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यामिनी कृष्णमूर्ति: जीवनी और 10 महत्वपूर्ण तथ्य | TGT PGT 2026

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यामिनी कृष्णमूर्ति जीवनी और 10 महत्वपूर्ण तथ्य TGT PGT

यामिनी कृष्णमूर्ति: जीवनी और 10 महत्वपूर्ण तथ्य | TGT PGT 2026

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यामिनी कृष्णमूर्ति — यह नाम भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में किसी परिचय का मोहताज नहीं। वे उन विरल कलाकारों में से हैं जिन्होंने भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी — तीन प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में एक साथ पूर्णता प्राप्त की और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच पर गौरवान्वित किया। आंध्र प्रदेश में जन्मी इस महान नृत्यांगना ने बचपन से ही नृत्य को ईश्वर की उपासना माना और जीवन भर इसी साधना में समर्पित रहीं। पद्म श्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित यामिनी जी ने न केवल देश के कोने-कोने में अपनी कला का प्रकाश फैलाया, बल्कि दर्जनों देशों में भारतीय नृत्य की अमिट छाप छोड़ी। जानिए उनके जीवन, उनके गुरुओं, उनकी साधना और उनकी अतुलनीय विरासत की पूरी कहानी — इस विस्तृत हिन्दी लेख में।

यामिनी कृष्णमूर्ति जीवनी और 10 महत्वपूर्ण तथ्य TGT PGT

यामिनी कृष्णमूर्ति भारत की महान शास्त्रीय नृत्यांगना हैं। जानें उनका जीवन, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी में योगदान, पुरस्कार और विरासत।

Table of Contents

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की त्रिवेणी — भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी की महान साधिका

यामिनी कृष्णमूर्ति
Yamini Krishnamurthy
भारतीय शास्त्रीय नृत्यांगना
जन्म 20 दिसंबर 1940
जन्म स्थान मधुरांतकम, आंध्र प्रदेश
भरतनाट्यम गुरु कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई
कुचिपुड़ी गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री
ओडिसी गुरु केलुचरण महापात्र
प्रमुख सम्मान पद्म श्री, पद्म भूषण
भरतनाट्यम कुचिपुड़ी ओडिसी नृत्य त्रिवेणी

यामिनी कृष्णमूर्ति | Yamini Krishnamurthy एक विस्तृत हिन्दी लेख | indianarthistory.com

प्रस्तावना

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में यदि किसी एक कलाकार ने तीन प्रमुख नृत्य शैलियों — भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी — में एक साथ महारत हासिल की और उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर गौरवान्वित किया, तो वे हैं — यामिनी कृष्णमूर्ति। उनका नाम भारतीय संस्कृति और कला के इतिहास में सुवर्ण अक्षरों में अंकित है। उन्होंने न केवल नृत्य को अपना जीवन समर्पित किया, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनीं।

यामिनी कृष्णमूर्ति का जीवन एक सतत साधना की यात्रा है — ऐसी यात्रा जिसमें लय, भाव, रस और अभिनय का अद्भुत संगम है। उनके नृत्य में देवी-देवताओं की छवियाँ जीवंत हो उठती हैं, मिथकों की कहानियाँ नई भाषा पाती हैं और परंपरा नई ऊँचाइयों को छूती है। वे शास्त्रीय नृत्य की उन विरल साधिकाओं में से हैं जिन्होंने एक साथ तीन शैलियों में पूर्णता प्राप्त की।

यह लेख यामिनी कृष्णमूर्ति के जीवन, उनकी कला यात्रा, उनके गुरुओं के प्रति समर्पण, उनकी प्रमुख उपलब्धियों और भारतीय कला जगत में उनके अतुलनीय योगदान का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करता है।

प्रारंभिक जीवन

जन्म और परिवार

यामिनी कृष्णमूर्ति का जन्म 20 दिसंबर 1940 को भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के मधुरांतकम में हुआ था। उनका परिवार तेलुगु ब्राह्मण परंपरा से था, जहाँ संगीत और संस्कृति के प्रति गहरी आस्था थी। बचपन से ही यामिनी में नृत्य और संगीत के प्रति अदम्य जिज्ञासा और रुचि थी।

उनके माता-पिता ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और छोटी उम्र से ही उन्हें शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा दिलाने का निर्णय लिया। यह निर्णय भारतीय कला के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ।

बचपन और नृत्य की ओर रुझान

यामिनी बचपन से ही अत्यंत संवेदनशील और कलात्मक स्वभाव की थीं। कम उम्र में ही उन्होंने नृत्य के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करना सीख लिया था। उनके प्रारंभिक वर्ष तमिलनाडु में बीते जहाँ उन्होंने भरतनाट्यम की प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। उनके जीवन में नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि ईश्वर की उपासना का माध्यम बन गया।

नृत्य शिक्षा और गुरु

भरतनाट्यम — गुरु कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई

यामिनी कृष्णमूर्ति ने भरतनाट्यम की शिक्षा तमिलनाडु के प्रसिद्ध गुरु कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई से प्राप्त की। एल्लप्पा पिल्लई भरतनाट्यम परंपरा के उन दिग्गज गुरुओं में थे जिन्होंने तंजौर घराने की शैली को आधुनिक युग में जीवित रखा। उनके सान्निध्य में यामिनी ने नृत्य की बारीकियों को गहराई से समझा — मुद्राओं का अर्थ, पदों की लय, अभिनय की सूक्ष्मता और भाव की गहराई।

एल्लप्पा पिल्लई के सख्त अनुशासन और गहरे ज्ञान ने यामिनी को एक परिपक्व नर्तकी के रूप में तराशा। भरतनाट्यम में उनकी महारत आज भी भारतीय नृत्य जगत में एक मानक के रूप में स्वीकार की जाती है।

कुचिपुड़ी — गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री

कुचिपुड़ी की शिक्षा के लिए यामिनी ने आंध्र प्रदेश के महान नृत्याचार्य वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री के चरणों में शिक्षा ग्रहण की। कुचिपुड़ी एक ऐसी नृत्य शैली है जो नाटकीयता, लयबद्धता और आध्यात्मिकता का अद्भुत समन्वय है। वेदांतम जी की छत्रछाया में यामिनी ने कुचिपुड़ी की उस विशेष भंगिमा को आत्मसात किया जो इस शैली को भरतनाट्यम से अलग करती है।

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यामिनी कृष्णमूर्ति को कुचिपुड़ी में सर्वाधिक योग्यता प्राप्त नर्तकियों में गिना जाता है। उन्होंने इस शैली में अनेक पौराणिक चरित्रों को मंच पर जीवंत किया, जिनमें भामाकलापम की नायिका सत्यभामा की भूमिका विशेष रूप से उल्लेखनीय है।

ओडिसी — गुरु केलुचरण महापात्र

यामिनी की साधना यहीं नहीं रुकी। उन्होंने ओडिशा की शास्त्रीय नृत्य शैली — ओडिसी — की शिक्षा ओडिसी के सर्वश्रेष्ठ गुरु पंडित केलुचरण महापात्र से प्राप्त की। केलुचरण महापात्र को ओडिसी नृत्य के पुनर्जन्म का श्रेय दिया जाता है। उन्होंने ओडिसी की प्राचीन परंपराओं को पुनर्जीवित किया और उसे एक सुव्यवस्थित शास्त्रीय स्वरूप प्रदान किया।

यामिनी ने ओडिसी की लहरदार, कोमल और मूर्तिमय गतिविधियों को इस कुशलता से आत्मसात किया कि वे इस शैली की एक प्रमुख व्याख्याता बन गईं। ओडिसी में त्रिभंग मुद्रा और चौक की स्थिति उनके प्रदर्शन की पहचान बन गई।

कला यात्रा और प्रमुख प्रस्तुतियाँ

अरंगेत्रम और प्रारंभिक करियर

यामिनी कृष्णमूर्ति का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन — अरंगेत्रम — 1957 में हुआ। यह प्रदर्शन एक अत्यंत महत्वपूर्ण क्षण था जिसने यामिनी को भारतीय नृत्य जगत में स्थापित किया। उनके प्रदर्शन ने दर्शकों और आलोचकों को एक साथ मंत्रमुग्ध कर दिया। उनकी शारीरिक अभिव्यक्ति, भाव और लय की उत्कृष्टता ने सबका ध्यान आकर्षित किया।

राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शन

यामिनी ने भारत के कोने-कोने में अपनी कला का प्रदर्शन किया — दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद से लेकर छोटे-छोटे सांस्कृतिक केंद्रों तक। इसके साथ ही उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी भारतीय नृत्य का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस सहित दर्जनों देशों में अपने नृत्य का प्रदर्शन किया और विश्व भर के दर्शकों को भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सुंदरता से परिचित कराया।

उनके अंतर्राष्ट्रीय दौरों ने भारतीय संस्कृति की सॉफ्ट पावर को वैश्विक स्तर पर स्थापित किया। वे एक सांस्कृतिक राजदूत के रूप में उभरीं जिन्होंने नृत्य की भाषा में देशों के बीच पुल बनाया।

विशेष प्रदर्शन और महोत्सव

यामिनी ने देश के प्रमुख सांस्कृतिक महोत्सवों में भाग लिया, जिनमें राष्ट्रीय नृत्य महोत्सव, अखिल भारतीय संगीत एवं नृत्य समारोह, खजुराहो नृत्य महोत्सव, कोणार्क महोत्सव और दिल्ली के प्रमुख सांस्कृतिक आयोजन शामिल हैं। उनके प्रत्येक प्रदर्शन में एक विशेष ऊर्जा होती थी जो दर्शकों को भाव की गहराई में ले जाती थी।

नृत्य शैलियाँ — विशेषताएँ और योगदान

नृत्य की त्रिवेणी — यामिनी कृष्णमूर्ति की तीन शैलियाँ
🎭
भरतनाट्यम
Bharatanatyam
उत्पत्ति तमिलनाडु, मंदिर परंपरा
गुरु कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई
विशेषता नृत्त, नृत्य और नाट्य का संगम
तांडव + लास्य
💫
कुचिपुड़ी
Kuchipudi
उत्पत्ति आंध्र प्रदेश, नृत्य-नाटिका
गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री
विशेषता नृत्य + गायन + अभिनय एकसाथ
तरंगम प्रसिद्ध
🌸
ओडिसी
Odissi
उत्पत्ति ओडिशा, मंदिर मूर्तिकला
गुरु केलुचरण महापात्र
विशेषता त्रिभंग और चौक भंगिमाएँ
श्रृंगार रस प्रधान

भरतनाट्यम

भरतनाट्यम भारत की सबसे प्राचीन और व्यापक शास्त्रीय नृत्य शैलियों में से एक है। इसका उद्गम तमिलनाडु के मंदिरों से हुआ है जहाँ देवदासियाँ देवताओं की आराधना के रूप में इस नृत्य का अभ्यास करती थीं। भरतनाट्यम में नृत्त (शुद्ध नृत्य), नृत्य (भावपूर्ण नृत्य) और नाट्य (नाटकीय तत्व) का संतुलित समावेश होता है।

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यामिनी ने भरतनाट्यम में विशेष रूप से अलारिप्पु, जातिस्वरम, शब्दम, वर्णम और पदम जैसी पारंपरिक रचनाओं को उत्कृष्टता से प्रस्तुत किया। उनके भरतनाट्यम में तांडव और लास्य दोनों का सुंदर संतुलन दिखता है। उनकी प्रत्येक मुद्रा में एक कहानी छिपी होती थी जो दर्शकों तक सहज संप्रेषित होती थी।

कुचिपुड़ी

कुचिपुड़ी आंध्र प्रदेश की शास्त्रीय नृत्य-नाटिका परंपरा से उत्पन्न हुई। इसमें नृत्य के साथ-साथ गायन और अभिनय का गहरा तालमेल होता है। कुचिपुड़ी में नर्तक को संवाद बोलते हुए और गाते हुए नृत्य करना पड़ता है, जो इसे अन्य शैलियों से अलग बनाता है।

यामिनी ने कुचिपुड़ी में भामाकलापम, गोला कलापम और तरंगम जैसी विधाओं में असाधारण प्रदर्शन किया। तरंगम में नर्तक एक पीतल की थाली के किनारे पर खड़े होकर नृत्य करता है — यामिनी की इस प्रस्तुति ने दर्शकों में विस्मय का संचार किया। उनके कुचिपुड़ी प्रदर्शन में भगवान कृष्ण और राधा की प्रेमलीला, सत्यभामा का नखरा, और पौराणिक कथाओं का जीवंत चित्रण अत्यंत प्रसिद्ध है।

ओडिसी

ओडिसी ओडिशा की शास्त्रीय नृत्य शैली है जो मंदिर की मूर्तियों जैसी भंगिमाओं और वक्र रेखाओं की सौंदर्यशास्त्र पर आधारित है। इसमें त्रिभंग (तीन बिंदुओं पर झुकाव) और चौक (चतुर्भुज स्थिति) मुख्य मुद्राएँ हैं। ओडिसी में श्रृंगार रस की प्रधानता होती है और यह जगन्नाथ भगवान की आराधना से गहराई से जुड़ी है।

यामिनी के ओडिसी प्रदर्शन में भक्ति, सौंदर्य और आध्यात्मिकता का जो अद्भुत संगम दिखता था, वह अतुलनीय था। उन्होंने जयदेव के गीत गोविंद पर आधारित प्रस्तुतियाँ दीं जो ओडिसी के सर्वश्रेष्ठ उदाहरणों में गिनी जाती हैं।

पुरस्कार और सम्मान

यामिनी कृष्णमूर्ति को उनकी अद्वितीय कला साधना के लिए अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है:

पुरस्कार का नामवर्षविवरण
पद्म श्री1968भारत सरकार द्वारा नृत्य कला में उत्कृष्ट योगदान हेतु
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार1977भारत की शीर्ष कला अकादमी द्वारा सम्मान
पद्म भूषण2001भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान
कालिदास सम्मान2003मध्य प्रदेश सरकार द्वारा
नृत्य चूड़ामणिकृष्ण गण सभा, चेन्नई द्वारा
संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप2016सर्वोच्च अकादमिक सम्मान
पुरस्कार एवं सम्मान
1968
पद्म श्री
भारत सरकार द्वारा नृत्य कला में असाधारण योगदान हेतु
भारत सरकार
1977
संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार
भारत की शीर्ष कला अकादमी द्वारा शास्त्रीय नृत्य में उत्कृष्टता हेतु
अकादमी पुरस्कार
2001
पद्म भूषण
भारत का तीसरा सर्वोच्च नागरिक सम्मान — जीवन भर की कला सेवा हेतु
भारत सरकार
2003
कालिदास सम्मान
मध्य प्रदेश सरकार द्वारा शास्त्रीय कला हेतु प्रदत्त
राज्य पुरस्कार
2016
संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप
सर्वोच्च अकादमिक सम्मान — भारतीय प्रदर्शन कला में जीवन भर का योगदान
फेलोशिप

प्रमुख प्रस्तुतियाँ एवं कार्यक्रमों की तालिका

नीचे दी गई तालिका में यामिनी कृष्णमूर्ति के कला जीवन की प्रमुख प्रस्तुतियाँ, माध्यम/विधा और वर्षानुसार विवरण प्रस्तुत है:

वर्षकार्यक्रम / प्रस्तुति का नाममाध्यम / विधास्थान
1957भरतनाट्यम अरंगेत्रम प्रदर्शनमंच प्रदर्शनचेन्नई, तमिलनाडु
1962दिल्ली में प्रमुख प्रदर्शनशास्त्रीय नृत्यनई दिल्ली
1968पद्म श्री सम्मान समारोहदस्तावेज़ / छायाचित्रराष्ट्रपति भवन
1971अंतर्राष्ट्रीय दौरा — यूरोपभरतनाट्यम / कुचिपुड़ीयूरोप
1975ओडिसी नृत्य में महारतओडिसी प्रदर्शनभुवनेश्वर
1981संयुक्त राज्य अमेरिका दौरातीनों शैलियाँअमेरिका
1988संगीत नाटक अकादमी पुरस्कारसम्मान समारोहनई दिल्ली
1992यामिनी स्कूल ऑफ डांस की स्थापनाशिक्षा / प्रशासननई दिल्ली
2001पद्म भूषण सम्मानसम्मान / दस्तावेज़राष्ट्रपति भवन
2007A Passion for Dance आत्मकथासाहित्य / संस्मरणनई दिल्ली
2013कलाश्रम में विशेष प्रदर्शनशास्त्रीय नृत्यनई दिल्ली
201660 वर्षीय नृत्य करियर उत्सवविशेष प्रदर्शननई दिल्ली
2019राष्ट्रीय नृत्य उत्सव में भागीदारीभरतनाट्यमदिल्ली
2022डिजिटल नृत्य महोत्सववर्चुअल प्रदर्शनऑनलाइन प्रसारण

साहित्यिक और बौद्धिक योगदान

आत्मकथा: A Passion for Dance

यामिनी कृष्णमूर्ति ने 2007 में अपनी आत्मकथा ‘A Passion for Dance’ प्रकाशित की। यह पुस्तक न केवल उनके नृत्य जीवन की कहानी है, बल्कि भारतीय शास्त्रीय नृत्य की परंपरा, उसके संघर्ष और उसकी महिमा का एक दस्तावेज़ भी है। इस पुस्तक में उन्होंने अपने गुरुओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की, नृत्य के अनुशासन और साधना के महत्व को रेखांकित किया और अपने अंतर्राष्ट्रीय अनुभवों को साझा किया।

यह पुस्तक नृत्य के विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और कला प्रेमियों के लिए एक अनमोल संदर्भ ग्रंथ बन गई है। इसमें यामिनी की सजीव भाषा और उनके अनुभवों की गहराई पाठकों को भारतीय नृत्य की दुनिया में ले जाती है।

नृत्य पर व्याख्यान और लेखन

यामिनी कृष्णमूर्ति ने अपने नृत्य के साथ-साथ व्याख्यानों, सेमिनारों और कार्यशालाओं के माध्यम से भी भारतीय कला की सेवा की। उन्होंने देश-विदेश के विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों में शास्त्रीय नृत्य पर व्याख्यान दिए। उनके विचारों ने नृत्य की सैद्धांतिक समझ को गहरा किया।

विरासत और प्रभाव

यामिनी स्कूल ऑफ डांस

1992 में यामिनी कृष्णमूर्ति ने नई दिल्ली में ‘यामिनी स्कूल ऑफ डांस’ की स्थापना की। यह विद्यालय आज भारतीय शास्त्रीय नृत्य की शिक्षा का एक प्रतिष्ठित केंद्र है। यहाँ देश भर से विद्यार्थी आकर भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी की शिक्षा प्राप्त करते हैं। इस विद्यालय के माध्यम से यामिनी जी ने हजारों शिष्यों को शास्त्रीय नृत्य की गुरु-शिष्य परंपरा में दीक्षित किया है।

शिष्य परंपरा

यामिनी कृष्णमूर्ति के अनेक शिष्य आज भारत और विश्व भर में शास्त्रीय नृत्य के प्रचार-प्रसार में संलग्न हैं। उनकी शिष्य परंपरा इस बात का प्रमाण है कि एक महान गुरु का प्रभाव पीढ़ी-दर-पीढ़ी जारी रहता है। उन्होंने अपने शिष्यों को न केवल नृत्य की तकनीक सिखाई, बल्कि कला के प्रति समर्पण, अनुशासन और आध्यात्मिक भाव भी दिया।

भारतीय नृत्य को वैश्विक पहचान

यामिनी कृष्णमूर्ति ने अपने अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनों के माध्यम से भारतीय शास्त्रीय नृत्य को वैश्विक मंच पर स्थापित किया। उन्होंने सिद्ध किया कि भारतीय नृत्य की भाषा सार्वभौमिक है और यह किसी भी देश और संस्कृति के दर्शकों को प्रभावित करने में सक्षम है। उनके प्रयासों ने भारतीय सांस्कृतिक कूटनीति को एक नई दिशा दी।

विश्वभर में जहाँ-जहाँ यामिनी ने नृत्य किया, वहाँ भारतीय संस्कृति की एक झलक मिली। उनके प्रदर्शनों ने विदेशी दर्शकों को भारतीय पुराण, आध्यात्म और सौंदर्यशास्त्र से परिचित कराया।

कला दर्शन और जीवन दृष्टि

यामिनी कृष्णमूर्ति के लिए नृत्य केवल एक कला नहीं, बल्कि ईश्वर की साधना है। उनका मानना है कि शास्त्रीय नृत्य में भगवान की उपस्थिति होती है और नर्तक उस दिव्य ऊर्जा का माध्यम बनता है। उनके जीवन में नृत्य का स्थान पूजा से कम नहीं रहा।

वे मानती हैं कि एक सच्चा कलाकार वही है जो जीवन भर सीखता रहे और अपनी कला को प्रतिदिन निखारे। उनका जीवन इसी सिद्धांत का प्रतीक है — दशकों की साधना के बावजूद उन्होंने कभी सीखना बंद नहीं किया।

यामिनी के अनुसार, शास्त्रीय नृत्य की शक्ति इसकी परंपरा में है। नई पीढ़ी को इस परंपरा का सम्मान करते हुए आगे बढ़ना चाहिए। उन्होंने हमेशा अपने शिष्यों को प्रेरित किया कि वे गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखें और शास्त्रों का अध्ययन करें।

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs)

निम्नलिखित प्रश्न यामिनी कृष्णमूर्ति के जीवन और कला पर आधारित हैं। प्रत्येक प्रश्न के नीचे सही उत्तर दिया गया है:

1. यामिनी कृष्णमूर्ति को कुचिपुड़ी नृत्य में प्रशिक्षण किसने दिया?(a) केलुचरण महापात्र(b) वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री(c) कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई(d) बिरजू महाराजउत्तर: (b) वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री
2. यामिनी कृष्णमूर्ति को पद्म श्री किस वर्ष प्रदान किया गया?(a) 1962(b) 1965(c) 1968(d) 1972उत्तर: (c) 1968
3. यामिनी कृष्णमूर्ति की आत्मकथा का नाम क्या है?(a) My Dance, My Life(b) A Passion for Dance(c) Dancing with the Stars(d) The Art of Movementउत्तर: (b) A Passion for Dance
4. यामिनी कृष्णमूर्ति ने किस नृत्य शैली में नहीं प्रशिक्षण लिया?(a) भरतनाट्यम(b) कथकली(c) कुचिपुड़ी(d) ओडिसीउत्तर: (b) कथकली
5. किस गुरु से यामिनी ने ओडिसी नृत्य सीखा?(a) पंडित बिरजू महाराज(b) रुक्मिणी देवी अरुंडेल(c) केलुचरण महापात्र(d) यामिनी देवीउत्तर: (c) केलुचरण महापात्र
6. यामिनी कृष्णमूर्ति को पद्म भूषण कब मिला?(a) 1995(b) 1998(c) 2001(d) 2005उत्तर: (c) 2001
7. यामिनी कृष्णमूर्ति ने किस संस्था की स्थापना की?(a) नालंदा नृत्य अकादमी(b) यामिनी स्कूल ऑफ डांस(c) कलाक्षेत्र(d) गंधर्व महाविद्यालयउत्तर: (b) यामिनी स्कूल ऑफ डांस
8. यामिनी का जन्म किस राज्य में हुआ?(a) तमिलनाडु(b) आंध्र प्रदेश(c) केरल(d) ओडिशाउत्तर: (b) आंध्र प्रदेश
9. संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार किस क्षेत्र में दिया जाता है?(a) चित्रकला(b) मूर्तिकला(c) संगीत, नृत्य, नाटक(d) साहित्यउत्तर: (c) संगीत, नृत्य, नाटक
10. यामिनी कृष्णमूर्ति की भरतनाट्यम शिक्षा का प्रारंभिक केंद्र कहाँ था?(a) दिल्ली(b) मुंबई(c) कांचीपुरम/चेन्नई(d) हैदराबादउत्तर: (c) कांचीपुरम/चेन्नई

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)

प्र. यामिनी कृष्णमूर्ति कौन हैं? 

उ. यामिनी कृष्णमूर्ति भारत की एक महान शास्त्रीय नृत्यांगना हैं जिन्होंने भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी — तीन प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियों में महारत हासिल की है। वे पद्म श्री और पद्म भूषण से सम्मानित हैं और भारतीय शास्त्रीय नृत्य की जीवित किंवदंती मानी जाती हैं।

प्र. यामिनी कृष्णमूर्ति का जन्म कहाँ हुआ? 

उ. उनका जन्म 20 दिसंबर 1940 को मधुरांतकम, आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) में हुआ था।

प्र. उन्होंने कितनी नृत्य शैलियाँ सीखीं? 

उ. उन्होंने तीन प्रमुख भारतीय शास्त्रीय नृत्य शैलियाँ सीखीं: भरतनाट्यम (गुरु कांचीपुरम एल्लप्पा पिल्लई से), कुचिपुड़ी (गुरु वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री से) और ओडिसी (गुरु केलुचरण महापात्र से)।

प्र. यामिनी को कौन-कौन से प्रमुख पुरस्कार मिले हैं? 

उ. उन्हें पद्म श्री (1968), संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार (1977), पद्म भूषण (2001), कालिदास सम्मान (2003) और संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप (2016) सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मान मिले हैं।

प्र. यामिनी कृष्णमूर्ति की आत्मकथा का नाम क्या है? 

उ. उनकी आत्मकथा का नाम ‘A Passion for Dance’ है जो 2007 में प्रकाशित हुई। इसमें उनकी नृत्य यात्रा, गुरुओं के साथ अनुभव और भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति उनके दृष्टिकोण का विस्तृत वर्णन है।

प्र. उन्होंने किस विद्यालय की स्थापना की? 

उ. उन्होंने 1992 में नई दिल्ली में ‘यामिनी स्कूल ऑफ डांस’ की स्थापना की जो आज भारतीय शास्त्रीय नृत्य शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र है।

प्र. कुचिपुड़ी नृत्य में उनकी कौन सी प्रस्तुति सबसे प्रसिद्ध है? 

उ. भामाकलापम में सत्यभामा की भूमिका और तरंगम (पीतल की थाली पर नृत्य) उनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध कुचिपुड़ी प्रस्तुतियों में गिनी जाती हैं।

प्र. यामिनी ने किन देशों में अपना नृत्य प्रदर्शन किया? 

उ. उन्होंने अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, जापान, रूस, कनाडा सहित दर्जनों देशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का प्रतिनिधित्व किया।

प्र. भारतीय नृत्य में उनका सबसे बड़ा योगदान क्या है? 

उ. एक साथ तीन शास्त्रीय नृत्य शैलियों में पूर्णता प्राप्त करना, उन्हें अंतर्राष्ट्रीय मंच पर ले जाना, हजारों शिष्यों को प्रशिक्षित करना और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवित रखना उनका सबसे महत्वपूर्ण योगदान है।

प्र. यामिनी कृष्णमूर्ति को ‘नृत्य त्रिवेणी’ क्यों कहा जाता है? 

उ. क्योंकि उन्होंने तीन प्रमुख शास्त्रीय नृत्य धाराओं — भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी और ओडिसी — में समान दक्षता हासिल की, जैसे तीन नदियों का संगम त्रिवेणी कहलाता है।

उपसंहार

यामिनी कृष्णमूर्ति भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक अमर विभूति हैं। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि सच्ची लगन, अदम्य परिश्रम और गुरु के प्रति समर्पण से कोई भी कलाकार अपने क्षेत्र में शिखर तक पहुँच सकता है। उन्होंने तीन भिन्न शास्त्रीय नृत्य शैलियों में महारत हासिल करके एक ऐसा कीर्तिमान स्थापित किया जो आज तक विरल है।

उनकी कला यात्रा केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है — यह भारतीय सभ्यता और संस्कृति की अमरता की कहानी है। भरतनाट्यम की ताल, कुचिपुड़ी की नाटकीयता और ओडिसी की सुकुमारता — इन तीनों को एक साथ जीना यामिनी जी ने संभव किया। वे सच्चे अर्थों में भारतीय नृत्य की त्रिवेणी हैं।

आज जब भारतीय शास्त्रीय नृत्य वैश्विक मंच पर अपना स्थान बना रहा है, यामिनी कृष्णमूर्ति का योगदान उस प्रक्रिया की नींव में है। उनके शिष्य, उनकी आत्मकथा, उनका विद्यालय और उनके असंख्य प्रदर्शन — ये सब मिलकर एक ऐसी विरासत बनाते हैं जो आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।

यामिनी कृष्णमूर्ति को शत्-शत् नमन!

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