जसवन्त सिंह | Jaswant Singh

सिख चित्रकारों में जसवन्त सिंह एक सशक्त अतियथार्थवादी चित्रकार के रूप में विख्यात हुए हैं। उनके अग्रज शोभासिंह तथा ठाकुरसिंह प्रति-रूपात्मक आकृतिमूलक चित्रकार थे।

जसवन्त सिंह का जन्म रावलपिण्डी (अब पाकिस्तान) में 1918 में हुआ था। आरम्भ से ही वे प्रकृति का चित्रण जल रंगों में करते थे। उन्होंने पुराने अंग्रेज शिक्षकों से व्यक्ति-चित्रण तथा बंगाल शैली के आचार्यों से टेम्परा चित्रण सीखा तथा लाहौर में बुक कवर डिजाइनर के रूप में कार्य आरम्भ किया। 

वहाँ वे उर्दू साहित्य तथा कविता में हो रहे नये प्रयोगों से प्रभावित हुए। इनके अनुभवों को उन्होंने पुस्तकों के आवरण के डिजाइनों में उतारने का प्रयत्न किया। अक्षर लेखन में प्रयुक्त होने वाले लिपिगत रेखांकन पर अधिकार होने के कारण उन्हें इस कार्य में आशातीत सफलता मिली। वे अद्भुत रूपों का सृजन करने लगे।

जसवन्त सिंह को शास्त्रीय संगीत में भी रूचि थी और उन्होंने अच्छे कलाकारों तथा उस्तादों से संगीत की शिक्षा भी ली। भारत-विभाजन के बाद वे दिल्ली चले आये और कनाट प्लेस की एक पिछली गली में रहने लगे।

जसवन्त सिंह प्रयोग करते-करते अतियथार्थवादी शैली के निकट पहुँच गये हैं। जहाँ उनके स्वप्न साकार हुए हैं। उन्होंने एक-दूसरे को आच्छादित करते, मिश्रित होते अथवा संघर्ष करते रंगों का प्रयोग किया है। 

रागमाला के चित्रण में उन्होंने राजस्थान अथवा पहाड़ी चित्रकारों से भिन्न प्रतीकों का प्रयोग किया है जो अतियथार्थवादी विचित्र रूपों से सम्बन्धित है। प्राचीन रागमाला चित्रों की अपेक्षा वे रूप रागों की संगीतात्मक अनुभूति को अधिक वास्तविकता से प्रकट करते हैं। 

उदाहरणार्थ रागिनी ललित के चित्र में एक उत्तेजित युवती पीले चन्द्रमा को पकड़ने का प्रयत्न कर रही है जो कटे तरबूज की भाँति चित्रित है। विभिन्न बलों के नीले वातावरण में उसके चाँदनी से प्रकाशित उरोज सम्पूर्ण चित्र में से उभर कर चित्र का भाव प्रकट कर रहे हैं। राग भैरव में कंकाल, चट्टानें तथा प्रातःकालीन गुलाबी आभा वाला आकाश चित्रित है जो योगियों द्वारा की जाने वाली कठिन साधनाओं के प्रतीक हैं।

जसवन्त सिंह ने गुरू नानक से सम्बन्धित जो चित्र बनाये हैं वे भी अत्यन्त प्रभावपूर्ण बन पड़े हैं। इनमें गुरू नानक की आन्तरिक आध्यात्मिक शक्ति तथा धार्मिक भावना का बहुत सुन्दर चित्रण हुआ है। उन्होंने गुरु नानक के भक्त, परमानन्द में डूबे साधक तथा प्रेम के प्रचारक सन्त आदि अनेक रूप अंकित किये हैं।

उनके अति- यथार्थवादी चित्रों में एक डरावनापन भी है जैसे कि भारी नितम्ब जो स्तनों जैसे लगते हैं, समय के प्रहार से क्षीण होती चट्टानें, दीवानगी लिये नेत्र, सूखे वृक्ष, सुन्दरता और विनाश के उपकरण, लम्बी फैली बाहें, कददू में से झाँकती आँख, तथा बनावटी चेहरे आदि।

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