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नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण | Indian Art History

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नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण

नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण | Indian Art History

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नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण — नवरात्रि में देवी के 9 रूपों का कला में चित्रण — तंजावुर, केरल मुरल, मधुबनी, गोंड, राजपूत चित्रकला और मूर्तिकला में महिषासुरमर्दिनी। जानें नवरात्रि देवी कला चित्रण की पूरी परंपरा। परिचय: नवरात्रि — नौ दिन, नौ रंग, नौ रूप भारतीय संस्कृति में नवरात्रि केवल ...

नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण

नवरात्रि और कला — देवी के 9 रूपों का चित्रण — नवरात्रि में देवी के 9 रूपों का कला में चित्रण — तंजावुर, केरल मुरल, मधुबनी, गोंड, राजपूत चित्रकला और मूर्तिकला में महिषासुरमर्दिनी। जानें नवरात्रि देवी कला चित्रण की पूरी परंपरा।

परिचय: नवरात्रि — नौ दिन, नौ रंग, नौ रूप

भारतीय संस्कृति में नवरात्रि केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है — यह एक जीवंत कला परंपरा का उत्सव भी है। नौ दिनों तक चलने वाले इस महापर्व में देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना की जाती है, और इन्हीं नौ रूपों को भारतीय कलाकारों ने सदियों से अपने चित्रों, मूर्तियों और लोक कलाओं में जीवंत किया है। जब हम भारतीय कला के इतिहास की बात करते हैं, तो देवी की उपासना और उनके कलात्मक चित्रण को अलग करके देखना असंभव है।

नवरात्रि शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है — “नव” अर्थात नौ और “रात्रि” अर्थात रात। यह पर्व वर्ष में मुख्यतः दो बार मनाया जाता है — चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि। शारदीय नवरात्रि अश्विन मास में आती है और इसे सबसे प्रमुख माना जाता है। इन नौ दिनों में देवी के नौ रूपों — शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री — की उपासना की जाती है।

भारतीय धार्मिक कला में देवी दुर्गा का चित्रण अत्यंत विविधतापूर्ण रहा है। उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक — हर क्षेत्र की अपनी कलात्मक शैली है जिसमें देवी के अलग-अलग रूप उकेरे गए हैं। राजस्थान की राजपूत चित्रकला हो, बिहार की मधुबनी कला हो, या केरल की भित्तिचित्र परंपरा — हर शैली में देवी अपने भव्य और दिव्य रूप में विद्यमान हैं।

इस लेख में हम नवरात्रि और भारतीय कला के इस अद्भुत संगम को विस्तार से समझेंगे। हम देखेंगे कि किस प्रकार भारत की विभिन्न कला परंपराओं ने देवी के नौ रूपों को अपने-अपने तरीके से अभिव्यक्त किया है। यह लेख न केवल कला प्रेमियों के लिए बल्कि परीक्षार्थियों के लिए भी उपयोगी होगा।

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नौ देवियों का कला में चित्रण: शैलपुत्री से सिद्धिदात्री

भारतीय देवी कला की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि प्रत्येक देवी रूप के साथ विशिष्ट प्रतीक, वाहन, आयुध और रंग जुड़े हुए हैं। कलाकार इन प्रतीकों के माध्यम से देवी की पहचान और महत्व को दर्शाते हैं।

1. शैलपुत्री नवरात्रि के प्रथम दिन शैलपुत्री की पूजा होती है। “शैल” का अर्थ है पर्वत और “पुत्री” का अर्थ है बेटी — अर्थात पर्वतराज हिमालय की पुत्री। कला में इन्हें वृषभ (बैल) पर सवार दिखाया जाता है। दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल धारण किए हुए। इनके चित्रण में सफेद रंग का प्रयोग प्रमुखता से होता है जो शुद्धता और पवित्रता का प्रतीक है।

2. ब्रह्मचारिणी द्वितीय दिन की देवी ब्रह्मचारिणी तपस्या और साधना की प्रतीक हैं। कला में इन्हें श्वेत वस्त्रों में नंगे पैर चलते हुए दिखाया जाता है। दाहिने हाथ में जप माला और बाएँ हाथ में कमंडल — ये दोनों प्रतीक उनकी तपस्वी प्रकृति को दर्शाते हैं। भारतीय मूर्तिकला में इनकी मुद्रा अत्यंत शांत और ध्यानमग्न होती है।

3. चंद्रघंटा तृतीय दिन की देवी चंद्रघंटा के मस्तक पर अर्धचंद्र और घंटे का संयोजन होता है। इनके दस हाथों में विभिन्न आयुध होते हैं। कला शास्त्र के अनुसार इनका रंग स्वर्ण के समान है और ये सिंह पर सवार हैं। कला में इनका चित्रण वीरता और साहस का प्रतीक है।

4. कूष्मांडा चतुर्थ दिन की देवी कूष्मांडा को ब्रह्मांड की सृष्टिकर्त्री माना जाता है। “कू” अर्थात छोटा, “उष्म” अर्थात ऊर्जा और “अंडा” अर्थात ब्रह्मांड। कला में इन्हें आठ भुजाओं वाली दिखाया जाता है जिनमें कमंडल, धनुष, बाण, कमल, सुधापान, जपमाला, गदा और चक्र हैं। भारतीय धार्मिक चित्रकला में इनका स्वरूप अत्यंत तेजस्वी और प्रकाशमान होता है।

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5. स्कंदमाता पंचम दिन की देवी स्कंदमाता कार्तिकेय (स्कंद) की माता हैं। कला में इन्हें कमल के आसन पर बैठे और गोद में बाल कार्तिकेय को लिए हुए दिखाया जाता है। इनकी चार भुजाएँ होती हैं और ये सिंह पर सवार होती हैं। मातृत्व का यह कलात्मक चित्रण भारतीय कला में अत्यंत भावपूर्ण और कोमल होता है।

6. कात्यायनी षष्ठम दिन की देवी कात्यायनी महर्षि कात्यायन की पुत्री के रूप में जन्मी थीं। ये महिषासुर के वध से जुड़ी हैं। कला में इन्हें चार भुजाओं के साथ दिखाया जाता है — एक हाथ में कमल, एक में खड्ग और दो हाथ अभय व वर मुद्रा में। सिंह इनका वाहन है और लाल रंग इनका प्रतीक। भारतीय शास्त्रीय कला में इनका चित्रण शक्ति और न्याय का प्रतीक है।

7. कालरात्रि सप्तम दिन की देवी कालरात्रि सबसे उग्र रूप हैं। इनका रंग काला, बाल बिखरे हुए और तीन नेत्र हैं। गधा इनका वाहन है और इनके हाथों में खड्ग, लौह कंटक तथा अग्नि होती है। उग्र देवी का यह चित्रण कला में सबसे चुनौतीपूर्ण माना जाता है क्योंकि रौद्र और भयंकर रूप को सौंदर्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करना कलाकार की परीक्षा लेता है।

8. महागौरी अष्टम दिन की देवी महागौरी अत्यंत शुभ्र और गौर वर्ण की हैं। श्वेत वस्त्र, श्वेत आभूषण और श्वेत वाहन (वृषभ) — सब कुछ श्वेत। सफेद रंग का यह प्रयोग शुद्धि, करुणा और शांति का प्रतीक है। कला में इनका स्वरूप सबसे कोमल और मनोहारी होता है।

9. सिद्धिदात्री नवम दिन की देवी सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों की दात्री हैं। कमल पर विराजमान, चार भुजाओं में गदा, चक्र, शंख और कमल धारण किए। भारतीय कला परंपरा में नवरात्रि के समापन पर इनकी पूजा सर्वोच्च कलात्मक उत्साह के साथ की जाती है।

नवरात्रि के नौ रंगों का कला में महत्व

भारतीय रंग दर्शन और नवरात्रि का संबंध अत्यंत गहरा है। नवरात्रि में प्रत्येक दिन के लिए एक विशेष रंग निर्धारित है, और ये रंग केवल परिधान का विषय नहीं हैं — ये कला, मनोविज्ञान और आध्यात्म का अद्भुत संगम हैं।

रंगों की सूची और उनका महत्व:

दिनदेवीरंगकलात्मक महत्व
प्रथमशैलपुत्रीपीलाऊर्जा और प्रसन्नता
द्वितीयब्रह्मचारिणीहराप्रकृति और विकास
तृतीयचंद्रघंटाभूरा/ग्रेस्थिरता
चतुर्थकूष्मांडानारंगीसाहस और उत्साह
पंचमस्कंदमातासफेदशांति और पवित्रता
षष्ठमकात्यायनीलालशक्ति और उत्साह
सप्तमकालरात्रिनीलारक्षा और गहराई
अष्टममहागौरीगुलाबीप्रेम और करुणा
नवमसिद्धिदात्रीबैंगनीआध्यात्मिकता

भारतीय कला में रंगों का प्रयोग केवल सौंदर्य के लिए नहीं होता — प्रत्येक रंग का एक विशिष्ट आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक अर्थ होता है। इसे “वर्ण विधान” कहते हैं।

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भारतीय चित्रकला में रंग दर्शन

प्राचीन भारतीय चित्रकला शास्त्र के अनुसार देवी चित्रण में रंगों का सुनिश्चित विधान है। अजंता की गुफाओं से लेकर राजपूत मिनिएचर तक — सभी में देवी के चित्रण में रंगों का यह शास्त्रोक्त प्रयोग देखने को मिलता है। लाल रंग शक्ति और ऊर्जा का, सफेद शुद्धता का, पीला ज्ञान का और काला या गहरा नीला रहस्य और ब्रह्मांडीय शक्ति का प्रतीक है।

आधुनिक भारतीय कलाकारों ने इस परंपरागत रंग विधान को नई संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है। समकालीन देवी चित्रण में परंपरागत रंगों के साथ-साथ नई रंग योजनाएँ भी देखने को मिलती हैं।

दक्षिण भारतीय कला में देवी: तंजावुर और केरल मुरल

दक्षिण भारतीय धार्मिक कला का अपना एक विशिष्ट और समृद्ध संसार है जिसमें देवी का चित्रण अत्यंत भव्य और विस्तृत रूप में होता है।

तंजावुर चित्रकला

तंजावुर (तमिलनाडु) की चित्रकला भारत की सबसे प्रसिद्ध धार्मिक कला शैलियों में से एक है। इस शैली की विशेषताएँ हैं:

  • सोने की पत्ती (Gold Leaf) का व्यापक प्रयोग
  • रत्न और अर्ध-रत्नों से सजावट
  • गहरे और चमकदार रंगों का प्रयोग
  • देवी की भव्य और राजसी प्रस्तुति

तंजावुर पेंटिंग में देवी दुर्गा का चित्रण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महिषासुरमर्दिनी के रूप में दुर्गा को असुर के ऊपर खड़े और सिंह पर सवार दिखाया जाता है। इनकी अष्टभुजाएँ विभिन्न आयुध धारण किए होती हैं और पृष्ठभूमि में सोने की पत्ती से बनी जटिल कलाकृति होती है। तंजावुर कला के विस्तृत चित्रण में देवी के परिधान, आभूषण और मुकुट को इतनी सूक्ष्मता से दर्शाया जाता है कि यह लगभग त्रि-आयामी प्रतीत होता है।

17वीं-18वीं शताब्दी में मराठा शासकों के संरक्षण में तंजावुर चित्रकला का स्वर्णकाल आया। इस दौरान देवी के अनेक भव्य चित्र बनाए गए जो आज विश्व के प्रमुख संग्रहालयों में संरक्षित हैं।

केरल मुरल (भित्तिचित्र)

केरल की मुरल (भित्तिचित्र) परंपरा भारत की सबसे प्राचीन और समृद्ध भित्तिचित्र परंपराओं में से एक है। केरल के मंदिरों की दीवारों पर बने ये विशाल चित्र न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं बल्कि कलात्मक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

केरल मुरल की विशेषताएँ:

  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग (पत्थर, पौधों और खनिजों से बने)
  • पाँच मूल रंगों का प्रयोग — पंचवर्ण: पीला, लाल, हरा, काला और सफेद
  • रेखाओं की स्पष्टता और परिशुद्धता
  • देवी के अलंकरण में जटिल विवरण

केरल भित्तिचित्र में देवी का सबसे प्रसिद्ध चित्रण पद्मनाभपुरम महल और कृष्णापुरम महल में मिलता है। यहाँ देवी दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी के रूप में अत्यंत शक्तिशाली और गतिशील मुद्रा में दिखाया गया है। केरल मुरल में देवी के नेत्र विशेष रूप से बड़े और भावपूर्ण होते हैं — यह इस शैली की पहचान है।

तिरुवनंतपुरम के पद्मनाभस्वामी मंदिर और त्रिशूर के वडक्कुनाथन मंदिर में केरल की देवी भित्तिचित्र कला के उत्कृष्ट उदाहरण देखे जा सकते हैं।

राजपूत चित्रकला में देवी के रूप

राजपूत चित्रकला भारतीय लघु चित्रकला की सर्वाधिक समृद्ध शाखाओं में से एक है। राजस्थान और पहाड़ी क्षेत्रों (हिमाचल प्रदेश) में विकसित इस चित्रकला परंपरा में देवी का चित्रण विशेष महत्व रखता है।

राजस्थानी चित्रकला में देवी

राजस्थान की विभिन्न रियासतों में चित्रकला की अलग-अलग शैलियाँ विकसित हुईं — मेवाड़, मारवाड़, बूंदी, कोटा, किशनगढ़ और जयपुर। इन सभी शैलियों में देवी दुर्गा का चित्रण एक महत्वपूर्ण विषय रहा है।

मेवाड़ शैली में देवी का चित्रण सबसे प्राचीन और शास्त्रसम्मत है। 17वीं शताब्दी के मेवाड़ चित्रों में दुर्गा को महिषासुर के साथ युद्ध करते हुए दिखाया गया है। इन चित्रों में गहरे लाल और नारंगी रंगों का प्रयोग युद्ध की तीव्रता को दर्शाता है।

बूंदी-कोटा शैली में देवी चित्रण की अपनी विशेषता है — यहाँ दुर्गा को जंगल और पर्वत के बीच दिखाया जाता है जो प्राकृतिक परिवेश के साथ देवी के संबंध को दर्शाता है।

किशनगढ़ शैली में देवी के मुखमंडल की विशेष प्रस्तुति होती है — लंबी नासिका, कमानदार भौंहें और कमल-नयन। किशनगढ़ के चित्रकार नागरीदास के नेतृत्व में देवी के इस सौम्य और आदर्श रूप को उकेरा गया।

पहाड़ी चित्रकला में देवी

हिमाचल प्रदेश की पहाड़ी शैलियों में — विशेषकर काँगड़ा, बसोहली और गुलेर — में देवी चित्रण एक प्रमुख विषय रहा है।

बसोहली शैली (17वीं शताब्दी) में देवी का चित्रण सबसे उग्र और शक्तिशाली है। इस शैली में चमकदार पीले रंग की पृष्ठभूमि, गहरे लाल रंग और बोल्ड रेखाओं का प्रयोग किया जाता है। बसोहली शैली की देवी श्रृंखला जिसमें देवी महात्म्य के दृश्यों को चित्रित किया गया है, भारतीय कला की अमूल्य धरोहर है।

काँगड़ा शैली (18वीं शताब्दी) में देवी का चित्रण अपेक्षाकृत कोमल और भावपूर्ण है। महाराजा संसार चंद के शासनकाल में काँगड़ा में देवी के अनेक मनोरम चित्र बनाए गए। इनमें देवी की कृपालु और मातृवत् मुद्रा को विशेष रूप से उभारा गया है।

देवी महात्म्य के चित्र

देवी महात्म्य (मार्कण्डेय पुराण का भाग) में देवी के विभिन्न स्वरूपों और उनके द्वारा किए गए असुर-वध के वर्णन हैं। इस ग्रंथ के दृश्यों को राजपूत चित्रकारों ने अपनी-अपनी शैली में चित्रित किया है। मधु-कैटभ वध, महिषासुर वध और शुंभ-निशुंभ वध के दृश्य राजपूत लघुचित्रों में बार-बार आते हैं।

लोक कला में नवरात्रि: मधुबनी और गोंड

भारतीय लोक कला भारत की सांस्कृतिक विविधता का जीवंत प्रमाण है। इस लोक कला परंपरा में नवरात्रि और देवी का चित्रण एक केंद्रीय विषय है।

मधुबनी (मिथिला) कला में देवी

बिहार के मिथिला क्षेत्र में विकसित मधुबनी कला भारत की सबसे प्रसिद्ध लोक कला परंपराओं में से एक है। इसे “मिथिला पेंटिंग” भी कहते हैं। नवरात्रि और देवी का चित्रण मधुबनी कला का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और लोकप्रिय विषय है।

मधुबनी कला में देवी दुर्गा की विशेषताएँ:

  • रेखाचित्रों में जटिल और सूक्ष्म विवरण
  • प्राकृतिक रंगों का प्रयोग (हल्दी, नील, फूलों के रंग)
  • देवी के आसपास फूलों, पक्षियों और प्राकृतिक तत्वों का समावेश
  • कोहबर चित्रण शैली में देवी की उपस्थिति

मधुबनी की महिला कलाकारों ने नवरात्रि के अवसर पर देवी के विभिन्न रूपों को अपनी कला में अमर किया है। दुर्गा-महिषासुर, काली, लक्ष्मी और सरस्वती के मधुबनी चित्र अत्यंत लोकप्रिय हैं।

मधुबनी की प्रसिद्ध कलाकार सीता देवी, गंगा देवी और जगदम्बा देवी ने देवी के ऐसे चित्र बनाए जो न केवल भारत में बल्कि विश्व के प्रमुख संग्रहालयों में भी सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हैं। मधुबनी कला की यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी माताओं से बेटियों को हस्तांतरित होती रही है।

गोंड कला में देवी

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के गोंड जनजाति की गोंड कला भारत की सबसे अनोखी आदिवासी कला परंपराओं में से एक है। गोंड कला में देवी की अवधारणा प्रकृति और आदिम शक्ति से जुड़ी है।

गोंड कला में देवी चित्रण की विशेषताएँ:

  • पूरे चित्र में बिंदुओं और रेखाओं का जाल
  • देवी को प्रकृति के साथ एकाकार दिखाना — पशु, पक्षी, वृक्ष
  • चमकदार और विपरीत रंगों का संयोजन
  • देवी की आकृति में ज्यामितीय तत्वों का समावेश

गोंड के प्रसिद्ध कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम ने देवी और शक्ति के आदिम रूपों को गोंड शैली में अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी कला में देवी एक ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में प्रकट होती हैं जो समस्त प्रकृति में व्याप्त है।

अन्य लोक कला परंपराएँ

वारली कला (महाराष्ट्र) में देवी को अत्यंत सरल ज्यामितीय आकृतियों में दर्शाया जाता है। वारली कला में त्रिकोण और वृत्त का प्रयोग देवी के स्वरूप को अभिव्यक्त करता है।

पट्टचित्र (ओडिशा और पश्चिम बंगाल) में देवी दुर्गा का चित्रण बंगाल की दुर्गा पूजा परंपरा से गहराई से जुड़ा है। पट्टचित्र में देवी को दस भुजाओं और महिषासुर के साथ दिखाया जाता है।

फड़ चित्रकला (राजस्थान) में देवियों की कथाओं को लंबे कपड़े पर चित्रित किया जाता है। यह एक प्रकार की चलती-फिरती कला दीर्घा है जो गाँव-गाँव में देवी की महिमा का प्रचार करती है।

मूर्तिकला में देवी: महिषासुरमर्दिनी

भारतीय मूर्तिकला में देवी दुर्गा का चित्रण महिषासुरमर्दिनी के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय और व्यापक है। यह रूप देवी की सर्वोच्च शक्ति और विजय का प्रतीक है।

महिषासुरमर्दिनी की मूर्तिकला परंपरा

“महिषासुरमर्दिनी” का शाब्दिक अर्थ है “महिषासुर का वध करने वाली।” भारतीय मूर्तिकला में यह रूप गुप्तकाल (4थी-6ठी शताब्दी ई.) से ही लोकप्रिय रहा है। इस रूप में देवी को सामान्यतः निम्नलिखित रूप में दिखाया जाता है:

  • अष्टभुज या दशभुज रूप में
  • सिंह पर सवार
  • महिष (भैंसे) का सिर काटते हुए या उसे भाले से बेधते हुए
  • विभिन्न आयुध — त्रिशूल, खड्ग, चक्र, शंख, धनुष, बाण, पाश आदि

प्रमुख मूर्तिकला उदाहरण:

महाबलीपुरम (तमिलनाडु) में स्थित महिषासुरमर्दिनी की विशाल शैल उत्कीर्ण मूर्ति भारतीय मूर्तिकला की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में से एक है। 7वीं शताब्दी की यह मूर्ति पल्लव राजाओं के काल में बनाई गई थी। इसमें देवी को गतिशील मुद्रा में दिखाया गया है — सिंह पर सवार, महिष पर पैर रखते और भाले से उसे बेधते हुए। यह मूर्ति शक्ति और गति का अद्भुत कलात्मक संयोजन है।

एलोरा की गुफाएँ (महाराष्ट्र) में भी महिषासुरमर्दिनी की अनेक महत्वपूर्ण मूर्तियाँ हैं। गुफा संख्या 6 में दुर्गा की एक भव्य प्रतिमा है। राष्ट्रकूट काल (8वीं-10वीं शताब्दी) में बनाई गई एलोरा की मूर्तियाँ भारतीय मूर्तिकला की उत्कृष्टता का प्रमाण हैं।

गुप्तकालीन मूर्तिकला में देवी

गुप्तकाल को भारतीय कला का स्वर्णकाल कहा जाता है। इस काल में देवी की मूर्तियाँ एक नई परिपूर्णता को प्राप्त हुईं। देवगढ़ (उत्तर प्रदेश), उदयगिरि (मध्य प्रदेश) और मथुरा में गुप्तकालीन देवी मूर्तियाँ मिली हैं।

उदयगिरि की गुफाओं में देवी दुर्गा की एक प्रसिद्ध प्रतिमा है जिसमें उन्हें महिष का वध करते हुए दिखाया गया है। गुप्तकालीन मूर्तिकला की विशेषता है — आकृतियों की कोमलता, अलंकरण की सूक्ष्मता और भावों की गहराई।

चोल मूर्तिकला में देवी

तमिलनाडु की चोल मूर्तिकला (9वीं-13वीं शताब्दी) में देवी पार्वती और दुर्गा की पंचधातु मूर्तियाँ (कांस्य प्रतिमाएँ) विश्वप्रसिद्ध हैं। चोल काँस्य मूर्तियों में देवी की आकृति में लय, गति और सौंदर्य का अद्भुत संयोजन है।

तिरुचेंदूर और तंजावुर के मंदिरों में चोल काँस्य प्रतिमाओं में देवी का जो रूप मिलता है वह भारतीय कला की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है।

खजुराहो और होयसल मूर्तिकला में देवी

खजुराहो (मध्य प्रदेश) के चंदेल शासकों द्वारा बनवाए गए मंदिरों में देवी की अनेक भव्य मूर्तियाँ हैं। यहाँ महिषासुरमर्दिनी और अन्य देवी रूपों का चित्रण अत्यंत परिष्कृत और विस्तृत है।

होयसल मूर्तिकला (कर्नाटक, 11वीं-14वीं शताब्दी) में देवी की मूर्तियाँ अपनी जटिल नक्काशी के लिए प्रसिद्ध हैं। हालेबिड और बेलूर के मंदिरों में देवी की मूर्तियों में इतनी सूक्ष्म कारीगरी है कि वे पत्थर नहीं बल्कि कपड़े से बनी प्रतीत होती हैं।

परीक्षा उपयोगी तथ्य + 20 MCQ

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

भारतीय कला इतिहास की परीक्षाओं के लिए निम्नलिखित तथ्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:

  1. महिषासुरमर्दिनी — भारतीय मूर्तिकला में देवी दुर्गा का सर्वाधिक चित्रित रूप।
  2. महाबलीपुरम महिषासुरमर्दिनी — पल्लव कालीन (7वीं शताब्दी), शैल उत्कीर्ण।
  3. तंजावुर पेंटिंग — 16वीं-17वीं शताब्दी, सोने की पत्ती का प्रयोग, नायक और मराठा संरक्षण।
  4. केरल मुरल — पंचवर्ण (पाँच रंग) की परंपरा, प्राकृतिक रंगों का प्रयोग।
  5. मधुबनी कला — मिथिला, बिहार; UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर सूची में शामिल।
  6. गोंड कला — मध्य प्रदेश की जनजातीय कला; जनगढ़ सिंह श्याम प्रमुख कलाकार।
  7. बसोहली शैली — सबसे पुरानी पहाड़ी चित्रकला शैली; देवी महात्म्य श्रृंखला प्रसिद्ध।
  8. काँगड़ा शैली — महाराजा संसार चंद के काल में विकास; कोमल और भावपूर्ण।
  9. राजपूत मिनिएचर — मेवाड़, मारवाड़, किशनगढ़ — देवी चित्रण की विभिन्न उपशैलियाँ।
  10. चोल काँस्य मूर्तियाँ — 9वीं-13वीं शताब्दी; पंचधातु निर्मित।
  11. पट्टचित्र — ओडिशा; दशभुज दुर्गा का लोकप्रिय विषय।
  12. वारली कला — महाराष्ट्र; ज्यामितीय आकृतियों में देवी चित्रण।
  13. एलोरा गुफाएँ — गुफा 6 में दुर्गा की भव्य प्रतिमा; राष्ट्रकूट काल।
  14. गुप्तकाल — उदयगिरि में महिषासुरमर्दिनी; भारतीय कला का स्वर्णकाल।
  15. नवरात्रि के 9 रंग — प्रत्येक दिन का एक विशिष्ट रंग।

20 बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ)

Q1. महाबलीपुरम में महिषासुरमर्दिनी की शैल मूर्ति किस शासन काल से संबंधित है?

  • (A) चोल
  • (B) पल्लव
  • (C) राष्ट्रकूट
  • (D) विजयनगर

Q2. तंजावुर चित्रकला की प्रमुख विशेषता क्या है?

  • (A) प्राकृतिक रंगों का प्रयोग
  • (B) सोने की पत्ती का प्रयोग
  • (C) ज्यामितीय आकृतियाँ
  • (D) काले और सफेद रंगों का प्रयोग

Q3. केरल मुरल में कितने मूल रंगों का प्रयोग होता है?

  • (A) तीन
  • (B) चार
  • (C) पाँच
  • (D) सात

Q4. मधुबनी कला किस राज्य से संबंधित है?

  • (A) उत्तर प्रदेश
  • (B) बिहार
  • (C) राजस्थान
  • (D) ओडिशा

Q5. गोंड कला के प्रमुख कलाकार जनगढ़ सिंह श्याम किस राज्य से थे?

  • (A) मध्य प्रदेश
  • (B) छत्तीसगढ़
  • (C) झारखंड
  • (D) ओडिशा

Q6. पहाड़ी चित्रकला की सबसे पुरानी शैली कौन सी है?

  • (A) काँगड़ा
  • (B) बसोहली
  • (C) गुलेर
  • (D) चंबा

Q7. काँगड़ा चित्रकला का विकास किस राजा के शासनकाल में हुआ?

  • (A) प्रताप सिंह
  • (B) संसार चंद
  • (C) रणजीत सिंह
  • (D) भीम सिंह

Q8. नवरात्रि के पाँचवें दिन किस देवी की पूजा होती है?

  • (A) कात्यायनी
  • (B) कालरात्रि
  • (C) स्कंदमाता
  • (D) कूष्मांडा

Q9. होयसल मंदिर किस राज्य में स्थित हैं?

  • (A) तमिलनाडु
  • (B) केरल
  • (C) कर्नाटक
  • (D) आंध्र प्रदेश

Q10. एलोरा की गुफा संख्या 6 में किस देवी की भव्य प्रतिमा है?

  • (A) लक्ष्मी
  • (B) सरस्वती
  • (C) दुर्गा
  • (D) काली

Q11. वारली कला किस राज्य की लोक कला है?

  • (A) महाराष्ट्र
  • (B) गुजरात
  • (C) राजस्थान
  • (D) मध्य प्रदेश

Q12. चोल काँस्य मूर्तियाँ किस धातु मिश्रण से बनती हैं?

  • (A) लोहा और ताँबा
  • (B) पंचधातु
  • (C) सोना और चाँदी
  • (D) ताँबा और जस्ता

Q13. नवरात्रि के नौवें दिन किस देवी की पूजा की जाती है?

  • (A) महागौरी
  • (B) कालरात्रि
  • (C) सिद्धिदात्री
  • (D) ब्रह्मचारिणी

Q14. पट्टचित्र किस राज्य की लोक कला है?

  • (A) ओडिशा
  • (B) बिहार
  • (C) पश्चिम बंगाल
  • (D) असम

Q15. “महिषासुरमर्दिनी” का शाब्दिक अर्थ क्या है?

  • (A) देवी की शक्ति
  • (B) महिषासुर का वध करने वाली
  • (C) नौ देवियों की माता
  • (D) सिंहवाहिनी देवी

Q16. फड़ चित्रकला किस राज्य की है?

  • (A) गुजरात
  • (B) राजस्थान
  • (C) हरियाणा
  • (D) पंजाब

Q17. गुप्तकालीन महिषासुरमर्दिनी मूर्ति किस स्थान पर मिलती है?

  • (A) खजुराहो
  • (B) उदयगिरि
  • (C) साँची
  • (D) भरहुत

Q18. किशनगढ़ चित्रकला में देवी के चित्रण की प्रमुख विशेषता क्या है?

  • (A) उग्र और रौद्र भाव
  • (B) काले रंग की प्रधानता
  • (C) लंबी नासिका और कमल-नयन
  • (D) अनेक भुजाएँ

Q19. नवरात्रि के सातवें दिन कौन सा रंग पहना जाता है?

  • (A) लाल
  • (B) गुलाबी
  • (C) नीला
  • (D) पीला

Q20. तंजावुर चित्रकला को किस शासक वंश का सर्वाधिक संरक्षण मिला?

  • (A) चोल
  • (B) विजयनगर
  • (C) मराठा
  • (D) पल्लव

FAQs (अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)

प्रश्न 1: नवरात्रि में देवी के नौ रूपों को “नवदुर्गा” क्यों कहते हैं?

उत्तर: “नव” का अर्थ है नौ और “दुर्गा” शक्ति की देवी हैं। नौ दिनों में नौ अलग-अलग शक्ति स्वरूपों की पूजा होती है — इसीलिए इन्हें सामूहिक रूप से “नवदुर्गा” कहते हैं। भारतीय धर्म और कला में ये नौ रूप एक संपूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का प्रतीक हैं — शैलपुत्री से आरंभ होकर सिद्धिदात्री तक।


प्रश्न 2: भारतीय कला में देवी दुर्गा का सर्वाधिक लोकप्रिय रूप कौन सा है?

उत्तर: भारतीय मूर्तिकला और चित्रकला में देवी दुर्गा का सर्वाधिक चित्रित रूप “महिषासुरमर्दिनी” है — जिसमें वे महिषासुर का वध करती हैं। यह रूप बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और हर काल और क्षेत्र की कला में पाया जाता है — गुप्तकाल से लेकर आधुनिक लोक कला तक।


प्रश्न 3: तंजावुर और केरल मुरल में क्या मुख्य अंतर है?

उत्तर: तंजावुर चित्रकला में सोने की पत्ती और रत्नों का प्रयोग होता है जबकि केरल मुरल भित्तिचित्र परंपरा है जिसमें प्राकृतिक रंगों और पंचवर्ण (पाँच रंग) का उपयोग होता है। तंजावुर पेंटिंग राजसी और भव्य होती है जबकि केरल मुरल में आध्यात्मिक गहराई और रेखाओं की परिशुद्धता प्रमुख होती है।


प्रश्न 4: मधुबनी कला में देवी दुर्गा को कैसे दिखाया जाता है?

उत्तर: मधुबनी कला में देवी दुर्गा को प्राकृतिक परिवेश में दिखाया जाता है। उनके आसपास फूल, पक्षी और प्रकृति के तत्व होते हैं। रेखाओं में जटिल विवरण होता है और प्राकृतिक रंगों — हल्दी, नील और फूलों के रंग — का प्रयोग होता है। यह कला मिथिला की महिला कलाकारों की अभिव्यक्ति है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रही है।


प्रश्न 5: नवरात्रि के नौ रंगों का कला से क्या संबंध है?

उत्तर: नवरात्रि के नौ रंग केवल परिधान तक सीमित नहीं हैं — भारतीय कला परंपरा में इन रंगों का आध्यात्मिक और प्रतीकात्मक महत्व है। प्रत्येक रंग एक विशेष भाव और शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। भारतीय चित्रकला में “वर्ण विधान” (रंग का शास्त्रीय प्रयोग) के अनुसार देवी के चित्रण में ये रंग उनके स्वरूप और शक्ति को दर्शाते हैं।


प्रश्न 6: गोंड कला और मधुबनी कला में क्या अंतर है?

उत्तर: गोंड कला मध्य प्रदेश की आदिवासी परंपरा है जिसमें पूरी आकृति बिंदुओं और रेखाओं के जाल से भरी होती है और चमकदार विपरीत रंगों का प्रयोग होता है। जबकि मधुबनी कला बिहार की मिथिला परंपरा है जिसमें प्राकृतिक रंगों और रेखाचित्रों की प्रधानता है। दोनों में देवी का चित्रण प्रमुख विषय है लेकिन दृष्टिकोण और शैली बिल्कुल भिन्न है।


प्रश्न 7: भारत में देवी कला को देखने के लिए प्रमुख स्थान कौन से हैं?

उत्तर: भारतीय देवी कला को देखने के लिए निम्नलिखित स्थान प्रमुख हैं:

  • महाबलीपुरम (तमिलनाडु) — पल्लव कालीन महिषासुरमर्दिनी
  • एलोरा गुफाएँ (महाराष्ट्र) — राष्ट्रकूट कालीन देवी मूर्तियाँ
  • तंजावुर (तमिलनाडु) — तंजावुर पेंटिंग संग्रहालय
  • पद्मनाभपुरम महल (केरल) — केरल मुरल
  • मधुबनी (बिहार) — मिथिला कला संग्रहालय
  • राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली — राजपूत और पहाड़ी चित्रकला संग्रह

प्रश्न 8: नवरात्रि और कला के बीच क्या संबंध है?

उत्तर: नवरात्रि और भारतीय कला का संबंध अत्यंत गहरा और ऐतिहासिक है। देवी की उपासना ने भारतीय कलाकारों को सदियों से प्रेरणा दी है। चित्रकला, मूर्तिकला, लोक कला — सभी में नवरात्रि के दौरान देवी के नौ रूपों का चित्रण एक विशेष उत्साह के साथ किया जाता है। नवरात्रि कला निर्माण का उत्सव भी है — लोक कलाकार इस समय विशेष रूप से देवी के चित्र बनाते हैं और यह परंपरा आज भी जीवित है।


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