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तंजौर चित्रकला – इतिहास, विशेषताएँ और निर्माण प्रक्रिया | 2026

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तंजौर चित्रकला – इतिहास, विशेषताएँ और निर्माण प्रक्रिया

तंजौर चित्रकला – इतिहास, विशेषताएँ और निर्माण प्रक्रिया | 2026

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तंजौर चित्रकला (Tanjore Painting) दक्षिण भारत की एक अत्यंत भव्य और प्राचीन कला परंपरा है जिसका जन्म तमिलनाडु के तंजावुर नगर में हुआ। सोने की चमकती पत्ती, बहुमूल्य रत्नों की जगमगाहट और हिंदू देवी-देवताओं के भावपूर्ण चित्रण से सजी यह कला शैली भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल रत्न है। 16वीं सदी में नायक शासकों से शुरू होकर 18वीं सदी में मराठा राजाओं के संरक्षण में अपने स्वर्णिम काल को छूने वाली इस कला को भारत सरकार ने 2007-08 में GI Tag प्रदान किया। इस लेख में जानें — तंजौर चित्रकला का सम्पूर्ण इतिहास, इसकी विशेषताएँ, निर्माण की चरण-दर-चरण प्रक्रिया, प्रमुख विषय-वस्तु, और इसके संरक्षण के प्रयास — साथ में MCQs और FAQs भी।

तंजौर चित्रकला – इतिहास, विशेषताएँ और निर्माण प्रक्रिया

Table of Contents

तंजौर चित्रकला| Tanjore Painting – Complete Study Notes

सम्पूर्ण अध्ययन नोट्स | MCQs | FAQs

परिचय (Introduction)

तंजौर चित्रकला (Tanjore Painting) दक्षिण भारत की एक अत्यंत समृद्ध, प्राचीन और भव्य चित्रकला परंपरा है, जिसका उद्गम तमिलनाडु के तंजावुर (Thanjavur) नगर में हुआ। यह चित्रकला न केवल अपनी अद्भुत सौंदर्यात्मकता के लिए जानी जाती है, बल्कि इसमें सोने की पत्ती (Gold Foil), बहुमूल्य रत्नों, और चमकीले रंगों का अनूठा संयोजन इसे विश्व की श्रेष्ठतम कलाओं में स्थान दिलाता है।

यह कला शैली मुख्य रूप से हिंदू धर्म के देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और धार्मिक प्रसंगों को अपना विषय बनाती है। तंजौर चित्रों में श्री कृष्ण, राम, गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती, विष्णु और अन्य देवी-देवताओं को अत्यंत भव्य रूप में चित्रित किया जाता है। इन चित्रों की विशेषता यह है कि इनमें पात्रों के चेहरे बड़े और गोल होते हैं, आँखें भावपूर्ण होती हैं और आभूषण-वस्त्र विशेष रूप से उभरे हुए प्रतीत होते हैं।

तंजौर चित्रकला को वर्ष 2007-08 में भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI Tag) प्राप्त हुआ, जिससे इसकी विशिष्ट पहचान और संरक्षण सुनिश्चित हुआ। आज यह कला न केवल भारत में बल्कि विदेशों में भी अत्यंत लोकप्रिय है और इसके चित्र संग्रहालयों तथा संग्राहकों के बीच बहुमूल्य माने जाते हैं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (Historical Background)

नायक शासन काल (16वीं–17वीं सदी)

तंजौर चित्रकला का बीजारोपण नायक शासकों के काल में हुआ। 16वीं और 17वीं शताब्दी में तंजावुर नायक राजाओं ने कला, संगीत और साहित्य को संरक्षण प्रदान किया। इस काल में विजयनगर साम्राज्य की कला परंपराओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखता है। तेलुगू और कन्नड़ कला शैलियों के तत्त्वों को मिलाकर एक नई और विशिष्ट शैली का विकास हुआ जो कालांतर में ‘तंजौर शैली’ के नाम से प्रसिद्ध हुई।

मराठा शासन काल (18वीं सदी) – स्वर्णिम युग

तंजौर चित्रकला का वास्तविक उत्कर्ष मराठा शासन काल में हुआ। 18वीं शताब्दी में तंजावुर के मराठा राजाओं — विशेष रूप से शरफोजी प्रथम और तुलाजी — ने इस कला को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। इन शासकों के दरबार में बड़े-बड़े चित्रकारों को आश्रय मिला और सोने की पत्ती, बहुमूल्य रत्नों व चमकीले रंगों का प्रयोग इस शैली की पहचान बन गई। मराठा काल में ‘राम दरबार’, ‘कृष्णलीला’, ‘त्रिमूर्ति’, और ‘अष्टलक्ष्मी’ जैसे विषयों पर असंख्य उत्कृष्ट चित्र बनाए गए।

ब्रिटिश काल और पतन

19वीं शताब्दी में ब्रिटिश शासन के आगमन के साथ-साथ राजकीय संरक्षण समाप्त होने लगा। परिणामस्वरूप तंजौर चित्रकला का विकास अवरुद्ध हो गया और कारीगर आर्थिक कठिनाइयों में जीवन व्यतीत करने लगे। धीरे-धीरे इस कला की परंपरा सिमटती गई और यह कला केवल कुछ परिवारों तक सीमित रह गई।

आधुनिक पुनर्जीवन

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत सरकार और तमिलनाडु सरकार ने इस कला को पुनर्जीवित करने के प्रयास किए। लघु उद्योग बोर्ड, हस्तशिल्प विकास निगम, और विभिन्न NGOs ने कारीगरों को प्रशिक्षण व वित्तीय सहायता प्रदान की। आज तंजावुर, कुंभकोणम, चेन्नई और पुडुचेरी जैसे केंद्रों में यह कला पुनः फल-फूल रही है।

3. तंजौर चित्रकला की विशेषताएँ (Characteristics)

तंजौर चित्रकला को अन्य भारतीय कला शैलियों से अलग करने वाली कई विशेषताएँ हैं जो इसे अनूठा और पहचानने योग्य बनाती हैं:

  • सोने की पत्ती (Gold Foil): यह इस शैली की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है। पात्रों के वस्त्रों, आभूषणों और मुकुटों पर सोने की पत्ती या सोने के रंग का भव्य प्रयोग किया जाता है।
  • उभरी हुई आकृतियाँ: राल (Resin) और सफेद सीमेंट के मिश्रण से पात्रों के आभूषणों और कपड़ों को त्रि-आयामी उभार दिया जाता है।
  • चमकीले और गहरे रंग: लाल, हरा, नीला, पीला और नारंगी जैसे चटकीले रंगों का प्रयोग किया जाता है। पृष्ठभूमि सामान्यतः गहरे लाल या हरे रंग की होती है।
  • बड़े और भावपूर्ण नेत्र: पात्रों की आँखें बड़ी, बादाम के आकार की और अत्यंत भावपूर्ण होती हैं।
  • गोल मुखाकृति: पात्रों के चेहरे गोल और परिपूर्ण होते हैं जो दैवीय सौंदर्य का प्रतीक हैं।
  • धार्मिक विषय-वस्तु: लगभग सभी चित्र हिंदू देवी-देवताओं, रामायण, महाभारत और पुराणों की कथाओं पर आधारित होते हैं।
  • काँच का प्रयोग: रत्नों और मणियों के स्थान पर रंगीन काँच के टुकड़ों का उपयोग भी किया जाता है जो चित्र को चमकदार बनाते हैं।

निर्माण प्रक्रिया (Making Process)

तंजौर चित्रकला का निर्माण एक अत्यंत जटिल, समय-साध्य और बहुचरणीय प्रक्रिया है। प्रत्येक चरण में विशेष कौशल और धैर्य की आवश्यकता होती है:

चरण 1: आधार तैयार करना

सबसे पहले एक मजबूत लकड़ी के तख्ते (Wooden Board) को आधार के रूप में चुना जाता है। साागौन (Teak), जैकवुड या ईब्नी जैसी कठोर लकड़ियाँ इस उद्देश्य के लिए उपयुक्त मानी जाती हैं। आधुनिक काल में प्लाई बोर्ड का भी उपयोग किया जाने लगा है।

चरण 2: कपड़े की परत चढ़ाना

लकड़ी के तख्ते पर सफेद सूती कपड़े (Muslin Cloth) को गोंद (Adhesive) की सहायता से चिपकाया जाता है। यह परत चित्र के लिए आवश्यक समतल और कोमल सतह प्रदान करती है।

चरण 3: चाक और गोंद का लेप

कपड़े पर चाक पाउडर और अरबी गोंद (Gum Arabic) का मिश्रण पतली परतों में लगाया जाता है। इसे पूरी तरह सूखने दिया जाता है। यह प्रक्रिया 2-3 बार दोहराई जाती है जिससे सतह चिकनी और समतल हो जाती है।

चरण 4: रेखाचित्र (Sketch) बनाना

तैयार सतह पर पेंसिल या कोयले से मुख्य आकृति का रेखाचित्र बनाया जाता है। पात्र का चेहरा, वस्त्र, आभूषण और पृष्ठभूमि — सभी का खाका पहले से तय किया जाता है।

चरण 5: उभार (Relief Work) बनाना

आभूषणों, मुकुटों, वस्त्रों की किनारियों और सजावटी तत्वों पर एक विशेष पेस्ट — जो सफेद सीमेंट, राल (Resin) और कभी-कभी साग का चूरा मिलाकर बनाई जाती है — की उभरी आकृतियाँ बनाई जाती हैं। इससे चित्र त्रि-आयामी (Three-Dimensional) प्रभाव प्राप्त करता है।

चरण 6: सोने की पत्ती लगाना

उभरे हुए भागों पर 22 कैरेट या उससे अधिक शुद्धता की सोने की पत्ती (Gold Foil) को गोंद से सावधानीपूर्वक चिपकाया जाता है। यह कार्य अत्यंत कौशल और धैर्य की माँग करता है क्योंकि सोने की पत्ती बहुत नाजुक होती है।

चरण 7: रत्नों और काँच की सजावट

सोने की पत्ती के बाद बहुमूल्य या अर्द्ध-मूल्यवान रत्नों — जैसे माणिक, पन्ना, नीलम — अथवा रंगीन काँच के टुकड़ों को आभूषणों के स्थान पर जड़ा जाता है। यही इस कला को जगमगाहट और वैभव प्रदान करता है।

चरण 8: रंग भरना

अंतिम चरण में प्राकृतिक अथवा रासायनिक रंगों से पूरे चित्र में रंग भरा जाता है। पृष्ठभूमि को सामान्यतः गहरे रंग से भरा जाता है जबकि पात्रों के वस्त्र और त्वचा के लिए विशेष रंगों का चयन किया जाता है।

प्रमुख विषय-वस्तु (Major Themes)

तंजौर चित्रकला मुख्य रूप से धार्मिक विषयों पर केंद्रित है। इसकी प्रमुख विषय-वस्तु निम्नलिखित हैं:

  • श्री कृष्ण और बाल कृष्ण: बाल कृष्ण के माखन खाते, नृत्य करते या यशोदा की गोद में चित्र सर्वाधिक लोकप्रिय हैं।
  • राम दरबार: राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान सहित पूरे अयोध्या दरबार का भव्य चित्रण।
  • गणेश: विघ्नहर्ता गणेश के विविध रूप, विशेषकर ‘नृत्य गणेश’ और ‘बाल गणेश’।
  • लक्ष्मी और महालक्ष्मी: धन और समृद्धि की देवी के कमल पर विराजमान चित्र।
  • सरस्वती: वीणावादिनी सरस्वती, विद्या और ज्ञान की देवी।
  • अष्टलक्ष्मी: लक्ष्मी के आठ रूपों का चित्रण।
  • नवग्रह: नौ ग्रहों का एक साथ चित्रण।
  • त्रिमूर्ति: ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त चित्रण।
  • शिव-पार्वती: नटराज शिव और देवी पार्वती के विभिन्न रूप।

प्रयुक्त सामग्री (Materials Used)

तंजौर चित्रकला में परंपरागत और आधुनिक — दोनों प्रकार की सामग्रियों का उपयोग किया जाता है:

  • आधार: लकड़ी का तख्ता (सागौन, जैकवुड), आधुनिक युग में प्लाईबोर्ड और मोटे कार्डबोर्ड भी।
  • कपड़ा: सफेद सूती मलमल (Muslin) या खादी का कपड़ा।
  • चाक (Whiting): बेस कोट बनाने के लिए।
  • गोंद: अरबी गोंद, आधुनिक एडहेसिव।
  • उभार पेस्ट: सफेद सीमेंट, राल और प्राकृतिक बाइंडर का मिश्रण।
  • सोने की पत्ती: 22 कैरेट या उससे अधिक शुद्धता, कभी-कभी चाँदी की पत्ती भी।
  • रत्न और काँच: माणिक, पन्ना, नीलम या रंगीन काँच के टुकड़े।
  • रंग: परंपरागत रूप से प्राकृतिक रंग (खनिज, वनस्पति), आधुनिक काल में रासायनिक रंग।

प्रमुख केंद्र (Major Centers)

तंजौर चित्रकला के उत्पादन और प्रशिक्षण के प्रमुख केंद्र इस प्रकार हैं:

  • तंजावुर (Thanjavur): यह इस कला का उद्गम स्थल और प्रमुख केंद्र है। यहाँ के बड़े मंदिर परिसरों के निकट आज भी अनेक कारीगर परिवार इस कला को जीवित रखे हुए हैं।
  • कुंभकोणम (Kumbakonam): तंजौर से निकटस्थ यह नगर भी इस कला का महत्वपूर्ण केंद्र है।
  • चेन्नई (Chennai): तमिलनाडु की राजधानी में इस कला की खरीद-बिक्री और प्रशिक्षण के केंद्र स्थापित हैं।
  • पुडुचेरी (Puducherry): यहाँ भी कुछ कारीगर परिवार इस परंपरा को निभा रहे हैं।
  • मैसूर और बेंगलुरु: कर्नाटक में भी इस शैली के चित्र बनाए जाते हैं, हालाँकि यहाँ इसे ‘मैसूर शैली’ के रूप में थोड़ा अलग पहचाना जाता है।

8. अन्य चित्रकला शैलियों से तुलना (Comparison)

तंजौर बनाम मैसूर चित्रकला

तंजौर और मैसूर — दोनों दक्षिण भारतीय शैलियाँ हैं और दोनों में सोने का प्रयोग होता है, किंतु इनमें महत्वपूर्ण अंतर हैं। तंजौर शैली में उभरी हुई आकृतियाँ और सोने की पत्ती का भव्य उपयोग होता है, जबकि मैसूर शैली में चित्र अपेक्षाकृत सपाट होते हैं और महीन रेखाओं का प्रयोग अधिक होता है। तंजौर में रंग अधिक चटकीले होते हैं जबकि मैसूर में शांत और सौम्य रंग प्रयुक्त होते हैं।

तंजौर बनाम केरल भित्तिचित्र (Mural)

केरल के भित्तिचित्र मंदिरों और महलों की दीवारों पर बनाए जाते हैं जबकि तंजौर चित्र चल (Portable) कला हैं जिन्हें लकड़ी पर बनाया जाता है। केरल की भित्तिचित्र शैली में रेखाएँ अधिक गतिशील और अभिव्यंजनापूर्ण होती हैं जबकि तंजौर में स्थैतिक और औपचारिक रचना होती है।

9. GI Tag और संरक्षण प्रयास (GI Tag & Conservation)

तंजौर चित्रकला को वर्ष 2007-08 में भारत सरकार द्वारा भौगोलिक संकेत (Geographical Indication – GI Tag) प्रदान किया गया। यह GI Tag इस बात का प्रमाण है कि यह कला केवल तंजावुर क्षेत्र की विशिष्ट पहचान है और इसकी नकल को ‘तंजौर पेंटिंग’ नहीं कहा जा सकता।

संरक्षण के क्षेत्र में निम्नलिखित प्रयास उल्लेखनीय हैं:

  • भारतीय हस्तशिल्प विकास निगम (HANTEX) और हस्तशिल्प विकास आयुक्त (DC Handicrafts) द्वारा वित्तीय सहायता।
  • तमिलनाडु सरकार द्वारा प्रशिक्षण संस्थान और कारीगर सहकारी समितियाँ।
  • ‘क्राफ्ट्स विलेज’ की स्थापना जहाँ कारीगर अपनी कला का प्रदर्शन और बिक्री कर सकते हैं।
  • राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मेलों में तंजौर कला की भागीदारी।
  • ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर इस कला की उपस्थिति से वैश्विक बाजार तक पहुँच।

फिर भी आज भी कई कारीगर परिवार आर्थिक कठिनाइयों से जूझ रहे हैं क्योंकि इस कला में लगने वाला समय और सामग्री की लागत अत्यधिक है जबकि उचित मूल्य नहीं मिल पाता।

10. तंजौर चित्रकला का सांस्कृतिक महत्व (Cultural Significance)

तंजौर चित्रकला केवल एक सौंदर्यात्मक कला नहीं है — यह भारतीय धर्म, दर्शन और संस्कृति का एक जीवंत दस्तावेज है। इन चित्रों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी धार्मिक कथाएँ, पौराणिक आख्यान और आध्यात्मिक संदेश संप्रेषित होते रहे हैं।

मंदिरों में इन चित्रों का उपयोग धार्मिक शिक्षा के माध्यम के रूप में होता था। घरों में तंजौर चित्र शुभ और मांगलिक माने जाते हैं। विवाह, गृहप्रवेश और अन्य मंगल अवसरों पर तंजौर के चित्र उपहार के रूप में दिए जाते हैं।

आज यह कला भारत की सॉफ्ट पावर का प्रतीक बन चुकी है। विदेशी पर्यटक और कला प्रेमी इन चित्रों को विशेष रुचि से खरीदते हैं। नई दिल्ली स्थित राष्ट्रीय संग्रहालय, चेन्नई का सरकारी संग्रहालय और लंदन के विक्टोरिया & एल्बर्ट म्यूज़ियम में तंजौर चित्रों का विशिष्ट संग्रह है।

11. निष्कर्ष (Conclusion)

तंजौर चित्रकला भारतीय सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य रत्न है। सोने की चमक, रत्नों की जगमगाहट और भक्ति की भावना से ओतप्रोत ये चित्र दर्शकों के हृदय को भाव-विभोर कर देते हैं। यह कला हमें याद दिलाती है कि भारत की सांस्कृतिक समृद्धि कितनी गहरी और विविध है।

डिजिटल युग में इस कला को नई पीढ़ी तक पहुँचाना हम सबकी जिम्मेदारी है। Indian Art History जैसे प्लेटफॉर्म इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं जो भारतीय कला के इतिहास को सरल, सुलभ और रोचक तरीके से प्रस्तुत करते हैं। आइए, हम सब मिलकर इस अमूल्य धरोहर को संरक्षित करें और आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

निर्देश: सही विकल्प चुनें। सही उत्तर ✔ से चिह्नित हैं।

1. तंजौर चित्रकला का उद्गम किस राज्य में हुआ?

   A) केरल

   B) आंध्र प्रदेश

   C) तमिलनाडु

   D) कर्नाटक

   ✔ सही उत्तर: C) तमिलनाडु

2. तंजौर चित्रकला में किस धातु की पत्ती का प्रमुख उपयोग होता है?

   A) चाँदी

   B) सोना

   C) ताँबा

   D) पीतल

   ✔ सही उत्तर: B) सोना

3. तंजौर चित्रकला को GI Tag किस वर्ष मिला?

   A) 2003-04

   B) 2005-06

   C) 2007-08

   D) 2010-11

   ✔ सही उत्तर: C) 2007-08

4. तंजौर चित्रकला के वास्तविक उत्कर्ष काल में किन शासकों ने इसे संरक्षण दिया?

   A) नायक शासक

   B) मराठा शासक

   C) चोल शासक

   D) पल्लव शासक

   ✔ सही उत्तर: B) मराठा शासक

5. तंजौर चित्रकला में आधार के रूप में प्रमुखतः किसका उपयोग होता है?

   A) पत्थर की शिला

   B) ताड़पत्र

   C) लकड़ी का तख्ता

   D) कागज

   ✔ सही उत्तर: C) लकड़ी का तख्ता

6. तंजौर और मैसूर चित्रकला में क्या अंतर है?

   A) मैसूर में उभरी आकृतियाँ अधिक होती हैं

   B) तंजौर में उभरी आकृतियाँ और चटकीले रंग होते हैं

   C) दोनों बिल्कुल एक समान हैं

   D) तंजौर में सोने का उपयोग नहीं होता

   ✔ सही उत्तर: B) तंजौर में उभरी आकृतियाँ और चटकीले रंग होते हैं

7. तंजौर चित्रकला में प्रमुख रूप से किस विषय को चित्रित किया जाता है?

   A) प्राकृतिक दृश्य

   B) युद्ध के दृश्य

   C) हिंदू देवी-देवता और पौराणिक कथाएँ

   D) राजदरबार के दृश्य

   ✔ सही उत्तर: C) हिंदू देवी-देवता और पौराणिक कथाएँ

8. तंजौर चित्रकला में ‘उभार’ (Relief Work) के लिए किस सामग्री का प्रयोग होता है?

   A) मिट्टी

   B) प्लास्टर ऑफ पेरिस

   C) सफेद सीमेंट और राल (Resin) का मिश्रण

   D) लाख

   ✔ सही उत्तर: C) सफेद सीमेंट और राल (Resin) का मिश्रण

9. तंजौर चित्रकला का सबसे प्रमुख उत्पादन केंद्र कौन-सा है?

   A) चेन्नई

   B) तंजावुर

   C) मदुरई

   D) कोयंबटूर

   ✔ सही उत्तर: B) तंजावुर

10. तंजौर चित्रकला में कपड़े की परत किस पर चढ़ाई जाती है?

   A) पत्थर पर

   B) लकड़ी के तख्ते पर

   C) कागज पर

   D) धातु की प्लेट पर

   ✔ सही उत्तर: B) लकड़ी के तख्ते पर

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

❓ प्रश्न 1: तंजौर चित्रकला में सोने की पत्ती का उपयोग क्यों किया जाता है?

   तंजौर चित्रकला मूलतः धार्मिक कला है और देवी-देवताओं को भव्य और दिव्य रूप में प्रस्तुत करना इसका उद्देश्य है। सोने की पत्ती इस दिव्यता और वैभव को व्यक्त करने का सर्वोत्तम माध्यम है। इसके अलावा सोना चिरस्थायी होता है जिससे चित्र शताब्दियों तक अपनी चमक बनाए रखता है।

❓ प्रश्न 2: तंजौर चित्रकला और मैसूर चित्रकला में क्या मुख्य अंतर है?

   तंजौर चित्रकला में उभरी हुई त्रि-आयामी आकृतियाँ, अत्यधिक चटकीले रंग और भारी मात्रा में सोने की पत्ती का उपयोग होता है। मैसूर चित्रकला में चित्र सपाट होते हैं, रेखाएँ महीन और सुस्पष्ट होती हैं, और रंग अपेक्षाकृत कोमल एवं सौम्य होते हैं। दोनों में सोने का प्रयोग होता है किंतु तंजौर में यह कहीं अधिक प्रभावशाली और स्पष्ट है।

❓ प्रश्न 3: तंजौर चित्र इतने महंगे क्यों होते हैं?

   तंजौर चित्र बनाने में अत्यंत समय लगता है — एक उत्कृष्ट चित्र बनाने में कई सप्ताह से लेकर महीनों तक का समय लग सकता है। इसके अतिरिक्त सोने की पत्ती, बहुमूल्य रत्न, उच्च गुणवत्ता के रंग और विशेष सामग्री की लागत भी अधिक होती है। साथ ही इस कला में वर्षों का प्रशिक्षण और कौशल आवश्यक है। इन सब कारणों से तंजौर चित्र महँगे होते हैं।

❓ प्रश्न 4: क्या तंजौर चित्रकला में केवल धार्मिक विषय ही बनाए जाते हैं?

   परंपरागत रूप से तंजौर चित्रकला मुख्यतः धार्मिक विषयों पर केंद्रित रही है — हिंदू देवी-देवता, रामायण, महाभारत और पुराण कथाएँ। हालाँकि आधुनिक काल में कुछ कारीगर इस शैली में राजदरबार के दृश्य, नवाबों के चित्र और सेक्युलर विषय भी बनाने लगे हैं, परंतु धार्मिक विषय ही इस कला की आत्मा हैं।

❓ प्रश्न 5: तंजौर चित्रकला को GI Tag क्यों दिया गया?

   GI Tag (Geographical Indication) इसलिए दिया गया क्योंकि यह कला शैली तंजावुर क्षेत्र की विशिष्ट पहचान है। इस टैग के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाता है कि केवल तंजावुर क्षेत्र में बने प्रामाणिक चित्र ही ‘तंजौर पेंटिंग’ कहलाएँ। इससे नकली और घटिया उत्पादों से इस कला की रक्षा होती है और मूल कारीगरों को उचित मान्यता व आर्थिक लाभ मिलता है।

❓ प्रश्न 6: तंजौर चित्रकला सीखने में कितना समय लगता है?

   तंजौर चित्रकला एक जटिल कला है जिसे सीखने में सामान्यतः 2 से 5 वर्ष का समय लग सकता है। बेसिक चित्रकारी, सोने की पत्ती लगाना, उभार बनाना और रत्न जड़ाई — प्रत्येक चरण के लिए अलग-अलग कौशल चाहिए। तंजावुर और तमिलनाडु सरकार के प्रशिक्षण केंद्रों में 6 महीने से 1 वर्ष के सर्टिफिकेट कोर्स भी उपलब्ध हैं।

❓ प्रश्न 7: तंजौर चित्रकला और पट्टचित्र में क्या अंतर है?

   पट्टचित्र ओडिशा की कपड़े पर बनाई जाने वाली चित्रकला है जबकि तंजौर चित्रकला तमिलनाडु की लकड़ी पर बनाई जाती है। पट्टचित्र में सोने की पत्ती और रत्नों का उपयोग नहीं होता जबकि तंजौर की यह इसकी विशिष्ट पहचान है। पट्टचित्र में पृष्ठभूमि प्रायः हल्के रंग की होती है और बारीक डिटेल्स पर जोर दिया जाता है।

❓ प्रश्न 8: तंजौर चित्रकला के प्रसिद्ध कारीगर या परिवार कौन से हैं?

   तंजावुर के कई पारंपरिक परिवार पीढ़ियों से इस कला से जुड़े हैं। इनमें ‘राजू’ परिवार विशेष रूप से उल्लेखनीय है जो शताब्दियों से तंजौर चित्रकला में संलग्न है। इसके अलावा तंजावुर के बड़े कोइल (मंदिर) के निकट बसे चित्रकार परिवार इस परंपरा को जीवित रखे हुए हैं।

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