Table of Contents
अजन्ता कला
उचित प्रमाण, लवलीन वर्णाढ्यता, भावनाओं की सुकुमारता, उच्चादर्श का गौरव, रूपाकारों की सुकोमल रचना, लयात्मक रेखाओं का नियोजन, धरातल विभाजन की परिकल्पना, अनुभूतियों की गहरायी आदि विशिष्टताएँ एक उत्कृष्ट कलाकृति की रचना में सहायक होती हैं.
इस कथन की सच्चाई अजन्ता की कलाकृतियाँ प्रत्यक्ष प्रदर्शित करती हैं। अजन्ता एक नाम है कलाकारों की परिकल्पना का, भिक्षुओं के उच्चादशों का बौद्ध धर्म के उपदेशों का, तत्कालीन संस्कृति के विस्तार का भित्ति चित्रण परम्परा के एक इतिहास का वास्तव में अजन्ता भारतीय संस्कृति का स्तम्भ है, एक वातायन है जिसके माध्यम से हम एक ऐसे जगत् से साक्षात्कार करते हैं जहाँ सृष्टि का प्रत्येक तत्व आत्मानुभूति से ओतप्रोत गतिशील है।
मुकुल डे के अनुसार “अजन्ता में उन वास्तविक दृश्यों का चित्रांकन मिलता है जो कि कलाकार के नेत्रों में पहले से ही विद्यमान थे क्योंकि उसने समाज में रहकर उनका निरीक्षण-परीक्षण किया था और वह उनसे चिरपरिचित था।”
“अजन्ता गुफा मन्दिरों की भित्ति चित्रकला अपनी उस पूर्णता पर पहुँची थी, जिसकी कलात्मकता संसार में अतुलनीय है। विषयवस्तु की उत्कृष्टता, आकल्पन का गौरवशाली उद्देश्य, सृजन की समरूपता, स्पष्टता, सहजता और रेखांकन की नियमबद्धता से हमें सम्पूर्ण गुफा मन्दिरों की आश्चर्यजनक समग्रता का आभास मिलता है। धार्मिक पवित्र भाव ने मानों स्थापत्य कला, मूर्तिकला और चित्रकला की एक सुखद् नयनाभिराम संगति प्रदान की है।” -डा० सर्वपल्ली राधा कृष्णन
अजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र में औरंगाबाद में 68 किलोमीटर दूर पहाड़ियों में विराजमान हैं। जहाँ प्रकृति ने मुक्त हस्त से अपना सौन्दर्य विकीर्ण किया है। प्राय: कलाकार को शोरगुल से दूर शान्तमय वातावरण में चित्रण करना भाता है
यह वातावरण इस घाटी में मिलता है। इसलिए ही यहाँ के कलाकार अजन्ता की कलाकृतियों के रूप में अपनी तूलिका एवं छैनी हथौड़े की सिद्धहस्वता को सदैव के लिए अमर कर गये और अपना नाम तक नहीं लिखा।
Join our WhatsApp channel for the latest updates.

अजंता की गुफाओं की संख्या
अजन्ता की गुफाएँ अजन्ता पर्वत को तराशकर निर्मित की गयी हैं जहाँ जाने के लिए बहुत सँकरे ऊँचे-नीचे रास्ते से होकर गुजरना पड़ता है। यहाँ कुल 30 गुफाएँ है। जिनमें 25 विहार तथा 5 चैत्य हैं। इनकी छते ऊँची नीची हैं बिहार गुफाओं को संघाराम भी कहा जाता है।
इन गुफाओं का प्रयोग बौद्ध भिक्षु निवास हेतु करते थे। 9, 10, 19, 26, 29 न० की गुफाएँ चैत्य हैं जहाँ उपासना की जाती थी। चैत्य के अन्तिम किनारे पर एक स्तूप बनाया जाता था जहाँ तथागत के अवशेष सुरक्षित रहते थे।
“चैत्य कहते हैं चिता को, और चिता के अवशिष्ट अंश को (अस्थि अवशेष को) भूमि गर्भ में रख कर वहाँ जो स्मारक तैयार किया जाता था उसे चैत्य कहा जाता था। स्तूप का अर्थ है ‘टीला’। स्तूप और चैत्य वस्तुतः उन स्मारकों को कहा जाता था, बहुधा जिनमें किसी महापुरुष की अस्थियाँ, राख, दाँत या बाल गाड़कर रखा जाता है।”
– गैरोला
चैत्य का दरवाजा घोड़े की नाल के आकार का होता है। इन चैत्य गुफाओं में भी चित्र हैं परन्तु अधिकांश चित्र बिहार गुफाओं में बनाए गए थे।
आज 1, 2, 9, 10, 16, 17 न० की गुफाओं में चित्र शेष हैं जहाँ बौद्ध कलाकारों के अद्भुत स्वप्न रेखा, रूपाकारों एवं रंगों में वेष्टित होकर आज तक अमरत्व का संदेश दे रहे हैं।
इन गुफाओं में 9वीं तथा 10वीं गुफा सबसे प्राचीन है तथा 17वीं गुफा में सबसे अधिक चित्र मिलते हैं।
अजन्ता भारतीय कला का कीर्ति स्तम्भ है जिसमें कलात्मकता एवं भावनात्मकता का सामञ्जस्य अभिव्यन्जित होता है। स्थापत्य शिल्प एवं चित्र तीन कलाओं का एक साथ संगम और वह भी इतने अनुपम ढंग से कि विश्व का प्रत्येक व्यक्ति उन्हें देखकर आश्चर्यचकित हो जाता है।
ऐसा कहा जाता है कि अजन्ता के ये भित्ति चित्र एवं पाषाण प्रतिमाएँ उन देवताओं के अभिशप्त शरीर है जो स्वर्गिक जीवन की एक रसता से उठकर इस पृथ्वी पर आनन्द हेतु विचरण करने आए थे परन्तु भोर होने से पहले स्वर्ग वापिस नहीं लौट पाए।
इसी से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यह घाटी कितनी सुन्दर होगी जहाँ विध्यांचल पहाड़ी, सात प्रपातों के रूप में गिरती बाघोरा नदी, चारों ओर प्रकृति का लवलीन साम्राज्य निहित है।
अजन्ता एक आलौकिक, दिव्य, आध्यात्मिक कृति है जिसका कारण अनुकूल एवं शान्त नैसर्गिक वातावरण था। घने जंगलों तथा अंधेरी गुफाओं में इन कलाकृतियों की रचना करने वाले कोई दीक्षित कलाकार नहीं थे। वरन् योगी, तपस्वी, भिक्षु थे जिन्होंने धर्म की शरण में स्वयं को समर्पित कर जीवन का मर्म कला जिज्ञासुओं के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।
‘अजन्ता’ मानव मात्र के लिए एक नाम नहीं वरन् कला की आत्मा है। इसके नामकरण के संदर्भ में बहुत से मतभेद है।
प्रथम विश्लेषण के आधार पर अजन्ता की गुफाएँ निर्जन स्थान पर थी जहाँ कोई आता-जाता नहीं था अर्थात् अजन्ता (जनता से हीन)
द्वितीय विश्लेषण के आधार पर गुफाओं के समीप एक छोटा सा गाँव अजिण्ठा था। सम्भवतः उसी के आधार पर इन्हें अजन्ता नाम दिया गया।
नैसर्गिक सम्पदा से आच्छादित पर्वतमालाएँ यहाँ अर्धचन्द्राकार रूप में है जिन्हें काटकर चैत्य और विहार गुफाओं की रचना की गयी। चैत्य गुफाएँ बौद्ध भिक्षुओं की धर्म साधना हेतु तथा विहार गुफाएँ उनके निवास हेतु थी।
वैसे तो आज इन गुफाओं की स्थिति वह नहीं जो उस समय थी किन्तु फिर भी सूर्य की अन्तिम किरण जब इन गुफाओं के द्वार पर अपनी आत्मा को विकीर्ण करती है तो निश्चित ही आध्यात्मिक परिवेश में मानव एक ऐसे वातावरण को पाता है जहाँ तथागत के आश्रय में मानव बुद्धत्व को प्राप्त कर लेता है।
गुफाओं के भीतरी भाग को प्रकाशित करने के लिए अजन्ता के कलाकारों ने मशाल अथवा चमकदार बड़ी धातु की प्लेट्स का प्रयोग किया ताकि प्रकाश प्रतिबिम्बत हो कर कार्य करने में सहायता कर सके।
अजंता की गुफाएँ किसने बनवाई
अजन्ता का कार्य शुंग, सातवाहन, कुषाण तथा गुप्तकाल में हुआ। गुप्तकाल में कला का सर्वाधिक विकास हुआ क्योंकि गुप्त सम्राट कला एवं संस्कृति के संरक्षण के पक्षधर थे।
यह समय भारतीय कला इतिहास में स्वर्णयुग माना जाता है। गुप्त के समकालीन वाकाटक वंश हुआ जो सातवाहन राजाओं को हराकर उत्तराधिकारी बने।
अजन्ता से कुछ ऐसे शिलालेख मिले हैं जो वाकाटक समय के हैं। गुप्त तथा वाकाटक वंश का साम्राज्य चौथी से छठी शताब्दी तक माना गया है इसलिए दोनों ही वंशों की सांस्कृतिक परम्परा का प्रभाव अजन्ता के भित्तिचित्रों पर पड़ा।
तत्कालीन जीवन में प्रचलित परम्पराएँ, धर्म, दर्शन, रीति-रिवाज फैशन सभी इन चित्रों के माध्यम से ज्ञात हो जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में भारत भ्रमण पर आया हुआ चीनी यात्री फहियान लिखता है-
“व्यक्तियों की संख्या अधिक है तथा वे प्रसन्न हैं। उन्हें अपने घरों को रजिस्टर्ड करवाने की या किसी न्यायाध्यक्ष के नियमों के पालन करने की कोई आवश्यकता नहीं है। राजा शिरच्छेदन या शारीरिक यातना दिए बिना उन पर शासन करता है। विभिन्न मतों या सम्प्रदायों के लोगों के घर दया एवं उदारता से परिपूर्ण है और जहाँ यात्री को विश्राम की सभी वस्तुएँ सुलभ हैं।”
अजंता की गुफा का निर्माण काल
बौद्ध कला के इतिहास का विस्तार प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से लेकर सातवीं शताब्दी तक माना जाता है।कुछ विद्वान् इसे ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी से सातवीं शताब्दी तक मानते हैं। यह वह समय था जब भारत में बौद्ध धर्म प्रचार में था। प्रत्येक व्यक्ति बुद्ध के उच्चादशों को अपना रहा था।
धनिक वर्ग अपनी सम्पति संघ को समर्पित कर रहे थे। बौद्ध भिक्षुओं का बहुत सम्मान बढ़ता जा रहा था। आम जनता भिक्षुओं से ज्ञानार्जन हेतु व्याकुल थी। जिससे भिक्षुओं को साधना हेतु समय नहीं मिल पा रहा था अतः उन्होंने निर्जन स्थान की खोज की और उसके लिए उन्होंने विन्ध्य पहाड़ी को काटकर उपासना एवं निवास हेतु गुफाएँ बना ली।
इन पहाड़ियों के नीचे एक दरें में बाघोरा नदी बहती है। इन गुफाओं में बैठकर बौद्ध भिक्षुओं ने साधना अर्चना की और तथागत के अमूल्य उपदेशों के माध्यम से जनता में प्रेम की भावना जाग्रत की।
बौद्ध धर्म चक्र विस्तार में केवल भारत ही नहीं वरन् चीन, जापान, नेपाल, बर्मा, तिब्बत आदि पूर्वी संलग्न थे। बौद्ध धर्म सम्बन्धित कथाओं आधारित चित्रों आख्यानों ने धर्म प्रचार में दिया।
गैरोला के शब्दों “आरम्भ में बौद्ध धर्म अनुयायियों दृष्टिकोण कला के प्रति अच्छा नहीं था। कला को विलासिता द्योतक समझते सम्भवतः यही कारण था कि बौद्ध बिहारों में पुष्पालंकार छोड़कर दूसरे विषयों चित्रकारी दिखाई देती के बौद्धों के दृष्टिकोण बावजूद प्राचीन बौद्ध ग्रन्थों जातकग्रन्थों महावंश में चित्रकला के बारे में बड़ी रूचिकर बातें देखने मिलती हैं।
Read More About Famous Artists:
Somnath Hore, Dhan Raj Bhagat, Ramkinkar Vaij, Arpana Caur, Jai Zharotia, Gogi Saroj Pal, Vivan Sundaram, Manjit Bawa, Jatin Das, Biren De, Gulam Mohammad Sheikh, Arpita Singh, A Ramachandran, Om Prakash, Shanti Dave, Bishamber Khanna, Jagdish Swaminathan, Anjolie Ela Menon, Satish Gujral, G.R. Santosh
इन ग्रन्थों उल्लेखों हमें यह भी होता है कि समय चित्र कला का विकास हो चुका था चित्रकारों की अलग-अलग श्रेणियाँ निर्धारित होने लगी थी चित्रकारों का सम्मान होने लगा था।” इस अजन्ता बौद्ध कला का मूर्धन्य केन्द्र माना जाता क्योंकि अजन्ता में ही कला की परिपक्व शैली और अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
अजन्ता चित्र शैली की विशेषताएँ
1. रेखा | Line
आश्चर्य है कि एक ही केन्द्र पर 800 वर्षों तक चित्र स्वरलहरी गुंजित होती रही और कोई बड़ा शैलीगत उतार-चढ़ाव कालक्रमों के बीच में नहीं आया, यूं तो चित्र शैली परिपक्वता की ओर बढ़ती ही गई है। अजन्ता चित्रों की मुख्य विशेषतायें इस प्रकार है
भारतीय कलाकार के लिए रेखा एक चित्रोपम मर्यादा है। अजन्ता के कलाकार रेखीय अंकन में निपुणता के बल पर ही नग्न आकृतियों को मिले एक सौम्य और सैद्धांतिक रूप में प्रस्तुत कर सके। यूरोपियन छाया प्रकाश वाली मांसलता के प्रभाव से बचते हुए रेखीय सौन्दर्य से ही माडलिंग ( Modelling) का बोध यहाँ के कुशल कलाकारों के दक्ष हाथों से हुआ रेखाओं के प्रयोग में गति, लय, संयम एवं सन्तुलन सदैव बने रहे हैं।
भावांकन के लिये प्रसिद्ध यहाँ के चित्रों में रेखा ही प्रधान रही है। मार विजय, सर्वनाश, दया याचना जैसे अनेक चित्र यहाँ प्रयुक्त रेखा की प्रधानता स्थापित करते हैं।
इस प्रकार अजन्ता कलाचार्यों ने रेखा के महत्व को पूर्णतता हृदयङ्गम किया है।
2. रूप | form
सक्रिय व सहायक रूपों का संयोजन एवं प्रभाव ही चित्र की आत्मा व शरीर होते हैं। इसे इस प्रकार भी कह सकते हैं कि प्रभाव रूप का सार होता है। सार-विहीन रूप की संरचना करना व्यर्थ है।
अजन्ता में रूपाभिव्यक्ति तत्कालीन समाज की मान्यताओं व आकृतियों से भिन्न है यथार्थ में अजन्ता चितेरों ने जिन्दगी की संजीदगी नैसर्गिक सौन्दर्य के आधार पर की है।
छोटे-छोटे अनगिनत रूपों (सिपाही, सेवक, भिक्षुक, मन्त्री, नतंकी) का समूह दर्शक के नेत्र-पथ को सुख प्रदान करता है व आनन्द देता है। ऐसा यहाँ रूप की सच्ची व सौन्दर्य परक छवि को उतारने तथा रूप व अन्तराल की सन्तुलित व्यवस्था करने से सम्भव हुआ है। अतः अजन्ता चित्रों में रूप सारविहीन अस्त-व्यस्त आलेख्य स्थान पर छितरा हुआ नहीं है।
3. वर्ण एवं छाया
अजन्ता चित्रों में हरा भाटा (टेरीवर्टी ग्रीन) लाजवर्द (लैपिस-लैज्युलाइ ) हिरमिच (burnt sienna), काला (लँम्प ब्लेक), सफेद (लाइम वाइट) सिन्दूरी (वरमिलियन) व पीला (यलो ऑकर) रंग मुख्य रूप से प्रयोग किये गये हैं लाजवर्द (प्रखर-नीला) ईरान से मंगवाया जाता था। काला रंग दीप कालिख से तैयार किया जाता था। अजन्ता-पत्थर के पौरस छिद्रों में हरा-भाटा रंग भरा है। रंगों की तैयारी विधि-शिल्प-ग्रन्थों में दी गई परिपाटी के अनुसार ही थी। आकृतियों में सरलीकरण एवं भावाभिव्यक्ति के आधार पर ही रंग भरे गए हैं।
छाया तथा गहराई हेतु आकृति में विस्तृत मुख्य रंगत में ही हल्का-काला मिलाकर प्रयोग किया जाता था। यह चाक्षुष यथार्थता व वातावरणीय परिप्रेक्ष्य पर आधारित नहीं होता था बल्कि चित्र में प्रभावोत्पादकता को बढ़ाने के लिये किया जाता था। वैसे शिल्प-शास्त्रों मे छाया (वर्तना) लगाने की अनेक विधियाँ लिखी गई हैं।
4. परिप्रेक्ष्य
अजन्ता में वातावरणीय व रेखीय परिप्रेक्ष्य में से किसी का भी प्रयोग नहीं हुआ है। वास्तव में चित्रकार ने अनेक दृष्टि बिन्दुओं से बने रूपों का विकास अन्तराल की सरल-संगत तथा बाल-सुलभ यथार्थता के आधार पर किया है। प्रायः पूर्वीय देशों की चित्रकला का यह प्रमुख गुण कहा है, जिसकी श्रेष्ठ अभिव्यक्ति अजन्ता के चित्रों में देखने को मिलती है। रेखा के घुमाव और अन्तराल में रूप-स्थापना के माध्यम से दूरी व समीपता का बोध कराया गया है।
5. संयोजन
आकृतियों की विविधता व सघनता को चित्रतल पर सफलता के साथ विस्तरित करना कठिन कार्य होता है। अजन्ता के चित्रों को भारतीय कला की सर्वश्रेष्ठ निधि इस कारण से ही स्वीकार नहीं किया गया है कि कलाकार बौद्ध-धर्म के लिए समर्पित थे।
चित्रों का महत्व उनमें प्रयुक्त संयोजन-शैली के कारण है। चित्रों में मुख्य रूप को बृहदाकार तथा अन्तराल के केन्द्र में स्थिर किया गया है एवं इतर रूपों को मध्य वाले ‘रूप’ के प्रभाव को उभारने हेतु चारों ओर दृष्टि-पथ की सुखद अनुभूति के अनुसार छितराया गया है।
इस प्रकार संयोजन में केन्द्रीयता के नियम का पालन किया गया है. अन्य चित्रोपम तत्वों के प्रयोग में भी सौन्दर्यानुभूति ही मुख्य मार्गदर्शक सिद्धान्त रहा है।
वर्ण-योजना शीतलता वाली तथा रेखा लय पूर्ण समायोजित की गई है। चित्र चौबटों के बन्धन से मुक्त रहते हुए पूरी की पूरी कहानी को एक ही भित्ति-खण्ड पर सफलता के साथ संयोजित किया गया है। इस प्रकार लेकिन कहानी की एक ही भित्ति-खण्ड पर विस्तृत संयोजना सचमुच अजन्ता के कलाकारों का अद्भुत प्रयोग रहा है।
6. मुद्राएं
स्नेह, मैत्री, काम, भार, लज्जा, हर्ष, उत्साह, चिन्ता, आक्रोश, रिक्तता, घृणा, ममता, उत्सव सम्पन्नता, विपन्नता, राग, विराग, आनन्द आदि अनेक भावों के प्रकटीकरण हेतु विविध हस्त-मुद्राओं का प्रयोग अजन्ता शिल्पियों ने किया।
हस्त मुद्राओं के साथ-साथ पाद मुद्राएँ एवं देह पष्टि के लोध-पूर्ण अंकन के माध्यम से अजन्ता चितेरों ने सौन्दर्य के प्रतिमान स्थापित किये। चित्रकारों ने यहाँ देह की मांसल कठारता को मृदुला व जानकारिता में परिवर्तित कर दिखाया है। प्रामः हाथों में कमल पुष्प, वस्त्र, चंवर, मोरपंख, मधु-पात्र म वाद्य-यंत्र विधाये गये है। हाथ लगीजे बने हैं, जैसे कुछ कह रहे हों।
7. शोभन
कमल के पुष्प, मुरियाँ, फल (आम्र, शरीफा, आदि) व पशु-पक्षियों ( हंस, बैल, हाथी, व ईहामृग आदि) तथा कभी-कभी प्रेमी युगलों से युक्त दिव्य आलेखन (शोभन ) द्वार-शाखाओं व छतों में बनाए गए हैं। यह एक आश्चर्य जनक तथ्य है कि अजन्ता की बिहार गुफाओं की छत वितान (शामियाना) के समान ढोल वाली बनाई गई है, वितान के समान ही आलेखनों का प्रयोग गुहा छत में किया गया है। अजन्ता आलेखनों की मधुर सम्पुंजना अनोखी है, और भारतीय चित्रकला की सर्वोत्कृष्ट निधि है।
8. प्रकृति-चित्रण
अजन्ता में चित्रकार प्रकृति का विविध हरीतिमा-रूपों तथा वन्य पशु-पक्षियों से दर्शक का घनिष्ठ परिचय कराता हुआ प्रतीत होता है। छदन्त के चित्र में गजराज की शोभा, प्रकृति वैभव तथा उन्मुक्तता का सुन्दर समन्वय है।
अजन्ता चित्रों में हाथी, घोड़े, बन्दर, भेड़, बैल, मृग, हंस आदि अनेक पशु-पक्षियों को उनकी स्वाभाविक उन्मुक्तता के साथ चित्रित किया है। वे मानव जीवन सुख-दुःख के साथी हैं, इसी भावना से अजन्ता चित्रकार ने उन्हें भाव-भीने ढंग में संजोया है। इसी प्रकार कदली, अशोक, साल, आम, बरगद, पीपल, ताड़ व गूलर आदि के वृक्ष बनाये हैं। चित्र-संयोजन में वृक्षों आदि के योग से दृश्य की स्वाभाविकता उजागर हुई है।
9. नारी सौन्दर्य
कोमलता तथा सौन्दर्य की देवी के रूप में नारी आत्म- समर्पण, विलासिता एवं क्लान्ति सूचित करती हुई अजन्ता में प्रकट हुई है। अजन्ता में नारी लंज्जा व विनय के प्रतीक स्वरूप चित्रित हुई है।
इसी से नारी उदात्त भावनाओं वाला रूप यहाँ नहीं उभर सका है–विन्य वारित वृत्तिरतस्त्या, न विव्रतों मदनो न च संवृतः । अजन्ता में नारी को प्रेयसी, रानी, परिचारिका, नर्तकी, आसवपायी, माता, अप्सरा व बालिका आदि रूप में चित्रित किया है।
चित्रकार ने उसके अंग-प्रत्यंग के छरहरे पन, तीखे नक्श तथा भावपूर्ण अंकन के बल पर उसे ‘सौन्दर्य के सिद्धान्त’ के रूप में आलेखित किया है। इसी से उसका नग्न-रूप पाश्चात्य कामुकता वाला न होकर सज्जा व मातृत्व रूप में अंकित हुआ है।
“अजन्ता में नारी का रूप सर्वत्र मोहक और गौरवपूर्ण है। किसी भी चित्र में उसे दीन या अशोभनीय नहीं दर्शाया गया है। उनके नेत्रों में दिव्य तेज और शरीर की सुडोलता में कुछ ऐसी विशेषता है, जो सौन्दर्य मर्मज्ञों को उसकी एक-एक रेखां और अंकन अनुपात में दृष्टिगत होता है।”
अजन्ता के नारी-चित्रण से कला समीक्षक सॉलमन भी बड़े प्रभावित हुये हैं, इस सन्दर्भ में उनका कथन है-
“कहीं भी नारी को इतनी पूर्ण सहानुभूति व श्रद्धा प्राप्त नहीं हुई है। अजन्ता में यह प्रतीति होती है कि उसे एक विशिष्टता के साथ नहीं बल्कि एक सारतत्व के रूप में निरूपित किया गया है। वह वहाँ एक नारी मात्र ही नहीं बल्कि संसार के अखिल सौन्दर्य के मूर्त रूप में है।”
10. विषय वस्तु
बौद्ध धर्म की करुणा, प्रेम और अहिंसा ने चितेरों, दान-दाताओं और जन सामान्य को बहुत समय तक अप्रत्याशित रूप से आकृष्ट किया। महात्मा बुद्ध के जन्मजन्मान्तर की कथाएँ, बोधिसत्व-रूप, राजपरिवार व साधारण समाज की परम्पराओं एवं विश्वासों का छेवां अजन्ता भित्तियों में चित्रित गया है। अजन्ता तत्कालीन जीवन का प्रतिरूप है। नगरों और गाँवों, महलों और झोपड़ियों, समुद्रों एवं यात्राओं का संसार अजन्ता में उतर पड़ा है। जुलूस के जुलूस, हाथी-घोड़े व अन्य पशु इस प्रकार चित्रों में उतरे हैं जैसे कि निर्देशक के बताये हुए अभिनय-इशारों पर वे कार्य कर रहे हों।
चित्रण प्रक्रिया
अजन्ता की गुफाएँ बाघोरा नदी के किनारे घूमी हुई चट्टान में खोदी गई है। शैल-बद्धकों (स्टोन-कटर्स) ने गुफा की दीवारों को आड़ी छैनी चलाकर उत्खनित किया है। भित्ति पर छैनी के जो दाँतें खुदाई के समय बन गये थे, उनमें प्लास्टर की पकड़ मजबूत हो गई है।
इन भित्तियों को चित्रण योग्य बनाने के लिए उन पर लोहे के अंश वाली चिकनी मिट्टी में गोबर व धान की भूसी, बजरी या रेत, वनस्पतियों के रेशे व गोंद अथवा सरेस का घोल मिलाकर आधा इंच मोटी तह लीप देते थे।
कुछ गुफाओं में गोंद की जगह जिप्सम का प्रयोग किया गया है। इसी के ऊपर चिकनी मिट्टी, बारीक रेत, वनस्पति के रेशे मिलाकर एक ओर पतली तह पहले किये गये प्लास्तर पर चढ़ाते थे। तत्पश्चात् शहद जैसा गाढ़ा सफेदी का विशेष घोल दूसरी वाली तह पर एक या दो बार (अन्डे के छिलके के समान मोटाई वाला) किया जाता था।
यह चिकना व चमकदार होता था। राजस्थानी अथवा बुन्देलखण्डी मित्तिचित्रों के समान पहली व दूसरी तह में चूने व झींकी (मारबल इस्ट) अथवा कौड़ी का प्रयोग नहीं किया गया है। अतः अजन्ता में राजस्थानी की आलागीला या आराश वाली कठोर चिन भूमि (buonco or seco ground) नहीं मिलती है। इसी से अजन्ता भित्तिचित्रों के लिये फ्रेस्को शब्द का व्यवहार नहीं किया जा सकता है।
फ्रेस्को की सही पद्धति में रंगों को बांधने वाला व विस्तरण करने वाला तत्व पानी ही होता है। अजन्ता की चित्रण पद्धति में रंगों को बांधने व स्थायी-विस्तरण के के लिए गोंद का प्रयोग किया है जैसा कि ‘टेम्परा प्रविधि में होता है।
वर्ण
‘फस्को’ प्रविधि में रंग चित्र तल के ऊपरी सतह का ही भाग बन जाता है क्योंकि रंग चूने के पानी में मिलाकर सतह पर लगाये जाते है तथा उनकी घुटाई की जाती है। इस पद्धति में वे ही रंग काम में लाये जाते हैं, जिनका चूने के साथ मेल होने पर अवांछित क्रिया न हो पाये।
अजन्ता में गीले पलस्तर पर कार्य न करके उसके सूखने पर किया गया है। अजन्ता में रंग तथा उनकी विभिन्न तानों (Tones) का प्रयोग ‘म्यूरल्स’ वाली प्रविधि के अपनाने से सम्भव हो सका। यहाँ पीले रंग (वर्ण) के पीली मिट्टी, लाल के लिये गेरू, सफेद के लिये चीनी मिट्टी, जिप्सम या चूना, काले के लिये काजल, नीले के लिये लाजवर्द तथा हरे रंग के लिये ग्लेकोनाइट पत्थर का प्रयोग किया जाता है। साजवदं बाहर से आयात किया जाता था बाकी रंग स्थानीय खनिजों से उपलब्ध कर लिये जाते थे। इन रंगों को गोंद अथवा सरेस के साथ घोलकर तैयार किया जाता था।
अजन्ता चित्र शैली का प्रभाव-प्रसार
अजन्ता चित्र शैली का प्रभाव मात्र अपने देश की सीमाओं तक ही नहीं रहा बल्कि अफगानिस्तान, ईरान, तिब्बत, चम्पा, जावा, सुमात्रा, काम्बुज, मलाया, चीन, कोरिया जापान जैसे सुदूर देशों तक गया । किसी भी चित्र शैली की उच्चता व भव्यता का उसके प्रभाव क्षेत्र से अनुमान लगाया जाता है—इसी से अजन्ता चित्र शैली भारतीय शैलियों की सिरमोर कही जाती है। चीन की टांग वंशीय चित्रकला ने अजन्ता के विशेष प्रभाव को ग्रहण किया था।
मध्य एशिया में खोतान के तुनह्वांग व तरफान केन्द्रों में बने अनेक कला मन्दिर अपने सौन्दर्य के लिये अजन्ता के प्रति श्रद्धावनत है।
अजन्ता के ये दिव्य आलेखन अपने निर्माताओं के अमर चिह्न हैं, चितेरों ने अंधेरी गुहा में बैठकर तथागत की अर्चना हेतु इन चित्र पुष्पों को समर्पित करके स्वयं मोक्ष को प्राप्त हो गये। अजन्ता के चित्र मात्र चित्र नहीं है ये काव्य है, वर्शन है, इतिहास है। यथार्थ में तुलिका की भाषा में निमित ये ‘त्रिपिटक’ के समान अमर ग्रंथ है।
लेडी हैरिंघम ने सत्य ही कहा है- ‘अजन्ता के चित्रों के कारण भारत मानवता की श्रद्धा का अधिकारी है।
READ MORE:
- प्रागैतिहासिक कालीन भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला का इतिहास | History of Prehistoric Indian Sculpture and Architectureप्रागैतिहासिक काल (लगभग 3000 ईसा पूर्व से 1500 ईसा पूर्व) पृष्ठभूमि भारतीय मूर्तिकला और वास्तुकला का इतिहास बहुत प्राचीन है, … Read more
- सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास,प्रमुख नगर,वास्तुकला,चित्र कला,मोहरें और प्रतिमाएं | History of Indus Valley Civilization, Major Cities, Architecture, Paintings, Seals and Statuesहड़प्पा व मोहनजोदड़ो की कला पाषाण युगीन सहस्त्रों वर्षों के पश्चात् की प्राचीनतम संस्कृतियाँ सिन्धु घाटी में मोहनजोदड़ो व हडप्पा … Read more
- कला क्या है | कला का अर्थ, कला के प्रकार“जीवन के प्रत्येक अंगों को नियमित रूप से निर्मित करने को ही कला कहते हैं।” समय-समय पर कुछ विद्वानों ने अपने विचार कला की परिभाषा के प्रति व्यक्त किए हैं, कुछ जो निम्न है…
- भारतीय चित्रकला के छः अंग | Six Limbs Of Paintingषडंग चित्रकार अपने निरंतर अभ्यास के द्वारा अपने भावों सम्वेदनाओं तथा अनुभवों के प्रकाशन हेतु एक प्रविधि को जन्म देता … Read more
- Cave painting | गुफ़ा चित्रगुहा चित्रण (जोगीमारा, अजन्ता, बाघ, बादामी, एलोरा, सित्तनवासल इत्यादि) जोगीमारा गुफाएँ Join our WhatsApp channel for the latest updates. अजंता … Read more
- भारतीय लघु चित्रकला की विभिन्न शैलियां | Different Styles of Indian Miniature Paintingsभारतीय लघु चित्रकला जैन शैली Join our WhatsApp channel for the latest updates. पाल शैली (730-1197 ई०) अपभ्रंश शैली (1050-1550 … Read more
- राजस्थानी चित्र शैली | राजस्थानी चित्र शैली के प्रमुख केंद्र | Rajasthani Schools of Painting | Major centers of Rajasthani painting styleराजस्थानी शैली परिचय राजस्थान का एक वृहद क्षेत्र है जो ‘अवोड ऑफ प्रिंसेज’ (Abode of Princes) माना जाता है। इसमें … Read more
- अजंता गुफाओं की संख्या, चित्रकला,निर्माण काल और अजन्ता चित्र शैली की विशेषताएँ | Number of Ajanta Caves, Painting, Construction Period and Characteristics of Ajanta Painting Styleअजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र में औरंगाबाद में 68 किलोमीटर दूर पहाड़ियों में विराजमान हैं। जहाँ प्रकृति ने मुक्त हस्त से अपना सौन्दर्य विकीर्ण किया है। प्राय: कलाकार को शोरगुल से दूर शान्तमय वातावरण में चित्रण करना भाता है
- पहाड़ी शैली और उसकी विशेषताएंपरिचय 17 शताब्दी के अन्तिम चतुर्थांश में पहाड़ी राजकुमार मुगलों के आश्रित थे जो कि मुगलों के दरबार में रहकर … Read more
- मिर्जापुर (उ०प्र०) एवं ‘मध्य-प्रदेश’ से प्राप्त शिलाचित्र | Inscriptions received from Mirzapur (U.P.) and ‘Madhya Pradesh’उत्तर प्रदेश से प्राप्त शिलाचित्र मिर्जापुर इलाहाबाद-मुगलसराय रेल पच पर मिर्जापुर मुख्यालय से करीब 20 किमी० दूर विध्य की कैमूर … Read more
- अजंता की मुख्य गुफाओं के चित्रअजंता की मुख्य गुफाओं के चित्र,अजन्ता में चैत्य और बिहार दोनों प्रकार की 30 गुफायें हैं। इनमें गुफा संख्या 1, 2, 6, 7, 9, 10, 11,15, 16, 17, 19, 20, 21 व 22 में चित्र बने थे। आज केवल गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16 व 17 चित्रों से मुख्य रूप से सुसज्जित है तथा यहीं अधिकांश चित्र सुरक्षित है।
- अपभ्रंश शैली के चित्र | अपभ्रंश-शैली की प्रमुख विशेषतायें | जैन शैली | गुजराती शैली या पश्चिम भारतीय शैली | ग्रामीण शैलीश्वेताम्बर जैन धर्म की अनेक सचित्र पोथियाँ 1100 ई० से 1500 ई० के मध्य विशेष रूप से लिखी गई। इस … Read more
- अकबर-कालीन चित्रित ग्रन्थअकबर काल में कला अकबर- 1557 ई० में अकबर अपने पिता हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात लगभग तेरह वर्ष की … Read more
- जहाँगीर कालीन चित्र शैली | जहाँगीर कालीन चित्रचित्रकला के जिस संस्थान का बीजारोपण अकबर ने किया था वास्तव में वह जहाँगीर (१६०५-१६२७ ईसवी राज्यकाल) के समय में … Read more
- गुप्त कालीन कलागुप्तकाल (300 ई0-600 ई०) मौर्य सम्राट ने मगध को राज्य का केन्द्र बनाकर भारतीय इतिहास में जो गौरव प्रदान किया, … Read more
- मेवाड़ चित्रशैली की विषय-वस्तु तथा विशेषतायेंमेवाड़ शैली राजस्थान के अन्य क्षेत्रों के समान मेवाड़ भी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रख्यात है। यहाँ के ऊँचे … Read more
- ‘काँगड़ा’ चित्र-शैली की विषयवस्तु तथा विशेषतायें ‘काँगड़ा’ चित्र-शैली का परिचय बाह्य रूप से समस्त पहाड़ी कला ‘काँगड़ा’ के नाम से अभिहित की जाती है जिसका कारण … Read more
- गांधार शैली का विकास और इसकी विशेषताएँगांधार शैली कुषाण काल में गान्धार एक ऐसा प्रदेश था जहां एशिया और यूरोप की कई सभ्यताएं एक-दूसरे से मिलती … Read more
- मुगल शैली | मुग़ल काल में चित्रकला और वास्तुकला का विकास | Development of painting and architecture during the Mughal periodमुगल चित्रकला को भारत की ही नहीं वरन् एशिया की कला में स्वतन्त्र और महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यह शैली ईरान की कला परम्परा से उत्पन्न होकर भी ईरानी शैली नहीं रही। इस पर यूरोपीय तथा चीनी प्रभाव भी पड़े हैं। इस शैली पर भारतीय रंग योजनाओं तथा वातावरण का प्रभाव पड़ा है।
- मौर्य काल में मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास ( 325 ई.पू. से 185 ई.पू.) | Development of sculpture and architecture in Maurya periodमौर्यकालीन कला को उच्च स्तर पर ले जाने का श्रेय चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक को जाता है। अशोक के समय से भारत में मूर्तिकला का स्वतन्त्र कला के रूप में विकास होता दिखाई देता है।
- पाल शैली | पाल चित्रकला शैली क्या है?नेपाल की चित्रकला में पहले तो पश्चिम भारत की शैली का प्रभाव बना रहा और बाद में उसका स्थान इस नव-निर्मित पूर्वीय शैली ने ले लिया नवम् शताब्दी में जिस नयी शैली का आविर्भाव हुआ था उसके प्रायः सभी चित्रों का सम्बन्ध पाल वंशीय राजाओं से था। अतः इसको पाल शैली के नाम से अभिहित करना अधिक उपयुक्त समझा गया।”
- दक्षिणात्य शैली | दक्षिणी शैली | दक्खिनी चित्र शैली | दक्कन चित्रकला | Deccan Painting Styleदक्खिनी चित्र शैली: परिचय भारतीय चित्रकला के इतिहास की सुदीर्घ परम्परा एक लम्बे समय से दिखाई देती है। इसके प्रमाणिक … Read more
- संस्कृति तथा कलाकिसी भी देश की संस्कृति उसकी आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा कलात्मक उपलब्धियों की प्रतीक होती है। यह संस्कृति उस सम्पूर्ण देश … Read more
- भारतीय कला संस्कृति एवं सभ्यताकला संस्कृति का यह महत्त्वपूर्ण अंग है जो मानव मन को प्रांजल सुंदर तथा व्यवस्थित बनाती है। भारतीय कलाओं में … Read more
- भारतीय चित्रकला की विशेषताएँभारतीय चित्रकला तथा अन्य कलाएँ अन्य देशों की कलाओं से भिन्न हैं। भारतीय कलाओं की कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं … Read more
- कला अध्ययन के स्रोतकला अध्ययन के स्रोत से अभिप्राय उन साधनों से है जो प्राचीन कला इतिहास के जानने में सहायता देते हैं। … Read more
- Explicabo eum ex idRerum est eligendi inventore. Veritatis debitis porro repudiandae nobis. Autem ipsum nobis numquam dolores Possimus nihil quo architecto laboriosam. Dolor … Read more
- आनन्द केण्टिश कुमारस्वामीपुनरुत्थान काल में भारतीय कला के प्रमुख प्रशंसक एवं लेखक डा० आनन्द कुमारस्वामी (1877-1947 ई०)- भारतीय कला के पुनरुद्धारक, विचारक, … Read more
- भारतीय चित्रकला में नई दिशाएँलगभग 1905 से 1920 तक बंगाल शैली बड़े जोरों से पनपी देश भर में इसका प्रचार हुआ और इस कला-आन्दोलन … Read more
- सोमालाल शाह | Somalal Shahआप भी गुजरात के एक प्रसिद्ध चित्रकार हैं आरम्भ में घर पर कला का अभ्यास करके आपने श्री रावल की … Read more
- बंगाल स्कूल | भारतीय पुनरुत्थान कालीन कला और उसके प्रमुख चित्रकार | Indian Renaissance Art and its Main Paintersबंगाल में पुनरुत्थान 19 वीं शती के अन्त में अंग्रजों ने भारतीय जनता को उसकी सास्कृतिक विरासत से विमुख करके … Read more
- तैयब मेहतातैयब मेहता का जन्म 1926 में गुजरात में कपाडवंज नामक गाँव में हुआ था। कला की उच्च शिक्षा उन्होंने 1947 … Read more
- कृष्ण रेड्डी ग्राफिक चित्रकार कृष्ण रेड्डी का जन्म (1925 ) दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश में हुआ था। बचपन में वे माँ … Read more
- लक्ष्मण पैलक्ष्मण पै का जन्म (1926 ) गोवा के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। गोवा की हरित भूमि और … Read more
- आदिकाल की चित्रकला | Primitive Painting(गुहाओं, कंदराओं, शिलाश्रयों की चित्रकला) (३०,००० ई० पू० से ५० ई० तक) चित्रकला का उद्गम चित्रकला का इतिहास उतना ही … Read more
- राजस्थानी चित्र शैली की विशेषतायें | Rajasthani Painting Styleराजस्थान एक वृहद क्षेत्र है जो “अवोड ऑफ प्रिंसेज” माना जाता है इसके पश्चिम में बीकानेर, दक्षिण में बूँदी, कोटा तथा उदयपुर … Read more
- टीजीटी / पीजीटी कला से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न | Important questions related to TGT/PGT Artsसांझी कला किस पर की जाती है ? उत्तर: (B) भूमि पर ‘चाँद को देखकर भौंकता हुआ कुत्ता’ किस चित्रकार … Read more
- रेखा क्या है | रेखा की परिभाषारखा वो बिन्दुओं या दो सीमाओं के बीच की दूरी है, जो बहुत सूक्ष्म होती है और गति की दिशा निर्देश करती है लेकिन कलापक्ष के अन्तर्गत रेखा का प्रतीकात्मक महत्व है और यह रूप की अभिव्यक्ति व प्रवाह को अंकित करती है।
- बसोहली की चित्रकलाबसोहली की स्थिति बसोहली राज्य के अन्तर्गत ७४ ग्राम थे जो आज जसरौटा जिले की बसोहली तहसील के अन्तर्गत आते … Read more
- अभिव्यंजनावाद | भारतीय अभिव्यंजनावाद | Indian Expressionismयूरोप में बीसवीं शती का एक प्रमुख कला आन्दोलन “अभिव्यंजनावाद” के रूप में 1905-06 के लगभग उदय हुआ । इसका … Read more
- तंजौर शैलीतंजोर के चित्रकारों की शाखा के विषय में ऐसा अनुमान किया जाता है कि यहाँ चित्रकार राजस्थानी राज्यों से आये … Read more
- मैसूर शैलीदक्षिण के एक दूसरे हिन्दू राज्य मैसूर में एक मित्र प्रकार की कला शैली का विकास हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के … Read more
- पटना शैलीउथल-पुथल के इस अनिश्चित वातावरण में दिल्ली से कुछ मुगल शैली के चित्रकारों के परिवार आश्रय की खोज में भटकते … Read more
- कलकत्ता ग्रुप1940 के लगभग से कलकत्ता में भी पश्चिम से प्रभावित नवीन प्रवृत्तियों का उद्भव हुआ । 1943 में प्रदोष दास … Read more
- Gopal Ghosh Biography | गोपाल घोष (1913-1980)आधुनिक भारतीय कलाकारों में रोमाण्टिक के रूप में प्रतिष्ठित कलाकार गोपाल घोष का जन्म 1913 में कलकत्ता में हुआ था। … Read more
- आधुनिक भारतीय चित्रकला की पृष्ठभूमि | Aadhunik Bharatiya Chitrakala Ki Prshthabhoomiआधुनिक भारतीय चित्रकला का इतिहास एक उलझनपूर्ण किन्तु विकासशील कला का इतिहास है। इसके आरम्भिक सूत्र इस देश के इतिहास तथा भौगोलिक परिस्थितियों … Read more
- काँच पर चित्रण | Glass Paintingअठारहवीं शती उत्तरार्द्ध में पूर्वी देशों की कला में अनेक पश्चिमी प्रभाव आये। यूरोपवासी समुद्री मार्गों से खूब व्यापार कर … Read more
- पट चित्रकला | पटुआ कला क्या हैलोककला के दो रूप है, एक प्रतिदिन के प्रयोग से सम्बन्धित और दूसरा उत्सवों से सम्बन्धित पहले में सरलता है; दूसरे में आलंकारिकता दिखाया तथा शास्त्रीय नियमों के अनुकरण की प्रवृति है। पटुआ कला प्रथम प्रकार की है।
- कम्पनी शैली | पटना शैली | Compony School Paintingsअठारहवी शती के मुगल शैली के चित्रकारों पर उपरोक्त ब्रिटिश चित्रकारों की कला का बहुत प्रभाव पड़ा। उनकी कला में … Read more
- बंगाल का आरम्भिक तैल चित्रण | Early Oil Painting in Bengalअठारहवीं शती में बंगाल में जो तैल चित्रण हुआ उसे “डच बंगाल शैली” कहा जाता है। इससे स्पष्ट है कि … Read more
- कला के क्षेत्र में किये जाने वाले सरकारी प्रयास | Government efforts made by the British in the field of artसन् 1857 की क्रान्ति के असफल हो जाने से अंग्रेजों की शक्ति बढ़ गयी और भारत के अधिकांश भागों पर … Read more
- अवनीन्द्रनाथ ठाकुरआधुनिक भारतीय चित्रकला आन्दोलन के प्रथम वैतालिक श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म जोडासको नामक स्थान पर सन् 1871 में जन्माष्टमी … Read more
- ठाकुर परिवार | ठाकुर शैली1857 की असफल क्रान्ति के पश्चात् अंग्रेजों ने भारत में हर प्रकार से अपने शासन को दृढ़ बनाने का प्रयत्न … Read more
- असित कुमार हाल्दार | Asit Kumar Haldarश्री असित कुमार हाल्दार में काव्य तथा चित्रकारी दोनों ललित कलाओं का सुन्दर संयोग मिलता है। श्री हाल्दार का जन्म … Read more
- क्षितीन्द्रनाथ मजुमदार के चित्र | Paintings of Kshitindranath Majumdar1. गंगा का जन्म (शिव)- (कागज, 12 x 18 इंच ) 2. मीराबाई की मृत्यु – ( कागज, 12 x … Read more
- क्षितीन्द्रनाथ मजुमदार | Kshitindranath Majumdarक्षितीन्द्रनाथ मजूमदार का जन्म 1891 ई० में पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में निमतीता नामक स्थान पर हुआ था। उनके … Read more
- देवी प्रसाद राय चौधरी | Devi Prasad Raychaudhariदेवी प्रसाद रायचौधुरी का जन्म 1899 ई० में पू० बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में रंगपुर जिले के ताजहाट नामक ग्राम में … Read more
- अब्दुर्रहमान चुगताई (1897-1975) वंश परम्परा से ईरानी और जन्म से भारतीय श्री मुहम्मद अब्दुर्रहमान चुगताई अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के ही एक प्रतिभावान् शिष्य थे … Read more
- हेमन्त मिश्र (1917)असम के चित्रकार हेमन्त मिश्र एक मौन साधक हैं। वे कम बोलते हैं। वेश-भूषा से क्रान्तिकारी लगते है अपने रेखा-चित्रों … Read more
- विनोद बिहारी मुखर्जी | Vinod Bihari Mukherjee Biographyमुखर्जी महाशय (1904-1980) का जन्म बंगाल में बहेला नामक स्थान पर हुआ था। आपकी आरम्भिक शिक्षा स्थानीय पाठशाला में हुई … Read more
- के० वेंकटप्पा | K. Venkatappaआप अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के आरम्भिक शिष्यों में से थे। आपके पूर्वज विजयनगर के दरबारी चित्रकार थे विजय नगर के पतन … Read more
- शारदाचरण उकील | Sharadacharan Ukilश्री उकील का जन्म बिक्रमपुर (अब बांगला देश) में हुआ था। आप अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रमुख शिष्यों में से थे। … Read more
- मिश्रित यूरोपीय पद्धति के राजस्थानी चित्रकार | Rajasthani Painters of Mixed European Styleइस समय यूरोपीय कला से राजस्थान भी प्रभावित हुआ। 1851 में विलियम कारपेण्टर तथा 1855 में एफ०सी० लेविस ने राजस्थान को प्रभावित … Read more
- रामकिंकर वैज | Ramkinkar Vaijशान्तिनिकेतन में “किकर दा” के नाम से प्रसिद्ध रामकिंकर का जन्म बांकुड़ा के निकट जुग्गीपाड़ा में हुआ था। बाँकुडा में … Read more
- कनु देसाई | Kanu Desai(1907) गुजरात के विख्यात कलाकार कनु देसाई का जन्म – 1907 ई० में हुआ था। आपकी कला शिक्षा शान्ति निकेतन … Read more
- नीरद मजूमदार | Nirad Majumdaarनीरद (अथवा बंगला उच्चारण में नीरोद) को नीरद (1916-1982) चौधरी के नाम से भी लोग जानते हैं। उनकी कला में … Read more
- मनीषी दे | Manishi Deदे जन्मजात चित्रकार थे। एक कलात्मक परिवार में उनका जन्म हुआ था। मनीषी दे का पालन-पोषण रवीन्द्रनाथ ठाकुर की. देख-रेख … Read more
- सुधीर रंजन खास्तगीर | Sudhir Ranjan Khastgirसुधीर रंजन खास्तगीर का जन्म 24 सितम्बर 1907 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता श्री सत्यरंजन खास्तगीर छत्ताग्राम (आधुनिक … Read more
- ललित मोहन सेन | Lalit Mohan Senललित मोहन सेन का जन्म 1898 में पश्चिमी बंगाल के नादिया जिले के शान्तिपुर नगर में हुआ था ग्यारह वर्ष … Read more
- नन्दलाल बसु | Nandlal Basuश्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की शिष्य मण्डली के प्रमुख साधक नन्दलाल बसु थे ये कलाकार और विचारक दोनों थे। उनके व्यक्तित्व … Read more
- रणबीर सिंह बिष्ट | Ranbir Singh Bishtरणबीर सिंह बिष्ट का जन्म लैंसडाउन (गढ़बाल, उ० प्र०) में 1928 ई० में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा गढ़वाल में ही … Read more
- रामगोपाल विजयवर्गीय | Ramgopal Vijayvargiyaपदमश्री रामगोपाल विजयवर्गीय जी का जन्म बालेर ( जिला सवाई माधोपुर) में सन् 1905 में हुआ था। आप महाराजा स्कूल … Read more
- रथीन मित्रा (1926)रथीन मित्रा का जन्म हावड़ा में 26 जुलाई को 1926 में हुआ था। उनकी कला-शिक्षा कलकत्ता कला-विद्यालय में हुई । … Read more
- मध्यकालीन भारत में चित्रकला | Painting in Medieval Indiaदिल्ली में सल्तनत काल की अवधि के दौरान शाही महलों, शयनकक्षों और मसजिदों से भित्ति चित्रों के साक्ष्य मिले हैं। … Read more
- रमेश बाबू कन्नेकांति की पेंटिंग | Eternal Love By Ramesh Babu Kannekantiशिव के चार हाथ शिव की कई शक्तियों को दर्शाते हैं। पिछले दाहिने हाथ में ढोल है, जो ब्रह्मांड के … Read more
- प्रगतिशील कलाकार दल | Progressive Artist Groupकलकत्ता की तुलना में बम्बई नया शहर है किन्तु उसका विकास बहुत अधिक और शीघ्रता से हुआ है। 1911 में … Read more
- आधुनिक काल में चित्रकला18वीं सदी के अंत और 19वीं सदी की शुरुआत में, चित्रों में अर्द्ध-पश्चिमी स्थानीय शैली शामिल हुई, जिसे ब्रिटिश निवासियों … Read more
- रमेश बाबू कनेकांति | Painting – A stroke of luck By Ramesh Babu Kannekantiगणेश के हाथी के सिर ने उन्हें पहचानने में आसान बना दिया है। भले ही वह कई विशेषताओं से सम्मानित … Read more
- सतीश गुजराल | Satish Gujral Biographyसतीश गुजराल का जन्म पंजाब में झेलम नामक स्थान पर 1925 ई० में हुआ था। केवल दस वर्ष की आयु … Read more
- पटना चित्रकला | पटना या कम्पनी शैली | Patna School of Paintingऔरंगजेब द्वारा राजदरबार से कला के विस्थापन तथा मुगलों के पतन के बाद विभिन्न कलाकारों ने क्षेत्रीय नवाबों के यहाँ आश्रय … Read more
- रमेश बाबू कन्नेकांति | Painting – Tranquility & harmony By Ramesh Babu Kannekantiयह कला पहाड़ी कलाकृतियों की 18वीं शताब्दी की शैली से प्रेरित है। इस आनंदमय दृश्य में, पार्वती पति भगवान शिव … Read more
- आगोश्तों शोफ्त | Agoston Schofftशोफ्त (1809-1880) हंगेरियन चित्रकार थे। उनके विषय में भारत में बहुत कम जानकारी है। शोफ्त के पितामह जर्मनी में पैदा हुए … Read more
- कालीघाट चित्रकारी | Kalighat Paintingकालीघाट चित्रकला का नाम इसके मूल स्थान कोलकाता में कालीघाट के नाम पर पड़ा है। कालीघाट कोलकाता में काली मंदिर के … Read more
- प्राचीन काल में चित्रकला में प्रयुक्त सामग्री | Material Used in Ancient Artविभिन्न प्रकार के चित्रों में विभिन्न सामग्रियों का उपयोग किया जाता था। साहित्यिक स्रोतों में चित्रशालाओं (आर्ट गैलरी) और शिल्पशास्त्र … Read more
- डेनियल चित्रकार | टामस डेनियल तथा विलियम डेनियल | Thomas Daniels and William Danielsटामस तथा विलियम डेनियल भारत में 1785 से 1794 के मध्य रहे थे। उन्होंने कलकत्ता के शहरी दृश्य, ग्रामीण शिक्षक, … Read more
- मिथिला चित्रकला | मधुबनी कला | Mithila Paintingमिथिला चित्रकला, जिसे मधुबनी लोक कला के रूप में भी जाना जाता है. बिहार के मिथिला क्षेत्र की पारंपरिक कला है। यह गाँव … Read more
- भारतीय चित्रकला | Indian Artपरिचय टेराकोटा पर या इमारतों, घरों, बाजारों और संग्रहालयों की दीवारों पर आपको कई पेंटिंग, बॉल हैंगिंग या चित्रकारी दिख … Read more
- भारत में विदेशी चित्रकार | Foreign Painters in Indiaआधुनिक भारतीय चित्रकला के विकास के आरम्भ में उन विदेशी चित्रकारों का महत्वपूर्ण योग रहा है जिन्होंने यूरोपीय प्रधानतः ब्रिटिश, … Read more
- सजावटी चित्रकला | Decorative Artsभारतीयों की कलात्मक अभिव्यक्ति केवल कैनवास या कागज पर चित्रकारी करने तक ही सीमित नहीं है। घरों की दीवारों पर … Read more
- बी. प्रभानागपुर में जन्मी बी० प्रभा (1933 ) को बचपन से ही चित्र- रचना का शौक था। सोलह वर्ष की आयु में … Read more
- दत्तात्रेय दामोदर देवलालीकर | Dattatreya Damodar Devlalikar Biographyअपने आरम्भिक जीवन में “दत्तू भैया” के नाम से लोकप्रिय श्री देवलालीकर का जन्म 1894 ई० में हुआ था। वे … Read more
- शैलोज मुखर्जीशैलोज मुखर्जी का जन्म 2 नवम्बर 1907 दन को कलकत्ता में हुआ था। उनकी कला चेतना बचपन से ही मुखर … Read more
- नारायण श्रीधर बेन्द्रे | Narayan Shridhar Bendreबेन्द्रे का जन्म 21 अगस्त 1910 को एक महाराष्ट्रीय मध्यवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पूर्वज पूना में रहते … Read more
- रवि वर्मा | Ravi Verma Biographyरवि वर्मा का जन्म केरल के किलिमन्नूर ग्राम में अप्रैल सन् 1848 ई० में हुआ था। यह कोट्टायम से 24 … Read more
- के०सी० एस० पणिक्कर | K.C.S.Panikkarतमिलनाडु प्रदेश की कला काफी पिछड़ी हुई है। मन्दिरों से उसका अभिन्न सम्बन्ध होते हुए भी आधुनिक जीवन पर उसकी … Read more
- भूपेन खक्खर | Bhupen Khakharभूपेन खक्खर का जन्म 10 मार्च 1934 को बम्बई में हुआ था। उनकी माँ के परिवार में कपडे रंगने का … Read more
- बम्बई आर्ट सोसाइटी | Bombay Art Societyभारत में पश्चिमी कला के प्रोत्साहन के लिए अंग्रेजों ने बम्बई में सन् 1888 ई० में एक आर्ट सोसाइटी की … Read more
- परमजीत सिंह | Paramjit Singhपरमजीत सिंह का जन्म 23 फरवरी 1935 अमृतसर में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा के उपरान्त वे दिल्ली पॉलीटेक्नीक के कला … Read more
- अनुपम सूद | Anupam Soodअनुपम सूद का जन्म होशियारपुर में 1944 में हुआ था। उन्होंने कालेज आफ आर्ट दिल्ली से 1967 में नेशनल डिप्लोमा … Read more
- देवकी नन्दन शर्मा | Devki Nandan Sharmaप्राचीन जयपुर रियासत के राज-कवि के पुत्र श्री देवकी नन्दन शर्मा का जन्म 17 अप्रैल 1917 को अलवर में हुआ … Read more













































































