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मध्यकालीन भारत में चित्रकला | Painting in Medieval India

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मध्यकालीन भारत में चित्रकला

मध्यकालीन भारत में चित्रकला | Painting in Medieval India

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दिल्ली में सल्तनत काल की अवधि के दौरान शाही महलों, शयनकक्षों और मसजिदों से भित्ति चित्रों के साक्ष्य मिले हैं। ये मुख्य रूप से फूलों, पत्तियों और पौधों को दर्शाते हैं। इल्तुतमिश (1210-1236) के समय के चित्रों के कुछ संदर्भ प्राप्त होते हैं।  ⏰ जून 2026 से पहले LT Grade Art की तैयारी पूरी करें! ...

मध्यकालीन भारत में चित्रकला

दिल्ली में सल्तनत काल की अवधि के दौरान शाही महलों, शयनकक्षों और मसजिदों से भित्ति चित्रों के साक्ष्य मिले हैं। ये मुख्य रूप से फूलों, पत्तियों और पौधों को दर्शाते हैं। इल्तुतमिश (1210-1236) के समय के चित्रों के कुछ संदर्भ प्राप्त होते हैं। 

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अलाउद्दीन खिलजी (1296-1316) के समय के भित्ति चित्र, लघु चित्र (सचित्र पांडुलिपियों के) और पटचित्र देखने को मिलते हैं। सल्तनत काल के दौरान, भारतीय चित्रों पर फारसी और अरबी प्रभाव दिखाई देता है।

मध्यकाल में विभिन्न क्षेत्रीय राज्यों में भी चित्रकला को प्रोत्साहन मिला। ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर के महल के सजावटी चित्रों में बाबर और अकबर दोनों को प्रभावित किया। 14वीं और 15वीं शताब्दी के दौरान, लघु चित्रकला गुजरात और राजस्थान में एक शक्तिशाली आंदोलन के रूप में उभरी और समृद्ध जैन व्यापारियों के संरक्षण के कारण मध्य, उत्तर और पूर्वी भारत में फैल गई। 

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मध्य प्रदेश में मांडू, पूर्वी उत्तर प्रदेश में जौनपुर और पूर्वी भारत में बंगाल चित्रों के साथ-साथ चित्रित पांडुलिपियों के भी प्रमुख केंद्र थे। पूर्वी भारत के बंगाल, बिहार और उड़ीसा में 9वीं और 10वीं शताब्दी के मध्य पाल साम्राज्य के दौरान एक नई तरह की चित्रकला विकसित हुई, जिसे लघु चित्रकला कहा जाता है। 

लघुचित्र

जैसा कि नाम से पता चलता है, छोटे चित्र थे जो खराब होनेवाली सामग्री पर बनाए गए थे। इन चित्रों को एक छोटी सतह पर चित्रित किया गया था और इन्हें लघुचित्र कहा जाता था। इनमें महाकाव्यों, मिथकों और किवदतियों पर आधारित विषयों को चित्रित किया गया था। 

अन्य विषय बारहमासा (मौसम) और रागमाला (धुन ) थे। काँगड़ा, कुल्लू, बसोली, गुलेर, चंबा, गढ़वाल, बिलासपुर और जम्मू जैसे स्थानीय केंद्रों में भी लघु चित्रकला विकसित हुई। 15वीं और 16वीं शताब्दी में भारत में भक्ति आंदोलन के उदय ने वैष्णव भक्ति पंथों के विषयों पर दृष्टांत ग्रंथों को भी प्रेरित किया। 

मुगलकाल से पहले के युग में मंदिरों की दीवारों पर भित्ति चित्रों को भारत के उत्तरी भाग में प्रमुखता मिली। मुगलकालीन चित्रकला को भारतीय लघुचित्रकला की रीढ़ कहा जाता है। इस श्रेणी में ताड़ के पत्तों पर बौद्ध, जैन और हिंदू पांडुलिपियों का चित्रण किया गया था। 

ये चित्र अजंता गुफाओं की चित्र शैली से मिलते-जुलते हैं, लेकिन छोटे पैमाने पर ये व्यापारियों के अनुरोध पर बनाए गए थे, जिन्होंने इन चित्रों को मंदिरों और मठों की दान कर दिया था।

13वीं शताब्दी में उत्तरी भारत के तुर्की सुलतान अपने साथ फारसी दरबारी संस्कृति को महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ लेकर आए। 15वीं और 16वीं शताब्दी में मालवा, बंगाल, दिल्ली, जौनपुर, गुजरात और दक्कन में फारसी प्रभाव की सचित्र पांडुलिपियाँ तैयार की गई। फारसी परंपराओं के साथ भारतीय चित्रकारों के मेल के परिणामस्वरूप 16वीं शताब्दी को चित्रकला में दो शैलियों का संयोग स्पष्ट नजर आता है। 

प्रारंभिक सल्तनत काल के दौरान, पश्चिमी भारत के जैन समुदाय द्वारा चित्रकला में महत्वपूर्ण योगदान दिया गया। जैन धर्मग्रंथों की सचित्र पांडुलिपियों को मंदिर के पुस्तकालयों में रखा गया। इन पांडुलिपियों में तीर्थकरों के जीवन और कार्यों को दर्शाया गया था। 

मुगलों के शासनकाल में पाठ्य चित्रण की कला को एक नया रूप मिला। अकबर और उसके उत्तराधिकारी चित्रकला और कामुक चित्रण में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए। इस अवधि में पुस्तक व्याख्या या व्यक्तिगत लघुचित्रों ने दीवार चित्रों का स्थान लेकर कला के सबसे महत्त्वपूर्ण रूप में स्थान बनाया। 

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सम्राट अकबर ने कश्मीर और गुजरात के कलाकारों को संरक्षण दिया। हुमायूँ दो फारसी चित्रकारों को अपने दरबार में लाया। इस काल के कुछ महान चित्रकार अब्द-उस-समद, दसवंत और बसावन थे। ‘बाबरनामा’ और ‘अकबरनामा’ के पृष्ठों पर सुंदर चित्र मिलते हैं। 

कुछ ही वर्षों के भीतर फारसी और भारतीय शैली के संयोग के परिणामस्वरूप एक एकीकृत और गतिशील शैली विकसित हुई जो मुगल चित्रकला की स्वतंत्र शैली कहलाई। 1562 और 1577 ई. के बीच नई शैली का प्रतिनिधित्व करते हुए लगभग 1400 पटचित्रों की एक श्रृंखला का निर्माण किया गया और उन्हें शाही कला कक्ष में रखा गया। 

अकबर ने तस्वीर बनाने की कला को भी प्रोत्साहित किया। चित्रकारी की कला अपने चरमोत्कर्ष पर जहाँगीर के काल में पहुंची, जो स्वयं एक महान चित्रकार और कला का पारखी था। जहाँगीर के काल में कलाकारों ने जीवंत रंगों का उपयोग करना शुरू कर दिया, जैसे कि मोरपंखी नीला और लाल। साथ ही, चित्रों को त्रिआयामी प्रभाव देने में भी इस समय के चित्रकार सक्षम हुए। 

मंसूर, बिशन दास और मनोहर जहाँगीर के समय के सबसे प्रतिभाशाली चित्रकार थे। मंसूर ने कलाकार अबुल हसन का एक उत्कृष्ट चित्र बनाया था, उसे पक्षियों और जानवरों के चित्र बनाने में महारत हासिल थी। मानवीय चित्रण में बिशन दास को कुशलता प्राप्त थी। 

‘साइबेरिया का विरला सारस’ भी मंसूर की रचना है। हालाँकि शाहजहाँ को स्थापत्य की भव्यता में अधिक रुचि थी, उसके बड़े बेटे दारा शिकोह ने अपने दादा की तरह चित्रकला को संरक्षण दिया। उसने अपने चित्रों में पौधों और जानवरों को चित्रित करना पसंद किया। 

हालांकि, औरंगजेब द्वारा चित्रकला से शाही संरक्षण वापस लेने से कलाकार देश के विभिन्न स्थानों पर चले गए। इससे राजस्थान और पंजाब में चित्रकला के विकास में मदद मिली और चित्रकला की अलग-अलग शैलियों (जैसे राजस्थानी और पहाड़ों) का जन्म हुआ। राजस्थान में भी चित्रकला की अनेक शैलियों का उद्भव हुआ जैसे मेवाड़ शैली कोटा-बूंदी शैली, बीकानेर शैली, मारवाड़ शैली, बसौली शैली, किशनगढ़ शैली आदि।


भारतीय चित्रकला की प्रमुख शैलियाँ :

  • जैनशैली
  • पाल शैली
  • अपभ्रंश शैली
  • मुगल शैली
  • पटना या कम्पनी शैली
  • दक्क्न शैली
  • गुजरात शैली
  • राजपूत शैली
  • मेवाड़ शैली
  • जयपुर शैली
  • बीकानेर शैली
  • मालवा शैली
  • किशनगढ शैली
  • बूंदी शैली
  • अलवर चित्रकला शैली
  • पहाड़ी चित्रकला शैली
  • बसोहली शैली
  • गुलेर शैली
  • गड़वाल शैली
  • जम्मू शैली
  • कांगड़ा शैली
  • नाथद्वारा शैली
  • सिक्ख शैली

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