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The six limbs (or principles) of Indian painting
भारतीय चित्रकला की परंपरा अत्यंत प्राचीन और समृद्ध है। प्राचीन भारतीय कला शास्त्रों में चित्रकला के छह मूलभूत तत्वों या सिद्धांतों का उल्लेख मिलता है, जिन्हें षड्अंग (षड् = छह, अंग = अंग या तत्व) कहा जाता है। इन षड्अंगों का सर्वप्रथम उल्लेख वात्स्यायन के कामसूत्र तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में मिलता है। पाँचवीं-छठी शताब्दी में इन सिद्धांतों को व्यवस्थित रूप प्रदान किया गया।
१. रूपभेद (रूपों की विविधता)
रूपभेद का अर्थ है विभिन्न रूपों, आकृतियों और प्रकारों का सही ज्ञान और उनका चित्रण। इसके अंतर्गत मानव, पशु-पक्षी, वृक्ष, पर्वत आदि विभिन्न विषयों के रूप, आकार, और बनावट का सूक्ष्म अध्ययन और उनके बीच के भेद को समझना आता है।
चित्रकार को पुरुष, स्त्री, बालक, वृद्ध आदि विभिन्न आयु वर्ग और लिंग के व्यक्तियों के शारीरिक अनुपात, भाव-भंगिमा और विशेषताओं का सम्यक् ज्ञान होना चाहिए। देवी-देवताओं, राजा-रानियों, सामान्य जनों के रूप-रंग और वेशभूषा में अंतर को स्पष्ट करना भी रूपभेद के अंतर्गत आता है। इसी प्रकार विभिन्न जाति और वर्ण के लोगों की शारीरिक विशेषताओं को पहचानना और चित्रित करना भी आवश्यक है।
२. प्रमाण (माप और अनुपात)
प्रमाण से तात्पर्य है सही माप, अनुपात और संतुलन। चित्र में अंकित की गई आकृतियों का परस्पर अनुपात सही होना अत्यंत महत्वपूर्ण है। मानव शरीर के विभिन्न अंगों – सिर, धड़, हाथ, पैर आदि का आपस में सही अनुपात होना चाहिए।
प्राचीन भारतीय शिल्प शास्त्रों में तालमान की विस्तृत व्यवस्था दी गई है, जिसमें मानव शरीर को अंगुलों में मापा जाता है। उदाहरण के लिए, एक आदर्श मानव आकृति की ऊँचाई 108 अंगुल मानी गई है। इसी प्रकार चित्र में अन्य वस्तुओं का भी परस्पर अनुपात सही होना चाहिए – जैसे वृक्ष और मनुष्य का अनुपात, भवन और मनुष्य का अनुपात आदि। प्रमाण के बिना चित्र में सामंजस्य और सौंदर्य नहीं आ सकता।
३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)
भाव चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण और प्राणवान तत्व है। इसका अर्थ है चित्र में भावनाओं और मनोदशाओं का सजीव चित्रण। चित्रकार को अपने पात्रों के माध्यम से हर्ष, शोक, क्रोध, भय, प्रेम, शांति, आश्चर्य आदि विभिन्न भावों को इस प्रकार व्यक्त करना चाहिए कि दर्शक उन्हें अनुभव कर सके।
भाव की अभिव्यक्ति केवल चेहरे के भाव-भंगिमा से ही नहीं, बल्कि शरीर की मुद्रा, हाथों की स्थिति, आँखों के भाव और समग्र शारीरिक भाषा से होती है। रामायण या महाभारत के दृश्यों में पात्रों के भावों का सटीक चित्रण चित्र को जीवंत बना देता है। भारतीय चित्रकला में नवरस (नौ रसों) की परंपरा का गहरा प्रभाव रहा है, जो भाव के महत्व को दर्शाता है।
४. लावण्य योजना (सौंदर्य और अनुग्रह)
लावण्य योजना का अर्थ है चित्र में सौंदर्य, लालित्य और आकर्षण का समावेश। यह केवल बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि आंतरिक अनुग्रह और कोमलता का प्रदर्शन भी है। चित्र में रेखाओं की कोमलता, वक्रता की मधुरता, रंगों का सामंजस्य और समग्र प्रभाव मनोहारी होना चाहिए।
स्त्री आकृतियों में नारी सुलभ कोमलता, लज्जा और सौंदर्य का चित्रण, देवी-देवताओं में दिव्यता और तेज का प्रदर्शन, प्रकृति के दृश्यों में मनोरमता – यह सब लावण्य योजना के अंतर्गत आते हैं। अजंता की चित्रकारी में लावण्य योजना का उत्कृष्ट उदाहरण देखने को मिलता है, जहाँ बोधिसत्व और अप्सराओं की आकृतियाँ अद्भुत सौंदर्य और अनुग्रह से परिपूर्ण हैं।
५. सादृश्य (समानता और यथार्थता)
सादृश्य का अर्थ है वास्तविकता के साथ समानता या साम्य। चित्रकार को अपने विषय का इतना सूक्ष्म और यथार्थ चित्रण करना चाहिए कि वह मूल वस्तु या व्यक्ति का प्रतिबिंब लगे। यदि किसी राजा या महापुरुष का चित्र बनाया जा रहा है, तो उसमें उस व्यक्ति की पहचान स्पष्ट होनी चाहिए।
प्राकृतिक दृश्यों में वृक्षों, पुष्पों, पशु-पक्षियों का चित्रण इतना सजीव होना चाहिए कि दर्शक उन्हें पहचान सके। हालांकि भारतीय चित्रकला में पूर्ण फोटोग्राफिक यथार्थता की अपेक्षा नहीं की जाती, लेकिन सादृश्य का तात्पर्य है कि चित्र में वस्तु या व्यक्ति की मूल विशेषताएँ और पहचान बनी रहे। मुगल चित्रकला में राजाओं के व्यक्तिचित्रों में सादृश्य का अद्भुत उदाहरण मिलता है।
६. वर्णिका भंग (रंगों का मिश्रण और प्रयोग)
वर्णिका भंग का संबंध रंगों के सही चयन, मिश्रण और प्रयोग से है। इसे रंग संयोजन या वर्ण विन्यास भी कहते हैं। चित्रकार को विभिन्न रंगों का ज्ञान, उनके मिश्रण से नए रंग बनाने की कला, और उचित स्थान पर उचित रंग के प्रयोग की दक्षता होनी चाहिए।
प्राचीन काल में चित्रकार प्राकृतिक स्रोतों से रंग तैयार करते थे – खनिजों, वनस्पतियों, पत्थरों और धातुओं से। रंगों की चमक, स्थायित्व और उनके प्रभाव का ज्ञान अत्यंत महत्वपूर्ण था। विभिन्न भावों और मनोदशाओं को व्यक्त करने के लिए उपयुक्त रंगों का चयन भी वर्णिका भंग का भाग है। उदाहरण के लिए, क्रोध के लिए लाल, शांति के लिए सफेद या नीला, प्रेम के लिए गुलाबी आदि।
राजस्थानी और पहाड़ी चित्रकला में रंगों का अद्भुत प्रयोग देखने को मिलता है, जहाँ प्रत्येक रंग सुविचारित और सार्थक है।
निष्कर्ष
ये षड्अंग भारतीय चित्रकला की नींव हैं और किसी भी उत्कृष्ट चित्र में इन सभी तत्वों का समावेश आवश्यक माना जाता है। ये सिद्धांत न केवल प्राचीन काल में प्रासंगिक थे, बल्कि आज भी भारतीय कला की पहचान और उसके सौंदर्यशास्त्र का आधार हैं। इन छह अंगों का संतुलित प्रयोग ही एक चित्र को पूर्णता और जीवंतता प्रदान करता है।
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१. रूपभेद (रूपों की विविधता)
२. प्रमाण (माप और अनुपात)
३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)
४. लावण्य योजना (सौंदर्य और अनुग्रह)
५. सादृश्य (समानता और यथार्थता)
६. वर्णिका भंग (रंगों का मिश्रण और प्रयोग)












