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परिचय
सजावटी कला (Decorative Arts) उन कला रूपों को संदर्भित करती है जो सौंदर्यात्मक और व्यावहारिक दोनों उद्देश्यों की पूर्ति करते हैं। इसे “अनुप्रयुक्त कला” (Applied Arts) भी कहा जाता है। फर्नीचर, मिट्टी के बर्तन, कांच की वस्तुएं, धातुकला, वस्त्र, आभूषण, और अन्य घरेलू वस्तुएं जो सौंदर्यपूर्ण ढंग से बनाई जाती हैं, सजावटी कला की श्रेणी में आती हैं।
सजावटी कला का इतिहास उतना ही पुराना है जितना मानव सभ्यता का। प्राचीन काल से ही मनुष्य ने अपनी दैनिक उपयोग की वस्तुओं को सुंदर बनाने का प्रयास किया है। यह कला “ललित कला” (Fine Arts) से इस अर्थ में भिन्न है कि यह केवल दृश्य आनंद के लिए नहीं, बल्कि उपयोग के लिए भी बनाई जाती है। हालांकि, इस विभाजन को आधुनिक युग में चुनौती दी जा रही है और दोनों के बीच की सीमाएं धुंधली हो रही हैं।
ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
प्राचीन सभ्यताएं
प्राचीन मिस्र, मेसोपोटामिया, सिंधु घाटी, चीन और ग्रीस में सजावटी कला अत्यंत विकसित थी। मिस्र के फिरौन के मकबरों में मिली सुंदर फर्नीचर, आभूषण और बर्तन शिल्पकारों की उत्कृष्टता को दर्शाते हैं। ग्रीक मिट्टी के बर्तनों पर बनी चित्रकारी कला और कारीगरी का अद्भुत संगम है।
रोमन साम्राज्य में मोज़ेक, कांच की वस्तुएं, और धातु के सजावटी सामान उच्च स्तर पर विकसित हुए। पोम्पेई में मिले घरों की सजावट रोमन सजावटी कला की समृद्धि का प्रमाण है।
मध्यकाल
मध्यकाल में ईसाई चर्चों और इस्लामी मस्जिदों के लिए बनी सजावटी वस्तुएं धार्मिक कला का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। स्टेन्ड ग्लास विंडोज़, वेदी की सजावट, धातु के क्रॉस और कैलिग्राफी कला विकसित हुई।
इस्लामी सजावटी कला में ज्यामितीय पैटर्न, अरबी सुलेख और पुष्प डिजाइन का व्यापक उपयोग हुआ। फारसी कालीन, मोरक्कन टाइल्स, और अरबी धातुकार्य विश्व प्रसिद्ध हैं।
पुनर्जागरण और बारोक
पुनर्जागरण काल में इटली में सजावटी कला फली-फूली। मुरानो का कांच, फ्लोरेंटाइन फर्नीचर, और मैयोलिका (चित्रित मिट्टी के बर्तन) प्रसिद्ध हुए। बारोक युग में फ्रांस में लुई XIV के दरबार में भव्य सजावटी कला विकसित हुई।
औद्योगिक क्रांति
18वीं और 19वीं सदी में औद्योगिक क्रांति ने सजावटी कला को बदल दिया। मशीन-निर्मित वस्तुओं के उत्पादन ने हस्तनिर्मित वस्तुओं के मूल्य को प्रभावित किया। इसके प्रतिक्रिया में “आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स मूवमेंट” (1880-1920) शुरू हुआ जो हस्तशिल्प की गुणवत्ता और कारीगर के महत्व पर बल देता था।
आधुनिक युग
20वीं सदी में आर्ट नोव्यू, आर्ट डेको, बाउहॉस और अन्य आंदोलनों ने सजावटी कला को नए आयाम दिए। फॉर्म और फंक्शन का संतुलन, न्यूनतम डिजाइन और नई सामग्रियों का प्रयोग मुख्य विशेषताएं बनीं।
सजावटी कला के प्रमुख क्षेत्र
फर्नीचर (Furniture)
फर्नीचर सजावटी कला का सबसे दृश्यमान और व्यावहारिक रूप है। विभिन्न युगों और संस्कृतियों ने अपनी विशिष्ट फर्नीचर शैलियां विकसित की हैं।
लकड़ी का फर्नीचर: विभिन्न प्रकार की लकड़ी – महोगनी, टीक, शीशम, ओक – का उपयोग। नक्काशी, जड़ाव (इनले), और पॉलिश तकनीकें।
धातु का फर्नीचर: पीतल, लोहा, स्टील और आधुनिक मिश्रधातुओं से बना फर्नीचर।
असबाबदार फर्नीचर: कपड़े, चमड़े से ढके सोफा, कुर्सियां।
भारतीय फर्नीचर में राजस्थानी नक्काशीदार लकड़ी, कश्मीरी अखरोट की लकड़ी, और दक्षिण भारतीय रोज़वुड का फर्नीचर प्रसिद्ध है।
मृण्कला और सिरेमिक (Pottery and Ceramics)
मिट्टी के बर्तन मानवता की सबसे पुरानी कला रूपों में से एक हैं।
मिट्टी के बर्तन (Earthenware): कम तापमान पर पकाए गए, छिद्रयुक्त।
पत्थर के बर्तन (Stoneware): उच्च तापमान पर पकाए गए, अधिक टिकाऊ।
चीनी मिट्टी के बर्तन (Porcelain): सबसे महीन और पारदर्शी, चीन में विकसित।
भारत में ब्लू पॉटरी (जयपुर), काले मिट्टी के बर्तन (निज़ामाबाद), टेराकोटा (पश्चिम बंगाल) और खुर्जा की सिरेमिक प्रसिद्ध हैं।
कांच कला (Glass Art)
कांच की सजावटी वस्तुएं प्राचीन काल से बनाई जा रही हैं।
स्टेन्ड ग्लास: रंगीन कांच के टुकड़ों को जोड़कर बनाए गए डिजाइन और चित्र।
कट ग्लास: हीरे की कटाई से बनाए गए पैटर्न।
ब्लोन ग्लास: कांच को फूंककर विभिन्न आकार बनाना।
फ्यूज़्ड ग्लास: कांच के टुकड़ों को गर्म करके जोड़ना।
वेनिस का मुरानो ग्लास, बोहेमियन क्रिस्टल, और टिफनी लैंप्स प्रसिद्ध उदाहरण हैं।
धातुकला (Metalwork)
धातु से बनी सजावटी वस्तुएं शक्ति और सुंदरता का प्रतीक रही हैं।
सोना-चांदी (Gold and Silver): आभूषण, बर्तन, धार्मिक वस्तुएं।
पीतल और कांसा (Brass and Bronze): मूर्तियां, बर्तन, सजावटी वस्तुएं।
तांबा (Copper): बर्तन, सजावटी पैनल।
लोहा (Iron): फाटक, ग्रिल, फर्नीचर।
भारतीय धातुकला में बिदरी (हैदराबाद), मुरादाबाद की पीतल की वस्तुएं, और नटराज की कांस्य मूर्तियां प्रसिद्ध हैं।
वस्त्र कला (Textile Arts)
वस्त्र सजावटी कला का व्यापक क्षेत्र है।
बुनाई (Weaving): विभिन्न तकनीकों से कपड़े बनाना।
कढ़ाई (Embroidery): कपड़े पर सुई-धागे से डिजाइन बनाना।
छपाई (Printing): ब्लॉक, स्क्रीन या डिजिटल छपाई।
बांधना और रंगना (Tie-dye): बांधकर रंगने की तकनीक।
टेपेस्ट्री (Tapestry): दीवार पर लटकाने के लिए बुने गए चित्र।
भारत में बनारसी सिल्क, कांथा कढ़ाई, चिकनकारी, बांधनी, कलमकारी, और पटोला साड़ियां विश्व प्रसिद्ध हैं।
आभूषण कला (Jewelry)
आभूषण निर्माण सजावट और स्थिति प्रतीक दोनों रहा है।
कीमती धातुएं: सोना, चांदी, प्लेटिनम।
कीमती पत्थर: हीरा, पन्ना, माणिक, नीलम।
तकनीकें: कुंदन, मीनाकारी, फिलिग्री, थेवा, पोलकी।
भारतीय आभूषण कला अत्यंत समृद्ध है। प्रत्येक क्षेत्र की अपनी विशिष्ट शैली है – राजस्थानी कुंदन, हैदराबादी मुक्ता (मोती), दक्षिण भारतीय मंदिर आभूषण, और बंगाली सोने के आभूषण।
कालीन और गलीचे (Carpets and Rugs)
हाथ से बुने कालीन सजावटी कला की उत्कृष्ट श्रेणी हैं।
फारसी कालीन: जटिल डिजाइन और महीन बुनाई।
तुर्की कालीन: ज्यामितीय पैटर्न।
भारतीय कालीन: कश्मीरी, आगरा, और जयपुर के कालीन।
गांठें प्रति वर्ग इंच जितनी अधिक होती हैं, कालीन उतना ही महीन और मूल्यवान होता है।
चीनी मिट्टी की वस्तुएं (Chinaware)
चीन में विकसित पोर्सलेन कला विश्व भर में फैली।
चीनी नीली-सफेद: पारंपरिक नीली छपाई।
जापानी इमारी: रंगीन डिजाइन।
अंग्रेजी चाइना: वेजवुड, रॉयल डॉल्टन।
चमड़े की कला (Leather Arts)
चमड़े से बनी सजावटी और उपयोगी वस्तुएं।
बैग और जूते: सजावटी डिजाइन।
बुक बाइंडिंग: पुस्तकों के चमड़े के आवरण।
दीवार की सजावट: उभरे हुए डिजाइन।
कोल्हापुरी चप्पल, राजस्थानी जूतियां और शंकर लाल का चमड़े का काम प्रसिद्ध है।
डिजाइन तत्व और सिद्धांत
सजावटी कला में डिजाइन के मूलभूत तत्व और सिद्धांत लागू होते हैं:
तत्व (Elements)
रेखा (Line): सीधी, वक्र, मोटी, पतली।
रूप और आकार (Form and Shape): द्वि-आयामी और त्रि-आयामी।
रंग (Color): रंग चक्र, संयोजन, मनोवैज्ञानिक प्रभाव।
बनावट (Texture): चिकना, खुरदरा, मुलायम, कठोर।
स्थान (Space): सकारात्मक और नकारात्मक स्थान।
मूल्य (Value): हल्का और गहरा।
सिद्धांत (Principles)
संतुलन (Balance): सममित या असममित।
अनुपात (Proportion): भागों के बीच आकार संबंध।
लय (Rhythm): दोहराव, प्रगति, संक्रमण।
जोर (Emphasis): फोकल पॉइंट।
एकता (Unity): सामंजस्य और पूर्णता।
विविधता (Variety): रुचि और विविधता।
महत्वपूर्ण आंदोलन और शैलियां
आर्ट्स एंड क्राफ्ट्स मूवमेंट (1880-1920)
विलियम मॉरिस के नेतृत्व में यह आंदोलन औद्योगिक उत्पादन की प्रतिक्रिया था। हस्तनिर्मित वस्तुओं की गुणवत्ता, प्राकृतिक सामग्री और मध्यकालीन शिल्पकारी पर बल दिया गया।
आर्ट नोव्यू (1890-1910)
प्रकृति से प्रेरित वक्र रेखाएं, पुष्प डिजाइन और जैविक रूप। लुई कम्फर्ट टिफनी के लैंप, रेने लालीक के आभूषण इसके उदाहरण हैं।
आर्ट डेको (1920-1940)
ज्यामितीय आकार, साहसिक रंग, विलासिता और आधुनिकता। क्रिसलर बिल्डिंग (न्यूयॉर्क) इस शैली का प्रतीक है।
बाउहॉस (1919-1933)
जर्मन डिजाइन स्कूल जिसने “फॉर्म फॉलोज़ फंक्शन” का सिद्धांत प्रस्तुत किया। सरलता, कार्यक्षमता और आधुनिक सामग्री पर जोर।
मिड-सेंचुरी मॉडर्न (1945-1965)
स्वच्छ रेखाएं, जैविक रूप, कार्यक्षमता और प्रकृति के साथ एकीकरण। चार्ल्स और रे ईम्स के डिजाइन प्रसिद्ध हैं।
पोस्टमॉडर्निज्म (1970-वर्तमान)
आधुनिकतावाद की सख्त सरलता की प्रतिक्रिया। रंग, सजावट, विडंबना और विविधता पर बल।
भारतीय सजावटी कला परंपरा
भारत में सजावटी कला की अत्यंत समृद्ध और विविध परंपरा है।
क्षेत्रीय विशेषताएं
राजस्थान: नक्काशीदार लकड़ी, नीली मिट्टी के बर्तन, कुंदन आभूषण, ब्लॉक प्रिंटिंग।
कश्मीर: अखरोट की लकड़ी का फर्नीचर, पेपर मशीन, पश्मीना शॉल।
गुजरात: बांधनी, पटोला, रोगन पेंटिंग।
उत्तर प्रदेश: चिकनकारी, ज़री का काम, मुरादाबाद की पीतल की वस्तुएं।
पश्चिम बंगाल: टेराकोटा, कांथा कढ़ाई, बालूचरी साड़ी।
तमिलनाडु: कांचीपुरम सिल्क, तंजौर पेंटिंग्स, कांस्य मूर्तियां।
भारतीय तकनीकें
मीनाकारी: धातु पर रंगीन तामचीनी का काम।
थेवा: कांच पर सोने का काम (राजस्थान)।
बिदरी: काले धातु पर चांदी का जड़ाव (हैदराबाद)।
ज़री और ज़रदोज़ी: सोने-चांदी के धागों से कढ़ाई।
डब्बू-घाट: धातु को उभारकर डिजाइन बनाना।
समकालीन सजावटी कला
आधुनिक युग में सजावटी कला नए आयाम ले रही है।
नई सामग्रियां
प्लास्टिक, रेज़िन, कार्बन फाइबर, और अन्य सिंथेटिक सामग्री। 3D प्रिंटिंग से जटिल डिजाइन संभव हो गए हैं।
टिकाऊ डिजाइन
पुनर्चक्रण, अपसाइक्लिंग, पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग। सतत विकास पर बल।
डिजिटल तकनीक
कंप्यूटर-सहायता प्राप्त डिजाइन (CAD), लेजर कटिंग, सीएनसी मशीनिंग।
शिल्प पुनर्जागरण
हस्तनिर्मित वस्तुओं में नई रुचि। युवा डिजाइनर पारंपरिक तकनीकों को आधुनिक डिजाइन के साथ मिला रहे हैं।
सजावटी कला बनाम ललित कला
परंपरागत रूप से, पश्चिमी कला इतिहास में ललित कला (चित्रकला, मूर्तिकला) को सजावटी कला से श्रेष्ठ माना जाता था। ललित कला को “उच्च” और सजावटी कला को “निम्न” या “लघु कला” कहा जाता था।
यह विभाजन कई कारणों से आलोचना का विषय है:
लिंग पूर्वाग्रह: सजावटी कला में महिलाओं की भागीदारी अधिक थी, जो इसकी कम मान्यता का कारण बन सकता था।
वर्ग पूर्वाग्रह: शिल्पकारों और कारीगरों को कलाकारों से निम्न माना जाता था।
पश्चिमी केंद्रितता: कई संस्कृतियों में यह विभाजन नहीं है।
आधुनिक युग में यह सीमा धुंधली हो रही है। कई कलाकार सजावटी वस्तुएं बना रहे हैं और शिल्पकार “कलाकार” की मान्यता प्राप्त कर रहे हैं।
सजावटी कला का सामाजिक-आर्थिक महत्व
सजावटी कला केवल सौंदर्यात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
आजीविका: लाखों कारीगर और शिल्पकार इस क्षेत्र से जुड़े हैं।
सांस्कृतिक पहचान: पारंपरिक सजावटी कला सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखती है।
निर्यात: हस्तशिल्प निर्यात से विदेशी मुद्रा अर्जित होती है।
पर्यटन: पर्यटक स्थानीय हस्तशिल्प खरीदते हैं।
सामुदायिक विकास: हस्तशिल्प ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में रोजगार प्रदान करते हैं।
संग्रह और संरक्षण
विश्व भर के संग्रहालयों में सजावटी कला के महत्वपूर्ण संग्रह हैं।
विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूज़ियम (लंदन) सजावटी कला का सबसे बड़ा संग्रहालय है।
मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम (न्यूयॉर्क) में विश्व भर की सजावटी कला है।
भारत में राष्ट्रीय हस्तशिल्प और हथकरघा संग्रहालय (नई दिल्ली), क्राफ्ट म्यूज़ियम, और राज्य संग्रहालय महत्वपूर्ण हैं।
पुरानी और नाजुक सजावटी वस्तुओं का संरक्षण विशेष चुनौती है। उचित तापमान, आर्द्रता नियंत्रण और प्रकाश से सुरक्षा आवश्यक है।
निष्कर्ष
सजावटी कला मानव सभ्यता का अभिन्न अंग है। यह हमारे दैनिक जीवन को सुंदर, आरामदायक और अर्थपूर्ण बनाती है। हजारों वर्षों से, विभिन्न संस्कृतियों ने अपनी विशिष्ट सजावटी कला परंपराएं विकसित की हैं जो उनकी पहचान, मूल्य और सौंदर्य दृष्टि को प्रतिबिंबित करती हैं।
आधुनिक युग में, जब मशीन-निर्मित वस्तुएं सर्वव्यापी हैं, हस्तनिर्मित सजावटी कला का मूल्य और बढ़ गया है। यह व्यक्तिगत स्पर्श, अद्वितीयता, और मानवीय कौशल का प्रतिनिधित्व करती है।
सजावटी कला केवल सुंदर वस्तुओं का निर्माण नहीं है – यह परंपरा का संरक्षण, कौशल का हस्तांतरण, सांस्कृतिक पहचान का संरक्षण, और लाखों लोगों की आजीविका है। जैसे-जैसे हम पर्यावरण और स्थिरता के प्रति जागरूक हो रहे हैं, हस्तनिर्मित, स्थानीय रूप से उत्पादित सजावटी कला का महत्व बढ़ेगा।
सजावटी कला हमें याद दिलाती है कि सुंदरता और उपयोगिता एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं, बल्कि पूरक हैं। यह दर्शाती है कि हर रोज़ की वस्तुएं भी कला का माध्यम हो सकती हैं और हमारे जीवन को समृद्ध बना सकती हैं।
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