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देवकी नंदन शर्मा | Devki Nandan Sharma

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देवकी नंदन शर्मा (Devkinandan Sharma): भारतीय कला के अमर साधक, पक्षी चितेरे एवं भित्ति कला के पुनरुद्धारक (1917 – 2005) प्रस्तावना (Introduction) देवकी नंदन शर्मा भारतीय चित्रकला के उन विरल साधकों में से एक थे जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण आयु कला के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ जी। वे एक असाधारण चित्रकार, एक समर्पित शिक्षक, और ...

देवकी नंदन शर्मा | Devki Nandan Sharma

देवकी नंदन शर्मा (Devkinandan Sharma): भारतीय कला के अमर साधक, पक्षी चितेरे एवं भित्ति कला के पुनरुद्धारक

(1917 – 2005)

Table of Contents

प्रस्तावना (Introduction)

देवकी नंदन शर्मा भारतीय चित्रकला के उन विरल साधकों में से एक थे जिन्होंने अपनी सम्पूर्ण आयु कला के प्रति पूर्ण समर्पण के साथ जी। वे एक असाधारण चित्रकार, एक समर्पित शिक्षक, और भारतीय भित्ति कला परंपरा के सशक्त संवाहक थे। उनका नाम भारतीय कला जगत में उसी श्रद्धा से लिया जाता है, जैसे किसी तपस्वी का — जो जन-प्रसिद्धि की परवाह किए बिना अपनी साधना में लीन रहे।

एक चित्रकार और प्रोफेसर (Painter + Professor) के रूप में उनकी दोहरी भूमिका ने भारतीय कला को दो स्तरों पर समृद्ध किया। एक ओर उन्होंने स्वयं अपने붓 और रंगों से श्रेष्ठ कृतियाँ रचीं, तो दूसरी ओर अपने छात्रों में वह दृष्टि जगाई जो कला को केवल व्यवसाय नहीं, जीवन-दर्शन के रूप में देखती है। राजस्थान की कला-परंपरा को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित करने में उनका योगदान अतुलनीय है।

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2. प्रारम्भिक जीवन (Early Life)

देवकी नंदन शर्मा  Devki Nandan Sharma
देवकी नंदन शर्मा Devki Nandan Sharma

देवकी नंदन शर्मा का जन्म राजस्थान के अलवर जिले में हुआ था। उनके पिता और दादा अलवर व जयपुर रियासत के प्रतिष्ठित राष्ट्रकवि थे। इस प्रकार शब्द और भाव की विरासत उन्हें पैतृक संस्कारों से ही प्राप्त थी — और इसी उर्वर भूमि पर कला के प्रति उनकी गहरी अभिरुचि का अंकुर फूटा।

बचपन से ही उनमें रेखाओं और रंगों के प्रति एक नैसर्गिक आकर्षण था। उनके पिता ने इस प्रतिभा को पहचाना और उन्हें जयपुर के प्रतिष्ठित महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश दिलाया। राजस्थान की मिट्टी, उसके लोकगीत, उसके भित्तिचित्रों से सुसज्जित हवेलियाँ और पक्षियों से भरे वन — इन सबने बालक देवकीनंदन की कल्पना को अनंत विस्तार दिया और उनकी कला की नींव रखी।

3. कला शिक्षा (Art Education)

महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर में उन्होंने चित्रकार एवं कला प्राध्यापक शैलेन्द्रनाथ डे के सानिध्य में विधिवत कला-शिक्षा ग्रहण की। यहाँ उन्होंने रेखांकन, रंग-विन्यास और पारंपरिक भारतीय चित्र-शैलियों की बारीकियाँ सीखीं।

इसके बाद उन्हें शान्तिनिकेतन जाने का सुअवसर मिला — वह पवित्र भूमि जहाँ गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने कला और संस्कृति का एक अनूठा संसार रचा था। यहाँ उन्होंने महान कलाकारों — बिनोद बिहारी मुखर्जी और नंदलाल बोस — के मार्गदर्शन में टेम्परा (Tempera) और वॉश (Wash) पद्धति में गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। इन महारथियों के संसर्ग ने उनकी कला-दृष्टि को एक नई गहराई और भारतीयता दी।

शान्तिनिकेतन के वातावरण ने उन्हें यह सिखाया कि कला केवल तकनीक नहीं, अनुभव और आत्मा की अभिव्यक्ति है। पारंपरिक भारतीय कला का अनुशासन और आधुनिक संवेदनशीलता — दोनों का सुंदर समन्वय उनकी शिक्षा की विशेषता रही।

4. शिक्षण जीवन (Academic Career)

सन् 1953 में प्रो. शर्मा वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान से जुड़े और यही उनकी कर्मभूमि बन गई। वनस्थली के ललित कला विभाग की स्थापना का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है। यहाँ वे दशकों तक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे और इसी संस्थान से ‘प्रोफेसर’ की उपाधि से सुशोभित हुए।

उनका शिक्षण केवल कक्षाओं तक सीमित नहीं था। उन्होंने नियमित भित्ति चित्रण प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन किया, जिनमें देश-विदेश के अनेक कलाकारों ने कला की गूढ़ विधाएँ सीखीं। उनकी कक्षाएँ एक तीर्थस्थल की भाँति थीं — जहाँ आने वाले खाली हाथ नहीं, एक नई दृष्टि लेकर लौटते थे।

उनके उल्लेखनीय शिष्यों में विमलदास, अल्मेलकर और जे. सुलतान अली के नाम प्रमुख हैं, जिन्होंने भारतीय कला में अपनी स्वतंत्र पहचान बनाई। एक शिक्षक की सच्ची सफलता उसके शिष्यों की ऊँचाइयों में होती है — और इस कसौटी पर प्रो. शर्मा खरे उतरे।

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5. कलात्मक यात्रा (Artistic Journey)

देवकी नंदन शर्मा की कलात्मक यात्रा अनेक आयामों में फैली हुई थी। शुरुआती दौर में उन्होंने पारंपरिक शैलियों में कार्य किया, किन्तु शान्तिनिकेतन के प्रभाव और अपनी स्वाभाविक सृजनशीलता से उन्होंने धीरे-धीरे एक ऐसी शैली विकसित की जो भारतीय आत्मा और आधुनिक अभिव्यक्ति का अद्भुत संगम थी।

पक्षियों के प्रति उनकी विशेष आसक्ति ने उन्हें ‘पक्षी चितेरा’ की उपाधि दिलाई। उन्होंने लगभग 1000 से अधिक पक्षियों के चित्र बनाए — पेन, स्याही, जलरंग और तैल रंग का कुशलतापूर्वक उपयोग करते हुए। हर पक्षी उनके कैनवास पर जीवंत प्रतीत होता था — मानो वे उड़ान भरने को तत्पर हों।

भित्ति कला (Fresco) के क्षेत्र में उनकी यात्रा और भी विशिष्ट रही। जयपुर आरायश पद्धति को पुनर्जीवित करने और उसे आगे बढ़ाने में उनका योगदान ऐतिहासिक है। उन्होंने इस विधा में निरंतर प्रयोग किए और उसे संस्थागत रूप देने का प्रयास किया।

6. शैली और तकनीक (Style & Technique)

देवकी नंदन शर्मा की शैली में यथार्थवाद (Realism) और काव्यात्मकता का अनूठा सम्मिश्रण था। उनके चित्रों में रेखाएँ उतनी ही महत्त्वपूर्ण थीं जितने रंग। विशेषकर पक्षी चित्रों में उनकी रेखांकन शैली (Line Drawing) अत्यंत परिष्कृत और सटीक थी।

माध्यमों की दृष्टि से उन्होंने वॉश टेम्परा, जलरंग (Watercolor) और तैल रंग (Oil Color) तीनों में दक्षता हासिल की। फ्रेस्को (Fresco) अर्थात भित्ति चित्रण उनका विशेष क्षेत्र था जिसमें उन्होंने जयपुर की पारंपरिक आरायश पद्धति को अपनाया और उसे नई ऊँचाइयाँ दीं।

उनके रंग-संयोजन में प्रकृति के रंगों की छटा स्पष्ट दिखती है — मिट्टी के रंग, आकाश की नीलिमा, वनस्पतियों का हरा और पक्षियों के विविध वर्ण। ब्रशवर्क में सूक्ष्मता और बड़े कैनवास पर भव्यता — दोनों उनमें समान रूप से विद्यमान थे।

7. विषय-वस्तु (Themes & Subjects)

उनकी कला का विस्तार अत्यंत व्यापक था। पक्षी-चित्रण तो उनकी विशेष पहचान थी ही, किन्तु उनके विषयों में प्रकृति, मानव जीवन, राजस्थानी लोक-संस्कृति, पौराणिक आख्यान और ऐतिहासिक गाथाएँ भी सम्मिलित थीं।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर उनके द्वारा निर्मित ‘ढोला मारू’ का विशाल फ्रेस्को चित्र उनकी विषय-वस्तु की गहराई का प्रमाण है। यह चित्र राजस्थानी लोककथा की उस प्रेम-गाथा को चित्रित करता है जिसमें ईर्ष्या-द्वेष के जाल में फँसे ढोला और मारू के प्रेम की अंततः विजय होती है। इसमें मानवीय गुणों — प्रेम, विश्वास और साहस — की सुंदर अभिव्यक्ति है।

उनके चित्रों में आध्यात्मिकता और सामाजिक चेतना भी झलकती है। वे भारतीय जन-जीवन की आत्मा को अपने रंगों में उतारते थे — बिना किसी कृत्रिमता के, अत्यंत स्वाभाविक और प्रवाहमान रूप में।

8. प्रमुख कृतियाँ (Major Works)

‘ढोला मारू’ — जयपुर रेलवे स्टेशन पर 6×9 फीट का विशाल फ्रेस्को चित्र (1964)। रेलवे और राजस्थान पर्यटन विभाग के संयुक्त तत्वावधान में निर्मित यह कृति जयपुर फ्रेस्को तकनीक का एक अद्वितीय उदाहरण है और आज भी दर्शकों को मुग्ध करती है।

1000 से अधिक पक्षी-चित्र — यह उनके जीवन-भर के सृजन की एक अनमोल निधि है। इनमें भारत के विभिन्न पक्षियों को उनके स्वाभाविक परिवेश में अंकित किया गया है। इनमें वैज्ञानिक सटीकता और कलात्मक सौंदर्य का अद्भुत समन्वय है।

बृजमोहन रुइया हाई स्कूल, विले पारले, मुम्बई के लिए भव्य फ्रेस्को चित्र (1955) — यह कार्य उनकी भित्ति कला की ख्याति का प्रमाण था, जो मुम्बई तक पहुँची। इसके अतिरिक्त उन्होंने वनस्थली विद्यापीठ और अन्य संस्थानों में भी अनेक दीर्घकालिक कृतियाँ निर्मित कीं।

9. भारतीय कला में स्थान (Place in Indian Art)

देवकी नंदन शर्मा का स्थान भारतीय कला के उस वर्ग में है जिसे ‘आधुनिक-पारंपरिक’ कहा जा सकता है। वे न तो पूर्णतः परंपरावादी थे, न ही पाश्चात्य आधुनिकतावाद के अनुगामी। उन्होंने एक मध्यम-मार्ग का अनुसरण किया — जड़ों से जुड़े रहकर समय के साथ चलना।

राजस्थान में उन्हें वरिष्ठतम चित्रकारों में गिना जाता है। परन्तु उनका योगदान क्षेत्रीय सीमाओं से कहीं आगे जाता है। भारतीय भित्ति कला परंपरा को पुनर्जीवित करने, पक्षी-चित्रण को एक अनुशासित विधा के रूप में स्थापित करने और अनगिनत छात्रों को प्रेरित करने में उनकी भूमिका राष्ट्रीय महत्त्व की है।

10. प्रदर्शनियाँ (Exhibitions)

देवकी नंदन शर्मा की कृतियाँ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय दोनों स्तरों पर प्रदर्शित हुईं। सन् 1963 में लंदन के प्रतिष्ठित ट्रायन कला विधि (Tryon Gallery) ने पक्षी-चित्र प्रदर्शनी के लिए उनके चित्रों का चयन किया। यह प्रदर्शनी विश्व के 18 देशों के पक्षी-चित्रकारों की भागीदारी से सम्पन्न हुई — और इनमें एक भारतीय कलाकार का नाम होना गर्व का विषय था।

देश में भी उनकी कृतियाँ विभिन्न नगरों और संस्थाओं में प्रदर्शित हुईं। वनस्थली विद्यापीठ में उनके भित्ति चित्र एक स्थायी प्रदर्शनी का रूप ले चुके हैं। उनकी कला को देखने के लिए कला-प्रेमी और शोधार्थी दूर-दूर से आते रहे।

11. पुरस्कार और सम्मान (Awards & Recognition)

देवकी नंदन शर्मा को ‘ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विस’ द्वारा विश्व के 18 श्रेष्ठ पक्षी चितेरों में स्थान दिया गया — यह उनके लिए सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान था। इस मान्यता ने उन्हें एक वैश्विक पहचान दी और भारतीय कला को गर्वान्वित किया।

राजस्थान में उन्हें वरिष्ठतम एवं प्रतिष्ठित कलाकारों में गिना गया। वनस्थली विद्यापीठ ने उन्हें प्रोफेसर एमेरिटस का सम्मान प्रदान किया। उनकी जन्मशताब्दी (17 अप्रैल 2019) के अवसर पर राजस्थान स्टूडियो ने ऑनलाइन समारोह आयोजित किया जिसमें देश के कला-विशेषज्ञों और चित्रकारों ने उनके योगदान को स्मरण किया।

12. कला-दर्शन (Art Philosophy)

देवकी नंदन शर्मा का मानना था कि कला एक आन्तरिक अनुभव है — बाह्य प्रदर्शन नहीं। उनके लिए सृजन एक साधना थी, और हर चित्र एक यज्ञ। वे कला में भारतीयता के प्रबल पक्षधर थे — बिना पाश्चात्य अनुकरण के, भारत की अपनी मिट्टी, रंग और परंपराओं से जुड़ी कला।

शिक्षण और सृजन के संबंध में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट था — एक सच्चा कलाकार ही सच्चा शिक्षक हो सकता है। जो स्वयं अनुभव नहीं करता, वह दूसरों को अनुभव नहीं करा सकता। उनकी कक्षाएँ इसी दर्शन का प्रतिबिम्ब थीं — जहाँ वे बोलते कम, करके दिखाते अधिक थे।

प्रकृति को वे अपना सबसे बड़ा गुरु मानते थे। पक्षियों को देखना, उनके रंगों और गतिविधियों को गहन ध्यान से अनुभव करना — यही उनकी कला की आधारशिला थी। इसीलिए उनके पक्षी-चित्र इतने जीवंत और प्रामाणिक लगते हैं।

13. चुनौतियाँ और संघर्ष (Struggles)

भारत में एक कलाकार का जीवन सदैव सरल नहीं होता। प्रो. शर्मा ने भी अपने करियर में अनेक चुनौतियों का सामना किया। स्वतंत्रता के बाद के भारत में पाश्चात्य अमूर्त कला (Abstract Art) का प्रभाव तेज़ी से बढ़ रहा था और पारंपरिक शैलियों को कभी-कभी ‘पुरातन’ समझा जाने लगा था।

ऐसे वातावरण में भित्ति कला और पक्षी-चित्रण जैसी विधाओं के लिए अपनी जगह बनाना एक संघर्ष था। किन्तु प्रो. शर्मा इस दबाव से कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने अपने विश्वास और परंपरा के प्रति निष्ठा के साथ अपना मार्ग जारी रखा। यह उनकी साधना का ही फल था कि उन्हें अंततः अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली।

14. विरासत (Legacy)

देवकी नंदन शर्मा 2005 में इस संसार से विदा हुए, परन्तु उनकी कला और उनके विचार आज भी जीवित हैं। वनस्थली विद्यापीठ में उनके द्वारा स्थापित कला विभाग आज भी कलाकारों को तैयार कर रहा है। उनके शिष्य देश के विभिन्न संस्थानों में कला की मशाल जलाए हुए हैं।

उनके पुत्र और चित्रकार भवानीशंकर शर्मा ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया है। उनके जन्मशताब्दी वर्ष में हुए आयोजनों ने यह सिद्ध किया कि उनकी प्रासंगिकता आज भी उतनी ही है।

जयपुर रेलवे स्टेशन पर उनका ‘ढोला मारू’ फ्रेस्को आज भी लाखों यात्रियों को मुग्ध करता है — एक कलाकार की सबसे बड़ी विरासत यही है कि उसकी कृतियाँ पीढ़ियों तक लोगों को स्पर्श करती रहें।

15. आलोचना और मूल्यांकन (Critical Analysis)

कला-समीक्षकों की दृष्टि में शर्मा की सबसे बड़ी शक्ति उनकी रेखांकन की सूक्ष्मता और प्रकृति के प्रति उनकी अटूट निष्ठा थी। उनके पक्षी-चित्रों में वैज्ञानिक प्रामाणिकता और काव्यात्मक सौंदर्य का जो संयोग है, वह दुर्लभ है।

कुछ समीक्षकों का मत है कि उनकी कला में आधुनिक प्रयोगशीलता का अभाव रहा। किन्तु यह आलोचना उनके स्वयं के कला-दर्शन की दृष्टि से निरर्थक है — उन्होंने कभी ‘आधुनिक’ दिखने की कोशिश नहीं की; उनका लक्ष्य सत्य और सौंदर्य था, न कि मौलिकता का दिखावा।

उनकी भित्ति कला के संदर्भ में यह निर्विवाद है कि उन्होंने जयपुर फ्रेस्को परंपरा को जीवित रखने में जो भूमिका निभाई, वह किसी एकल कलाकार के लिए असाधारण उपलब्धि है। इस क्षेत्र में उनकी विशेषज्ञता को विश्व-स्तरीय मान्यता मिली।

16. निष्कर्ष (Conclusion)

देवकी नंदन शर्मा भारतीय कला के उस अध्याय का नाम है जो मौन साधना, गहन निष्ठा और निःस्वार्थ समर्पण से लिखा गया। वे एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने न जन-प्रशंसा के लिए काम किया, न पुरस्कारों के लिए — बल्कि इसलिए कि कला उनकी साँस थी, उनका जीवन-सत्य था।

उनकी विरासत तीन स्तरों पर अमर है — उनकी कृतियों में, उनके शिष्यों में, और उस परंपरा में जिसे उन्होंने जीवित रखा। पक्षी-चित्रण के क्षेत्र में विश्व के 18 श्रेष्ठ कलाकारों में स्थान पाना, जयपुर फ्रेस्को को पुनर्जीवित करना, और वनस्थली जैसी संस्था में एक पूरी पीढ़ी को तैयार करना — ये उपलब्धियाँ किसी एक जीवन के लिए पर्याप्त से भी अधिक हैं।

भारतीय कला में उनका महत्त्व इस दृष्टि से और भी बढ़ जाता है कि उन्होंने यह सब बिना किसी महानगरीय चमक-दमक के, राजस्थान की धूल और रंगों के बीच रहकर किया। वे सच्चे अर्थों में ‘कला के मौन साधक’ थे।

“कला केवल तकनीक नहीं है — वह आत्मा की भाषा है।”

— देवकी नंदन शर्मा की कला-साधना का सार

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

प्रो. देवकीनंदन शर्मा — पक्षी चितेरे एवं भित्ति कला के साधक

व्यक्तिगत जीवन (Personal Life)

प्र. 1  प्रो. देवकीनंदन शर्मा का जन्म कब और कहाँ हुआ था?
उ.  प्रो. देवकीनंदन शर्मा का जन्म राजस्थान के अलवर जिले में सन् 1917 (कुछ स्रोतों के अनुसार 1919) में हुआ था। उनका परिवार साहित्य और संस्कृति से जुड़ा था — उनके पिता और दादा अलवर तथा जयपुर रियासत के प्रतिष्ठित राष्ट्रकवि थे।
प्र. 2  उनके परिवार की पृष्ठभूमि कैसी थी?
उ.  उनका परिवार अत्यंत साहित्यिक और सांस्कृतिक वातावरण में रहा। कविता और कला का संस्कार उन्हें विरासत में मिला। उनके पुत्र भवानीशंकर शर्मा भी एक चित्रकार हैं जो उनकी कला-परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
प्र. 3  प्रो. शर्मा का निधन कब हुआ?
उ.  प्रो. देवकीनंदन शर्मा का निधन सन् 2005 में हुआ। उनकी जन्मशताब्दी 17 अप्रैल 2019 को मनाई गई, जिसमें राजस्थान स्टूडियो द्वारा एक ऑनलाइन समारोह आयोजित किया गया।

शिक्षा एवं प्रशिक्षण (Education & Training)

प्र. 1  प्रो. शर्मा ने कला की शिक्षा कहाँ से प्राप्त की?
उ.  उन्होंने जयपुर के महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट्स से विधिवत कला-शिक्षा ग्रहण की, जहाँ चित्रकार एवं प्राध्यापक शैलेन्द्रनाथ डे उनके प्रमुख गुरु थे। इसके बाद उन्हें शान्तिनिकेतन में अध्ययन का सुअवसर मिला।
प्र. 2  शान्तिनिकेतन में उन्होंने क्या सीखा और किससे?
उ.  शान्तिनिकेतन में प्रो. शर्मा ने महान कलाकारों बिनोद बिहारी मुखर्जी और नंदलाल बोस के मार्गदर्शन में टेम्परा (Tempera) और वॉश (Wash) पद्धति में गहन प्रशिक्षण प्राप्त किया। यहाँ उनकी कला-दृष्टि को एक गहरी भारतीयता और परिपक्वता मिली।
प्र. 3  उनकी कला-शिक्षा में किसका सर्वाधिक प्रभाव रहा?
उ.  दो प्रभाव सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रहे — पहला, जयपुर के गुरु शैलेन्द्रनाथ डे द्वारा दी गई पारंपरिक भारतीय कला की नींव; और दूसरा, शान्तिनिकेतन में नंदलाल बोस और बिनोद बिहारी मुखर्जी से प्राप्त आधुनिक तकनीकी कुशलता। इन दोनों के संयोग ने उनकी विशिष्ट शैली को जन्म दिया।

कला एवं शैली (Art & Style)

प्र. 1  प्रो. शर्मा किस विशेष कला-क्षेत्र के लिए जाने जाते हैं?
उ.  वे मुख्यतः दो क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं — पक्षी-चित्रण (Bird Painting) और भित्ति कला (Fresco / Wall Painting)। पक्षी-चित्रण में उन्हें विश्व के 18 श्रेष्ठ कलाकारों में स्थान मिला, जबकि जयपुर फ्रेस्को परंपरा को पुनर्जीवित करने में उनकी भूमिका ऐतिहासिक है।
प्र. 2  उन्होंने कितने पक्षी-चित्र बनाए और किन माध्यमों में?
उ.  प्रो. शर्मा ने लगभग 1000 से अधिक पक्षियों के चित्र बनाए। इनमें उन्होंने पेन व स्याही (Pen & Ink), जलरंग (Watercolor) और तैल रंग (Oil Color) का उपयोग किया। उनके पक्षी-चित्रों में वैज्ञानिक सटीकता और काव्यात्मक सौंदर्य का अद्भुत संयोग मिलता है।
प्र. 3  जयपुर आरायश (Aaraish) पद्धति क्या है और इसमें उनका क्या योगदान था?
उ.  आरायश राजस्थान की पारंपरिक फ्रेस्को भित्ति-चित्रण पद्धति है जिसमें चूने की पुताई पर प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाए जाते हैं। प्रो. शर्मा ने इस लुप्तप्राय विधा को पुनर्जीवित किया, इसमें निरंतर प्रयोग किए और प्रशिक्षण शिविरों के माध्यम से इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाया।
प्र. 4  उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति कौन सी है?
उ.  उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति जयपुर रेलवे स्टेशन पर बनाया गया 6×9 फीट का विशाल ‘ढोला मारू’ फ्रेस्को चित्र (1964) है। यह राजस्थानी लोककथा पर आधारित है और जयपुर फ्रेस्को तकनीक का एक उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। आज भी लाखों यात्री इसे देखकर अभिभूत होते हैं।
प्र. 5  उनकी चित्र-शैली यथार्थवादी थी या अमूर्त?
उ.  उनकी शैली मुख्यतः यथार्थवादी और प्रकृति-आधारित थी, किन्तु उसमें काव्यात्मक और भावात्मक गुण भी थे। वे न तो शुद्ध फोटोग्राफिक यथार्थवादी थे, न ही अमूर्त कलाकार। उनकी कला भारतीय परंपरा और आधुनिक संवेदनशीलता का एक सुंदर सम्मिश्रण थी।

शिक्षण एवं करियर (Teaching & Career)

प्र. 1  वे किस संस्थान से जुड़े थे और कब से?
उ.  प्रो. शर्मा सन् 1953 में वनस्थली विद्यापीठ, राजस्थान से जुड़े और यही उनकी कर्मभूमि बन गई। इस संस्थान के ललित कला विभाग की स्थापना का श्रेय भी उन्हीं को दिया जाता है। वे दशकों तक यहाँ प्राध्यापक के रूप में कार्यरत रहे।
प्र. 2  उनके प्रमुख शिष्य कौन थे?
उ.  उनके उल्लेखनीय शिष्यों में विमलदास, अल्मेलकर (Almelkar) और जे. सुलतान अली के नाम प्रमुख हैं — इन तीनों ने भारतीय कला में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई। इसके अतिरिक्त उन्होंने देश-विदेश के अनेक कलाकारों को अपने प्रशिक्षण शिविरों में प्रशिक्षित किया।
प्र. 3  भित्ति चित्रण प्रशिक्षण शिविर क्या थे?
उ.  प्रो. शर्मा ने वनस्थली विद्यापीठ में नियमित भित्ति चित्रण प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन किया। इनमें देशी और विदेशी कलाकार भाग लेते थे और जयपुर आरायश (फ्रेस्को) पद्धति की बारीकियाँ सीखते थे। ये शिविर भारतीय भित्ति कला के संरक्षण और प्रसार में अत्यंत महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए।

पुरस्कार एवं सम्मान (Awards & Recognition)

प्र. 1  उन्हें किस अंतरराष्ट्रीय सम्मान से नवाज़ा गया?
उ.  ‘ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विस’ ने उन्हें विश्व के 18 श्रेष्ठ पक्षी चितेरों में स्थान दिया। सन् 1963 में लंदन के प्रतिष्ठित ट्रायन गैलरी (Tryon Gallery) ने उनके चित्रों को अंतरराष्ट्रीय पक्षी-चित्र प्रदर्शनी के लिए चुना, जिसमें 18 देशों के कलाकारों ने भाग लिया।
प्र. 2  क्या उनकी कला की जन्मशताब्दी पर कोई आयोजन हुआ?
उ.  हाँ। 17 अप्रैल 2019 को उनकी जन्मशताब्दी के उपलक्ष्य में राजस्थान स्टूडियो ने एक ऑनलाइन समारोह आयोजित किया जिसे इंस्टाग्राम और फेसबुक लाइव पर सैकड़ों लोगों ने देखा। इसमें देश के प्रमुख चिंतकों, कला-विशेषज्ञों और चित्रकारों ने उनके जीवन और कृतित्व पर विचार साझा किए।

विरासत एवं प्रासंगिकता (Legacy & Relevance)

प्र. 1  आज उनकी कला की क्या प्रासंगिकता है?
उ.  डिजिटल युग में जब कला अमूर्त और आभासी होती जा रही है, प्रो. शर्मा की कला प्रकृति, परंपरा और सत्यनिष्ठा की याद दिलाती है। उनके पक्षी-चित्र पर्यावरण-चेतना के प्रतीक बन गए हैं और जयपुर फ्रेस्को की पुनर्जागृति भारतीय हस्तकला के संरक्षण आंदोलन में प्रेरणा का स्रोत है।
प्र. 2  उनकी कृतियाँ आज कहाँ देखी जा सकती हैं?
उ.  उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कृति ‘ढोला मारू’ जयपुर रेलवे स्टेशन पर आज भी देखी जा सकती है। वनस्थली विद्यापीठ में उनके द्वारा निर्मित भित्ति चित्र संस्थान की धरोहर हैं। इसके अतिरिक्त उनके चित्र विभिन्न निजी और संस्थागत संग्रहों में सुरक्षित हैं।
प्र. 3  उनके बाद उनकी परंपरा को कौन आगे बढ़ा रहा है?
उ.  उनके पुत्र और प्रसिद्ध चित्रकार भवानीशंकर शर्मा उनकी कला-विरासत के सबसे सक्रिय संवाहक हैं। इसके अलावा उनके अनेक शिष्य देश के विभिन्न कला-संस्थानों में शिक्षक और कलाकार के रूप में उनकी परंपरा जीवित रखे हुए हैं।
प्र. 4  नई पीढ़ी के कलाकार उनसे क्या सीख सकते हैं?
उ.  प्रो. शर्मा का जीवन यह सिखाता है कि महानता के लिए महानगर आवश्यक नहीं — अपनी जड़ों से जुड़े रहकर, प्रकृति को गुरु मानकर, और निरंतर साधना से भी विश्व-स्तरीय कला-कृतियाँ रची जा सकती हैं। उनका सब्र, उनकी भारतीयता के प्रति निष्ठा और शिक्षण के प्रति समर्पण — ये तीन गुण हर कलाकार के लिए अनुकरणीय हैं।

यह FAQ प्रो. देवकीनंदन शर्मा के जीवन, कला और विरासत पर आधारित है।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

Multiple Choice Question: देवकी नंदन शर्मा — पक्षी चितेरे एवं भित्ति कला के साधक

कुल प्रश्न: 75  |  प्रत्येक प्रश्न: 1 अंक  |  कुल अंक: 75

सही उत्तर अंत में उत्तर-कुंजी (Answer Key) में दिए गए हैं।

खण्ड-1: व्यक्तिगत जीवन एवं पृष्ठभूमि (Personal Life & Background)

प्र.1.  प्रो. देवकीनंदन शर्मा का जन्म किस राज्य में हुआ था?

(A)  उत्तर प्रदेश

(B)  राजस्थान

(C)  मध्य प्रदेश

(D)  गुजरात

प्र.2.  प्रो. देवकीनंदन शर्मा का जन्म किस जिले में हुआ था?

(A)  जयपुर

(B)  जोधपुर

(C)  अलवर

(D)  उदयपुर

प्र.3.  देवकी नंदन शर्मा का निधन किस वर्ष हुआ?

(A)  1998

(B)  2001

(C)  2005

(D)  2010

प्र.4.  उनकी जन्मशताब्दी कब मनाई गई?

(A)  17 अप्रैल 2017

(B)  17 अप्रैल 2019

(C)  17 अप्रैल 2020

(D)  17 अप्रैल 2021

प्र.5.  देवकी नंदन शर्मा के पिता और दादा किस रूप में प्रसिद्ध थे?

(A)  चित्रकारों के रूप में

(B)  राष्ट्रकवियों के रूप में

(C)  मूर्तिकारों के रूप में

(D)  संगीतकारों के रूप में

प्र.6.  उनके पुत्र का क्या नाम है जो स्वयं भी एक चित्रकार हैं?

(A)  रामशंकर शर्मा

(B)  भवानीशंकर शर्मा

(C)  कृष्णशंकर शर्मा

(D)  विश्वनाथ शर्मा

प्र.7.  देवकी नंदन शर्मा की जन्मशताब्दी समारोह का आयोजन किसने किया?

(A)  वनस्थली विद्यापीठ

(B)  जयपुर नगर निगम

(C)  राजस्थान स्टूडियो

(D)  ललित कला अकादमी

प्र.8.  उनके पिता किस रियासत के प्रतिष्ठित कवि थे?

(A)  जोधपुर और बीकानेर

(B)  अलवर और जयपुर

(C)  कोटा और बूँदी

(D)  उदयपुर और चित्तौड़

खण्ड-2: कला शिक्षा (Art Education)

प्र.9.  देवकी नंदन शर्मा ने प्रारंभिक कला-शिक्षा कहाँ से ग्रहण की?

(A)  शान्तिनिकेतन

(B)  दिल्ली स्कूल ऑफ आर्ट

(C)  महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर

(D)  बॉम्बे स्कूल ऑफ आर्ट

प्र.10.  महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर में उनके प्रमुख गुरु कौन थे?

(A)  नंदलाल बोस

(B)  शैलेन्द्रनाथ डे

(C)  बिनोद बिहारी मुखर्जी

(D)  अवनींद्रनाथ ठाकुर

प्र.11.  शान्तिनिकेतन में उन्होंने किनसे टेम्परा और वॉश पद्धति सीखी?

(A)  रामकिंकर बैज और सोमनाथ होर

(B)  बिनोद बिहारी मुखर्जी और नंदलाल बोस

(C)  अवनींद्रनाथ ठाकुर और গগেंद्रनाथ ठाकुर

(D)  जामिनी राय और अमृता शेरगिल

प्र.12.  शान्तिनिकेतन की स्थापना किसने की थी?

(A)  महात्मा गांधी

(B)  जवाहरलाल नेहरू

(C)  रवींद्रनाथ ठाकुर

(D)  सुभाषचंद्र बोस

प्र.13.  देवकी नंदन शर्मा ने शान्तिनिकेतन में कौन-सी दो प्रमुख तकनीकें सीखीं?

(A)  ऑयल और ऐक्रेलिक

(B)  टेम्परा और वॉश

(C)  फ्रेस्को और मोज़ेक

(D)  बाटिक और टाई-डाई

प्र.14.  नंदलाल बोस किस कला-आंदोलन से जुड़े थे?

(A)  बंगाल स्कूल

(B)  बॉम्बे प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप

(C)  दिल्ली आर्ट स्कूल

(D)  राजपूत स्कूल

प्र.15.  देवकी नंदन शर्मा की कला-शिक्षा में पारंपरिक और किस प्रकार की कला का समन्वय था?

(A)  पाश्चात्य अमूर्त कला

(B)  आधुनिक भारतीय कला

(C)  जापानी कला

(D)  चीनी कला

खण्ड-3: शिक्षण जीवन एवं वनस्थली (Teaching Career & Vanasthali)

प्र.16.  देवकी नंदन शर्मा किस संस्थान में प्राध्यापक रहे?

(A)  जयपुर विश्वविद्यालय

(B)  वनस्थली विद्यापीठ

(C)  दिल्ली कॉलेज ऑफ आर्ट

(D)  बड़ौदा विश्वविद्यालय

प्र.17.  वनस्थली विद्यापीठ किस राज्य में स्थित है?

(A)  मध्य प्रदेश

(B)  गुजरात

(C)  राजस्थान

(D)  उत्तर प्रदेश

प्र.18.  देवकी नंदन शर्मा वनस्थली विद्यापीठ से कब जुड़े?

(A)  1948

(B)  1953

(C)  1960

(D)  1965

प्र.19.  वनस्थली विद्यापीठ के ललित कला विभाग की स्थापना का श्रेय किसे दिया जाता है?

(A)  नंदलाल बोस

(B)  शैलेन्द्रनाथ डे

(C)  प्रो. देवकीनंदन शर्मा

(D)  भवानीशंकर शर्मा

प्र.20.  देवकी नंदन शर्मा के प्रमुख शिष्यों में कौन शामिल नहीं है?

(A)  विमलदास

(B)  अल्मेलकर

(C)  जे. सुलतान अली

(D)  मकबूल फ़िदा हुसैन

प्र.21.  उनके शिष्य जे. सुलतान अली किस क्षेत्र के कलाकार थे?

(A)  मूर्तिकला

(B)  भित्ति चित्रकला

(C)  ललित कला

(D)  फोटोग्राफी

प्र.22.  देवकी नंदन शर्मा के भित्ति चित्रण प्रशिक्षण शिविरों में कौन भाग लेते थे?

(A)  केवल भारतीय कलाकार

(B)  केवल राजस्थानी कलाकार

(C)  देशी और विदेशी दोनों कलाकार

(D)  केवल महिला कलाकार

प्र.23.  देवकी नंदन शर्मा ने वनस्थली में भित्ति चित्रण प्रशिक्षण शिविर कब से शुरू किए?

(A)  1950

(B)  1953

(C)  1958

(D)  1962

खण्ड-4: पक्षी चित्रकारिता (Bird Painting)

प्र.24.  ‘पक्षी चितेरा’ के नाम से किसे जाना जाता है?

(A)  नंदलाल बोस

(B)  प्रो. देवकीनंदन शर्मा

(C)  जामिनी राय

(D)  अमृता शेरगिल

प्र.25.  देवकी नंदन शर्मा ने लगभग कितने पक्षियों के चित्र बनाए?

(A)  500 से अधिक

(B)  750 से अधिक

(C)  1000 से अधिक

(D)  1500 से अधिक

प्र.26.  पक्षी-चित्रण में उन्होंने किन माध्यमों का प्रयोग किया?

(A)  केवल पेन और स्याही

(B)  केवल जलरंग

(C)  पेन-स्याही, जलरंग और तैल रंग

(D)  केवल तैल रंग

प्र.27.  ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विस ने प्रो. शर्मा को किस सूची में शामिल किया?

(A)  विश्व के 10 श्रेष्ठ चित्रकार

(B)  विश्व के 18 श्रेष्ठ पक्षी चितेरे

(C)  एशिया के 5 श्रेष्ठ कलाकार

(D)  भारत के 20 श्रेष्ठ कलाकार

प्र.28.  लंदन के किस गैलरी ने 1963 में उनके चित्रों को चुना?

(A)  नेशनल गैलरी

(B)  टेट गैलरी

(C)  ट्रायन गैलरी

(D)  विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम

प्र.29.  1963 की लंदन प्रदर्शनी में कितने देशों के कलाकार शामिल थे?

(A)  10 देश

(B)  15 देश

(C)  18 देश

(D)  22 देश

प्र.30.  देवकी नंदन शर्मा के पक्षी-चित्रों की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?

(A)  केवल काल्पनिक चित्रण

(B)  वैज्ञानिक सटीकता और काव्यात्मक सौंदर्य का संयोग

(C)  केवल बड़े कैनवास पर काम

(D)  केवल विदेशी पक्षियों का चित्रण

प्र.31.  पक्षी-चित्रण में उनकी रेखांकन शैली कैसी थी?

(A)  अस्पष्ट और अमूर्त

(B)  परिष्कृत और सटीक

(C)  बच्चों जैसी सरल

(D)  घनवादी (Cubist)

खण्ड-5: भित्ति कला एवं फ्रेस्को (Fresco & Wall Painting)

प्र.32.  जयपुर की पारंपरिक फ्रेस्को पद्धति को क्या कहा जाता है?

(A)  तंजावूर पद्धति

(B)  मधुबनी पद्धति

(C)  आरायश पद्धति

(D)  पिछवाई पद्धति

प्र.33.  देवकी नंदन शर्मा ने जयपुर रेलवे स्टेशन पर कौन-सा प्रसिद्ध फ्रेस्को चित्र बनाया?

(A)  पधारो म्हारे देश

(B)  ढोला मारू

(C)  गणगौर

(D)  तीज

प्र.34.  जयपुर रेलवे स्टेशन का ‘ढोला मारू’ चित्र किस वर्ष बना?

(A)  1955

(B)  1960

(C)  1964

(D)  1970

प्र.35.  ‘ढोला मारू’ चित्र का आकार क्या था?

(A)  3×4 फीट

(B)  4×6 फीट

(C)  6×9 फीट

(D)  8×12 फीट

प्र.36.  जयपुर रेलवे स्टेशन का ‘ढोला मारू’ फ्रेस्को किनके संयुक्त तत्वावधान में बना?

(A)  रेलवे और ललित कला अकादमी

(B)  रेलवे और राजस्थान पर्यटन विभाग

(C)  राज्य सरकार और केंद्र सरकार

(D)  वनस्थली विद्यापीठ और जयपुर नगर निगम

प्र.37.  ‘ढोला मारू’ किस प्रकार की गाथा है?

(A)  युद्ध गाथा

(B)  राजस्थानी लोक प्रेम-गाथा

(C)  धार्मिक गाथा

(D)  ऐतिहासिक गाथा

प्र.38.  मुम्बई के विले पारले में किस स्कूल के लिए उन्होंने फ्रेस्को चित्र बनाया?

(A)  डॉन बॉस्को हाई स्कूल

(B)  बृजमोहन रुइया हाई स्कूल

(C)  सेंट जेवियर्स स्कूल

(D)  कैंपियन स्कूल

प्र.39.  मुम्बई के विले पारले का फ्रेस्को चित्र किस वर्ष बना?

(A)  1950

(B)  1955

(C)  1960

(D)  1963

प्र.40.  आरायश पद्धति में चित्र किस पर बनाए जाते हैं?

(A)  कैनवास पर

(B)  कागज पर

(C)  चूने की पुताई पर

(D)  रेशम पर

प्र.41.  भित्ति कला (Fresco) की विशेषता क्या होती है?

(A)  यह बहुत जल्दी बनती है

(B)  यह दीवार पर स्थायी रूप से बनाई जाती है

(C)  यह केवल कागज पर बनती है

(D)  यह केवल तैल रंग से बनती है

खण्ड-6: शैली एवं तकनीक (Style & Technique)

प्र.42.  देवकी नंदन शर्मा ने किस प्रमुख तकनीक में विशेष दक्षता प्राप्त की?

(A)  डिजिटल आर्ट

(B)  वॉश टेम्परा

(C)  पेस्टल

(D)  कोलाज

प्र.43.  टेम्परा (Tempera) क्या है?

(A)  एक प्रकार का ब्रश

(B)  अंडे की जर्दी या गोंद आधारित रंग-माध्यम

(C)  एक प्रकार का कैनवास

(D)  एक मूर्तिकला तकनीक

प्र.44.  देवकीनंदन शर्मा की शैली को किस रूप में वर्णित किया जा सकता है?

(A)  शुद्ध अमूर्त

(B)  पूर्णतः यूरोपीय

(C)  भारतीय परंपरा और आधुनिक संवेदनशीलता का समन्वय

(D)  केवल लोक शैली

प्र.45.  उनके रंग-संयोजन की विशेषता क्या थी?

(A)  केवल काले और सफेद रंग

(B)  प्रकृति के रंग — मिट्टी, आकाश, वनस्पति

(C)  चमकीले नियॉन रंग

(D)  केवल प्राथमिक रंग

प्र.46.  ‘वॉश’ (Wash) तकनीक का उपयोग मुख्यतः किस माध्यम में होता है?

(A)  तैल रंग

(B)  जलरंग

(C)  ऐक्रेलिक

(D)  पेस्टल

प्र.47.  उनके चित्रों में रेखाएँ किस प्रकार की थीं?

(A)  मोटी और अव्यवस्थित

(B)  सूक्ष्म, परिष्कृत और सटीक

(C)  पूरी तरह अनुपस्थित

(D)  केवल ज्यामितीय

खण्ड-7: विषय-वस्तु एवं प्रमुख कृतियाँ (Themes & Major Works)

प्र.48.  देवकीनंदन. शर्मा के चित्रों में कौन-सा विषय प्रमुख रूप से नहीं था?

(A)  पक्षी

(B)  राजस्थानी लोक-संस्कृति

(C)  औद्योगिक परिदृश्य

(D)  प्रकृति

प्र.49.  ‘ढोला मारू’ की कथा में अंततः किसकी विजय होती है?

(A)  युद्ध की

(B)  ईर्ष्या और द्वेष की

(C)  प्रेम की

(D)  धन की

प्र.50.  उनके चित्रों में ‘धार्मिक और पौराणिक विषय’ भी शामिल थे, यह कथन:

(A)  पूर्णतः गलत है

(B)  सही है

(C)  केवल आंशिक रूप से सही है

(D)  अनिश्चित है

प्र.51.  देवकीनंदन शर्मा के पक्षी-चित्रों में किन पक्षियों को अंकित किया गया?

(A)  केवल विदेशी पक्षी

(B)  केवल मोर

(C)  भारत के विभिन्न पक्षी अपने स्वाभाविक परिवेश में

(D)  केवल काल्पनिक पक्षी

प्र.52.  उनकी कला में ‘भारतीयता’ से क्या तात्पर्य था?

(A)  केवल हिंदू धार्मिक विषय

(B)  केवल राजस्थानी लोककला

(C)  भारतीय मिट्टी, रंग, परंपरा और जन-जीवन से जुड़ी अभिव्यक्ति

(D)  केवल ऐतिहासिक चित्र

खण्ड-8: प्रदर्शनियाँ एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान (Exhibitions & International Recognition)

प्र.53.  लंदन में 1963 की प्रदर्शनी का आयोजन किसने किया?

(A)  ब्रिटिश म्यूजियम

(B)  नेशनल गैलरी

(C)  ट्रायन गैलरी

(D)  विक्टोरिया म्यूजियम

प्र.54.  1963 की लंदन प्रदर्शनी किस विषय पर थी?

(A)  भित्ति चित्र

(B)  पक्षी चित्र

(C)  परिदृश्य चित्र

(D)  पोर्ट्रेट

प्र.55.  ब्रिटिश इन्फॉर्मेशन सर्विस ने उन्हें किस श्रेणी में विश्व के 18 श्रेष्ठ में चुना?

(A)  भित्ति चित्रकार

(B)  पोर्ट्रेट चित्रकार

(C)  पक्षी चितेरे

(D)  अमूर्त चित्रकार

प्र.56.  जयपुर रेलवे स्टेशन का फ्रेस्को चित्र आज भी किस रूप में महत्त्वपूर्ण है?

(A)  यह नष्ट हो चुका है

(B)  यह एक लोकप्रिय पर्यटन आकर्षण है

(C)  यह केवल इतिहास की पुस्तकों में है

(D)  यह एक निजी संग्रहालय में है

प्र.57.  उनकी जन्मशताब्दी का ऑनलाइन समारोह किस प्लेटफॉर्म पर आयोजित हुआ?

(A)  यूट्यूब और ट्विटर

(B)  इंस्टाग्राम और फेसबुक लाइव

(C)  जूम और मीट

(D)  व्हाट्सऐप और टेलीग्राम

खण्ड-9: कला-दर्शन एवं विरासत (Art Philosophy & Legacy)

प्र.58.  देवकीनंदन शर्मा का सबसे बड़ा गुरु किसे माना जाता था?

(A)  नंदलाल बोस

(B)  शैलेन्द्रनाथ डे

(C)  प्रकृति

(D)  रवींद्रनाथ ठाकुर

प्र.59.  उनके कला-दर्शन का केंद्रीय विचार क्या था?

(A)  कला एक व्यवसाय है

(B)  कला एक साधना और आत्मा की अभिव्यक्ति है

(C)  कला केवल तकनीक है

(D)  कला केवल धनवानों के लिए है

प्र.60.  उन्होंने पाश्चात्य कला का अनुकरण क्यों नहीं किया?

(A)  क्योंकि उन्हें पाश्चात्य कला की जानकारी नहीं थी

(B)  क्योंकि वे भारतीय परंपरा और सत्य में विश्वास रखते थे

(C)  क्योंकि पाश्चात्य कला महँगी थी

(D)  क्योंकि उनके गुरु ने मना किया था

प्र.61.  देवकीनंदन शर्मा की विरासत किन तीन स्तरों पर जीवित है?

(A)  पुरस्कार, धन और प्रसिद्धि

(B)  कृतियाँ, शिष्य और जीवित परंपरा

(C)  पुस्तकें, भाषण और यात्राएँ

(D)  स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय

प्र.62.  देवकीनंदन शर्मा को ‘मौन साधक’ क्यों कहा जाता है?

(A)  वे बोलते नहीं थे

(B)  उन्होंने जन-प्रसिद्धि और पुरस्कारों की परवाह किए बिना साधना की

(C)  वे एकांतप्रिय थे और किसी से नहीं मिलते थे

(D)  उनकी आवाज धीमी थी

प्र.63.  उनकी ‘ढोला मारू’ कृति आज भी कहाँ देखी जा सकती है?

(A)  जयपुर संग्रहालय में

(B)  वनस्थली विद्यापीठ में

(C)  जयपुर रेलवे स्टेशन पर

(D)  राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में

प्र.64.  नई पीढ़ी प्रो. शर्मा से क्या सीख सकती है?

(A)  केवल पक्षियों को कैसे चित्रित करें

(B)  महानगर में रहकर ही कलाकार बना जा सकता है

(C)  जड़ों से जुड़कर, प्रकृति को गुरु मानकर श्रेष्ठ कला संभव है

(D)  पुरस्कार पाना ही कला का लक्ष्य है

प्र.65.  भारतीय कला में उनका सर्वाधिक योगदान किस क्षेत्र में माना जाता है?

(A)  आधुनिक अमूर्त कला

(B)  जयपुर फ्रेस्को परंपरा का पुनरुद्धार और पक्षी-चित्रण

(C)  पश्चिमी शैली का प्रसार

(D)  डिजिटल कला

खण्ड-10: सामान्य एवं विविध (General & Miscellaneous)

प्र.66.  देवकीनंदन शर्मा की कला को ‘आधुनिक-पारंपरिक’ क्यों कहा जाता है?

(A)  क्योंकि वे नई और पुरानी दोनों तकनीकें प्रयोग करते थे

(B)  क्योंकि वे परंपरा से जुड़े रहे पर समय के साथ भी चले

(C)  क्योंकि उनके चित्र संग्रहालयों में हैं

(D)  क्योंकि वे विदेश गए थे

प्र.67.  भारत में ‘फ्रेस्को’ चित्रकला की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध उदाहरण कहाँ मिलती है?

(A)  खजुराहो

(B)  अजंता की गुफाएँ

(C)  हम्पी

(D)  एलोरा की मूर्तियाँ

प्र.68.  राजस्थान का सबसे प्रसिद्ध लोक-चित्र-शैली कौन सी है?

(A)  मधुबनी

(B)  पिछवाई

(C)  फड़

(D)  गोंड

प्र.69.  ‘ढोला’ और ‘मारू’ की लोककथा किस भावना का प्रतीक है?

(A)  वीरता

(B)  सच्चे प्रेम की विजय

(C)  त्याग और बलिदान

(D)  धन-प्राप्ति

प्र.70.  वनस्थली विद्यापीठ की स्थापना किस उद्देश्य से हुई थी?

(A)  केवल विज्ञान शिक्षा के लिए

(B)  महिलाओं की समग्र शिक्षा के लिए

(C)  केवल कला शिक्षा के लिए

(D)  केवल व्यापार शिक्षा के लिए

प्र.71.  देवकीनंदन शर्मा की कला में ‘प्रकृति’ की भूमिका क्या थी?

(A)  एक गौण विषय

(B)  उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा और गुरु

(C)  केवल पृष्ठभूमि

(D)  कोई भूमिका नहीं

प्र.72.  टेम्परा (Tempera) माध्यम किस प्रकार की कला के लिए उपयुक्त माना जाता है?

(A)  बड़े आकार की अमूर्त कृतियाँ

(B)  सूक्ष्म और विस्तृत काम

(C)  केवल आधुनिक डिजाइन

(D)  केवल पोर्ट्रेट

प्र.73.  देवकीनंदन शर्मा के जीवन से सबसे बड़ी सीख क्या है?

(A)  महानगर में रहना जरूरी है

(B)  विदेश जाने से ही मान्यता मिलती है

(C)  समर्पण, साधना और जड़ों से जुड़ाव से विश्व-स्तरीय कला संभव है

(D)  केवल पुरस्कार से पहचान मिलती है


उत्तर-कुंजी (Answer Key)


सही उत्तर नीचे दिए गए हैं।

खण्ड-1: व्यक्तिगत जीवन एवं पृष्ठभूमि (Personal Life & Background)

प्र.1:  (B)  राजस्थान

प्र.2:  (C)  अलवर

प्र.3:  (C)  2005

प्र.4:  (B)  17 अप्रैल 2019

प्र.5:  (B)  राष्ट्रकवियों के रूप में

प्र.6:  (B)  भवानीशंकर शर्मा

प्र.7:  (C)  राजस्थान स्टूडियो

प्र.8:  (B)  अलवर और जयपुर

खण्ड-2: कला शिक्षा (Art Education)

प्र.9:  (C)  महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट, जयपुर

प्र.10:  (B)  शैलेन्द्रनाथ डे

प्र.11:  (B)  बिनोद बिहारी मुखर्जी और नंदलाल बोस

प्र.12:  (C)  रवींद्रनाथ ठाकुर

प्र.13:  (B)  टेम्परा और वॉश

प्र.14:  (A)  बंगाल स्कूल

प्र.15:  (B)  आधुनिक भारतीय कला

खण्ड-3: शिक्षण जीवन एवं वनस्थली (Teaching Career & Vanasthali)

प्र.16:  (B)  वनस्थली विद्यापीठ

प्र.17:  (C)  राजस्थान

प्र.18:  (B)  1953

प्र.19:  (C)  प्रो. देवकीनंदन शर्मा

प्र.20:  (D)  मकबूल फ़िदा हुसैन

प्र.21:  (C)  ललित कला

प्र.22:  (C)  देशी और विदेशी दोनों कलाकार

प्र.23:  (B)  1953

खण्ड-4: पक्षी चित्रकारिता (Bird Painting)

प्र.24:  (B)  प्रो. देवकीनंदन शर्मा

प्र.25:  (C)  1000 से अधिक

प्र.26:  (C)  पेन-स्याही, जलरंग और तैल रंग

प्र.27:  (B)  विश्व के 18 श्रेष्ठ पक्षी चितेरे

प्र.28:  (C)  ट्रायन गैलरी

प्र.29:  (C)  18 देश

प्र.30:  (B)  वैज्ञानिक सटीकता और काव्यात्मक सौंदर्य का संयोग

प्र.31:  (B)  परिष्कृत और सटीक

खण्ड-5: भित्ति कला एवं फ्रेस्को (Fresco & Wall Painting)

प्र.32:  (C)  आरायश पद्धति

प्र.33:  (B)  ढोला मारू

प्र.34:  (C)  1964

प्र.35:  (C)  6×9 फीट

प्र.36:  (B)  रेलवे और राजस्थान पर्यटन विभाग

प्र.37:  (B)  राजस्थानी लोक प्रेम-गाथा

प्र.38:  (B)  बृजमोहन रुइया हाई स्कूल

प्र.39:  (B)  1955

प्र.40:  (C)  चूने की पुताई पर

प्र.41:  (B)  यह दीवार पर स्थायी रूप से बनाई जाती है

खण्ड-6: शैली एवं तकनीक (Style & Technique)

प्र.42:  (B)  वॉश टेम्परा

प्र.43:  (B)  अंडे की जर्दी या गोंद आधारित रंग-माध्यम

प्र.44:  (C)  भारतीय परंपरा और आधुनिक संवेदनशीलता का समन्वय

प्र.45:  (B)  प्रकृति के रंग — मिट्टी, आकाश, वनस्पति

प्र.46:  (B)  जलरंग

प्र.47:  (B)  सूक्ष्म, परिष्कृत और सटीक

खण्ड-7: विषय-वस्तु एवं प्रमुख कृतियाँ (Themes & Major Works)

प्र.48:  (C)  औद्योगिक परिदृश्य

प्र.49:  (C)  प्रेम की

प्र.50:  (B)  सही है

प्र.51:  (C)  भारत के विभिन्न पक्षी अपने स्वाभाविक परिवेश में

प्र.52:  (C)  भारतीय मिट्टी, रंग, परंपरा और जन-जीवन से जुड़ी अभिव्यक्ति

खण्ड-8: प्रदर्शनियाँ एवं अंतरराष्ट्रीय पहचान (Exhibitions & International Recognition)

प्र.53:  (C)  ट्रायन गैलरी

प्र.54:  (B)  पक्षी चित्र

प्र.55:  (C)  पक्षी चितेरे

प्र.56:  (B)  यह एक लोकप्रिय पर्यटन आकर्षण है

प्र.57:  (B)  इंस्टाग्राम और फेसबुक लाइव

खण्ड-9: कला-दर्शन एवं विरासत (Art Philosophy & Legacy)

प्र.58:  (C)  प्रकृति

प्र.59:  (B)  कला एक साधना और आत्मा की अभिव्यक्ति है

प्र.60:  (B)  क्योंकि वे भारतीय परंपरा और सत्य में विश्वास रखते थे

प्र.61:  (B)  कृतियाँ, शिष्य और जीवित परंपरा

प्र.62:  (B)  उन्होंने जन-प्रसिद्धि और पुरस्कारों की परवाह किए बिना साधना की

प्र.63:  (C)  जयपुर रेलवे स्टेशन पर

प्र.64:  (C)  जड़ों से जुड़कर, प्रकृति को गुरु मानकर श्रेष्ठ कला संभव है

प्र.65:  (B)  जयपुर फ्रेस्को परंपरा का पुनरुद्धार और पक्षी-चित्रण

खण्ड-10: सामान्य एवं विविध (General & Miscellaneous)

प्र.66:  (B)  क्योंकि वे परंपरा से जुड़े रहे पर समय के साथ भी चले

प्र.67:  (B)  अजंता की गुफाएँ

प्र.68:  (C)  फड़

प्र.69:  (B)  सच्चे प्रेम की विजय

प्र.70:  (B)  महिलाओं की समग्र शिक्षा के लिए

प्र.71:  (B)  उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा और गुरु

प्र.72:  (B)  सूक्ष्म और विस्तृत काम

प्र.73:  (C)  समर्पण, साधना और जड़ों से जुड़ाव से विश्व-स्तरीय कला संभव है

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