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रूपभेद (रूपों की विविधता)
Morphological variation (diversity of forms)
परिभाषा और मूल अवधारणा
रूपभेद चित्रकला का प्रथम और अत्यंत महत्वपूर्ण अंग है। संस्कृत में ‘रूप’ का अर्थ है आकार या स्वरूप, और ‘भेद’ का अर्थ है भिन्नता या विभाजन। इस प्रकार रूपभेद का तात्पर्य है – विभिन्न रूपों, आकृतियों, प्रकारों और उनके बीच की सूक्ष्म भिन्नताओं का गहन ज्ञान और उनका यथार्थ चित्रण।
प्राचीन आचार्यों के अनुसार, एक कुशल चित्रकार को संसार में विद्यमान प्रत्येक वस्तु, प्राणी और तत्व के स्वरूप का विस्तृत ज्ञान होना चाहिए। यह केवल बाहरी आकार का ज्ञान नहीं है, बल्कि उस रूप की आंतरिक संरचना, उसकी गतिविधियों, उसके स्वभाव और उसकी विशिष्टताओं का सम्पूर्ण बोध है।
मानव आकृतियों में रूपभेद
आयु के आधार पर भेद
चित्रकार को विभिन्न आयु वर्ग के व्यक्तियों की शारीरिक विशेषताओं का सूक्ष्म ज्ञान होना आवश्यक है:
शिशु और बालक: शिशु का सिर शरीर के अनुपात में बड़ा होता है, गाल भरे हुए, अंग कोमल और गोलाकार, त्वचा कोमल और चमकदार। बालक की आकृति में अधिक लम्बाई परन्तु अभी भी कोमलता विद्यमान रहती है।
युवा: युवा पुरुष और स्त्री की आकृतियाँ पूर्ण विकसित, सुडौल और बलिष्ठ होती हैं। मांसपेशियाँ स्पष्ट, चेहरे पर तेज और ओज, शरीर की रेखाएँ सुनिश्चित।
प्रौढ़: मध्य आयु में शरीर की परिपक्वता, चेहरे पर अनुभव के चिह्न, शरीर में भारीपन का आभास।
वृद्ध: वृद्धावस्था में त्वचा पर झुर्रियाँ, शरीर का कुछ झुका हुआ होना, बाल सफेद, मांसपेशियों की शिथिलता, परन्तु चेहरे पर ज्ञान और अनुभव का तेज।
लिंग के आधार पर भेद
पुरुष आकृति: चौड़े कंधे, संकीर्ण कमर, मजबूत भुजाएँ, गर्दन मोटी, चेहरे की रेखाएँ कठोर और स्पष्ट, शारीरिक बनावट में बल और शक्ति का प्रदर्शन।
स्त्री आकृति: कोमल और वक्राकार रेखाएँ, संकीर्ण कंधे, चौड़े नितम्ब, लम्बी गर्दन, सुकोमल अंग, चेहरे की रेखाएँ मृदुल और मधुर, समस्त शरीर में लावण्य और कोमलता।
भारतीय चित्रकला में स्त्री सौंदर्य के विशेष लक्षण बताए गए हैं – कमल जैसे नेत्र, भ्रूलता (आँखों की पतली रेखा), चंद्रमुखी (चंद्रमा के समान मुख), मृगनयनी (हिरण जैसे नेत्र) आदि।
सामाजिक स्थिति के आधार पर रूपभेद
देवी-देवताओं का चित्रण
देवताओं की आकृतियों में दिव्यता, तेज और अलौकिकता का समावेश होना चाहिए। उनके अंग सुडौल और आदर्श अनुपात में हों। विशेष चिह्न और आभूषण जैसे – विष्णु के चार भुजाएँ, शंख-चक्र-गदा-पद्म; शिव की तीसरी आँख, जटाएँ, त्रिशूल; देवी दुर्गा की अष्टभुजाएँ आदि।
राजा-रानी और कुलीन वर्ग
राजाओं और कुलीन व्यक्तियों का चित्रण गरिमामय, भव्य वेशभूषा युक्त, कीमती आभूषणों से सुसज्जित, शरीर सुपुष्ट और स्वस्थ, मुखमंडल पर अधिकार और आत्मविश्वास का भाव।
सामान्य जन और श्रमिक वर्ग
साधारण जनता और श्रमिक वर्ग के लोगों का चित्रण अधिक सरल वेशभूषा में, शारीरिक परिश्रम के चिह्न, सादा आभूषण या बिना आभूषण के, त्वचा पर धूप और मेहनत का प्रभाव।
क्षेत्रीय और जातीय भिन्नताएँ
प्राचीन भारतीय चित्रकारों को विभिन्न क्षेत्रों और जातियों के लोगों की शारीरिक विशेषताओं का भी ज्ञान था:
- उत्तर भारतीय: गोरा रंग, लम्बी नाक, सीधे बाल
- दक्षिण भारतीय: सांवला रंग, चौड़ी नाक, घुंघराले बाल
- पूर्वी भारतीय: मध्यम कद, विशिष्ट चेहरे की बनावट
- पश्चिमी और राजस्थानी: रूखी और कठोर जलवायु का प्रभाव, मजबूत शारीरिक बनावट
पशु-पक्षियों का रूपभेद
पशुओं की विभिन्न प्रजातियाँ
घोड़ा: भारतीय चित्रकला में घोड़े का चित्रण अत्यंत महत्वपूर्ण है। लम्बी गर्दन, मजबूत टाँगें, बहती हुई अयाल, विभिन्न मुद्राओं में – दौड़ता, खड़ा, कूदता हुआ। विभिन्न नस्लों के घोड़ों की विशेषताएँ।
हाथी: विशाल शरीर, लम्बी सूंड, बड़े कान, मोटे पैर, दाँत (गजदंत), माथे पर तिलक के चिह्न, राजसी शृंगार।
गाय और बैल: भारतीय संस्कृति में पवित्र माने जाने वाले इन पशुओं का चित्रण विशेष सावधानी से – कूबड़, सींग, पूंछ, शांत स्वभाव का प्रदर्शन।
शेर और बाघ: शक्ति और पराक्रम के प्रतीक, मांसपेशियों का उभार, दाँत और नाखून, भयानक परन्तु राजसी मुद्रा।
मयूर (मोर): राष्ट्रीय पक्षी, लम्बे और रंगीन पंख, नृत्य की मुद्रा, कलगी।
पक्षियों की विविधता
विभिन्न पक्षियों – हंस, तोता, कोयल, चकोर, बाज आदि के विशिष्ट लक्षण, उनकी उड़ान, बैठने की मुद्रा, चोंच और पंखों की बनावट का सटीक चित्रण।
वनस्पति जगत का रूपभेद
वृक्षों की प्रजातियाँ
कल्पवृक्ष और अशोक वृक्ष: धार्मिक महत्व के वृक्षों का विशेष चित्रण
आम, नीम, बरगद, पीपल: सामान्य वृक्षों की विशिष्ट बनावट – पत्तियों का आकार, शाखाओं की दिशा, तने की मोटाई
ताड़ और नारियल: तटीय क्षेत्रों के वृक्ष, लम्बे और सीधे तने
पुष्प और लताएँ
कमल, गुलाब, चमेली, गेंदा आदि विभिन्न पुष्पों की पंखुड़ियों का विशेष आकार और रंग। लताओं और बेलों की घुमावदार और कोमल बनावट।
प्रकृति और भूदृश्य में रूपभेद
पर्वत
हिमालय जैसे ऊँचे पर्वतों की भव्यता, चट्टानी पहाड़, हरे-भरे पहाड़, पहाड़ों पर बर्फ का आवरण, विभिन्न आकृतियों और ऊँचाई के पर्वत।
जल स्रोत
नदी, झील, समुद्र, झरने – प्रत्येक का विशिष्ट स्वरूप। नदी की बहती धारा, समुद्र की लहरें, झील का शांत जल, झरने का गिरता जल।
आकाश
दिन और रात का आकाश, बादलों के विभिन्न प्रकार, सूर्योदय और सूर्यास्त के रंग, चंद्रमा और तारों का चित्रण।
वास्तुकला और निर्माण
भवन और महल
मंदिर, महल, किला, साधारण घर – प्रत्येक की वास्तुकला शैली में भिन्नता। स्तंभ, गुम्बद, मेहराब, द्वार, खिड़कियाँ आदि का सटीक चित्रण।
सजावटी तत्व
नक्काशी, जाली का काम, भित्ति चित्र, फर्श की बनावट।
रूपभेद का व्यावहारिक महत्व
रूपभेद के बिना चित्रकार अपने विषय को सही ढंग से प्रस्तुत नहीं कर सकता। यह ज्ञान चित्रकार को निम्नलिखित में सहायता करता है:
- यथार्थता: वस्तु या व्यक्ति का सही और पहचानने योग्य चित्रण
- विश्वसनीयता: दर्शक चित्र को सत्य मान सके
- विविधता: चित्र में एकरसता न हो, विभिन्न तत्वों में स्पष्ट अंतर दिखे
- कथा वाचन: कथा चित्रों में विभिन्न पात्रों की पहचान स्पष्ट हो
प्राचीन ग्रंथों में रूपभेद
विष्णुधर्मोत्तर पुराण में रूपभेद पर विस्तृत चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि चित्रकार को मूर्तिकला और नृत्य का भी ज्ञान होना चाहिए, क्योंकि इससे शरीर की विभिन्न मुद्राओं और आकृतियों का बोध होता है।
चित्रसूत्र और अन्य प्राचीन ग्रंथों में विभिन्न नायक-नायिकाओं, ऋतुओं, राग-रागिनियों के लिए विशिष्ट रूपों का वर्णन मिलता है।
आधुनिक संदर्भ में रूपभेद
आज भी रूपभेद का महत्व कम नहीं हुआ है। आधुनिक चित्रकार को:
- मानव शरीर रचना (Anatomy) का वैज्ञानिक ज्ञान
- विभिन्न संस्कृतियों और समाजों का अध्ययन
- प्राकृतिक जगत का सूक्ष्म निरीक्षण
- फोटोग्राफी और अन्य माध्यमों से सहायता
रूपभेद केवल देखना नहीं, बल्कि समझना और आत्मसात करना है। एक सच्चा चित्रकार संसार के प्रत्येक रूप को अपने मन-मस्तिष्क में संजो लेता है और फिर उसे कागज या कैनवास पर उतारता है। रूपभेद – विभिन्न रूपों और आकृतियों का ज्ञानप्रमाण – सही माप और अनुपातभाव – भावनाओं की अभिव्यक्तिलावण्य योजना – सौंदर्य और लालित्यसादृश्य – यथार्थता और समानतावर्णिका भंग – रंगों का सही मिश्रण और प्रयोग ।
रूपभेद – विभिन्न रूपों और आकृतियों का ज्ञानप्रमाण – सही माप और अनुपातभाव – भावनाओं की अभिव्यक्तिलावण्य योजना – सौंदर्य और लालित्यसादृश्य – यथार्थता और समानतावर्णिका भंग – रंगों का सही मिश्रण और प्रयोग ।
Read More:
१. रूपभेद (रूपों की विविधता)
२. प्रमाण (माप और अनुपात)
३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)
४. लावण्य योजना (सौंदर्य और अनुग्रह)
५. सादृश्य (समानता और यथार्थता)
६. वर्णिका भंग (रंगों का मिश्रण और प्रयोग)












