 1940-50 के दशक में विकसित हुई। जैक्सन पोलक इसके प्रमुख कलाकार थे जो कैनवास पर रंग टपकाकर (Drip Painting) चित्र बनाते थे। वासिली कैंडिंस्की को अमूर्त कला का जनक माना जाता है। पीट मोंड्रियन ने नव-प्लास्टिसिज्म (Neo-Plasticism) में काम किया — केवल क्षैतिज और ऊर्ध्वाधर रेखाओं और तीन मूल रंगों का उपयोग। भारत में — एस.एच. रजा की “बिंदु” श्रृंखला, वी.एस. गायतोंडे के अमूर्त चित्र, राम कुमार की अमूर्त कृतियाँ महत्वपूर्ण हैं।


प्रश्न 39: भारतीय कला में नायिका भेद क्या है? इसके प्रमुख प्रकार बताइए।

उत्तर: नायिका भेद भारतीय काव्यशास्त्र और चित्रकला दोनों की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है। यह श्रृंगार रस की नायिकाओं का वर्गीकरण है। भानुदत्त की “रसमंजरी” इस विषय का प्रमुख ग्रंथ है। प्रमुख वर्गीकरण — नायिकाएँ मुख्यतः आठ प्रकार की होती हैं जिन्हें “अष्टनायिका” कहते हैं — 1. वासकसज्जा — जो प्रेमी की प्रतीक्षा में सज-सँवर कर बैठी हो; 2. विरहोत्कंठिता — जो प्रेमी के विरह में व्याकुल हो; 3. स्वाधीनपतिका — जिसका पति उसके वश में हो; 4. कलहान्तरिता — जो कलह के बाद पछता रही हो; 5. खंडिता — जिसका पति किसी अन्य स्त्री के पास रात बिताकर आया हो; 6. विप्रलब्धा — जिसे प्रेमी ने धोखा दिया हो; 7. प्रोषितपतिका — जिसका पति परदेश गया हो; 8. अभिसारिका — जो प्रेमी से मिलने जाने के लिए निकली हो। नायिका भेद के चित्र राजपूत और पहाड़ी चित्रकला में बहुतायत में मिलते हैं।


प्रश्न 40: रागमाला चित्रकला क्या है? इसका भारतीय चित्रकला में क्या महत्व है?

उत्तर: रागमाला संगीत रागों के भावों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त करने की भारतीय परंपरा है। “राग” का शाब्दिक अर्थ है “भाव” या “रंग”। भारतीय संगीत में प्रत्येक राग एक विशेष मौसम, समय और भाव से जुड़ा है। रागमाला चित्रकला में इन्हीं रागों को पुरुष (राग) और स्त्री (रागिणी) के रूप में मानवीकृत करके चित्रित किया जाता है। उदाहरण के लिए — भैरव राग — प्रातःकाल का राग, इसमें शिव का ध्यान करते योगी का चित्रण होता है; मेघ मल्हार राग — वर्षा ऋतु का राग, इसमें मेघों और वर्षा का चित्रण होता है; बसंत रागिणी — वसंत ऋतु का रागिणी, इसमें फूलों से भरे बगीचे और नायिकाएँ होती हैं। महत्व — रागमाला भारतीय कला, संगीत, काव्य और दर्शन के अद्भुत संगम का उदाहरण है। यह भारत की समन्वयवादी सांस्कृतिक परंपरा का प्रतीक है। रागमाला चित्रकला की परंपरा मुख्यतः मेवाड़, मारवाड़, बूँदी, जोधपुर और अन्य राजपूत शैलियों में समृद्ध रही।


प्रश्न 41: एलिफेंटा की गुफाओं का कला-ऐतिहासिक महत्व क्या है?

उत्तर: एलिफेंटा की गुफाएँ मुंबई के पास अरब सागर में एलिफेंटा द्वीप पर स्थित हैं। इन्हें 1987 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया। यहाँ की गुफाएँ मुख्यतः शैव धर्म से संबंधित हैं और राष्ट्रकूट काल (6ठी-8वीं शताब्दी) में निर्मित मानी जाती हैं। प्रमुख कलाकृतियाँ — “त्रिमूर्ति” (Maheshmurti) — यह भारतीय मूर्तिकला की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक है। इस विशाल तीन मुख वाली प्रतिमा में शिव के तीन रूप हैं — अघोर/भैरव (बाईं ओर, संहारक रूप), तत्पुरुष (मध्य में, शांत और दिव्य रूप), और वामदेव/उमा (दाईं ओर, स्त्रीरूप/सृजनात्मक रूप)। यह मूर्ति लगभग 6 मीटर ऊँची है और इसे “एशिया की मोनालिसा” कहा जाता है। अन्य महत्वपूर्ण मूर्ति-पटल हैं — अर्धनारीश्वर (शिव और पार्वती का समन्वित रूप), नटराज, शिव-पार्वती विवाह, रावण द्वारा कैलाश उठाना। इन मूर्तियों में विशाल आकार, भव्य मुद्राएँ और भावों की गहराई एलिफेंटा को अद्वितीय बनाती है।


प्रश्न 42: दृष्टिबाधित छात्रों के लिए कला शिक्षा कैसे दी जानी चाहिए?

उत्तर: दृष्टिबाधित छात्रों के लिए कला शिक्षा में स्पर्श (Tactile) पद्धतियों का उपयोग किया जाना चाहिए। कुछ महत्वपूर्ण उपाय हैं — 1. स्पर्शकला (Tactile Art) — मिट्टी, काँच, मखमल, रेत जैसी विभिन्न बनावटों से बनी वस्तुओं को छूकर उन्हें पहचानना और बनाना। 2. त्रिआयामी मॉडल — स्थापत्य कला और मूर्तियों के स्पर्श करने योग्य मॉडल बनाना। 3. मूर्तिकला — मिट्टी और साबुन जैसी नरम सामग्री से मूर्तियाँ बनाना जिसमें दृष्टि की जरूरत कम होती है। 4. उभरी रेखाएँ — विशेष कागज और पेन से उभरी रेखाओं वाले चित्र बनाना। 5. श्रव्य विवरण — ऑडियो गाइड और विस्तृत मौखिक वर्णन से कला-सराहना विकसित करना। 6. सुगंध और स्पर्श — प्राकृतिक सामग्रियों जैसे पत्तियों, फूलों और पत्थरों का उपयोग करके संवेदनशीलता विकसित करना। 7. ब्रेल कला पुस्तकें — कला इतिहास और सिद्धांत की ब्रेल में जानकारी। इस प्रकार समावेशी शिक्षा (Inclusive Education) के सिद्धांत के अनुसार दृष्टिबाधित छात्र भी कला-शिक्षा का लाभ उठा सकते हैं।


प्रश्न 43: भारतीय कला में “षड्अंग” सिद्धांत क्या है?

उत्तर: षड्अंग (Six Limbs of Indian Art) भारतीय चित्रकला का एक प्राचीन सैद्धांतिक ग्रंथ है। यह वात्स्यायन के कामसूत्र में उल्लिखित है और बाद में यशोधर पंडित ने अपनी “जयमंगला” टीका में इसकी व्याख्या की। षड्अंग के छह तत्व हैं — 1. रूपभेद — विभिन्न वस्तुओं और प्राणियों के रूपों का ज्ञान; 2. प्रमाण — सही अनुपात और माप का ज्ञान; 3. भाव — चित्र में भावनाओं और मनोभावों की सही अभिव्यक्ति; 4. लावण्ययोजना — सौंदर्य की उचित योजना और रचना; 5. सादृश्य — वस्तुओं की यथार्थ समानता; 6. वर्णिकाभंग — रंगों का उचित प्रयोग और मिश्रण। षड्अंग सिद्धांत बताता है कि भारत में हजारों वर्ष पहले ही कला के वैज्ञानिक मानदंड निर्धारित हो चुके थे। यह सिद्धांत चित्रकार के लिए एक दिशानिर्देश था जो बताता था कि श्रेष्ठ चित्र में क्या-क्या गुण होने चाहिए।


प्रश्न 44: ऑप आर्ट (Op Art) और पॉप आर्ट (Pop Art) में क्या अंतर है?

उत्तर: ऑप आर्ट (Op Art / Optical Art) 1960 के दशक में विकसित एक कला आंदोलन था। इसमें दृश्य भ्रम (Visual Illusions) उत्पन्न करने के लिए ज्यामितीय पैटर्न और रंगों का उपयोग किया जाता है। दर्शक को चित्र देखते समय गति, कंपन और त्रिआयामी भाव महसूस होता है। विक्टर वासारेली (Victor Vasarely) और ब्रिजेट राइली (Bridget Riley) इसके प्रमुख कलाकार हैं। पॉप आर्ट (Pop Art) 1950-60 के दशक में ब्रिटेन और अमेरिका में विकसित हुआ। यह उपभोक्ता संस्कृति, विज्ञापन, फिल्म और लोकप्रिय संस्कृति के चित्रों और छवियों का उपयोग करता है। यह उच्च कला और जन-संस्कृति के बीच की सीमा को मिटाता है। एंडी वारहोल (Andy Warhol) — “कैम्पबेल्स सूप कैन” और “मेरिलिन मोनरो” श्रृंखला के लिए प्रसिद्ध हैं। रॉय लिचेंस्टीन (Roy Lichtenstein) — कॉमिक बुक शैली में चित्र बनाते थे। मुख्य अंतर — ऑप आर्ट दृश्य और मनोवैज्ञानिक अनुभव पर केंद्रित है जबकि पॉप आर्ट सामाजिक टिप्पणी और लोकप्रिय संस्कृति पर केंद्रित है।


प्रश्न 45: भारतीय कला के संदर्भ में “तालमान” प्रणाली क्या है?

उत्तर: तालमान भारतीय शास्त्रीय मूर्तिकला और चित्रकला में मानव शरीर के अनुपात निर्धारण की परंपरागत प्रणाली है। “ताल” का अर्थ है हथेली (चेहरे की लंबाई) और इसी को मानक इकाई मानकर पूरे शरीर के अनुपात निर्धारित किए जाते थे। भारत में चित्र-लक्षण, मानसार, शिल्पशास्त्र जैसे ग्रंथों में तालमान का विस्तृत वर्णन है। प्रमुख मान — नवताल — नौ तालों के बराबर ऊँचाई — देवताओं के लिए; अष्टताल — आठ तालों की ऊँचाई — राजाओं और नायकों के लिए; सप्तताल — सात तालों की ऊँचाई — सामान्य मानव पुरुष के लिए; षट्ताल — छह तालों की ऊँचाई — स्त्री आकृतियों के लिए। इसके अनुसार नाभि शरीर के ठीक बीच में, कंधे की चौड़ाई दो तालों के बराबर आदि नियम होते हैं। यह प्रणाली ग्रीस के कैनन ऑफ पॉलीक्लेटस के समान ही है जो मानव शरीर के आदर्श अनुपात की बात करता है।


प्रश्न 46: कला समीक्षा (Art Criticism) के प्रमुख चरण क्या हैं?

उत्तर: कला समीक्षा किसी कलाकृति का व्यवस्थित और तर्कसंगत विश्लेषण और मूल्यांकन है। इसके प्रमुख चरण हैं — 1. वर्णन (Description) — इस चरण में कलाकृति में जो कुछ दिखता है उसका तटस्थ और वस्तुनिष्ठ वर्णन किया जाता है। क्या दिखाई दे रहा है? कौन-कौन से रंग, रेखाएँ और आकार हैं? 2. विश्लेषण (Analysis) — इस चरण में कला के तत्वों (रेखा, रंग, रूप, बनावट, स्थान) और सिद्धांतों (संतुलन, अनुपात, लय) के आधार पर विश्लेषण किया जाता है। 3. व्याख्या (Interpretation) — इस चरण में यह समझने की कोशिश की जाती है कि चित्रकार क्या कहना चाहता था। कलाकृति का अर्थ, प्रतीक और भाव क्या हैं? 4. निर्णय/मूल्यांकन (Judgment/Evaluation) — इस अंतिम चरण में कलाकृति की गुणवत्ता का समग्र मूल्यांकन किया जाता है। यह कितनी सफल है और क्यों? एडमंड फेल्डमैन (Edmund Feldman) ने इस चार-चरणीय पद्धति को लोकप्रिय बनाया। कला शिक्षा में इस पद्धति का उपयोग छात्रों में कला-सराहना (Art Appreciation) विकसित करने के लिए किया जाता है।


प्रश्न 47: होयसल वास्तुकला की विशेषताएँ क्या हैं?

उत्तर: होयसल राजवंश ने 11वीं से 14वीं शताब्दी के बीच कर्नाटक में शासन किया और उनके काल में अत्यंत विशिष्ट वास्तुकला शैली विकसित हुई। होयसल वास्तुकला की विशेषताएँ — तारे के आकार का तल-विन्यास (Star-shaped Plan) — मंदिर का आधार एक जटिल बहुकोणीय तारे के आकार में होता है जो पूरी इमारत में ऊपर तक चलता है। यह इसकी सबसे विशिष्ट पहचान है। सोपानक्रमीय अलंकरण — दीवारों पर क्षैतिज पट्टियाँ (Friezes) होती हैं जिनमें नीचे से ऊपर की ओर हाथियों की कतार, घोड़ों की कतार, पुष्पीय पट्टी, पशुओं की पट्टी, देवताओं की आकृतियाँ और महाकाव्य के दृश्य होते हैं। मूर्तियों की प्रचुरता — पूरी दीवार मूर्तियों से ढकी होती है जो अत्यंत सूक्ष्म और विस्तृत है। क्लोराइटिक शिस्ट (Chloritic Schist) — होयसल मंदिर इस नरम पत्थर से बने हैं जो खुदाई में आसान था। प्रमुख मंदिर — होयसलेश्वर मंदिर (हलेबिड), चेन्नकेशव मंदिर (बेलूर) और केशव मंदिर (सोमनाथपुरम)।


प्रश्न 48: भारतीय कला के संदर्भ में “गंधर्व कला” और “दैव कला” में क्या अंतर है?

उत्तर: भारतीय कलाशास्त्र में चित्रकला को उसकी प्रकृति और उद्देश्य के आधार पर वर्गीकृत किया गया है। सद्यस्क और अन्य ग्रंथों में मुख्यतः चित्रकला को दो श्रेणियों में रखा गया है। दैव (धार्मिक) चित्रकला — इसमें देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और धार्मिक विषयों का चित्रण होता है। इसमें प्रतिमा लक्षण और आगम ग्रंथों के नियमों का पालन आवश्यक होता है। मंदिरों की दीवारों और धार्मिक पांडुलिपियों में यह प्रकार मिलता है। अजंता के जातक चित्र, पट्टचित्र की कृष्णलीला इसके उदाहरण हैं। मानव/लौकिक चित्रकला — इसमें राजदरबार के दृश्य, प्रेम-प्रसंग, प्रकृति, युद्ध और सांसारिक जीवन के दृश्य होते हैं। राजपूत और मुगल चित्रकला के दरबारी दृश्य इसके उदाहरण हैं। व्यापक अर्थ में भारतीय कलाशास्त्र में चित्रकला के चित्र, व्यंग्यचित्र (Caricature), चित्र-प्रतिमा आदि अनेक प्रकार भी वर्णित हैं।


प्रश्न 49: कोणार्क का सूर्य मंदिर भारतीय वास्तुकला में क्यों महत्वपूर्ण है?

उत्तर: कोणार्क का सूर्य मंदिर ओडिशा के पुरी जिले में स्थित है और इसे राजा नरसिंहदेव प्रथम (1238-1264 ई.) ने बनवाया था। यह नागर शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है। इसे 1984 में यूनेस्को विश्व धरोहर घोषित किया गया। इसे “ब्लैक पैगोडा” भी कहते हैं क्योंकि यह समुद्री यात्रियों को दूर से काला दिखता था। विशेषताएँ — मंदिर को एक विशाल रथ के रूप में बनाया गया है जिसमें 12 जोड़े पहिए (24 पहिए) और 7 घोड़े हैं। ये 12 पहिए वर्ष के 12 महीनों का और 7 घोड़े सप्ताह के 7 दिनों का प्रतीक हैं। प्रत्येक पहिया धूपघड़ी (Sundial) का काम करता है जिससे समय बताया जा सकता है। मूर्तिकला — मंदिर की बाहरी दीवारों पर देव-आकृतियाँ, अप्सराएँ, मिथुन मूर्तियाँ, पशु आकृतियाँ और जीवन के विभिन्न पहलुओं का अत्यंत विस्तृत चित्रण है। “कोणार्क नर्तकी” की प्रतिमा ओडिसी नृत्य की एक क्लासिक मुद्रा में है और अत्यंत प्रसिद्ध है।


प्रश्न 50: भारतीय कला के संदर्भ में “सहजीवन चित्रकला” (Syncretic Art) का क्या अर्थ है? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर: सहजीवन या समन्वयवादी चित्रकला वह कला है जिसमें दो या दो से अधिक सांस्कृतिक, धार्मिक या शैलीगत परंपराओं का अद्भुत मिश्रण होता है। भारत की बहुसांस्कृतिक परंपरा ने विश्व की कुछ सर्वश्रेष्ठ समन्वयवादी कलाओं को जन्म दिया। प्रमुख उदाहरण —

1. मुगल चित्रकला — फारसी-इस्लामिक और भारतीय-हिंदू परंपराओं का समन्वय। फारसी शैली की बारीक कारीगरी और भारतीय जीवंतता और रंगों का संयोग।

2. गांधार कला — यूनानी-रोमन और भारतीय बौद्ध परंपराओं का समन्वय।

3. विजयनगर वास्तुकला — द्रविड़, होयसल और इस्लामी तत्वों का समन्वय।

4. दक्कनी चित्रकला — बीजापुर और गोलकुंडा में विकसित यह शैली ईरानी, तुर्की और भारतीय परंपराओं का मिश्रण है।

5. बंगाल स्कूल — भारतीय परंपरा (अजंता, राजपूत) और जापानी वाश तकनीक का समन्वय। यह समन्वयवादी प्रवृत्ति भारतीय कला की सबसे बड़ी शक्ति रही है — यह विभिन्न संस्कृतियों से प्रेरणा लेकर उन्हें अपने में समाहित कर एक नई और मौलिक कला परंपरा को जन्म देती है।

निष्कर्ष

यह संकलन TGT Art परीक्षा 2026 की तैयारी के लिए एक व्यापक और विश्वसनीय संदर्भ के रूप में तैयार किया गया है।

इन 50 प्रश्नों में भारतीय और पाश्चात्य कला के इतिहास, चित्रकला की विभिन्न शैलियों, वास्तुकला, लोक कला, कला के तत्वों एवं सिद्धांतों, मूर्तिकला और कला शिक्षा को समग्र रूप से समाहित किया गया है।

अभ्यर्थियों को सलाह दी जाती है कि वे इन प्रश्नों को केवल रटें नहीं बल्कि इन्हें गहराई से समझें।

परीक्षा में सफलता के लिए नियमित पुनरावृत्ति, मानचित्रों और चित्रों का अध्ययन, और प्रमुख कलाकारों व उनकी कृतियों की सूचियाँ याद करना अत्यंत लाभदायक रहेगा। साथ ही राष्ट्रीय संग्रहालयों और कला दीर्घाओं का भ्रमण कला को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करने का सर्वोत्तम तरीका है।

परीक्षा में शुभकामनाएँ!

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