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दुर्गा पूजा और बंगाल की कला — विसर्जन तक की यात्रा

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दुर्गा पूजा और बंगाल की कला — विसर्जन तक की यात्रा

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दुर्गा पूजा और बंगाल की कला: दुर्गा पूजा बंगाल कला का महोत्सव है — Kumartuli की मूर्तिकला, Pandal Art, Alpona, Bengal School और UNESCO मान्यता 2021 को विस्तार से जानें। दुर्गा पूजा और बंगाल की कला परिचय: दुर्गा पूजा — सिर्फ पूजा नहीं, एक Art Festival भारत के त्योहारों में यदि किसी एक उत्सव को ...

दुर्गा पूजा और बंगाल की कला — विसर्जन तक की यात्रा

दुर्गा पूजा और बंगाल की कला: दुर्गा पूजा बंगाल कला का महोत्सव है — Kumartuli की मूर्तिकला, Pandal Art, Alpona, Bengal School और UNESCO मान्यता 2021 को विस्तार से जानें।

Table of Contents

दुर्गा पूजा और बंगाल की कला

परिचय: दुर्गा पूजा — सिर्फ पूजा नहीं, एक Art Festival

भारत के त्योहारों में यदि किसी एक उत्सव को “जीवंत कला का महोत्सव” कहा जाए, तो वह है दुर्गा पूजा। पश्चिम बंगाल में यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं है — यह एक विशाल, जीवंत और बहुआयामी कला उत्सव है जो हर साल लाखों कलाकारों, शिल्पकारों, चित्रकारों और सामान्य नागरिकों को एक साथ जोड़ता है।

दुर्गा पूजा का उत्सव आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी से दशमी तक मनाया जाता है। लेकिन इसकी तैयारी महीनों पहले से शुरू हो जाती है। कोलकाता की गलियों में जब मिट्टी की सोंधी खुशबू फैलती है, तब समझ लीजिए कि Kumartuli के कुम्हार देवी दुर्गा की मूर्तियां गढ़ना शुरू कर चुके हैं।

यह त्योहार बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का सबसे बड़ा प्रतीक है। भारतीय कला इतिहास के परिप्रेक्ष्य में देखें तो दुर्गा पूजा में मूर्तिकला, चित्रकला, वास्तुकला, लोक कला, संगीत, नृत्य और थिएटर — सभी कलाएं एक साथ प्रकट होती हैं। यही कारण है कि इसे “The World’s Largest Art Festival” भी कहा जाता है।

2021 में UNESCO ने दुर्गा पूजा को Intangible Cultural Heritage of Humanity की सूची में शामिल किया — यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि यह उत्सव केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मानवता की साझा सांस्कृतिक धरोहर है।

इस लेख में हम दुर्गा पूजा को एक कला महोत्सव के रूप में समझेंगे — Kumartuli के कारीगरों से लेकर Pandal Art तक, Bengal School of Art से लेकर Alpona की लोक परंपरा तक, और UNESCO की मान्यता से लेकर परीक्षा उपयोगी तथ्यों तक।

Kumartuli: कोलकाता का वो मोहल्ला जहां देवी बनती हैं

कोलकाता के उत्तरी हिस्से में गंगा नदी के किनारे बसा एक छोटा-सा मोहल्ला है — Kumartuli। “कुमार” यानी कुम्हार और “तुली” यानी मोहल्ला। यह वह जगह है जहां सैकड़ों वर्षों से कारीगर देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाते आए हैं।

Kumartuli कोई साधारण बाजार नहीं है। यह एक जीवंत कला केंद्र है जहां हर गली, हर दरवाजे पर मूर्तियां बनाने का काम चलता रहता है। यहां लगभग 300 से अधिक स्टूडियो हैं जिनमें 500 से अधिक प्रमुख शिल्पकार और उनके सहायक काम करते हैं। दुर्गा पूजा से पहले यहां कामगारों की संख्या हजारों में पहुंच जाती है।

Kumartuli का इतिहास

Kumartuli का इतिहास 18वीं शताब्दी से जुड़ा है। जब कोलकाता में जमींदार वर्ग ने अपने घरों में दुर्गा पूजा शुरू की, तो मूर्तिकारों की मांग बढ़ी। नदिया, मुर्शिदाबाद और बांकुड़ा जिलों के कुम्हार यहां आकर बसने लगे। धीरे-धीरे यह क्षेत्र मूर्तिकला का केंद्र बन गया।

यहां के प्रमुख शिल्पकार परिवारों में पाल समुदाय का विशेष स्थान है। ये लोग पीढ़ियों से इस काम में लगे हैं और अपनी विशिष्ट शैली को बनाए रखते हैं।

Kumartuli की विशेषताएं

  • यहां से प्रतिवर्ष लगभग 40,000 से अधिक दुर्गा मूर्तियां तैयार होती हैं।
  • इन मूर्तियों को केवल कोलकाता में नहीं, बल्कि पूरे भारत और विदेशों में भी भेजा जाता है — लंदन, न्यूयॉर्क, टोरंटो जैसे शहरों में बंगाली समुदाय इन्हीं मूर्तियों के साथ पूजा मनाता है।
  • Kumartuli में एक छोटा-सा लोक कला संग्रहालय भी है जो इस परंपरा को दस्तावेज करता है।

Kumartuli की यात्रा किसी कला तीर्थयात्रा से कम नहीं है। जून-जुलाई से ही यहां मूर्ति निर्माण का काम शुरू हो जाता है और पर्यटक दूर-दूर से इस प्रक्रिया को देखने आते हैं।

दुर्गा मूर्ति बनाने की प्रक्रिया: मिट्टी से विसर्जन तक

दुर्गा की मूर्ति बनाने की प्रक्रिया एक लंबी, श्रमसाध्य और अत्यंत कलात्मक यात्रा है। यह केवल शिल्प नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है। भारतीय मूर्तिकला परंपरा में इस प्रक्रिया का बहुत गहरा महत्व है।

चरण 1 — बांस और पुआल का ढांचा (Skeleton)

मूर्ति निर्माण का पहला चरण होता है ढांचा तैयार करना। बांस की खपच्चियों और धान के पुआल से देवी का कंकाल (skeleton) बनाया जाता है। इसे “Kathi” कहते हैं। यह ढांचा मूर्ति को भीतरी मजबूती देता है।

बांस को विशेष तरीके से बांधा जाता है — देवी के हाथ, पैर, धड़ और सिर का अनुपात (proportion) शास्त्रों के अनुसार तय होता है। यह शिल्पशास्त्र की परंपरा का पालन करते हुए किया जाता है।

चरण 2 — मिट्टी का लेप (Clay Work)

इसके बाद गंगा की मिट्टी का लेप लगाया जाता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण परंपरा है — Nishiddho Palli की मिट्टी। Kumartuli के पास स्थित वेश्यालयों की मिट्टी (पुण्यभूमि मिट्टी) का प्रयोग अनिवार्य माना जाता है। इसके पीछे की लोककथा कहती है कि जब कोई पुरुष वेश्यालय में जाता है, तो वह अपनी पवित्रता वहीं छोड़ जाता है — अतः वह स्थान पवित्र हो जाता है।

यह परंपरा भारतीय लोक विश्वास और सामाजिक दर्शन का अनूठा उदाहरण है।

मिट्टी को कई परतों में लगाया जाता है। पहले मोटी परत, फिर बारीक मिट्टी से चेहरे और हाथों की आकृति उभारी जाती है।

चरण 3 — रंग और सज्जा (Painting & Ornamentation)

जब मिट्टी सूख जाती है, तब रंग का काम शुरू होता है। पहले सफेद रंग का आधार (base coat) लगाया जाता है। फिर देवी के अंगों को विशेष रंगों से सजाया जाता है।

देवी का मुखड़ा — विशेषकर आंखें — सबसे महत्वपूर्ण होती हैं। चक्षुदान (आंखें बनाना) की रस्म एक अनुष्ठान की तरह होती है जिसे विशेष मुहूर्त में किया जाता है। मूर्तिकार की दृष्टि से यह क्षण सबसे भावनात्मक होता है — जब निर्जीव मिट्टी में “प्राण” आते हैं।

चरण 4 — साज-श्रृंगार (Decoration)

मूर्ति को साड़ी, गहने, मुकुट और अस्त्र-शस्त्र से सजाया जाता है। आधुनिक समय में थर्मोकोल, फाइबरग्लास और अन्य सामग्रियों का भी प्रयोग होता है, लेकिन पारंपरिक मूर्तियां अभी भी मिट्टी से ही बनती हैं।

चरण 5 — विसर्जन (Immersion)

दशमी के दिन देवी का विसर्जन होता है। हुगली नदी में देवी को प्रवाहित किया जाता है। यह दृश्य अत्यंत भावनात्मक होता है — जिस मूर्ति को महीनों की मेहनत से बनाया गया, वह कुछ ही क्षणों में जल में विलीन हो जाती है।

विसर्जन का दार्शनिक अर्थ — यह क्षण भारतीय दर्शन में अनित्यता (impermanence) का प्रतीक है। जो बना, वह नष्ट होगा। लेकिन कला और स्मृति बनी रहती है।

पर्यावरण की दृष्टि से अब eco-friendly मूर्तियां भी बनाई जा रही हैं — जो पानी में घुलनशील मिट्टी से बनती हैं और नदी को प्रदूषित नहीं करतीं।

Pandal Art: Theme-based Pandals एक नई कला परंपरा

दुर्गा पूजा में मूर्ति के साथ-साथ Pandal भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पंडाल वह अस्थायी संरचना है जिसमें देवी को स्थापित किया जाता है। लेकिन आधुनिक समय में पंडाल अपने आप में एक कला प्रतिष्ठान बन चुका है।

Theme-based Pandals की परंपरा

1990 के दशक से थीम-आधारित पंडालों की परंपरा तेजी से विकसित हुई। अब हर बड़ा पूजा समिति एक unique theme चुनती है और उस पर करोड़ों रुपये खर्च करती है।

कुछ प्रसिद्ध theme आधारित पंडाल:

बागबाजार सार्वजनिन दुर्गोत्सव — यह कोलकाता के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित पूजाओं में से एक है। 1919 से आयोजित यह पूजा अपनी भव्यता के लिए जानी जाती है।

College Square Puja — यहां पर हर वर्ष ऐसे पंडाल बनाए जाते हैं जो किसी ऐतिहासिक इमारत या विश्व धरोहर स्थल की प्रतिकृति होते हैं — जैसे Buckingham Palace, Angkor Wat, या Hagia Sophia।

Deshapriya Park — यहां इतना विशाल पंडाल बनाया गया था कि Guinness Book of World Records में इसका नाम दर्ज हुआ।

Pandal Art में प्रयुक्त सामग्री

आधुनिक पंडाल निर्माण में कलाकार अद्भुत सामग्रियों का प्रयोग करते हैं:

  • पुराने बर्तन और धातु के टुकड़े — recycled art के रूप में
  • बांस और जूट — पर्यावरण अनुकूल संरचनाओं के लिए
  • थर्मोकोल और फाइबर — जटिल आकृतियों के लिए
  • LED Lighting और Digital Projection — आधुनिक प्रकाश कला के लिए

समकालीन भारतीय कला में Pandal Art एक नई विधा के रूप में स्थापित हो चुकी है।

पंडाल और सामाजिक संदेश

अनेक पंडाल सामाजिक मुद्दों पर आधारित थीम चुनते हैं:

  • जलवायु परिवर्तन
  • लैंगिक समानता
  • किसान आंदोलन
  • COVID-19 महामारी में स्वास्थ्यकर्मियों को श्रद्धांजलि

2020 में COVID के दौरान एक पंडाल को PPE Kit पहने हुए देवी दुर्गा की थीम पर सजाया गया — यह समकालीन कला और सामाजिक चेतना का अद्भुत संगम था।

Competitive Puja Culture

कोलकाता में 3,000 से अधिक पूजा समितियां होती हैं जो आपस में प्रतिस्पर्धा करती हैं। विभिन्न समाचार संस्थाएं और सरकारी निकाय सर्वश्रेष्ठ पंडाल को पुरस्कार देते हैं। इससे कला की गुणवत्ता हर वर्ष बढ़ती है।

Bengal School और दुर्गा पूजा: Artists का योगदान

Bengal School of Art भारतीय आधुनिक कला का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। 19वीं और 20वीं शताब्दी में इस विद्यालय ने भारतीय कला को नई दिशा दी। और दुर्गा पूजा के साथ इसका गहरा संबंध रहा है।

Abanindranath Tagore और दुर्गा पूजा

अवनींद्रनाथ ठाकुर — Bengal School के प्रमुख प्रणेता — ने दुर्गा की छवि को एक नए आयाम से प्रस्तुत किया। उनकी “Bharat Mata” पेंटिंग में देवी की छवि और मातृभूमि का विचार एक साथ उभरा। यह राष्ट्रवादी कला आंदोलन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज है।

अवनींद्रनाथ ने कोलकाता के Government School of Art में पढ़ाते हुए पारंपरिक भारतीय पेंटिंग शैलियों — मुगल, राजपूत और अजंता — को एक साथ जोड़कर एक नई “Indo-Persian” शैली विकसित की।

Rabindranath Tagore का योगदान

रबींद्रनाथ टैगोर स्वयं एक महान चित्रकार भी थे। उनके जीवन के अंतिम वर्षों में बनाई गई पेंटिंग्स में देवी की भावनात्मक छवियां मिलती हैं। शांतिनिकेतन में उन्होंने जो कला परंपरा स्थापित की, वह दुर्गा पूजा के सांस्कृतिक संदर्भ से गहरे जुड़ी थी।

Nandalal Bose और Visva-Bharati

नंदलाल बोस — Bengal School के एक और महान कलाकार — शांतिनिकेतन की परंपरा को आगे बढ़ाते रहे। उन्होंने दुर्गा की लोक कला छवियों को आधुनिक भारतीय कला में समाहित किया।

Jamini Roy और Folk Art

जामिनी रॉय ने बांकुड़ा की लोक कला — विशेषकर Kalighat Pat शैली — को मुख्यधारा में लाया। उनकी दुर्गा की पेंटिंग्स में बोल्ड रेखाएं और चमकीले रंग देखने को मिलते हैं जो बंगाल की लोक कला परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जामिनी रॉय की शैली आज भी आधुनिक कला संग्रहों में बहुत लोकप्रिय है।

Kalighat Paintings और दुर्गा

कालीघाट पट — 19वीं सदी की यह चित्रकला परंपरा कोलकाता के कालीघाट मंदिर के आसपास विकसित हुई। यहां के चित्रकार देवी-देवताओं की सरल, प्रभावशाली छवियां बनाते थे जो श्रद्धालुओं में बहुत लोकप्रिय थीं।

कालीघाट पेंटिंग में देवी दुर्गा को अक्सर महिषासुर का वध करते हुए दिखाया जाता था। यह भारतीय लोक चित्रकला का एक अनमोल उदाहरण है।

Alpona: दुर्गा पूजा में बंगाल की लोक कला

Alpona — बंगाल की सबसे प्राचीन और सुंदर लोक कला परंपराओं में से एक। यह वस्तुतः वही है जो राजस्थान में “मांडना”, महाराष्ट्र में “रंगोली” और तमिलनाडु में “Kolam” है। लेकिन Alpona की अपनी विशिष्ट शैली और सौंदर्यबोध है।

Alpona क्या है?

Alpona एक प्रकार की लोक चित्रकला है जो जमीन पर, दरवाजे के सामने या पूजा स्थल पर बनाई जाती है। यह मुख्यतः चावल के घोल (चावल की लेई) से बनाई जाती है।

शब्द “Alpona” संस्कृत के “अलंपन” से आया है जिसका अर्थ है — अनुलेपन करना, यानी लीपना या चित्र बनाना।

Alpona की विशेषताएं

  • यह मुख्यतः श्वेत रंग में बनाई जाती है — चावल की लेई के कारण।
  • इसके मोटिफ (आकृतियां) प्रकृति से प्रेरित होते हैं — कमल, पान का पत्ता, शंख, मछली, धान की बाली।
  • यह पारंपरिक रूप से महिलाओं द्वारा बनाई जाती है।
  • दुर्गा पूजा के दौरान Alpona के विशेष pattern बनाए जाते हैं जो शुभ और मांगलिक माने जाते हैं।

Alpona और दुर्गा पूजा

दुर्गा पूजा में Alpona का विशेष महत्व होता है:

  • षष्ठी के दिन से घर के प्रवेश द्वार पर Alpona बनाना शुरू होता है।
  • पूजा के स्थान (ठाकुर दालान) पर विस्तृत Alpona designs बनाई जाती हैं।
  • देवी के पैरों के निशान (Lakshmipada) Alpona की एक विशेष आकृति है जो बेहद लोकप्रिय है।
  • दशमी के दिन “धुनुची नाच” और “सिंदूर खेला” के समय भी Alpona की विशेष भूमिका होती है।

Alpona का कलात्मक महत्व

भारतीय कला परंपरा में Alpona को ephemeral art (क्षणिक कला) की श्रेणी में रखा जाता है — यह बनाई जाती है और कुछ समय बाद मिट जाती है। लेकिन यही इसकी सुंदरता है।

आधुनिक समय में Alpona के patterns को textile design, saree printing, और graphic design में भी उपयोग किया जाता है। कोलकाता के कई fashion houses इन motifs को अपने designs में शामिल करते हैं।

शांतिनिकेतन और Alpona

रबींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में Alpona को एक कला शिक्षा के रूप में पढ़ाया जाता था। वहां की महिला छात्राएं विशेष अवसरों पर जमीन पर जटिल Alpona designs बनाती थीं। इसे “Alpona Art” के रूप में औपचारिक मान्यता मिली।

UNESCO Recognition: 2021 में Intangible Heritage

दिसंबर 2021 में एक ऐतिहासिक घटना हुई। UNESCO ने पेरिस में अपनी बैठक में दुर्गा पूजा को “Intangible Cultural Heritage of Humanity” की सूची में शामिल किया।

यह भारतीय सांस्कृतिक विरासत के लिए एक बड़ी उपलब्धि थी।

UNESCO का Intangible Cultural Heritage क्या है?

UNESCO की 2003 की Convention for the Safeguarding of the Intangible Cultural Heritage के तहत उन परंपराओं, प्रथाओं, अभिव्यक्तियों, ज्ञान और कौशल को सूचीबद्ध किया जाता है जिन्हें समुदाय, समूह और कभी-कभी व्यक्ति अपनी सांस्कृतिक विरासत के रूप में मानते हैं।

Intangible Heritage में शामिल होती हैं:

  1. मौखिक परंपराएं और अभिव्यक्तियां
  2. कला और प्रदर्शन कलाएं
  3. सामाजिक प्रथाएं, अनुष्ठान और उत्सव
  4. प्रकृति और ब्रह्मांड से जुड़ा ज्ञान
  5. पारंपरिक शिल्प कौशल

दुर्गा पूजा को मान्यता क्यों मिली?

UNESCO ने दुर्गा पूजा को इन कारणों से Intangible Heritage माना:

समावेशिता (Inclusivity): दुर्गा पूजा एक ऐसा उत्सव है जो जाति, धर्म और वर्ग की सीमाओं को तोड़ता है। यह सबके लिए खुला है।

कला और शिल्प का संरक्षण: पंडाल निर्माण, मूर्तिकला, Alpona, ढाकी वादन — ये सभी पारंपरिक कौशल इस उत्सव के माध्यम से जीवित रहते हैं।

सामुदायिक भागीदारी: पूजा समितियां community bonding का एक अनूठा उदाहरण हैं। हर स्तर का व्यक्ति — बच्चे, महिलाएं, वृद्ध — इसमें भागीदार होते हैं।

लोक संगीत — ढाक: ढाक (एक विशेष ढोल) दुर्गा पूजा की आत्मा है। ढाकी कलाकार — ढाक बजाने वाले पारंपरिक संगीतकार — यह कला पीढ़ियों से सीखते आए हैं।

UNESCO मान्यता का प्रभाव

  • दुर्गा पूजा को वैश्विक पर्यटन मानचित्र पर नई पहचान मिली।
  • पश्चिम बंगाल सरकार ने इसे “Heritage Tourism” के रूप में प्रमोट करना शुरू किया।
  • पंडाल शिल्पकारों और मूर्तिकारों को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर पहचान मिली।
  • कला और शिल्प के संरक्षण के लिए सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास तेज हुए।

भारत के अन्य जो तत्व UNESCO Intangible Heritage में शामिल हैं उनमें योग, कुंभ मेला, रामलीला, वैदिक मंत्र पाठ परंपरा आदि प्रमुख हैं। दुर्गा पूजा इस सूची में एक गर्वपूर्ण स्थान पर है।

परीक्षा उपयोगी तथ्य + 20 MCQ

महत्वपूर्ण तथ्य (Key Facts)

विषयतथ्य
UNESCO मान्यतादिसंबर 2021
UNESCO सूचीIntangible Cultural Heritage of Humanity
Kumartuli स्थानउत्तरी कोलकाता, हुगली नदी के किनारे
मूर्ति की आंखें बनाने की रस्मचक्षुदान
Alpona सामग्रीचावल की लेई (Rice Paste)
Bengal School के प्रणेताअवनींद्रनाथ ठाकुर
कालीघाट पेंटिंग का केंद्रकोलकाता
दुर्गा पूजा का समयआश्विन शुक्ल षष्ठी से दशमी
ढाकदुर्गा पूजा का पारंपरिक वाद्य यंत्र
Jamini Roy की शैलीKalighat Pat से प्रेरित
पहली सार्वजनिक दुर्गा पूजा1790, गुप्तिपाड़ा, हुगली
Bagbazar Puja की स्थापना1919
Nishiddho Palli की मिट्टीवेश्यालय की मिट्टी — पवित्र मानी जाती है
Alpona का अर्थसंस्कृत “अलंपन” से — अनुलेपन
Theme-based Pandal परंपरा1990 के दशक से

20 MCQ (Multiple Choice Questions)

Q1. दुर्गा पूजा को UNESCO ने Intangible Cultural Heritage की सूची में कब शामिल किया? (a) 2019 (b) 2020 (c) 2021 ✓ (d) 2022

Q2. Kumartuli किस शहर में स्थित है? (a) दिल्ली (b) मुंबई (c) कोलकाता ✓ (d) वाराणसी

Q3. दुर्गा मूर्ति बनाने में किस नदी की मिट्टी का प्रयोग होता है? (a) यमुना (b) गंगा ✓ (c) ब्रह्मपुत्र (d) महानदी

Q4. “चक्षुदान” का अर्थ क्या है? (a) मूर्ति का विसर्जन (b) मूर्ति को रंगना (c) मूर्ति की आंखें बनाना ✓ (d) बांस का ढांचा तैयार करना

Q5. Alpona किस सामग्री से बनाई जाती है? (a) हल्दी पाउडर (b) चावल की लेई ✓ (c) गेरू मिट्टी (d) रंगीन रेत

Q6. Bengal School of Art के प्रमुख प्रणेता कौन थे? (a) नंदलाल बोस (b) जामिनी रॉय (c) अवनींद्रनाथ ठाकुर ✓ (d) रबींद्रनाथ टैगोर

Q7. “Kalighat Pat” किस प्रकार की कला है? (a) मूर्तिकला (b) लोक चित्रकला ✓ (c) वास्तुकला (d) वस्त्र कला

Q8. दुर्गा पूजा किस मास में मनाई जाती है? (a) श्रावण (b) भाद्रपद (c) आश्विन ✓ (d) कार्तिक

Q9. Alpona शब्द किस संस्कृत शब्द से बना है? (a) अलंकार (b) अलंपन ✓ (c) अलापन (d) अवलंब

Q10. Bagbazar Puja की स्थापना किस वर्ष हुई? (a) 1900 (b) 1910 (c) 1919 ✓ (d) 1925

Q11. जामिनी रॉय किस लोक कला शैली से प्रेरित थे? (a) मधुबनी (b) वारली (c) Kalighat Pat ✓ (d) पिथोरा

Q12. दुर्गा पूजा के पंडालों में ढाक बजाने वाले कलाकारों को क्या कहते हैं? (a) भजनिक (b) ढाकी ✓ (c) तबलची (d) मृदंगी

Q13. पहली सार्वजनिक दुर्गा पूजा कहां आयोजित हुई थी? (a) कोलकाता (b) गुप्तिपाड़ा, हुगली ✓ (c) बर्दवान (d) मुर्शिदाबाद

Q14. Theme-based Pandals की परंपरा कब से शुरू हुई? (a) 1970 के दशक में (b) 1980 के दशक में (c) 1990 के दशक में ✓ (d) 2000 के दशक में

Q15. शांतिनिकेतन की स्थापना किसने की थी? (a) स्वामी विवेकानंद (b) अवनींद्रनाथ ठाकुर (c) रबींद्रनाथ टैगोर ✓ (d) नंदलाल बोस

Q16. दुर्गा पूजा का विसर्जन किस तिथि को होता है? (a) अष्टमी (b) नवमी (c) दशमी ✓ (d) एकादशी

Q17. Kumartuli में प्रतिवर्ष लगभग कितनी दुर्गा मूर्तियां बनती हैं? (a) 10,000 (b) 20,000 (c) 40,000 ✓ (d) 60,000

Q18. “Nishiddho Palli” की मिट्टी का उपयोग दुर्गा मूर्ति में क्यों किया जाता है? (a) यह मिट्टी मजबूत होती है (b) यह धार्मिक रूप से पवित्र मानी जाती है ✓ (c) यह सस्ती होती है (d) यह जल्दी सूखती है

Q19. Alpona में किस रंग का प्रयोग सबसे अधिक होता है? (a) लाल (b) पीला (c) श्वेत ✓ (d) नीला

Q20. UNESCO की Intangible Cultural Heritage Convention किस वर्ष बनी थी? (a) 1995 (b) 2003 ✓ (c) 2010 (d) 2015

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

Q1. दुर्गा पूजा और नवरात्रि में क्या अंतर है?

नवरात्रि पूरे भारत में मनाई जाती है और इसमें नौ दिनों तक देवी के नौ रूपों की पूजा होती है। दुर्गा पूजा मुख्यतः बंगाल और पूर्वी भारत का उत्सव है जो आश्विन शुक्ल की षष्ठी से दशमी तक मनाया जाता है। दोनों एक ही काल में होते हैं लेकिन उनकी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति अलग है। बंगाल की दुर्गा पूजा में कला और शिल्प का विशेष महत्व है।

Q2. Kumartuli कैसे जाएं?

कोलकाता में Sovabazar Metro Station से Kumartuli पैदल दूरी पर है। आप Shyambazar से भी रिक्शा या टैक्सी से जा सकते हैं। मूर्ति निर्माण देखने का सबसे अच्छा समय जून से सितंबर है।

Q3. दुर्गा की मूर्ति में गंगा के अलावा किस नदी की मिट्टी लगती है?

पारंपरिक रूप से केवल गंगा की मिट्टी और Nishiddho Palli (वेश्यालय) की मिट्टी का उपयोग होता है। लेकिन कुछ क्षेत्रों में स्थानीय नदियों की मिट्टी का भी प्रयोग होता है।

Q4. Eco-friendly दुर्गा मूर्तियां कैसी होती हैं?

Eco-friendly मूर्तियां प्राकृतिक मिट्टी, प्राकृतिक रंगों और बायोडिग्रेडेबल सामग्रियों से बनाई जाती हैं। इनमें POP (Plaster of Paris) का उपयोग नहीं होता। ये मूर्तियां पानी में आसानी से घुल जाती हैं और नदी को प्रदूषित नहीं करतीं।

Q5. सिंदूर खेला क्या है?

सिंदूर खेला दशमी के दिन की एक विशेष परंपरा है। विवाहित महिलाएं देवी को सिंदूर लगाती हैं और फिर एक-दूसरे को भी सिंदूर लगाती हैं। यह विवाहित महिलाओं के सौभाग्य की कामना का प्रतीक है। यह दृश्य बंगाल की लोक संस्कृति का एक अद्भुत चित्र प्रस्तुत करता है।

Q6. Alpona और रंगोली में क्या अंतर है?

रंगोली मुख्यतः रंगीन पाउडर से बनाई जाती है और महाराष्ट्र व उत्तर भारत में प्रचलित है। Alpona मुख्यतः सफेद चावल की लेई से बनाई जाती है और बंगाल की विशेषता है। Alpona के motifs भी अलग होते हैं — इनमें मछली, शंख, पान का पत्ता आदि प्रमुख हैं।

Q7. दुर्गा पूजा किन देशों में मनाई जाती है?

भारत के अलावा दुर्गा पूजा बांग्लादेश, नेपाल, यूनाइटेड किंगडम, संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और यूरोप के कई देशों में बंगाली समुदाय द्वारा उत्साह से मनाई जाती है।

Q8. दुर्गा पूजा में ढाक क्यों बजाया जाता है?

ढाक एक पारंपरिक बंगाली ढोल है जो दुर्गा पूजा का अभिन्न हिस्सा है। इसकी थाप देवी के आगमन का संदेश देती है। ढाकी (ढाक बजाने वाले कलाकार) पीढ़ियों से यह कला सीखते आए हैं। ढाक वादन अपने आप में एक विशेष लोक संगीत परंपरा है।

निष्कर्ष — कला, श्रद्धा और समुदाय का संगम

दुर्गा पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। यह बंगाल की आत्मा है — उसकी कला, उसका शिल्प, उसका संगीत, उसकी लोक परंपराएं और उसकी सामूहिकता का उत्सव है।

Kumartuli के मिट्टी के कारीगरों से लेकर theme-based pandals के आधुनिक कलाकारों तक; Alpona बनाने वाली महिलाओं से लेकर ढाक बजाने वाले लोक संगीतकारों तक — यह उत्सव हजारों कलाकारों की आजीविका, उनकी पहचान और उनके अस्तित्व का आधार है।

UNESCO की मान्यता ने इस तथ्य को वैश्विक स्वीकृति दी है कि दुर्गा पूजा मानवता की साझा धरोहर है।

यदि आप भारतीय कला और संस्कृति को गहराई से समझना चाहते हैं, तो दुर्गा पूजा की यात्रा एक अनिवार्य अध्याय है — जो मिट्टी से शुरू होती है और विसर्जन में पूर्ण होती है, लेकिन स्मृति में हमेशा के लिए अंकित हो जाती है।


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