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पी० टी० रेड्डी | P. T. Reddy

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पी० टी० रेड्डी | P. T. Reddy

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पाकल तिरूमल रेड्डी का जन्म हैदराबाद (दक्षिण) से लगभग 108 मील दूर अन्नारम ग्राम में 15 जनवरी 1915 को हुआ था। बारह वर्ष की आयु में आपकी माता तथा अठाईस वर्ष की आयु में पिता का देहान्त हो गया। वे केवल मैट्रिक तक पढ़ पाये किन्तु शैशव से ही उन्हें चित्रांकन का शौक था। उनके ...

पाकल तिरूमल रेड्डी का जन्म हैदराबाद (दक्षिण) से लगभग 108 मील दूर अन्नारम ग्राम में 15 जनवरी 1915 को हुआ था। बारह वर्ष की आयु में आपकी माता तथा अठाईस वर्ष की आयु में पिता का देहान्त हो गया। वे केवल मैट्रिक तक पढ़ पाये किन्तु शैशव से ही उन्हें चित्रांकन का शौक था। उनके पिता को यह अच्छा नहीं लगता था। 

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स्कूली शिक्षा के समय ही उन्होंने अपनी शिक्षा संस्था के संस्थापक का एक सुन्दर पेंसिल स्केच बनाया था जिसके कारण संस्था ने उन्हें बम्बई के सर जे०जे० स्कूल ऑफ आर्ट में कला की शिक्षा प्राप्त करने हेतु। 

छात्रवृत्ति प्रदान की । 1935 में वे बम्बई पहुँचे जहाँ तत्कालीन प्रिंसिपल श्री जेरार्ड ने उनकी प्रतिभा को पहचान लिया। 1940 की डिप्लोमा परीक्षा में रेड्डी सर्वप्रथम रहे और उन्हें भित्ति-चित्रण कृति पर एक हजार रूपये का पुरस्कार प्राप्त हुआ । 

1942 में उन्होंने वहाँ अपनी कला शिक्षा समाप्त की और दो वर्ष तक अथक परिश्रम के द्वारा स्वयंको एक कलाकार के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया। 1946 में वे लाहौर के फिल्म स्टूडियो व्यवसाय में कला निर्देशन करने लगे किन्तु 1947 में विभाजन के पश्चात् हैदराबाद चले आये। 

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हैदराबाद में उन्होंने घरेलू उपकरण सज्जा का कार्य आरम्भ किया। किन्तु 1949 में उनका व्यवसाय ठप्प हो गया, उनके पुत्र की मृत्यु हो और उनके पिता ने उन्हें आर्थिक सहायता देने से मना कर दिया। किन्तु ये अपूर्व साहस के साथ अपने मार्ग पर बढ़ते गये। 1956 तक उन्होंने व्यावसायिक औद्योगिक कला का कार्य किया और अपने चित्रों की प्रदर्शनियों भी पुनः आरम्भ की।

पी०टी० रेड्डी की आरम्भ में अपनी कोई शैली नहीं थी। पश्चिम की अकादमी पद्धति की कला में उन्होंने रूचि नहीं ली। उन्होंने प्राचीन और मध्यकालीन भारतीय कला-अजन्ता, मुगल, राजपूत तथा बाजार पेण्टिंग की खूब नकल की । 

उस समय वे रेखांकन में निपुणता प्राप्त करना चाहते थे वे अजन्ता, लघु चित्रों तथा लोक कला से विशेष प्रभावित हुए। उसके बाद ही उन्होंने अपनी कला में विभिन्न शैलियों का समन्वय किया। प्रभावोत्तरवादी कला, विशेष रूप से पिकासो का उन पर बहुत प्रभाव है। 

अमूर्त कला में वे कान्दिन्स्की से प्रभावित है। उनके अनुसार अमूर्त-कला प्रकृति के अधिक निकट है। उन्होंने यूरोपीय कलाकार वान गॉग को अपना गुरू माना है। वान गॉग के ओजपूर्ण तूलिकाघातों, बलों तथा रंगों की उन्होंने बहुत प्रशंसा की है। भारतीय कलाकारों में वे रवीन्द्रनाथ ठाकुर, शैलोज मुखर्जी तथा अमृता शेरगिल को महत्वपूर्ण मानते हैं।

पी०टी० रेड्डी के चित्रों में धार्मिक तथा लोक कला की आकृतियों का समावेश और संयोजन कुछ इस प्रकार से हुआ है कि वे तान्त्रिक जैसी लगती है। उनकी कला में अतियथार्थवाद की ध्वनि है। 

वे अत्यन्त कल्पनाशील है और पर्याप्त प्रभावशाली हैं। उनके विषय कुण्ठा-रहित तथा स्पष्ट होते हैं। वे अपनी कला-शैली तथा तकनीक में निरन्तर प्रयोगशील रहे हैं।

प्रेरणादायी चन्द्रमा, प्रत्यय और सत्य आदि उनके ऐसे चित्र हैं जो तंत्र से प्रभावित लगते हैं।

नवम्बर 1990 में आयोजित प्रदर्शनी में उन्होंने शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि शीर्षकों के साथ तांत्रिक कला-कृतियाँ रखी थीं। उनके विचार से देवता अथवा ईश्वर का अर्थ है सूर्य तथा पृथ्वी। ये सृष्टिकारक अथवा संहारक दोनों रूपों में हो सकते हैं। 

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इनका चित्रण प्रतीकात्मक हुआ है किन्तु उन्होंने मानवाकृतियों का प्रयोग भी किया है। उन्होंने तान्त्रिक दर्शन को अपने प्रतीकों द्वारा प्रस्तुत किया है।

1978 में भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग ने उन्हें दो वर्ष की एक छात्रवृत्ति तान्त्रिक रूपों पर शोध करने के लिये दी थी। 1980 में वे ललित कला अकादमी नई दिल्ली के चेयरमैन चुने गये। 1981 में आन्ध्र प्रदेश सरकार ने उन्हें आजीवन राज्य के आस्थान चित्रकार (प्रदेश के राजकीय स्थायी चित्रकार) के पद पर नियुक्त कर दिया है।

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