खजुराहो मंदिरों की कला, वास्तुकला, इतिहास और मूर्तिकला की संपूर्ण जानकारी। चंदेल वंश द्वारा निर्मित इन UNESCO विश्व धरोहर मंदिरों के बारे में विस्तार से जानें — नागर शैली, मिथुन मूर्तियाँ, प्रमुख मंदिर और दार्शनिक महत्व।
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खजुराहो मंदिर — कला और वास्तुकला
प्रस्तावना
भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ पत्थर भी बोलते हैं, जहाँ शिला भी संगीत गाती है और जहाँ मंदिरों की दीवारें किसी महाकाव्य से कम नहीं होतीं। इसी भूमि के हृदय में, मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में, एक ऐसा स्थान है जो सदियों से विद्वानों, कलाप्रेमियों, दार्शनिकों और यात्रियों को अपनी ओर आकर्षित करता रहा है — वह स्थान है खजुराहो। खजुराहो के मंदिर केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि वे भारतीय सभ्यता की उस परिपक्वता के प्रतीक हैं जिसमें आत्मा और शरीर, भक्ति और सौंदर्य, धर्म और जीवन — सभी को समान दृष्टि से देखा गया।
खजुराहो के मंदिर-समूह को वर्ष 1986 में UNESCO ने विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि खजुराहो की कला और वास्तुकला केवल भारत की नहीं, बल्कि समस्त मानव जाति की अमूल्य धरोहर है। यहाँ के मंदिरों में उकेरी गई मूर्तियाँ, उनकी भव्य शिखर-रचना, उनका गणितीय अनुपात और उनमें निहित दार्शनिक गहराई — ये सब मिलकर खजुराहो को विश्व की महानतम कलात्मक उपलब्धियों में से एक बनाते हैं।
इस लेख का उद्देश्य खजुराहो के मंदिरों की कला और वास्तुकला को उसकी पूर्ण गहराई में समझना है — उनके इतिहास से लेकर उनकी शिल्पकला तक, उनकी संरचना से लेकर उनके दार्शनिक अर्थ तक। यह लेख उन सभी जिज्ञासु मनों के लिए है जो खजुराहो को केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अनुभव के रूप में जानना चाहते हैं।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
खजुराहो के मंदिरों की कहानी चंदेल वंश की कहानी है। चंदेल राजपूत शासकों ने मध्य भारत के बुंदेलखंड क्षेत्र में लगभग नौवीं शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक शासन किया। इतिहास में वर्णन मिलता है कि चंदेल वंश की उत्पत्ति चंद्रमा से हुई थी — इसीलिए इन्हें चंद्रवंशी भी कहा जाता है। इस वंश के संस्थापक चंद्रवर्मन माने जाते हैं, किंतु इस वंश को वास्तविक शक्ति और प्रतिष्ठा दिलाने वाले राजा यशोवर्मन थे, जिन्होंने दसवीं शताब्दी के प्रारंभ में अपनी राजधानी खजुराहो में स्थापित की।
चंदेल शासकों ने खजुराहो में मंदिर-निर्माण की जो परंपरा आरंभ की, वह लगभग एक शताब्दी तक जारी रही। इतिहासकारों के अनुसार खजुराहो के अधिकांश मंदिरों का निर्माण 950 ईसवी से 1050 ईसवी के बीच हुआ। इस काल को चंदेल वंश का स्वर्णकाल कहा जाता है। राजा धंगदेव, गंडदेव, विद्याधर और यशोवर्मन जैसे शक्तिशाली शासकों के संरक्षण में यहाँ 85 से अधिक मंदिरों का निर्माण किया गया। आज इनमें से केवल 25 मंदिर ही सुरक्षित अवस्था में बचे हैं, शेष समय की मार और आक्रमणों के कारण नष्ट हो गए।
खजुराहो का नाम खजूर के वृक्षों से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में इस नगर में खजूर के वृक्षों की बहुतायत थी, इसीलिए इसे खजूरपुरा या खर्जुरवाहक कहा जाता था, जो कालांतर में खजुराहो बन गया। यह नगर उस समय व्यापार और धर्म का एक महत्वपूर्ण केंद्र था।
ग्यारहवीं शताब्दी के अंत और बारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में जब मुस्लिम आक्रांताओं का भारत पर आक्रमण बढ़ा, तो चंदेल वंश की शक्ति क्षीण होने लगी। 1203 ईसवी में कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस क्षेत्र पर आक्रमण किया और कई मंदिरों को क्षति पहुँचाई। धीरे-धीरे यह नगर जंगलों में खो गया और इसकी स्मृति केवल स्थानीय लोगों तक सीमित रह गई।
खजुराहो को विश्व के सामने लाने का श्रेय ब्रिटिश सेना के इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट को जाता है। सन् 1838 में जब वे इस क्षेत्र से गुजर रहे थे, तो स्थानीय लोगों से उन्हें इन मंदिरों की जानकारी मिली। घने जंगलों को पार करके जब वे इन मंदिरों तक पहुँचे, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने इन मंदिरों का विस्तृत विवरण एशियाटिक सोसायटी को भेजा और इस प्रकार खजुराहो एक बार फिर दुनिया के नक्शे पर आया।
भौगोलिक और सांस्कृतिक संदर्भ
खजुराहो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित है और यह झाँसी से लगभग 175 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व में है। यह क्षेत्र विंध्य पर्वत श्रृंखला की तलहटी में बसा हुआ है और यहाँ का परिदृश्य अत्यंत मनोरम है। चारों ओर से हरियाली और पर्वत-श्रृंखलाओं से घिरे इस स्थान को प्राचीन काल में एक पवित्र तीर्थ के रूप में मान्यता प्राप्त थी।
उस युग की सामाजिक और धार्मिक पृष्ठभूमि को समझे बिना खजुराहो की कला को पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दी का भारत धार्मिक विविधता और दार्शनिक उत्कर्ष का काल था। शैव, वैष्णव, शाक्त और जैन — सभी धाराएँ एक साथ प्रवाहित हो रही थीं। तंत्र का प्रभाव भी इस काल में अत्यंत व्यापक था। चंदेल शासक मुख्यतः शैव थे, अर्थात वे भगवान शिव के उपासक थे, किंतु उन्होंने वैष्णव और जैन मंदिरों के निर्माण में भी उदारता दिखाई।
तंत्र-शास्त्र की परंपरा में ब्रह्मांड की सृजन-शक्ति को स्त्री और पुरुष के मिलन के प्रतीक से व्यक्त किया जाता है। यही कारण है कि खजुराहो के मंदिरों की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियाँ इतनी प्रमुखता से उकेरी गई हैं। ये मूर्तियाँ केवल शारीरिक आकर्षण का चित्रण नहीं हैं, बल्कि इनमें एक गहरा आध्यात्मिक और दार्शनिक संदेश निहित है, जिसकी विवेचना हम आगे करेंगे।
उस काल में कला को धर्म से अलग नहीं देखा जाता था। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं था, वह समाज का सांस्कृतिक केंद्र था — जहाँ शिक्षा, संगीत, नृत्य, दर्शन और कला सभी का समागम होता था। मंदिर की दीवारें एक प्रकार से उस समाज का दर्पण थीं जो जीवन को उसकी संपूर्णता में देखता था।
मंदिरों का वर्गीकरण
खजुराहो के मंदिरों को मुख्यतः तीन समूहों में विभाजित किया जाता है — पश्चिमी समूह, पूर्वी समूह और दक्षिणी समूह। यह वर्गीकरण मंदिरों की भौगोलिक स्थिति के आधार पर किया गया है।
पश्चिमी समूह खजुराहो का सबसे भव्य और सर्वाधिक महत्वपूर्ण समूह है। इसमें कंदरिया महादेव, लक्ष्मण मंदिर, विश्वनाथ मंदिर, चित्रगुप्त मंदिर, देवी जगदंबा मंदिर और मातंगेश्वर मंदिर सम्मिलित हैं। ये सभी मंदिर एक सुव्यवस्थित उद्यान के भीतर स्थित हैं और इनकी देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा की जाती है। यहाँ प्रत्येक संध्या एक भव्य ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम (Sound and Light Show) आयोजित किया जाता है जो पर्यटकों के बीच अत्यंत लोकप्रिय है।
पूर्वी समूह में हिंदू और जैन दोनों प्रकार के मंदिर सम्मिलित हैं। इस समूह में पार्श्वनाथ मंदिर, आदिनाथ मंदिर, घंटाई मंदिर, वामन मंदिर और जावरी मंदिर प्रमुख हैं। पार्श्वनाथ मंदिर जैन मंदिरों में सबसे विशाल और कलात्मक है। इस समूह के मंदिर खजुराहो के पुराने गाँव के निकट स्थित हैं।
दक्षिणी समूह में मुख्यतः दो मंदिर हैं — दूल्हादेव मंदिर और चतुर्भुज मंदिर। दूल्हादेव मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और यह चंदेल शासकों द्वारा निर्मित अंतिम मंदिरों में से एक है। चतुर्भुज मंदिर में भगवान विष्णु की एक भव्य चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है।
इन तीनों समूहों के मंदिर मिलकर एक ऐसी कलात्मक और धार्मिक एकता प्रस्तुत करते हैं जो खजुराहो को विश्व में अद्वितीय बनाती है। यह तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण है कि हिंदू और जैन मंदिर एक ही स्थान पर इतनी निकटता से स्थित हैं, जो उस युग की धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक उदारता का प्रमाण है।
वास्तुकला शैली
खजुराहो के मंदिर नागर शैली की वास्तुकला के सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं। नागर शैली उत्तर भारतीय मंदिर वास्तुकला की प्रधान शैली है और इसे इसके ऊँचे, वक्ररेखीय शिखर से पहचाना जाता है। खजुराहो के मंदिरों ने नागर शैली को एक नई ऊँचाई और परिपक्वता दी।
शिखर खजुराहो की वास्तुकला का सबसे आकर्षक तत्व है। यहाँ के मंदिरों का शिखर एक सीधी रेखा में न उठकर अनेक छोटे-छोटे उरुशृंगों (subsidiary spires) से मिलकर बना है। ये छोटे-छोटे शिखर एक के ऊपर एक लगे हुए पर्वत-शृंखला का आभास देते हैं। कंदरिया महादेव मंदिर का शिखर लगभग 31 मीटर ऊँचा है और इसमें 84 उरुशृंग हैं। इस शिखर को देखते समय सहज ही मेरु पर्वत की अनुभूति होती है — जो हिंदू ब्रह्मांड-विज्ञान में सृष्टि का केंद्र है।
पंचायतन योजना खजुराहो के कुछ प्रमुख मंदिरों में देखने को मिलती है। इस योजना में मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बनाए जाते हैं। इससे संपूर्ण मंदिर-परिसर एक पवित्र मंडल का रूप धारण कर लेता है।
मंदिर की मूल संरचना में कई भाग होते हैं। सबसे नीचे अधिष्ठान या जगती होती है — एक ऊँचा चबूतरा जिस पर संपूर्ण मंदिर खड़ा है। यह चबूतरा केवल संरचनात्मक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि इसकी बाहरी दीवारों पर भी विस्तृत मूर्तिकला उकेरी गई है। जगती के ऊपर वेदिबंध होता है जो मंदिर की दीवारों का आधार है। इसके ऊपर जंघा होती है — यह वह भाग है जहाँ मंदिर की प्रमुख मूर्तिकला स्थित होती है। जंघा के ऊपर वरंडिका और फिर शिखर आता है।
मंदिर के भीतरी भागों में गर्भगृह सबसे पवित्र स्थान है जहाँ देवता की मूल प्रतिमा स्थापित होती है। गर्भगृह के सामने अंतराल होता है जो गर्भगृह और मंडप को जोड़ता है। मंडप वह बड़ा कक्ष है जहाँ श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। कुछ मंदिरों में मंडप के सामने अर्धमंडप भी होता है जो मंदिर के प्रवेश द्वार का काम करता है।
खजुराहो की वास्तुकला की एक और अद्भुत विशेषता है प्रकाश और छाया का नियोजन। मूर्तियों को इस प्रकार उकेरा गया है कि दिन के अलग-अलग समय में सूर्य की रोशनी उन पर अलग-अलग प्रकार से पड़ती है और वे जीवंत प्रतीत होती हैं। यह उस काल के शिल्पियों की उस असाधारण दक्षता का प्रमाण है जो केवल तकनीकी ज्ञान से नहीं, बल्कि गहरी सौंदर्य-चेतना से उत्पन्न होती है।
मंदिरों की दीवारें सपाट नहीं हैं। उनमें बाहर की ओर उभरे हुए और अंदर की ओर धँसे हुए अनेक रथ (projections and recesses) हैं। इन रथों के कारण दीवार पर प्राकृतिक रूप से छाया और प्रकाश का एक जटिल खेल उत्पन्न होता है जो मूर्तिकला को और भी जीवंत बना देता है।
प्रमुख मंदिरों का विस्तृत विवरण
कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो का सबसे विशाल, सबसे भव्य और सर्वाधिक कलापूर्ण मंदिर है। यह भगवान शिव को समर्पित है और इसका निर्माण लगभग 1025-1050 ईसवी के बीच हुआ। इस मंदिर की ऊँचाई लगभग 31 मीटर है और इसमें 900 से अधिक मूर्तियाँ हैं। मंदिर का शिखर अनेक उरुशृंगों से मिलकर बना है जो देखने में मेरु पर्वत की भाँति लगता है। इस मंदिर की अंदरूनी छत पर की गई नक्काशी अत्यंत जटिल और सुंदर है। गर्भगृह में एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। इस मंदिर की बाहरी दीवारों पर तीन पट्टियों में मूर्तियाँ उकेरी गई हैं जिनमें देवी-देवता, अप्सराएँ, व्याल और मिथुन मूर्तियाँ सम्मिलित हैं।
लक्ष्मण मंदिर खजुराहो के सबसे प्राचीन और सुरक्षित मंदिरों में से एक है। इसका निर्माण राजा यशोवर्मन ने 930-950 ईसवी के बीच किया था। यह मंदिर भगवान विष्णु के वैकुंठ रूप को समर्पित है। लक्ष्मण मंदिर एकमात्र ऐसा मंदिर है जो पंचायतन योजना पर आधारित है — अर्थात इसके चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बने हैं। इस मंदिर में एक अभिलेख (शिलालेख) प्राप्त हुआ है जिससे इसके निर्माण काल की पुष्टि होती है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर सप्त-शाखाएँ हैं और गर्भगृह के द्वार पर देवी-देवताओं की सुंदर मूर्तियाँ अंकित हैं।
चित्रगुप्त मंदिर भगवान सूर्य को समर्पित है, जो खजुराहो में एकमात्र सूर्य मंदिर है। इसका निर्माण लगभग 1000-1025 ईसवी के बीच हुआ। इस मंदिर में सूर्य देवता की एक भव्य प्रतिमा है जिसमें वे सात घोड़ों के रथ पर सवार हैं। इस मंदिर की दीवारों पर शिकार और युद्ध के दृश्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ ग्यारह सिर वाले विष्णु की एक दुर्लभ प्रतिमा भी है।
देवी जगदंबा मंदिर मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित था, किंतु बाद में इसमें देवी पार्वती की मूर्ति स्थापित हो गई और तब से यह देवी जगदंबा मंदिर कहलाने लगा। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसकी बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियों की संख्या और विविधता अत्यंत उल्लेखनीय है।
विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव को समर्पित है और इसका निर्माण राजा धंगदेव ने 999 ईसवी में किया था। इस मंदिर में एक शिलालेख है जिसमें राजा धंगदेव की प्रशस्ति का वर्णन है। इस मंदिर के सामने नंदी मंडप है जिसमें भगवान शिव के वाहन नंदी की एक विशाल प्रतिमा है। विश्वनाथ मंदिर की दीवारों पर अप्सराओं की प्रतिमाएँ विशेष रूप से सुंदर हैं — उनके केश-विन्यास, आभूषण और भाव-भंगिमा इतनी सजीव हैं कि लगता है मानो वे अभी-अभी जीवंत हो उठेंगी।
पार्श्वनाथ मंदिर खजुराहो के जैन मंदिरों में सबसे विशाल और सबसे कलापूर्ण है। यह 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ को समर्पित है और इसका निर्माण लगभग 950-970 ईसवी के बीच हुआ। इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसकी दीवारों पर हिंदू देवी-देवताओं की भी मूर्तियाँ उकेरी गई हैं जो उस युग की धार्मिक एकता को दर्शाती है। इस मंदिर में एक सुंदर अभिलेख भी प्राप्त हुआ है।
मूर्तिकला और शिल्पकला
खजुराहो की मूर्तिकला भारतीय शिल्प-परंपरा की सर्वोच्च उपलब्धि मानी जाती है। यहाँ की प्रत्येक मूर्ति में इतनी सजीवता, इतनी कोमलता और इतनी भावाभिव्यक्ति है कि दर्शक अपलक उसे निहारता रह जाता है। यहाँ की मूर्तियाँ मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में विभाजित की जा सकती हैं।
देवी-देवता की मूर्तियाँ गर्भगृह के भीतर और मंदिर की मध्य पट्टी पर स्थापित हैं। शिव, विष्णु, ब्रह्मा, इंद्र, सरस्वती, लक्ष्मी और अनेक अन्य देवी-देवताओं की भव्य प्रतिमाएँ यहाँ देखने को मिलती हैं। इन प्रतिमाओं में दिव्यता और गरिमा का अद्भुत संतुलन है।
अप्सराएँ और सुर-सुंदरियाँ खजुराहो की मूर्तिकला की सबसे मनोहारी श्रेणी हैं। इन्हें शलभंजिकाएँ भी कहा जाता है। ये नारी-प्रतिमाएँ अपनी अलौकिक सुंदरता के लिए विश्वप्रसिद्ध हैं। कोई अप्सरा दर्पण में अपना प्रतिबिंब देख रही है, कोई अपने केशों में फूल सजा रही है, कोई वीणा बजा रही है, कोई नृत्य की मुद्रा में है और कोई अपने पाँव से काँटा निकाल रही है। इन मूर्तियों में नारी-सौंदर्य का इतना सजीव और कलात्मक चित्रण है कि पाश्चात्य विद्वानों ने इन्हें भारत की Mona Lisa कहा है।
इन नारी-प्रतिमाओं के शरीर का अनुपात आदर्श माना जाता है — पतली कमर, भरे हुए कूल्हे और उरोज, दीर्घ नेत्र और उन्नत मस्तक। उनके आभूषण — कर्णफूल, हार, कंगन, मेखला और नूपुर — इतने सूक्ष्मता से उकेरे गए हैं कि उनकी एक-एक कड़ी स्पष्ट दिखती है। उनके केश-विन्यास की विविधता देखकर आश्चर्य होता है — उस काल में स्त्रियाँ कितने प्रकार से अपने बाल सँवारती थीं, इसकी झलक इन मूर्तियों से मिलती है।
मिथुन मूर्तियाँ खजुराहो का वह पहलू हैं जो सबसे अधिक चर्चा का विषय रही हैं और जिनके बारे में सबसे अधिक जिज्ञासा और भ्रांतियाँ रही हैं। इनकी विवेचना अगले अनुभाग में विस्तार से की जाएगी।
इनके अतिरिक्त मंदिरों की दीवारों पर दैनिक जीवन के अनेक दृश्य भी उकेरे गए हैं। शिकार के दृश्य, युद्ध के दृश्य, संगीत और नृत्य के दृश्य, विद्यार्थी और गुरु के दृश्य, बाजार के दृश्य — ये सभी उस काल के जीवन का एक जीवंत चित्र प्रस्तुत करते हैं। हाथी, घोड़े, सिंह, व्याल (मिथकीय पशु) और अन्य जीव-जंतुओं की मूर्तियाँ भी यहाँ प्रचुर मात्रा में हैं।
शिल्पकारों की तकनीक की दृष्टि से खजुराहो की मूर्तियाँ अत्यंत उन्नत हैं। मूर्तियाँ गहरी उभरी हुई (high relief) हैं — कुछ स्थानों पर तो वे लगभग त्रि-आयामी (three-dimensional) प्रतीत होती हैं। शिल्पियों ने पत्थर की प्रत्येक सतह का पूरा उपयोग किया है। मूर्तियों की रेखाएँ प्रवाहमान हैं, उनमें कठोरता नहीं है। प्रत्येक अंग में एक लय है, एक गति है, एक जीवन है।
मिथुन मूर्तियों की व्याख्या
खजुराहो की मिथुन मूर्तियाँ विश्वभर में चर्चित हैं और अनेक विद्वानों ने इनकी अलग-अलग व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं। यह समझना आवश्यक है कि ये मूर्तियाँ मंदिर की बाहरी दीवारों पर हैं, भीतरी गर्भगृह में नहीं। यह तथ्य स्वयं में एक गहरे प्रतीकात्मक अर्थ को समेटे हुए है।
तांत्रिक व्याख्या सबसे अधिक प्रचलित और तर्कसंगत व्याख्या है। तंत्र-शास्त्र में शिव और शक्ति का मिलन सृष्टि की मूल प्रक्रिया का प्रतीक है। पुरुष और स्त्री, चेतना और ऊर्जा — इन दोनों का मिलन ही ब्रह्मांड की सृजनात्मक शक्ति है। मंदिर की बाहरी दीवार पर ये मिथुन मूर्तियाँ इस ब्रह्मांडीय सृजन-शक्ति का प्रतीकात्मक चित्रण हैं। वे दर्शक को यह संदेश देती हैं कि संसार और उसकी समस्त भोग-क्रियाएँ मंदिर के बाहर हैं — भीतर जाने पर आत्मा उस सांसारिकता को त्यागकर परमात्मा में लीन हो जाती है।
पुरुषार्थ की व्याख्या भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारतीय दर्शन में जीवन के चार पुरुषार्थ बताए गए हैं — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। काम अर्थात इच्छाओं की पूर्ति जीवन का एक स्वाभाविक और मान्य अंग है। मंदिर की बाहरी दीवारें धर्म, अर्थ और काम का प्रतिनिधित्व करती हैं, जबकि गर्भगृह मोक्ष का प्रतीक है। इस दृष्टि से मिथुन मूर्तियाँ यह बताती हैं कि मनुष्य को सांसारिक जीवन की समस्त अवस्थाओं से होकर गुजरना है और अंत में मोक्ष की ओर अग्रसर होना है।
कुछ विद्वानों का मत है कि ये मूर्तियाँ वज्रपात से मंदिर की रक्षा के लिए बनाई गई थीं। लोक-विश्वास था कि मिथुन दृश्य देखकर देवी लज्जा से वज्र नहीं गिराएंगी। यद्यपि यह व्याख्या थोड़ी सरलीकृत लगती है, किंतु इसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण व्याख्या यह है कि इन मूर्तियों का उद्देश्य कामशास्त्र का शिक्षण था। उस काल में कामशास्त्र को एक विद्या के रूप में मान्यता प्राप्त थी और वात्स्यायन का कामसूत्र इसी युग की देन है। समाज में काम को एक वर्जित विषय नहीं, बल्कि जीवन का एक स्वाभाविक और अध्ययनीय पहलू माना जाता था।
आधुनिक दृष्टिकोण से देखें तो इन मूर्तियों को भारतीय समाज की उस परिपक्वता और उदारता का प्रमाण माना जा सकता है जो जीवन को उसकी संपूर्णता में स्वीकार करती थी। वह समाज शरीर और आत्मा, पार्थिव और दिव्य — इन दोनों को अलग नहीं देखता था। उसके लिए जीवन का प्रत्येक पहलू पवित्र था और इसीलिए वह मंदिर की दीवारों पर भी अपना स्थान पा सका।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि खजुराहो के कुल मंदिर-क्षेत्र में मिथुन मूर्तियाँ वास्तव में एक अल्पसंख्यक भाग हैं — मात्र दस प्रतिशत के लगभग। शेष नब्बे प्रतिशत मूर्तियाँ देवी-देवता, अप्सराएँ, पशु-पक्षी और दैनिक जीवन के दृश्य हैं। किंतु आधुनिक पर्यटकों का ध्यान अक्सर इसी दस प्रतिशत पर केंद्रित हो जाता है, जो खजुराहो की कला की एक अधूरी समझ का परिणाम है।
निर्माण सामग्री और तकनीक
खजुराहो के मंदिरों के निर्माण में मुख्यतः बलुआ पत्थर (sandstone) का उपयोग किया गया है। यह पत्थर स्थानीय क्षेत्र से ही प्राप्त होता था और इसे मूर्तिकला के लिए अत्यंत उपयुक्त माना जाता था क्योंकि यह अपेक्षाकृत मुलायम होता है और इसमें बारीक नक्काशी संभव है। पत्थर का रंग हल्का गुलाबी से लेकर सुनहरा होता है और सूर्य की रोशनी में यह अत्यंत सुंदर चमकता है।
खजुराहो के मंदिरों की एक असाधारण विशेषता यह है कि इनके निर्माण में चूने या मोर्टार का प्रयोग नहीं किया गया है। पत्थर के विशाल खंडों को एक-दूसरे के ऊपर इस प्रकार रखा गया है कि वे अपने ही भार से स्थिर रहते हैं। इस तकनीक को इंटरलॉकिंग स्टोन तकनीक कहते हैं। इस तकनीक की सफलता इस बात से सिद्ध होती है कि एक हजार वर्ष से अधिक बीत जाने के बाद भी ये मंदिर अडिग खड़े हैं।
मंदिर की नींव से लेकर शिखर तक पत्थर की प्रत्येक परत को सुचारु रूप से संरेखित किया गया है। शिखर के निर्माण में कोर्बेलिंग तकनीक का उपयोग किया गया है — जिसमें प्रत्येक ऊपरी परत थोड़ी-सी आगे की ओर निकलती जाती है, जिससे ऊपर जाते-जाते एक बंद शंकु-आकार बनता है।
मूर्तिकला की तकनीक की दृष्टि से यहाँ के शिल्पी उच्च-उभार (high relief) में काम करते थे। पत्थर की मोटी चादर को पहले मूल आकार दिया जाता था, फिर उस पर बारीक नक्काशी की जाती थी। मूर्ति के एक-एक आभूषण, एक-एक केश-रेखा और एक-एक भाव-भंगिमा को असाधारण कुशलता से उकेरा गया है।
निर्माण की प्रक्रिया के बारे में इतिहासकारों का मानना है कि मंदिर के विभिन्न भागों को पहले जमीन पर बनाया जाता था और फिर उन्हें ऊपर चढ़ाया जाता था। इसके लिए मिट्टी के विशाल ढेरों का उपयोग किया जाता था जो एक प्रकार से अस्थायी मचान का काम करते थे। निर्माण पूरा होने के बाद इस मिट्टी को हटा दिया जाता था।
UNESCO विश्व धरोहर और संरक्षण
खजुराहो के मंदिरों को वर्ष 1986 में UNESCO की विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया गया। यह मान्यता खजुराहो की उत्कृष्ट सार्वभौमिक मूल्यता (Outstanding Universal Value) के आधार पर प्रदान की गई। UNESCO ने खजुराहो को मानव रचनात्मकता की एक असाधारण उपलब्धि माना और इसे भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India — ASI) खजुराहो के मंदिरों की देखरेख और संरक्षण का उत्तरदायित्व निभाता है। ASI ने मंदिरों के चारों ओर सुव्यवस्थित उद्यान बनाए हैं, रात्रि-प्रकाश की व्यवस्था की है और पर्यटकों के लिए अनेक सुविधाएँ जुटाई हैं।
संरक्षण की दृष्टि से खजुराहो के मंदिरों के सामने अनेक चुनौतियाँ भी हैं। बलुआ पत्थर पर वर्षा और नमी का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वायु-प्रदूषण के कारण पत्थर की सतह क्षरित हो रही है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या भी मंदिरों पर दबाव डालती है। इन चुनौतियों से निपटने के लिए ASI नियमित रूप से मंदिरों की सफाई और मरम्मत का कार्य करती है तथा अनेक वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग करके पत्थर को क्षरण से बचाने का प्रयास किया जाता है।
एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि खजुराहो के मंदिरों में आज भी पूजा-अर्चना होती है — विशेषकर मातंगेश्वर मंदिर में, जो पश्चिमी समूह में स्थित है और जहाँ एक विशाल शिवलिंग है। यह मंदिर आज भी एक जीवंत धार्मिक स्थल है।
खजुराहो और पर्यटन
खजुराहो आज भारत के सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थलों में से एक है। प्रतिवर्ष लाखों देशी-विदेशी पर्यटक यहाँ आते हैं। खजुराहो की अपनी हवाई पट्टी है और यह रेलमार्ग और सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है।
खजुराहो नृत्य महोत्सव (Khajuraho Dance Festival) प्रतिवर्ष फरवरी-मार्च के महीने में आयोजित किया जाता है। यह एक सप्ताह तक चलने वाला उत्सव है जिसमें देशभर के प्रख्यात शास्त्रीय नर्तकों और नृत्य-समूहों को आमंत्रित किया जाता है। भरतनाट्यम, कथक, कुचिपुड़ी, ओडिसी और अन्य शास्त्रीय नृत्य-शैलियों का प्रदर्शन खजुराहो के मंदिरों की पृष्ठभूमि में होता है — और यह दृश्य अपने आप में अत्यंत मनोरम होता है। प्राचीन मंदिरों के सामने शास्त्रीय नृत्य का यह संयोजन एक ऐसा अनुभव है जो किसी भी कला-प्रेमी के मन पर अमिट छाप छोड़ता है।
ध्वनि और प्रकाश कार्यक्रम (Sound and Light Show) प्रत्येक संध्या पश्चिमी समूह के मंदिरों के सामने आयोजित होता है। इस कार्यक्रम में खजुराहो का इतिहास, चंदेल वंश का उत्थान और पतन और मंदिरों की पुनर्खोज — इन सभी विषयों को प्रकाश और ध्वनि के माध्यम से नाटकीय रूप से प्रस्तुत किया जाता है। यह कार्यक्रम हिंदी और अंग्रेजी — दोनों भाषाओं में उपलब्ध है।
पर्यटन का खजुराहो और उसके आसपास के क्षेत्र पर आर्थिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण है। होटल, रेस्तराँ, दस्तकारी की दुकानें और परिवहन सेवाएँ — इन सभी के माध्यम से खजुराहो क्षेत्र की एक बड़ी आबादी की जीविका पर्यटन पर निर्भर है। खजुराहो की पत्थर की नक्काशी और हस्तशिल्प वस्तुएँ पर्यटकों में अत्यंत लोकप्रिय हैं।
उपसंहार
खजुराहो के मंदिर केवल पत्थर की इमारतें नहीं हैं। वे उस भारतीय मानस का प्रतिबिंब हैं जो जीवन को उसकी समग्रता में देखता था — जो सुंदर को, शिव को और सत्य को एक ही मानता था। जो देह और आत्मा में, लौकिक और अलौकिक में, भोग और मोक्ष में — किसी विरोध को नहीं देखता था।
खजुराहो के शिल्पियों ने जो निर्माण किया, वह केवल मंदिर नहीं था — वह एक दर्शन था पत्थर में उकेरा हुआ, एक संगीत था संगमरमर में बजता हुआ, एक महाकाव्य था शिला पर लिखा हुआ। इन मंदिरों की दीवारों पर जो अप्सरा दर्पण देख रही है, जो योद्धा युद्ध कर रहा है, जो प्रेमी युगल आलिंगनबद्ध है — ये सभी मिलकर जीवन का एक ऐसा समग्र चित्र प्रस्तुत करते हैं जो किसी और युग में, किसी और स्थान पर शायद ही इतनी निर्भीकता और कुशलता से बनाया गया हो।
एक हजार वर्ष से अधिक का समय बीत चुका है। चंदेल वंश का राज्य समाप्त हो गया, वे शासक जो इन मंदिरों के निर्माता थे, इतिहास के गर्त में समा गए। किंतु खजुराहो के मंदिर आज भी उसी प्रतिभा और उसी गौरव के साथ खड़े हैं। उनका शिखर आज भी आकाश को छूता है, उनकी अप्सराएँ आज भी मुस्कुराती हैं, उनकी दीवारें आज भी उस अमर गाथा को कहती हैं — मनुष्य की सृजन-शक्ति अमर है, कला की शक्ति अविनाशी है और सौंदर्य का कोई अंत नहीं।
खजुराहो केवल एक स्थान नहीं, एक अनुभव है। यह उस भारत का अनुभव है जो आज भी जीवित है — जो पत्थरों में बोलता है, मंदिरों में गाता है और शताब्दियों के पार से हमें पुकारता है कि आओ, हमारी विरासत को पहचानो, उसे समझो और उस पर गर्व करो।
यह लेख खजुराहो की कला और वास्तुकला को समर्पित है — उन अज्ञात शिल्पियों को श्रद्धांजलि जिनके हाथों ने पत्थर को जीवन दिया।
खजुराहो मंदिर — MCQ, FAQs और SEO Pack
बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)
1. खजुराहो के मंदिरों का निर्माण किस वंश ने करवाया?
- A) पल्लव वंश
- B) चंदेल वंश ✅
- C) चालुक्य वंश
- D) परमार वंश
व्याख्या: खजुराहो के मंदिरों का निर्माण चंदेल राजपूत शासकों ने 950–1050 ईसवी के बीच करवाया था।
2. खजुराहो को UNESCO विश्व धरोहर स्थल कब घोषित किया गया?
- A) 1972
- B) 1983
- C) 1986 ✅
- D) 1990
व्याख्या: UNESCO ने खजुराहो के मंदिर-समूह को वर्ष 1986 में विश्व धरोहर स्थल की मान्यता दी।
3. खजुराहो के मंदिर किस भारतीय राज्य में स्थित हैं?
- A) उत्तर प्रदेश
- B) राजस्थान
- C) मध्य प्रदेश ✅
- D) छत्तीसगढ़
व्याख्या: खजुराहो मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित एक ऐतिहासिक नगर है।
4. खजुराहो के मंदिरों की वास्तुकला शैली कौन सी है?
- A) द्राविड़ शैली
- B) वेसर शैली
- C) नागर शैली ✅
- D) कलिंग शैली
व्याख्या: खजुराहो के मंदिर उत्तर भारतीय नागर शैली के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माने जाते हैं।
5. कंदरिया महादेव मंदिर किस देवता को समर्पित है?
- A) भगवान विष्णु
- B) भगवान सूर्य
- C) भगवान ब्रह्मा
- D) भगवान शिव ✅
व्याख्या: कंदरिया महादेव मंदिर खजुराहो का सबसे विशाल मंदिर है और यह भगवान शिव को समर्पित है।
6. खजुराहो के मंदिरों में निर्माण सामग्री के रूप में मुख्यतः क्या प्रयोग किया गया?
- A) ग्रेनाइट
- B) संगमरमर
- C) बलुआ पत्थर ✅
- D) चूना पत्थर
व्याख्या: खजुराहो के मंदिर स्थानीय बलुआ पत्थर से बने हैं जो मूर्तिकला के लिए उपयुक्त था।
7. कंदरिया महादेव मंदिर की ऊँचाई लगभग कितनी है?
- A) 20 मीटर
- B) 25 मीटर
- C) 31 मीटर ✅
- D) 45 मीटर
व्याख्या: कंदरिया महादेव मंदिर का शिखर लगभग 31 मीटर ऊँचा है और इसमें 84 उरुशृंग हैं।
8. खजुराहो के मंदिरों को 1838 में पुनः किसने खोजा?
- A) अलेक्जेंडर कनिंघम
- B) कैप्टन टी.एस. बर्ट ✅
- C) जेम्स प्रिंसेप
- D) विलियम जोन्स
व्याख्या: ब्रिटिश सेना के इंजीनियर कैप्टन टी.एस. बर्ट ने 1838 में खजुराहो के मंदिरों को विश्व के सामने पुनः प्रस्तुत किया।
9. लक्ष्मण मंदिर का निर्माण किस चंदेल शासक ने करवाया था?
- A) धंगदेव
- B) गंडदेव
- C) यशोवर्मन ✅
- D) विद्याधर
व्याख्या: लक्ष्मण मंदिर का निर्माण राजा यशोवर्मन ने 930–950 ईसवी के बीच करवाया था।
10. खजुराहो में चित्रगुप्त मंदिर किस देवता को समर्पित है?
- A) भगवान विष्णु
- B) भगवान सूर्य ✅
- C) भगवान इंद्र
- D) भगवान गणेश
व्याख्या: चित्रगुप्त मंदिर खजुराहो का एकमात्र सूर्य मंदिर है जहाँ सूर्य देवता सात घोड़ों के रथ पर विराजमान हैं।
11. पंचायतन योजना में मुख्य मंदिर के कितने कोनों पर सहायक मंदिर होते हैं?
- A) दो
- B) तीन
- C) चार ✅
- D) पाँच
व्याख्या: पंचायतन योजना में केंद्रीय मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे सहायक मंदिर बनाए जाते हैं।
12. खजुराहो के मंदिरों में निर्माण के लिए किस तकनीक का उपयोग किया गया?
- A) सीमेंट जोड़ तकनीक
- B) इंटरलॉकिंग स्टोन तकनीक ✅
- C) लकड़ी के ढाँचे की तकनीक
- D) ईंट-गारा तकनीक
व्याख्या: खजुराहो के मंदिरों में चूने या मोर्टार का प्रयोग नहीं हुआ, बल्कि पत्थर आपस में इंटरलॉकिंग तकनीक से जुड़े हैं।
13. खजुराहो के पूर्वी समूह में सबसे बड़ा जैन मंदिर कौन सा है?
- A) आदिनाथ मंदिर
- B) घंटाई मंदिर
- C) पार्श्वनाथ मंदिर ✅
- D) शांतिनाथ मंदिर
व्याख्या: पार्श्वनाथ मंदिर खजुराहो का सबसे बड़ा जैन मंदिर है और यह 23वें तीर्थंकर को समर्पित है।
14. खजुराहो के मंदिरों में मिथुन मूर्तियाँ कुल मूर्तिकला का लगभग कितना भाग हैं?
- A) 50 प्रतिशत
- B) 30 प्रतिशत
- C) 20 प्रतिशत
- D) 10 प्रतिशत ✅
व्याख्या: मिथुन मूर्तियाँ खजुराहो की कुल मूर्तिकला का केवल लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा हैं, शेष देवी-देवता, अप्सराएँ और दैनिक जीवन के दृश्य हैं।
15. विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किस चंदेल राजा ने करवाया?
- A) यशोवर्मन
- B) धंगदेव ✅
- C) गंडदेव
- D) परमर्दिदेव
व्याख्या: विश्वनाथ मंदिर का निर्माण राजा धंगदेव ने 999 ईसवी में करवाया था और इसका उल्लेख मंदिर के शिलालेख में है।
16. खजुराहो नृत्य महोत्सव किस महीने में आयोजित होता है?
- A) अक्टूबर-नवंबर
- B) दिसंबर-जनवरी
- C) फरवरी-मार्च ✅
- D) जुलाई-अगस्त
व्याख्या: खजुराहो नृत्य महोत्सव प्रतिवर्ष फरवरी-मार्च में मंदिरों की भव्य पृष्ठभूमि में आयोजित किया जाता है।
17. खजुराहो की नारी-मूर्तियों को किस नाम से जाना जाता है?
- A) देवदासियाँ
- B) शलभंजिकाएँ ✅
- C) यक्षिणियाँ
- D) गंधर्वाएँ
व्याख्या: खजुराहो की अप्सरा और सुर-सुंदरी मूर्तियों को शलभंजिकाएँ कहा जाता है जो अपनी अलौकिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध हैं।
18. खजुराहो का नाम किससे पड़ा?
- A) एक राजा के नाम से
- B) एक नदी के नाम से
- C) खजूर के वृक्षों से ✅
- D) एक देवी के नाम से
व्याख्या: प्राचीन काल में इस क्षेत्र में खजूर के वृक्षों की बहुतायत थी जिससे इसका नाम खजूरपुरा और फिर खजुराहो पड़ा।
19. भारतीय दर्शन के चार पुरुषार्थों में से कौन सा पुरुषार्थ मंदिर का गर्भगृह दर्शाता है?
- A) धर्म
- B) अर्थ
- C) काम
- D) मोक्ष ✅
व्याख्या: मंदिर की बाहरी दीवारें धर्म, अर्थ और काम की प्रतीक हैं जबकि गर्भगृह मोक्ष का प्रतीक माना जाता है।
20. खजुराहो के मंदिरों की देखरेख कौन सी संस्था करती है?
- A) UNESCO
- B) भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ✅
- C) राज्य पर्यटन विभाग
- D) राष्ट्रीय संग्रहालय
व्याख्या: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) खजुराहो के मंदिरों के संरक्षण, रखरखाव और पर्यटन प्रबंधन का दायित्व निभाता है।
10 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: खजुराहो के मंदिरों में मिथुन मूर्तियाँ क्यों बनाई गई हैं?
मिथुन मूर्तियों के पीछे मुख्यतः तांत्रिक दर्शन है जिसमें शिव और शक्ति के मिलन को सृष्टि की मूल शक्ति माना गया है। इसके अतिरिक्त ये मूर्तियाँ जीवन के चार पुरुषार्थों — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — का प्रतीक हैं। मंदिर के बाहर काम और भीतर मोक्ष — यही इनका दार्शनिक संदेश है।
प्रश्न 2: खजुराहो में कुल कितने मंदिर हैं और कितने आज सुरक्षित हैं?
मूलतः खजुराहो में 85 से अधिक मंदिर थे। आज इनमें से केवल 25 मंदिर ही सुरक्षित और सुव्यवस्थित अवस्था में हैं। शेष मंदिर समय, प्राकृतिक आपदाओं और आक्रमणों के कारण नष्ट हो गए।
प्रश्न 3: खजुराहो जाने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?
खजुराहो जाने का सर्वोत्तम समय अक्टूबर से मार्च के बीच है जब मौसम सुहावना रहता है। फरवरी-मार्च में खजुराहो नृत्य महोत्सव भी होता है जो यात्रा को और भी यादगार बना देता है।
प्रश्न 4: खजुराहो कैसे पहुँचें?
खजुराहो की अपनी हवाई पट्टी है जहाँ दिल्ली और वाराणसी से सीधी उड़ानें उपलब्ध हैं। निकटतम रेलवे स्टेशन महोबा और छतरपुर हैं। सड़क मार्ग से झाँसी, छतरपुर और सतना से भी खजुराहो पहुँचा जा सकता है।
प्रश्न 5: क्या खजुराहो के मंदिरों में आज भी पूजा होती है?
हाँ, पश्चिमी समूह का मातंगेश्वर मंदिर आज भी एक जीवंत धार्मिक स्थल है जहाँ प्रतिदिन पूजा-अर्चना होती है। शेष अधिकांश मंदिर अब संरक्षित स्मारक के रूप में ASI के अधीन हैं।
प्रश्न 6: खजुराहो के मंदिरों की वास्तुकला में सबसे अनोखी विशेषता क्या है?
खजुराहो के मंदिरों की सबसे अनोखी विशेषता उनका बहु-शिखर निर्माण है जिसमें अनेक छोटे-छोटे उरुशृंग मिलकर एक भव्य शिखर बनाते हैं। इसके अलावा चूने या मोर्टार के बिना पत्थरों को आपस में जोड़ने की इंटरलॉकिंग तकनीक भी अत्यंत उल्लेखनीय है।
प्रश्न 7: खजुराहो के मंदिरों में किन-किन धर्मों के मंदिर हैं?
खजुराहो में हिंदू और जैन दोनों धर्मों के मंदिर हैं। हिंदू मंदिरों में शैव, वैष्णव और शाक्त परंपराओं का प्रतिनिधित्व है। जैन मंदिरों में पार्श्वनाथ और आदिनाथ मंदिर प्रमुख हैं। यह धार्मिक विविधता उस काल की सांस्कृतिक उदारता का प्रमाण है।
प्रश्न 8: खजुराहो की मूर्तिकला में अप्सराएँ इतनी महत्वपूर्ण क्यों हैं?
खजुराहो की अप्सरा-मूर्तियाँ या शलभंजिकाएँ भारतीय शिल्पकला में नारी-सौंदर्य का सर्वोच्च चित्रण मानी जाती हैं। ये मूर्तियाँ दैवीय और मानवीय सौंदर्य के बीच की कड़ी हैं और इनमें उस युग के सामाजिक जीवन, आभूषण-परंपरा और सौंदर्य-बोध का सजीव दस्तावेज है।
प्रश्न 9: खजुराहो के मंदिरों का निर्माण इतने कम समय में कैसे हुआ?
खजुराहो के अधिकांश मंदिर मात्र एक शताब्दी (950–1050 ईसवी) में बने। इसके पीछे चंदेल शासकों की असाधारण संगठन-शक्ति, राजकीय संरक्षण और उस काल के कुशल शिल्पियों की विशाल टोलियाँ थीं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस कार्य में लगी रहीं।
प्रश्न 10: खजुराहो को विश्व की महानतम कलाकृतियों में क्यों गिना जाता है?
खजुराहो को इसलिए महानतम कलाकृतियों में गिना जाता है क्योंकि यहाँ की मूर्तिकला, वास्तुकला, दार्शनिक गहराई और तकनीकी कुशलता का संयोजन विश्व में अद्वितीय है। एक हजार वर्ष पहले बिना आधुनिक उपकरणों के जो निर्माण हुआ, वह आज भी अपनी संपूर्णता और सजीवता में अतुलनीय है।







