⚠️ LT Grade जून 2026 परीक्षा! PDF + MCQ Bundle सिर्फ ₹299 👉 अभी खरीदें  |  📲 FREE Notes पाएं 👉 WhatsApp Join करें

भारतीय मूर्तिकला क्या है? इतिहास और विशेषताएं | TGT PGT

admin

Updated on:

भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला का इतिहास

भारतीय मूर्तिकला क्या है? इतिहास और विशेषताएं | TGT PGT

By admin

Updated on:

Follow Us

भारतीय मूर्तिकला का इतिहास — प्रागैतिहासिक काल से आधुनिक काल तक। TGT, PGT, B.Ed और UGC NET परीक्षाओं के लिए सम्पूर्ण नोट्स हिंदी में। प्रागैतिहासिक काल (लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व) ⏰ जून 2026 से पहले LT Grade Art की तैयारी पूरी करें! हजारों छात्र पहले ही तैयारी शुरू कर चुके हैं ...

भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला का इतिहास

भारतीय मूर्तिकला का इतिहास — प्रागैतिहासिक काल से आधुनिक काल तक। TGT, PGT, B.Ed और UGC NET परीक्षाओं के लिए सम्पूर्ण नोट्स हिंदी में।

Table of Contents

प्रागैतिहासिक काल (लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व)

⏰ जून 2026 से पहले

LT Grade Art की तैयारी पूरी करें!

हजारों छात्र पहले ही तैयारी शुरू कर चुके हैं 📈

Complete Bundle में मिलेगा:

✅ सम्पूर्ण PDF Notes — सभी topics

✅ 500+ MCQ प्रश्न उत्तर सहित

✅ Previous Year Questions

सिर्फ ₹299

🎯 अभी खरीदें

Instant Download ✅ Secure Payment ✅

पृष्ठभूमि

भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला का इतिहास बहुत प्राचीन है, जो मानव सभ्यता के विकास से भी जुड़ा है। वस्तुतः भारतीय कला भारतीय धर्म और संस्कृति की मूर्त अभिव्यक्ति रही है, जहाँ व्यक्ति की सोच नहीं बल्कि भारतीय समाज के सामूहिक अनुभव और सोच को व्यक्त किया गया है।

भारतीय कला में देवताओं, मनुष्यों, जानवरों और पौधों की दुनिया को एक विशाल प्रासंगिक स्थान के रूप में दर्शाया गया है। कला के विभिन्न माध्यमों में मूर्तिकला निस्संदेह सबसे शक्तिशाली और बहुमुखी रही है, जिसमें धर्म हमेशा प्रमुख रहा है।

भारत एक मूर्तिपूजक देश है। इस देश के निवासी पूजा के कई तरीके अपनाते हैं, जिनमें से एक है “मूर्ति पूजा”; लेकिन मूर्ति बनाने का उद्देश्य केवल मूर्ति को पूजा में रखना ही नहीं है, बल्कि यह उससे कहीं अधिक व्यापक है। मूर्ति निर्माण के उद्देश्य इस प्रकार हैं

📚 FREE PDF Notes पाएं!

Join करें और सभी Art History Notes PDF में डाउनलोड करें

✅ सम्पूर्ण नोट्स ✅ MCQ Series ✅ FREE
💬 WhatsApp Join करें ✈️ Telegram Join करें

🌐 indianarthistory.com

(1) स्मृति को संरक्षित करना,

(2) अमूर्त को मूर्त रूप देना,

(3) भावना को आकार देना।

मूर्ति की परिभाषा

डॉ. रायकृष्ण दास जी के अनुसार- “किसी भी धातु- सोना, चाँदी, ताँबा, काँसा, पीतल, अष्टधातु अथवा कृत्रिम धातु- पारे के मिश्रण, रत्न, उपरत्न, काँच, कड़े और मुलायम पत्थर, मसाले, कच्ची व पकाई मिट्टी, मोम, लाख, गंधक, हाथीदांत, शंख, सीप, अस्थि, सींग, लकड़ी एवं कागज की बनी लुग्दी आदि को उनके स्वभाव के अनुसार गढ़कर, खोदकर, उभारकर, कोरकर, पीटकर हाथ से अथवा औजार से डौलियाकर, ठप्पा या साँचा छापकर बनाई गई आकृति को ‘मूर्ति’ कहते हैं।”

इंसान हजारों साल पहले जंगली जानवरों की तरह रहता था और खुद को जंगली जानवरों से बचाने के लिए हथियार बनाता था, मानव आज से सहस्त्रों वर्षों पहले जंगली पशुओं के समान ही जीवन बिताता था और जंगली जानवरों से अपनी रक्षा करने हेतु हथियार बनाया करता था, परन्तु ईसा पूर्व पाँचवीं व छठी शताब्दी से नागरिक सभ्यता का आरम्भ होता है, और तभी से ही मानव ने पत्थर, मिट्टी व धातु आदि की मूर्तियाँ बनानी प्रारम्भ कर दी थीं।

भारत में प्रागैतिहासिक कालीन मनुष्य द्वारा बनाई गई कलात्मक वस्तुओं के उदाहरण ताम्र युग या नव-पाषाण युग से ही उपलब्ध होने लगते हैं। उस समय यह मूर्तियाँ मात्र मानव आकृति का भान कराने वाली मूर्तियाँ ही होती थीं।

ऐसा प्रतीत होता है कि जिन जातियों का सांस्कृतिक विकास अन्य जातियों की अपेक्षा कम था, वे जातियाँ ही इस प्रकार की मानव आकृतियों का, जो कि ताँबे की पीटी हुई मोटी चादर की बनी होती थीं, का निर्माण करती थी और कदाचित् ये आकृतियाँ पूजा के उद्देश्य से बनाई जाती थीं।

ताम्रयुग की पूजनीय मानव आकृतियाँ

मूर्तिकला के प्रारंभिक काल के कुछ उदाहरण भी मिले हैं, जिन्हें मूर्तिकला के इतिहास का जन्म कहा जा सकता है और इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। कुछ मुख्य निम्नलिखित हैं-

(1) हाथी दांत पर उकेरे गए एक ‘हाथी’ का चित्र

(2) एक विशाल सींग पर उभरा हुआ ‘घोड़े’ का चित्र

(3) हड्डी पर बना एक ‘टट्टू’ रूप।

इन्हीं प्रारम्भिक आकृतियों को मूर्तिकला की जन्मदाता कहा जाना उचित है। जैसे-जैसे मानव सभ्यता आगे बढ़ी, धातु, हाथीदांत, कांस्य आदि की मूर्तियाँ भी प्रकाश में आने लगीं।

इन उदाहरणों से यह भी स्पष्ट होता है कि प्रारम्भ में मूर्तिकला का मुख्य उद्देश्य धार्मिक कार्य जैसे पूजा आदि था।

ध्यान से देखा जाए तो मानव सभ्यता का विकास वास्तव में इन दो विशेषताओं पर आधारित है – “अतीत का संरक्षण” और “अव्यक्त को व्यक्त या अमूर्त को मूर्त रूप देना” ।

पाषाण युग की पृष्ठभूमि

वस्तुतः पाषाण युग की संस्कृतियाँ मानव सभ्यता की पुरातनता का प्रमाण हैं। 1863 में लुबॉक ने सबसे पहले इस पाषाण युग को तीन भागों में बांटा था।

(1) पूर्व पाषाण युग (पैलियोलिथिक एज)

(2) मध्य पाषाण युग (मेसोलिथिक एज)

(3) नव पाषाण युग (नियोलिथिक एज)

पूर्व पाषाण युग (पैलियोलिथिक एज)

पूर्व पाषाण युग की संस्कृति लगभग 5,00,000 वर्ष पुरानी मानी जाती है। इस समय का मनुष्य पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर था और जंगलों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध फलों और कंदों से अपने पेट की आपूर्ति करता था और जंगली जानवरों से खुद को बचाने के लिए, वह मोटे पत्थर के औजारों और हथियारों का इस्तेमाल करता था।

पाषाण युग के मनुष्य झाड़ियों में छायादार वृक्षों के नीचे, नदियों के किनारे और पहाड़ों की दरारों में रहते थे।

पाषाणयुगीन मानव के पत्थर के औजार भारत के विभिन्न भागों में प्राप्त हुए हैं। जैसे- मद्रास, उड़ीसा, हैदराबाद, मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश, पंजाब आदि। इस समय के मानव द्वारा प्रयुक्त होने वाले पत्थर के उपकरणों में मुख्यतः पेबुल से बने शल्क (फ्लेक्स), गंडासे (चॉपर), खुरचना (स्क्रेपर), वसूली (क्लीवर), फलक (ब्लेड) तथा विदारक परशु (हैण्ड एक्स क्लीवर) सम्मिलित हैं। 

पूर्व पाषाण युगीन उपकरण

1. पेबुल समन्तान्त हैण्डऐक्स 2. चॉपर 3. यू आकृति क्लीवर 4. अन्वस्थ स्क्रेपर 5. जनगठित ब्लेड 6. फ्लेक 7. पेबुल 8. छेनी

मध्य पाषाण काल (मेसोलिथिक एज)

पूर्व पाषाण युग के विभिन्न चरणों से संबंधित पत्थर के औजारों का अध्ययन यह दर्शाता है कि धीरे-धीरे मनुष्य की कलात्मक रुचि विकसित और परिष्कृत हो रही थी।

शुरुआत में उसके औजार जो खुरदुरे और मोटे थे अब कुछ परिष्कृत होने लगे थे। इस काल के मनुष्यों ने अपने औजार छोटे-छोटे पत्थरों और कंकड़ से बनाना शुरू किया, जो मध्य पाषाण युग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था।

⏰ जून 2026 से पहले

LT Grade Art की तैयारी पूरी करें!

हजारों छात्र पहले ही तैयारी शुरू कर चुके हैं 📈

Complete Bundle में मिलेगा:

✅ सम्पूर्ण PDF Notes — सभी topics

✅ 500+ MCQ प्रश्न उत्तर सहित

✅ Previous Year Questions

सिर्फ ₹299

🎯 अभी खरीदें

Instant Download ✅ Secure Payment ✅

इस काल में निर्मित ये छोटे औज़ार आकार में छोटे होते हुए भी अधिक उपयोगी और घातक थे। ये विशिष्ट उपकरण भारत के विभिन्न क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं।

इन स्थानों में उत्तरप्रदेश में विध्य क्षेत्र (मोरहना पहाड़ बघहीखोर आदि) एवं गंगा घाटी (सराय नहरराय), बंगाल में वीर भानपुर, तमिलनाडु में  टेरी उद्योग, गुजरात में लंघनाज, मध्यप्रदेश में आदमगढ़ एवं राजस्थान में बागोर (भीलवाड़ा जिला) की गणना की जा सकती है।

लघु पाषाण उपकरण, सराय नहरराय

मध्य पाषाण युगीन इन लघु प्रस्तर उपकरणों के निर्माण के लिए जिन प्रस्तर प्रकारों का उपयोग किया गया, उनमें हैं-इन्द्रगोप (कार्नेलियन), गोमेद (अगेट), चकमक (फ्लिन्ट), स्फटिक (क्वार्ट्ज) आदि को मध्यपाषाण युग के इन छोटे पत्थर के औजारों के निर्माण के लिए उपयोग किए जाने वाले पत्थर के प्रकारों में गिना जा सकता है।

इनमें मुख्य रूप से खुरचनी त्रिकोणीय ब्लेड, साधारण चाकू जैसा ब्लेड शामिल है। संभवतः इनको बाण के सिरे पर फँसाया जाता होगा। कहीं-कहीं इन छोटे-छोटे औजारों की प्राप्ति के स्थान से मिट्टी के घड़े भी मिले हैं।

मध्य पाषाण काल ​​के मानव ने संभवत: किसी प्रकार की सामाजिक व्यवस्था विकसित की थी, क्योंकि शवों को दफनाने की विधि आदि इस समय पर्याप्त रूप से विकसित हो चुकी थी।

यह अनुमान लंघनाज (अहमदाबाद से 59 किमी) से उत्खनित नर कंकालों के आधार पर निकाला गया है। शायद उस जमाने का आदमी भी आग से परिचित हो गया था।

नवपाषाण युग (नवपाषाण युग)

सांस्कृतिक विकास की प्रक्रिया में नवपाषाण काल ​​सबसे महत्वपूर्ण है। इस युग में मनुष्य ने पशुपालन और खेती की कला सीखी थी। इसलिए उन्होंने उत्पादित भोजन पर निर्वाह करना शुरू कर दिया और भोजन बनाने के लिए हाथ से मिट्टी के बर्तन बनाना शुरू कर दिया।

नवपाषाण काल ​​के मानव द्वारा सबसे महत्वपूर्ण खोज ‘अग्नि’ थी। वह अब कच्चे मांस के स्थान पर भुने हुए मांस का प्रयोग कर रहा था। इससे वह खुद को जंगली जानवरों से बचाने में सक्षम हो गया। इस काल के मनुष्य शैलाश्रय के स्थान पर घास-फूस की कुटिया बनाकर जीवन व्यतीत करने लगे थे।

इसके साथ ही जानवरों और पौधों और पत्तियों आदि की खाल से कपड़े बनाना भी शुरू किया गया था। इस अवधि के दौरान, उन्होंने अपने औजारों और उपकरणों को चिकना और चमकदार बनाकर अपना निर्माण कौशल भी दिखाया।

नवपाषाणकालीन मानव ने शव के विसर्जन के लिए ‘दाह संस्कार’ और ‘शव-दफन’ दोनों विधियों का पालन किया। इसलिए कभी-कभी वह शव के ऊपर कब्र भी बना लेता था।

मृतकों को पत्थर के औजारों सहित जीवन की आवश्यकताओं से संबंधित कई सामग्रियों के साथ भी दफनाया गया था। आदिम मनुष्य की यह स्थिति मनुष्य के सामाजिक जीवन की ओर संकेत करती है।

नवपाषाण मानव संस्कृति के अवशेष कश्मीर (बुर्जहोम), बलूचिस्तान, स्वात, ऊपरी सिंधु घाटी, गंगा घाटी के दक्षिण में विंध्य क्षेत्र, बिहार का सारण जिला, छोटा नागपुर पठार, उत्तर प्रदेश के पूर्वी जिले, बिहार, उड़ीसा और पश्चिम बंगाल, असम चटगाँव, दार्जिलिंग और दक्षिणी भारत से प्राप्त हुए हैं ।

नवपाषाण युग की सबसे उल्लेखनीय विशेषता पॉलिश किए गए पत्थर के औजारों का निर्माण और उपयोग है। ऐसा भी प्रतीत होता है कि नवपाषाण काल ​​के मनुष्य ने पत्थर के औजारों के अलावा हड्डियों से भी औजार बनाना शुरू किया। बुर्जहोम से प्राप्त हड्डियों से बने छेदक, नुकीले (बिंदु), सुई (सुई) इस बात की पुष्टि करते हैं।

घुलमुहम्मद, महगढ़ा, चिरांद आदि स्थलों से भी अस्थि निर्मित उपकरण प्राप्त हुए हैं। विभिन्न स्थलों से उपलब्ध हुए उपकरणों में घर्षण तकनीक से पाषाण निर्मित कुल्हाड़ी, बसुली (एड्जे), खोदने की लकड़ी (डिगिंग स्टिक), चाकू, गदाशीर्ष (मेस हैड), कुदाल (हो), छेन्यान्त, कुल्हाड़ी (पिक एक्स), छेनी (चीजिल) आदि की गणना मुख्यतः की जा सकती है।

नव पाषाण उपकरण

1. चिंतागोलाकार) 2. खावेदार कुलाही 3.बसुली 4. वृत्ताश्म अथवा गदाशीर्ष 5. दण्ड छेनी 6. न्यान्त कुल्हाड़ी

इस काल के मनुष्यों के घर की दीवारों को मिट्टी और ईंटों से बनाने और फर्श को गेरू से प्लास्टर करने के भी संकेत मिलते हैं। इसी समय से चाक पर बने काले-भूरे रंग के मिट्टी के बर्तनों का भी प्रारंभ माना जाता है। दक्षिण भारत में कई स्थानों से पीले-भूरे रंग और भूरे या काले रंग के हस्तनिर्मित मिट्टी के बर्तन मिले हैं। ऐसे बर्तनों की लाल सतह पर भूरे और बैंगनी रंग के चित्र भी मिले हैं।

नवपाषाण काल ​​के मनुष्य की कलात्मक रुचि को व्यक्त करने वाले यंत्रों में बिहार के सारण जिले के चिरंद से पाए गए महंगे पत्थरों, पेंडेंट, हड्डियों की चूड़ियों और जानवरों और पक्षियों और सांपों की मूर्तियों से बने मोतियों की गिनती की जा सकती है।

नवपाषाण युग में धातुओं में तांबे के साथ मानव का परिचय स्थापित किया गया था। उन्होंने धातु के औजार बनाने के साथ-साथ चाक पर बर्तन बनाने की कला भी सीखी।

भारत के विभिन्न हिस्सों से मरणोपरांत दाह संस्कार भी प्राप्त हुए हैं। ब्रह्मगिरी, तमिलनाडु, आंध्र, केरल और कर्नाटक प्रांतों के विस्तृत क्षेत्रों से पत्थर की लाशें मिली हैं। ये महापाषाण कब्रें उत्तर भारत में भी मिली हैं। राजस्थान में दौसा और नागौर और उत्तर प्रदेश में बेलन घाटी की खुदाई से भी लौह युग की महापाषाणकालीन कलाकृतियाँ सामने आई हैं।

ताम्रनिधि और गैरिक पॉटरी (कॉपर होर्ड और ओसीपी)

आदिम मनुष्य की कलात्मक क्षमता और कौशल को उजागर करने वाली कई सामग्रियों में तांबे से बने उपकरण और गैरिक रंग से चित्रित मिट्टी के बर्तनों का अपना विशेष स्थान है। मध्य प्रदेश, बिहार और उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जगहों से इस तरह के उपकरण सामने आए हैं। स्टुअर्ट पिगट ने भारत में आर्यों के आगमन के साथ तांबे के उपकरणों को जोड़ा है। गंगाघाटी के प्रमुख ताम्र यंत्र थे

(1) चपटी कुल्हाड़ी (फ्लैट सेल्ट)

(2) कन्धेदार फरसेनुमा कुल्हाड़ी (शुल्डर्ड सेल्ट)ड सेल्ट)

(3) हत्थेदार कुल्हाड़ी (बार सेल्ट)

(4) ताँबे की अंगूठी (कॉपर रिंग)

(5) काँटेदार बरछेनुमा उपकरण (हार्पून)

(6) तलवार की भाँति का उपकरण (एन्टिने सोर्ड)

(7) मानवाकृति उपकरण (एन्थ्रोपोमॉर्फिक फिगर)। 

ताम्र निधि (कॉपर होर्ड)

1. फ्लैट सेल्ट 2. शुल्डर्ड सेल्ट 3. बार सेल्ट 4. रिंग 5. हार्पून 6. एन्टिने सोर्ड 7. एन्थ्रोपोमॉर्फिक फिगर

ताम्रनिधि उपकरणों के साथ ही ‘गैरिक’ अथवा ‘गेरुए रंग’ की एक विशेष प्रकार की पॉटरी भी उत्खनन से प्रकाश में आई है। इसे ‘ओकर कलर्ड पॉटरी’ (OCP) भी कहा जाता है। बी बी लाल के अनुसार, ताम्रनिधि और गैरिक पॉटरी के बीच एक निश्चित संबंध है।

उनके अनुसार, वे आर्यों के आने से पहले गंगा घाटी में रहने वाले लोगों द्वारा बनाए गए थे। श्री लाल ने अपने मत की पुष्टि के लिए मध्य प्रदेश, उत्तरी उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और दक्षिणी बिहार से उपलब्ध पत्थर की कुल्हाड़ियों का उदाहरण दिया है।

जिसके आधार पर बाद के समय में तांबे की कुल्हाड़ियों का विकास हुआ। संभवतः संथाल और मुंडा जातियों के पूर्वज इन ताम्र वाद्य समूहों के निर्माता थे।

⏰ जून 2026 से पहले

LT Grade Art की तैयारी पूरी करें!

हजारों छात्र पहले ही तैयारी शुरू कर चुके हैं 📈

Complete Bundle में मिलेगा:

✅ सम्पूर्ण PDF Notes — सभी topics

✅ 500+ MCQ प्रश्न उत्तर सहित

✅ Previous Year Questions

सिर्फ ₹299

🎯 अभी खरीदें

Instant Download ✅ Secure Payment ✅

विभिन्न तिथियों के प्रकाश में कहा जा सकता है कि गैरिकवर्णी पॉटरी व ताम्रनिधि से सम्बद्ध संस्कृतियाँ 2000 ई.पू. से 1580 ई.पू. के मध्य अस्तित्व में आ चुकी थीं।इस गैर-मौखिक मिट्टी के बर्तनों को चित्रित भूरे रंग के मिट्टी के बर्तनों का अग्रदूत कहा जा सकता है।

डी.पी.अग्रवाल ने ताम्रनिधि संस्कृति और हड़प्पा संस्कृतियों के निवासियों को एक दूसरे से अलग संस्कृतियों के रूप में माना है। तांबे की उत्पत्ति के उपकरण दृश्य आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए निर्मित किए गए थे।

ताम्रनिधि भारतीय प्रागैतिहासिक काल की एक विशेष परंपरा है। वे संभवतः पूर्वी भारत के उपकरणों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो मूल रूप से पूर्वी बिहार, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा में रहते थे।

इसलिए, यह कहा जा सकता है कि गेरू रंग के बर्तनों की परंपरा को पोषित करने वाले लोग पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के निवासी थे। उनके मुख्य बर्तन घड़े, अनाज से भरे जार, प्याले, प्लेट, कटोरे आदि थे।

संभवतः ये लोग गंगा घाटी के मूल निवासी थे। ग्रेवाल द्वारा इन्हें परवर्ती हड़प्पाई कहा जाता है। ताम्रनिधि के पालन-पोषण करने वाले लोग मूल रूप से शिकार की स्थिति में थे। वे खाद्य सामग्री संग्रहक थे। इसके विपरीत, गेरू रंग के मिट्टी के बर्तन बनाने वाले लोग एक सुसंस्कृत जीवन व्यतीत करने वाले लोग थे। वे कृषि कार्य करते थे और आर्थिक रूप से पूरी तरह से बस गए थे।


FAQ

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों की खोज किसने की?

आर्चिवाल्ड कार्लाईल (Archibald Carlleyle) तथा जॉन काकबर्न (John Cockbum) ने सर्वप्रथम ई० में कैमूर की पहाड़ियों के सम्बन्ध में बताकर शिला चित्रों की खोज की।

सन् 1899 ई० में काकबर्न का लेख ‘केव ड्राइंग्स इन द कैमूर रेंज, नॉर्थ वेस्ट प्रोविन्सेज’ किस जनरल में प्रकाशित हुआ?

जर्नल ऑफ रॉयल एशियाटिक सोसायटी

सिंहनपुर के महत्वपूर्ण शिलाचित्रों की खोज किसने की?

सी० डब्ल्यू एण्डर्सन ने 1910 में।

आदि मानव किसके बने हथियार प्रयोग करता था?

पत्थर।

प्रागैतिहासिक चित्रों का सर्वाधिक प्रमुख विषय क्या था?

आखेट।

लद्दाख में प्रागैतिहासिक चित्रों का केन्द्र कौन सा था?

ससपाल।

होशंगाबाद के शिलाचित्रों की खोज का श्रेय किसको जाता है?

मनोरंजन घोष ने 1922 ई में इन शिला चित्रों की खोज की।

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों में कौन-कौन से प्रतीक अधिक प्रयुक्त हुए हैं?

चक्र, त्रिशूल, स्वास्तिक।

आदि मानव ने किन रंगों का प्रयोग किया है?

खनिज रंगों का।

होशंगाबाद क्षेत्र में दोहरी रेखाओं द्वारा शिलाश्रय के ऊपरी भाग में जो महामहिष का चित्र है उसका आकार क्या है?

10’x6′

जिराफ ग्रुप कहाँ की शिलाओं पर मिलता है?

आदमगढ़।

पंचमढी को “पाँच पाण्डवों की गुफाएं” नाम से क्यों जाना जाता है?

यहाँ पाण्डवों ने वनवास के दौरान निवास किया था।

पंचमढी चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय किसको है?

डा० जी. आर. हन्टर

छः पैर वाले अति दीर्घ काल्पनिक पशु के आखेट का दृश्य किस स्थान पर चित्रित है?

चम्बल घाटी में कनवला नामक स्थान पर।

‘हरनी हरना’ नामक गुफा कहाँ पर है?

विजयगढ़।

लिखनिया गुफा कहाँ है?

मिर्जापुर क्षेत्र में कंडाकोट पहाड़ के समीप

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों में मानवाकृतियों की रूप विधि किस प्रकार की है?

ज्यामितिक (कहीं आयताकार, कहीं त्रिकोणात्मक, कहीं डमरूनुमा तो कहीं सीढ़ीनुमा आदि)

कबरा पहाड किस क्षेत्र में है ?

रायगढ़ क्षेत्र में।

पूर्व पाषाण कालीन प्रस्तर उपकरणों का पता किसने और कब लगाया?

1863 ई० में रॉबर्ट ब्रूस फूट ने मद्रास के निकट पल्लवरम में।

प्रागैतिहासिक शैली में बना महाकाय गजराज का चित्र कहाँ मिलता है ?

माण्टेरोजा (पंचमढ़ी) से।

भीम बेटका के चित्र अधिकतर कहाँ और किस रंग से बने हैं?

दीवार व छत पर लाल रंग से।

लेफ्टिनेट कर्नल डी० एच० गार्डन के लेखों का संकलन किस नाम से प्रकाशित है?

1950 ई० में प्रकाशित “रिप्रोडक्शन्स फ्राम गार्डन।”

भीम बेटका कहाँ पर है?

भोपाल के पास।

भीम बेटका की गुफाएँ किस काल से सम्बन्धित हैं?

मध्य पाषाण काल से (10,000 से 3,000 वर्ष ईसा पूर्व) ।

भीम बेटका की गुफाएँ कितनी हैं?

600 से भी अधिक गुफाएँ जिसमे 475 चित्रित हैं।

प्रागैतिहासिक काल में किन-किन पशुओं के चित्र मिलते हैं?

हाथी, भैसा, जिराफ, सुअर, हिरन, गाय, बैल, बंदर, चीता, भालू, गैंडा, वकरी आदि।

ताम्रपाषाण युग में मानव किसकी पूजा करते थे?

मातृदेवी

भीम बेटका की गुफाओं की खोज का श्रेय किसको जाता है?

वी० एस० वाकणकर

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों में किन-किन पक्षियों का अंकन किया गया है?

गिद्ध मोर या काल्पनिक आकृतियां आदि।

भारतीय शिलाचित्रों की खोज का प्रथम श्रेय किस विदेशी विद्वान को जाता है?

आर्चिवाल्ड

जिस मर्तबान पर पंचतन्त्र की कहानी ‘धूर्त लोमड़ी’ चित्रित हुई है वह कहाँ मिलता है?

लोथल (गुजरात)।

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों में मुख्य विषय क्या रहा?

शिकार।

आदिकाल की सबसे बड़ी ताम्रनिधि किस प्रदेश में मिली है?

गुगेरिया, मध्य प्रदेश में।

प्रागैतिहासिक शिला चित्रों के विषय क्या-क्या थे?

नृत्य, शिकार, मद्यपान, जुलूस, वृद्ध आदि।

सबसे अधिक धनुर्धरों का चित्रण कहाँ मिलता है?

पंचमढी।

प्रागैतिहासिक शिला चित्र मुख्य रूप से किन-किन स्थानों पर मिलते हैं?

भोपाल, होशंगाबाद, मिर्जापुर आदि।

दक्षिण भारत के वैल्लारी के प्रागैतिहासिक शैल चित्रों का परिचय किसने दिया?

एफ. फासेट।

READ MORE:

Related Post

Leave a Comment