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सुधीर रंजन खास्तगीर | Sudhir Ranjan Khastgir

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सुधीर रंजन खास्तगीर | Sudhir Ranjan Khastgir

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सुधीर रंजन खास्तगीर का जन्म 24 सितम्बर 1907 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता श्री सत्यरंजन खास्तगीर छत्ताग्राम (आधुनिक चटगाँव) के निवासी थे और कलकत्ता में इंजीनियर थे।  सुधीर जब छः वर्ष के थे, उनके पिता का स्थानान्तरण छत्ताग्राम के लिय श्री सत्यरंजन खस्तगीर छत्ताग्राम ( आधुनिक चटगाँव) के निवासी थे और कलकत्ता में ...

सुधीर रंजन खास्तगीर का जन्म 24 सितम्बर 1907 को कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता श्री सत्यरंजन खास्तगीर छत्ताग्राम (आधुनिक चटगाँव) के निवासी थे और कलकत्ता में इंजीनियर थे। 

सुधीर जब छः वर्ष के थे, उनके पिता का स्थानान्तरण छत्ताग्राम के लिय श्री सत्यरंजन खस्तगीर छत्ताग्राम ( आधुनिक चटगाँव) के निवासी थे और कलकत्ता में इंजीनियर थे । 

सुधीर जब छः वर्ष के थे, उनके पिता का स्थानान्तरण छत्ताग्राम के लिए हो गया । वहाँ सुधीर को अपने पूर्वजों की जन्मभूमि के प्राकृतिक सौन्दर्य के दर्शन करने का अवसर मिला । 

वहां वे ‘काटेज’ में रहते थे जिसके सामने एक छोटी पहाडी थी । उस पर एक चर्च था और उसके पीछे कब्रिस्तान । 

सुधीर वहां मूर्तियां आदि देखने चले जाया करते थे । कुछ मूर्तियां उन्हें आकर्षित भी करती थीं। अपने भाई-बहिनों में सुधीर सबसे छोटे थे। उन्हें एक बालिका विद्यालय में प्रवेश दिला दिया गया जो उनके पूर्वजों ने स्थापित किया था । 

उनके पूर्वजों को मुगलों ने “खास्तगीर” ( हिन्दू वैद्य ) की पदवी दी थी । ब्रहा समाज की अनुयायिनी माता तथा गांव के सुन्दर प्राकृतिक वातावरण की खास्तगीर पर अमिट छाप पड़ी । 

बिहार में उनके पिता ने एक प्लाट खरीद लिया था गिरिडीह में । वहीं वे एक बंगला बना कर रहने लगे। निकट ही पहाड़ियाँ तथा नदी थी । 

सुधीर उनकी सैर करने निकल जाते और नदी किनारे बाँसुरी बजाया करते। उन्हें एक हाई स्कूल में भी प्रवेश दिला दिया गया किन्तु पढ़ाई के बजाय घूमने फिरने तथा चित्रकारी में उनका मन लगने लगा। 

वे छोटी छोटी कहानियाँ और कविताएँ भी लिखने लगे। 1925 में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करके उन्हें कलकत्ता में शिक्षा के लिए भेजा गया। अवकाश के समय वे शान्ति निकेतन के कला भवन में भी जाने लगे । 

इण्टर की परीक्षा के कुछ दिन पूर्व उन्हें क्रान्तिकारी समझ कर कलकत्ता की पुलिस ने उनसे गहरी पूछताछ की उन्हें इससे मानसिक आघात पहुंचा और उनका मन वहां से उखड़ गया । 

उस समय भारत भ्रमण करते हुए तीन गुजराती विद्यार्थी कलकत्ता आये हुए थे। सुधीर उनके साथ चल दिये। उन्होंने मार्ग में पिताजी को पत्र भी लिखा। 

पिता ने उत्तर भेजा कि शान्ति निकेतन लौट आओ और पढ़ाई पूरी करो। उसके पश्चात् स्वंय आत्म निर्भर बनो। 

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सुधीर, आगरा, अहमदाबाद, नडियाद, बड़ौदा, अजन्ता, ऐलौरा आदि का भ्रमण करके पुनः शान्ति निकेतन लौट गये और नन्दलाल बसु के शिष्यत्व में कला का अध्ययन करने लगे। वहीं उन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विनोद बिहारी मुखर्जी तथा रामकिंकर का भी सान्निध्य प्राप्त हुआ । 

ब्रह्म समाजी होने के कारण वे एकेश्वरवादी थे अतः नन्द बाबू ने उन्हें भारतीय देवी-देवताओं के विषय में विस्तृत रूप से समझाया।

शान्ति निकेतन में अध्ययन पूर्ण करने के उपरान्त सुधीर ने छात्रवृत्ति के सहारे माडलिंग तथा कांस्य ढलाई की शिक्षा हेतु इंग्लैण्ड जाने का विचार किया अतः वे अवनीन्द्रनाथ ठाकुर से मिलने जोरासांको गये । 

अवनी बाबू उनके अध्ययन से तो सन्तुष्ट हुए पर विदेश जाने के पूर्व अपने ही देश के कला वैभव को समझने के लिए महाबलीपुरम्, कोणार्क तथा एलीफेण्टा आदि की कला के मर्म को समझने का परामर्श दिया । 

1930 में सुधीर दक्षिण भारत तथा लंका की यात्रा पर निकल पड़े । अन्त में वे बम्बई पहुँचे । यहाँ अपनी कृतियाँ धनिकों के घर जा-जाकर बेचने का प्रयत्न किया पर यह उन्हें अच्छा न लगा । 

सिंधिया स्कूल ग्वालियर में कला शिक्षक के एक रिक्त स्थान का विज्ञापन देख कर उन्होंने आवेदन किया और ग्वालियर में कला-शिक्षक नियुक्त हो गये 1933 से 1936 तक वहां कार्य करने पश्चात् उन्हे ‘दून के कला विद्यालय में बुला लिया गया। 

वहाँ उन्होंने भारतीय पद्धति से कला की शिक्षा देना आरम्भ किया । 1937 में एक वर्ष का अवकाश लेकर वे यूरोप के भ्रमण के लिए निकल पड़े और पेरिस, इटली ऑस्ट्रिया, जर्मनी तथा इंग्लैण्ड के कला-संग्रहालयों का अवलोकन किया एवं अनेक कलाकारों तथा कलाविदों से मिले ये इंग्लैण्ड में एरिक गिल तथा आनन्द कुमारस्वामी से भी मिले और वहाँ कांस्य ढलाई का कार्य भी सीखा।

इंग्लैण्ड से लौट कर सुधीर रंजन पुनः दून स्कूल पहुंचे। दून में कांसे की मूर्तियां ढालना सम्भव नहीं था अतः वे सीमेंट तथा प्लास्टर के मॉडल बनाने लगे । 

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1947 तक वे देहरादून तथा मसूरी में इनके लिए विख्यात हो गये। उनकी कृतियां खरीदने के लिए होड़ लग गई। वहां उन्होंने 1955 तक कार्य किया। इसी अवधि में सन् 1950 में भारत सरकार ने उन्हें ” पद्मश्री’ की उपाधि से विभूषित किया ।

1956 में वे राजकीय कला तथा शिल्प महाविद्यालय लखनऊ में प्रधानाचार्य पद के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा आमंत्रित किये गये । 

उनके यहां आने के पश्चात् उनके अधीन रह कर मदनलाल नागर, रणवीर सिंह विष्ट तथा अवतार सिंह पंवार जैसे कलाकार उभरे। वे कला-आन्दोलन के एक प्रिय नेता के रूप में आये और उन्होंने पर्याप्त शासकीय सहयोग भी प्राप्त किया । 

1960 में लखनऊ में गोमती नदी में जो विनाशकारी बाढ़ आयी उसमें इस महाविद्यालय की अधिकांश कलाकृतियां नष्ट हो गयीं। इससे उनके मन को बहुत क्षोभ हुआ और वे बीपार रहने लगे ।

1961 के पश्चात् ये एकान्त में रहने लगे। उन्होंने लोगों विशेष कर नवीन आगुन्तकों से मिलना जुलना बंद कर दिया। 

कुछ समय के उपरान्त वे शान्ति-निकेतन चले गये और वहां एकान्त जीवन बिताने लगे 1964 में उन्हें कला भवन के प्रधानाचार्य का पद सम्हालने को कहा गया किन्तु उन्होंने अस्वीकार कर दिया । 

शान्ति निकेतन में ही 27 मई 1974 को उनका निधन हुआ ।

खास्तगीर के चित्र जीवन के हर्षोल्लास के पक्ष से सम्बन्धित है । उन्हें लोक जीवन का चित्रकार भी कहा गया है। 

उनके चित्रों में बान गाँग की भांति तूलिकाघातों का प्रयोग लयात्मक विधि से हुआ है जिससे चित्रों में अपूर्व गतिशीलता का अनुभव होता है । 

उन्होंने तैल, जल, पेस्टल तथा पोस्टर सभी प्रकार के माध्यमों में कार्य किया है माँ और शिशु उनकी उत्कृष्ट कृतियों में से है । अन्य प्रसिद्ध चित्र हैं नग्ना, लय, नृत्यमत्ता, गुरूदेव, बापू आदि । 

उनके ऋतुओं से सम्बन्धित तथा मानसिक भावनाओं के साकार चित्र अपनी विशिष्टता के लिए अभिनन्दित हो चुके हैं।

सुधीर खास्तगीर की कला में जीवन का यथार्थ मिलता है जैसे वृद्ध, माँ, नर्तकी, पूजा, यात्रा, तालाब से वापसी, तूफान में यात्रा, अधिक अन्न उपजाओ आदि । 

“तूफान में यात्रा” आधुनिक अणु बम की विभीषिका से लड़ने वाले शान्ति दूत कपोत की प्रतीक है । श्रमिकों और जन-साधारण से ही उनकी कला के विषय जुड़े रहे हैं ।

स्वतन्त्रता के बाद उन्होंने नई दिशाएं अपनायीं। वे अनवरत रूप से चित्रांकन, सीमेंट माडलिंग आदि का कार्य करते रहे थे नर्तकी बालाएं, संथाल स्त्रियां तथा पलाश के फूल बार – बार उनके चित्र फलकों पर उभरे हैं। 

उनका एक विशेष विषय कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुर की मुखाकृति थी जिसको उन्होंने बार-बार अंकित किया है।

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