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उत्तर प्रदेश से प्राप्त शिलाचित्र
मिर्जापुर
इलाहाबाद-मुगलसराय रेल पच पर मिर्जापुर मुख्यालय से करीब 20 किमी० दूर विध्य की कैमूर पर्वतमाला के भीतर सोन नदी की घाटी में लिखनिया, भलडरिया आदि कुछ मुख्य गुहाएँ हैं, जिनकी छतों व दीवारों पर 5000 ई०पू० के चित्र बने हैं। कैमूर शृंखला के अन्तर्गत मिर्जापुर जिले में भारतीय शैल चित्र पहले पहल परिलक्षित फिए गए।
लिखनिया दरी एक छोटो पहाड़ियों की गरई नदी के किनारे स्थित है। इस क्षेत्र में लोक भाषा में गुफा को दरी कहा जाता है। लखनिया दरी नं० 1 है। इसमें आखेट का सुन्दर दृश्य ऑकित है। यहाँ कुछ घुड़सवार पालतू हथिनी की मदद से जंगली हाथी को पकड़ते हुए दिखाये गये हैं। घुडसवारों के हाथ में लम्बे भाले हैं।
यहाँ के एक अन्य चित्र में मुँह ऊपर उठाये मृत्यु कष्ट से करहाता एक जंगली सुअर जान पड़ता है। लेखनिया दरी नं० 2 में पशु आखेट के दृश्यों के साथ-साथ नृत्य वादन आदि दृश्य आलेखनों में आदि निवासियों की लोकप्रियता और सौन्दर्यवर्धन का सजीव परिचय मिलता है।
इसी क्षेत्र में लोहरी नामक स्थान की एक दरों में एक आदमी हाथ में जलती हुई मशाल लिये बाघ का सामना कर रहा है। यहाँ पर पीले काले लाल व सफेद रंगों का प्रयोग किया गया है।
मानिकपुर क्षेत्र
मानिकपुर उत्तर प्रदेश के कन्दरा’ जिले के अन्तर्गत आता है। यहाँ पर तीर कमान लिए हुए घुड़सवार चित्रित हैं। धनुर्धारियों को बारहसिंगा का पीछा करते दिखाया गया है। मानिकपुर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र के खुले स्थान में गेरू से बने कुछ चित्र प्राप्त हुए हैं। एक चित्र में पहिये रहित छकड़ा गाड़ी में बैठा हुआ व्यक्ति चित्रित है।
हरनीहरन
मिर्जापुर क्षेत्र में विजयगढ़ दुर्ग के समीप ‘हरनीहरन’ एक गाँव है। यहाँ पर हस्नीहरन गुफा में कुछ चित्र प्राप्त हुए हैं। हरनीहरन गुफा के चित्रों में आखेटकों की प्रहार करती हुई मुद्राएँ तथा पशु के सींगों के ऊपर उठले आखेटकों की नाटकीय स्थिति का रोचक चित्रण है।
हरनीहरन गुफाएँ तथा चित्र उत्तर पाषाण युग के हैं। इन गुफाओं में जादू-टोना के प्रचलन के चिन्ह अंकित किए गए है और यहाँ प्राचीन हथियार तथा अन्य यन्त्र भी प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर एक गैंडे का आखेट करते हुए शिकारियों का रोचक चित्र प्राप्त हुआ है। इस प्रकार के कुछ आखेट चित्र विजयगढ़ के दुर्ग के समीप घोड़मगर गुफा तथा परगना में भी प्राप्त हुए हैं।
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पंचमढ़ी
यह स्थान महादेव पहाड़ी में अवस्थित है। पंचमंडी के पाँच मील के घेरे में 50 के करीब दरियाँ (गुहाएँ) हैं। इन सभी से चित्र प्राप्त हुये हैं। यहाँ चित्रों के कई स्तर प्राप्त हुये हैं- पहले स्तर में तख्तीनुमा व डमरूनुमा आकृतियों को बनाया गया है। लहरदार रेखाओं से शारीरिक गठन का बोध कराने का प्रयास किया है।
यहाँ लाल-पीले रंगों की अधिकता है। दूसरे स्तर में हाथ-पैरों वाली बेडौल ओजपूर्ण आकृतियों का निर्माण किया गया है जिनमें उनका शिकारी रूप ही चित्रित किया गया है। तीसरे स्तर में स्वाभाविकता की ओर झुकान प्रदर्शित होता है।
इसमें आखेट के लिये प्रस्थान करते तथा शहद एकत्र करते हुए मनुष्य, घुड़सवार, योद्धा, शस्त्रधारी सैनिक, वाद्ययन्त्रों को बजाते हुये यादक तथा घरेलू जीवन से सम्बन्धित अन्य अनेक चित्रों को यहाँ दूरी दीवारों पर अंकित किया गया है।
पंचमढ़ी के शिला चित्रों में पशु तथा आखेट चित्रों के अतिरिक्त सशस्त्र युद्ध दृश्यों तथा नृत्यवादन के चित्र भी मिलते हैं। इस क्षेत्र में इमली, सौंफ, नींबू, कमोध रस, छोटे महादेव, बड़े महादेव आदि गुफाएँ हैं। इन गुफाओं में भिन्न-भिन्न प्रकार के चित्र बने हुए हैं।
यहाँ पर ‘बाजारकेव’ में एक विशालकाय बकरी का चित्र है। इस क्षेत्र में मण्डादेव गुफा की छत में ‘शेर के आखेट का एक दृश्य अंकित है। इस क्षेत्र में चट्टानों पर पशु को पंक्तियों में अंकन के साथ-साथ दैनिक जीवन के चित्र भी अंकित किए गए हैं।
पंचमढ़ी क्षेत्र के चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय डी०एच० गार्डन नामक विद्वान को है। यहाँ पाँच प्राचीन गुफाएँ प्राप्त हुई है। यहाँ पर शिकार के दृश्यों के साथ दैनिक जीवन के भी चित्र मिले हैं। इसका पंचमढ़ी नाम इन पाँच गुफाओं पर आधारित है जिनसे पाण्डवों का वनवास सम्बन्ध माना जाता है।
होशंगाबाद
यहाँ आदमगढ़ एक प्रमुख स्थान है जहाँ से जंगली भैसे व हाथों के चित्र मिलते हैं। यहीं घुड़सवारों के दल का चित्र है, इस चित्रण में रेखाओं की पुनरावृत्ति से घोड़ों की आकृति में अद्भुत गति का आभास होता है। छलांग लगाते बारहसिंगा का एक अन्य सुन्दर चित्र मिला है, जो गहरी पृष्ठभूमि पर पीली रेखाओं से बनाया गया है।
यह पंचमढ़ी से 45 किलोमीटर दूर नर्मदा नदी के किनारे पर स्थित है। यहाँ आदमगढ़ नामक स्थान है जहाँ से जंगली से तथा हाथी के चित्र प्राप्त हुए हैं। इसी पहाड़ी में एक दर्जन से अधिक शैलाश्रय हैं जिनमें हाथी, घोड़े, जिराफ समूह, अश्वारोही, चार धनुर्धारी आदि क्षेपांकन (Stencil) पद्धति से बनाए गए हैं।
डॉ० जगदीश गुप्त ने इस क्षेत्र में बुदनी तथा रहेली का नाम भी प्रागैतिहासिक चित्रकला के लिए प्रस्तुत किया है। इस क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की ओर से उत्खनन किया गया है जिससे पाषाण युगों से सम्बद्ध आदि मानव के निवास आदि के चिन्ह प्रकाश में आने की अधिक सम्भावना है।
सिंघनपुर
रायगढ़ जनपद में सिघनपुर गाँव के निकट कुछ गुफायें मिली है। यहाँ चित्र अधिकतर गेरु व रामरज जैसे भू-रंगों से बने हैं। यहाँ अधिकतर हरिण, छिपकली, व जंगली पैसों का अंकन किया गया है। यहाँ पर एक जंगली भैंसे के शिकार का बड़ा मनोहारी दृश्य अंकित है। अंकन की सजीवता यहाँ खरी उत्तरी है। भाव व ओज रेखाओं में उमड़ता दिखायी पड़ता है।
सिघनपुर में 50 गुफाएँ मिलती है। रेतीली चट्टानों में गुफाओं के द्वार पर कंगारू के चित्र बने हैं। सूड उठाए हाथी तथा खरगोश आदि जानवरों के चित्र है। इन चट्टानों को निचले स्थान में बहुत से पत्थरों के औजार और हथियार प्राप्त हुए हैं जिससे निःसन्देह इन गुफाओं को उत्तर पाषाण काल का माना जा सकता है।
मन्दसौर
मन्दसौर जिले में मोरी स्थान पर बने चित्र भी बड़े प्रसिद्ध है। यहाँ पर 30 पहाड़ी गुफाएँ हैं जिनमें अनेक चित्र हैं। उनमें मुख्य रूप से स्वस्तिक, चक्र, सूर्य, सर्वतोभद्र, अष्टदल कमल व पीपल की पत्तियों के प्रतीकात्मक चिन्ह हैं। देहाती बाँस की गाड़ियाँ भी यहाँ दिखाई गयी हैं। यहाँ अनेक पशु, नृत्यरत मानव और ग्वाले पशुओं को हाँकते दिखाये गये हैं।
भीमबेटका
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से 40 किमी० दक्षिण में भीमबेटका नाम की एक पहाड़ी स्थित है। होशंगाबाद से भोपाल की ओर जाने वाले रेल पथ पर मियाँपुर नाम का एक छोटा सा आदिवासी गाँव है। उसके 2 किमी० दक्षिण की ओर भीमबेटका की एक खड़ी पहाड़ी है। यहाँ पर बने चित्रों के दो स्तर मिलते हैं- पहले स्तर पर हरिण, बारहसिंघा, सुअर, रौछ, भैंसे आदि जानवरों को चित्रित किया गया है। दूसरे स्तर पर मानव को जानवरों के साथ अन्तरंग मित्र के रूप में दिखाया गया है। इन चित्रो में लाल, काले व सफेद रंगों का प्रयोग हुआ है।
यहाँ पर लगभग 600 प्राचीन गुफाएँ प्राप्त हुई हैं। यहाँ पर लगभग 275 गुफाओं में चित्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं,यही पर हिरण, बारहसिंगा, सुअर, रीछ, भैसें आदि के चित्र अंकित है परवर्ती चित्रों में आखेटक, कृषक, ग्वाले आदि चित्रित हैं। इस स्थान के महत्व का कारण है कि यहाँ वास्तव में मानव संगलू द्वीप में रहते थे तथा उनके द्वारा बनाए गए और उपयोग में लाए गए हथियार तथा औजार यहाँ रह गए हैं।
पहाड़गढ़
ग्वालियर से लगभग 150 किमी० दूर मोरेना जिले में पहाड़गढ़ के निकट असान नदी के तट पर एक घाटी में लगभग 10 हजार ई०पू० से लेकर 100 ई० के निकट की गुफायें व शिलाचित्र प्राप्त हुये हैं। यहाँ के चित्रों में मनुष्य व जानवर आदि बने हैं। मानव आकृतियाँ, तीरों, धनुषों व भालों से लैस जैसे हाथी, घोड़ों पर सवार हैं।
भोपाल-बांदा ग्वालियर क्षेत्र
भोपाल में कई क्षेत्रों में आदि मानव की चित्रकला के नमूने प्राप्त हुए हैं। किन्तु उनमें धरमपुरी क्षेत्र विशेष उल्लेखनीय है जिनमें एक चित्र हिरण के शिकार का है जिसे गेरू से बनाया गया है। बांदा और ग्वालियर में भी अनेकों क्षेत्रों में गुफाएँ प्राप्त हुई हैं जहाँ से प्रागैतिहासिक काल के चित्र मिले हैं।
बांदा क्षेत्र में सरहत, मलवा, अमयां, उत्दन, चित्रकूट आदि स्थानों में तथा ग्वालियर, शिवपुरी तथा फतेहपुर सीकरी के आस-पास भी आदिम चित्रकला के चिन्ह प्राप्त हुए हैं।
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