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नटराज मूर्ति CERN में क्यों है? — विज्ञान और कला का संबंध

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नटराज मूर्ति CERN में क्यों है — विज्ञान और कला का संबंध

नटराज मूर्ति CERN में क्यों है? — विज्ञान और कला का संबंध

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जानिए CERN Geneva में नटराज मूर्ति क्यों स्थापित है, Fritjof Capra का सिद्धांत, चोल कालीन कला और Particle Physics का गहरा संबंध। परीक्षा उपयोगी MCQ सहित। नटराज की मूर्ति परिचय: Geneva में CERN के बाहर नटराज — क्यों? जब आप किसी विज्ञान प्रयोगशाला के बाहर एक प्राचीन देवता की मूर्ति देखते हैं, तो पहला प्रश्न ...

नटराज मूर्ति CERN में क्यों है — विज्ञान और कला का संबंध

जानिए CERN Geneva में नटराज मूर्ति क्यों स्थापित है, Fritjof Capra का सिद्धांत, चोल कालीन कला और Particle Physics का गहरा संबंध। परीक्षा उपयोगी MCQ सहित।

नटराज की मूर्ति

परिचय: Geneva में CERN के बाहर नटराज — क्यों?

जब आप किसी विज्ञान प्रयोगशाला के बाहर एक प्राचीन देवता की मूर्ति देखते हैं, तो पहला प्रश्न यही उठता है — यहाँ यह क्यों? लेकिन जब वह प्रयोगशाला हो CERN — यानी यूरोपियन सेंटर फॉर रिसर्च इन पार्टिकल फिजिक्स — और वह मूर्ति हो भगवान शिव की नटराज स्वरूप में, तो यह प्रश्न और भी गहरा हो जाता है।

18 जून 2004 को Geneva में CERN के परिसर के बाहर एक असाधारण नई मूर्ति का अनावरण किया गया — भारतीय देवता शिव नटराज की 2 मीटर ऊँची कांस्य प्रतिमा, जो नृत्य की मुद्रा में है।

CERN वह स्थान है जहाँ दुनिया के सबसे बड़े और सबसे शक्तिशाली कण-त्वरक (Particle Accelerator) — Large Hadron Collider (LHC) — के माध्यम से ब्रह्मांड के मूलभूत रहस्यों को सुलझाने का प्रयास किया जाता है। यहाँ 100 से अधिक देशों के वैज्ञानिक कार्यरत हैं। इस स्थान पर एक हिंदू देवता की मूर्ति का होना — और वह भी स्थायी रूप से — किसी को भी चौंका सकता है।

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लेकिन इस मूर्ति की कहानी केवल एक उपहार की कहानी नहीं है। यह उस गहरे संबंध की कहानी है जो भारतीय कला और आधुनिक भौतिकी के बीच सदियों से बना हुआ है। यह कहानी है भारतीय मूर्तिकला की परंपरा की, जो हजारों वर्ष पहले उन सत्यों को कांस्य में उकेर गई जिन्हें विज्ञान आज जटिल गणनाओं से सिद्ध कर रहा है।

इस लेख में हम जानेंगे कि नटराज मूर्ति CERN में क्यों है, इसका वैज्ञानिक अर्थ क्या है, चोल कालीन कला में इसका क्या स्थान है, और आखिर क्यों एक भौतिकविद् ने कहा था कि “नटराज का नृत्य ही उपपरमाणविक कणों का नृत्य है।”

CERN ने 2004 में भारत से नटराज की मूर्ति क्यों मांगी?

यह मूर्ति स्थापित करने के पीछे एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक और वैज्ञानिक पृष्ठभूमि है।

भारत और CERN का संबंध

यह मूर्ति भारत सरकार ने CERN के साथ अपने दीर्घकालिक संबंधों को सम्मानित करने के लिए उपहार में दी थी, जो 1960 के दशक में शुरू हुए थे और आज भी मजबूत हैं। भारत CERN का Associate Member State है।

भारतीय वैज्ञानिकों की भागीदारी CERN के प्रारंभिक काल से ही रही है। भारत के अनेक परमाणु वैज्ञानिक, इंजीनियर और शोधकर्ता CERN की परियोजनाओं में सक्रिय रहे हैं। इसी दीर्घकालिक साझेदारी के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने यह भव्य मूर्ति भेजी।

अनावरण समारोह

इस मूर्ति का अनावरण WTO में भारत के राजदूत महामहिम के.एम. चन्द्रशेखर, प्रख्यात भारतीय परमाणु वैज्ञानिक डॉ. अनिल काकोडकर और CERN के तत्कालीन महानिदेशक डॉ. रॉबर्ट आयमार ने किया।

यह कोई साधारण राजनयिक उपहार नहीं था। नटराज की छवि को चुनते हुए भारत सरकार ने शिव के नृत्य के रूपक और उपपरमाणविक कणों के ब्रह्मांडीय नृत्य के बीच गहरे संबंध को स्वीकार किया, जिसे CERN के भौतिकविद् देखते और विश्लेषण करते हैं।

मूर्ति का निर्माण

CERN की यह मूर्ति भारत में बनाई गई थी। पिघले हुए मोम के मॉडल के चारों ओर मिट्टी का सांचा तैयार किया गया, फिर उसमें तरल धातु डाली गई। धातु के ठंडा होने और कठोर होने के बाद इसे पॉलिश किया गया और एक पुरातन स्वरूप दिया गया, जिसके बाद इसे Switzerland भेजा गया।

यह निर्माण प्रक्रिया वही प्राचीन Lost-Wax (Cire Perdue) तकनीक थी जिसका उपयोग चोल काल के कांस्य शिल्पकार सदियों पहले करते थे। इस प्रकार यह मूर्ति न केवल एक विचार का प्रतीक है, बल्कि एक जीवंत परंपरा की निरंतरता भी।

यह मूर्ति CERN के भवन संख्या 39 और 40 के बीच के चौक में स्थायी रूप से प्रदर्शित है, जो मुख्य भवन से थोड़ी दूरी पर है।

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नटराज का वैज्ञानिक अर्थ: Creation और Destruction का Cycle

नटराज केवल एक मूर्ति नहीं — यह ब्रह्मांड के मूल सत्य का दृश्य रूप है।

तांडव: सृष्टि का नृत्य

आगम शास्त्रों में कहा गया है: “संसार का जन्म, उसका पालन, उसका विनाश, आत्मा का आवरण और मुक्ति — ये उनके नृत्य के पाँच कार्य हैं।”

नटराज की मूर्ति भगवान शिव को उस ब्रह्मांडीय नर्तक के रूप में दर्शाती है जो सृजन, संरक्षण और विनाश को अपने दिव्य तांडव के माध्यम से नियंत्रित करता है।

यह तांडव नृत्य पाँच रूपों में होता है जो सृष्टि से विनाश तक का चक्र दर्शाता है:

  1. सृष्टि (Creation) — जब शिव नृत्य करते हैं, तो ब्रह्मांड अस्तित्व में आता है।
  2. स्थिति (Preservation) — नृत्य की निरंतरता ब्रह्मांड को बनाए रखती है।
  3. संहार (Destruction) — नृत्य की समाप्ति विनाश का प्रतीक है।
  4. तिरोधान (Concealment) — माया का आवरण।
  5. अनुग्रह (Liberation) — मोक्ष की प्राप्ति।

आधुनिक भौतिकी से समानता

अब देखिए — यही चक्र आधुनिक भौतिकी में भी दिखता है। क्वांटम फिजिक्स बताती है कि उपरमाणविक कण (subatomic particles) निरंतर उत्पन्न होते और नष्ट होते रहते हैं। एक इलेक्ट्रॉन एक क्षण में ऊर्जा के रूप में प्रकट होता है, दूसरे क्षण में वापस ऊर्जा में विलीन हो जाता है।

क्वांटम फील्ड थ्योरी के अनुसार, सृष्टि और विनाश का यह नृत्य ही पदार्थ के अस्तित्व का आधार है। आधुनिक भौतिकी ने इस प्रकार यह प्रकट किया है कि प्रत्येक उपरमाणविक कण न केवल एक ऊर्जा नृत्य करता है, बल्कि वह स्वयं एक ऊर्जा नृत्य है — सृजन और विनाश की एक स्पंदनशील प्रक्रिया।

Big Bang की अवधारणा भी इसी चक्र का एक वृहत् संस्करण है। ब्रह्मांड का एक बिंदु से विस्फोट होकर विस्तार — और अंत में फिर से संकुचन या समाप्ति — यही नटराज के तांडव का ब्रह्मांडीय स्वरूप है।

भारतीय दार्शनिक परंपरा ने जो हजारों वर्ष पहले प्रतीकों के माध्यम से कहा, उसे आज का वैज्ञानिक गणनाओं के माध्यम से सिद्ध कर रहा है। यही इस मूर्ति की असली महत्ता है।

Particle Physics और नटराज का नृत्य — Fritjof Capra का सिद्धांत

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यदि किसी एक व्यक्ति को श्रेय देना हो जिसने CERN में नटराज मूर्ति की स्थापना का मार्ग प्रशस्त किया, तो वे हैं — Fritjof Capra

कौन हैं Fritjof Capra?

Fritjof Capra एक ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी भौतिकविद्, सिस्टम थ्योरिस्ट और लेखक हैं। उनकी 1975 में प्रकाशित पुस्तक “The Tao of Physics” ने पूरी दुनिया में तहलका मचा दिया था। इस पुस्तक में उन्होंने पूर्वी दर्शन और आधुनिक भौतिकी के बीच के गहरे समानांतरों को प्रस्तुत किया।

शिव के नृत्य और उपरमाणविक कणों के नृत्य के बीच समानता को सर्वप्रथम Fritjof Capra ने 1972 में “Main Currents in Modern Thought” पत्रिका में प्रकाशित अपने लेख “The Dance of Shiva: The Hindu View of Matter in the Light of Modern Physics” में विस्तार से समझाया था।

CERN की पट्टिका पर Capra के शब्द

CERN में नटराज की मूर्ति के पास लगी पट्टिका पर Capra के “The Tao of Physics” से कई उद्धरण अंकित हैं। उनमें से एक का भावार्थ इस प्रकार है:

“आधुनिक भौतिकी ने यह दिखाया है कि सृजन और विनाश की यह लय न केवल ऋतुओं के बदलाव में और सभी जीवित प्राणियों के जन्म-मृत्यु में प्रकट होती है, बल्कि यह अकार्बनिक पदार्थ का भी मूल सार है।”

एक अन्य उद्धरण का भावार्थ: “आधुनिक भौतिकविद के लिए शिव का नृत्य उपरमाणविक पदार्थ का नृत्य है।”

और अंततः: “सैकड़ों वर्ष पहले भारतीय कलाकारों ने नृत्य करते शिव की दृश्य छवियाँ सुंदर कांस्य शृंखलाओं में रचीं। हमारे समय में भौतिकविदों ने इस ब्रह्मांडीय नृत्य के पैटर्न को चित्रित करने के लिए सबसे उन्नत तकनीक का उपयोग किया है। इस प्रकार ब्रह्मांडीय नृत्य का यह रूपक प्राचीन पौराणिकता, धार्मिक कला और आधुनिक भौतिकी को एकीकृत करता है।”

Capra का तर्क

Capra का मूल तर्क यह था कि भारतीय दर्शन — विशेषकर शैव दर्शन और वैदिक विचारधारा — ने ब्रह्मांड को एक गतिशील, परस्पर संबद्ध और निरंतर बदलते हुए तंत्र के रूप में समझा। यही समझ आधुनिक क्वांटम भौतिकी की नींव है।

जहाँ न्यूटनियन फिजिक्स ब्रह्मांड को एक स्थिर मशीन मानती थी, वहीं क्वांटम फिजिक्स यह कहती है कि हर कण संभावनाओं की एक लहर है, निरंतर परिवर्तनशील और अनिश्चित। यह अनिश्चितता, यह गतिशीलता, यह निरंतर परिवर्तन — यही नटराज का तांडव है।

CERN में नटराज की उपस्थिति इस संस्था की बहुसांस्कृतिक प्रकृति को भी दर्शाती है। CERN 100 से अधिक देशों के वैज्ञानिकों का स्वागत करता है और यह मूर्ति इस वैश्विक सहयोग का प्रतीक है।

एक CERN के पोस्ट-डॉक्टोरल शोधार्थी Aidan Randle-Conde ने लिखा: “दिन के उजाले में जब CERN जीवंत होता है, शिव चंचल दिखते हैं, हमें याद दिलाते हुए कि ब्रह्मांड निरंतर हिल-डुल रहा है, खुद को नया बना रहा है और कभी स्थिर नहीं है। लेकिन रात में, जब हमारे पास गहरे प्रश्नों पर विचार करने का समय होता है, शिव हमारे कार्य पर एक लंबी छाया डालते हैं।”

नटराज मूर्ति की कला: चोल काल की सर्वश्रेष्ठ कृति

नटराज की प्रतिमा केवल दार्शनिक प्रतीक नहीं है — यह भारतीय कला इतिहास की सर्वोच्च उपलब्धियों में से एक है।

चोल काल और नटराज

नटराज के रूप में शिव के चित्रण — नृत्य के राजा — सर्वप्रथम चोल काल (लगभग 907-1279 ई.) में बनाए गए। इस प्रकार की पंथ-प्रतिमाएं मंदिरों में उपयोग की जाती थीं और कभी-कभी जुलूसों में ले जाई जाती थीं।

चोल काल के कारीगरों ने अद्वितीय कौशल और सूक्ष्म विवरण के साथ कांस्य मूर्तियाँ तैयार कीं, जो शिव के दिव्य नृत्य की गतिशील ऊर्जा और प्रतीकात्मक समृद्धि को दर्शाती हैं। चोल काल की कांस्य मूर्तियाँ भारतीय मूर्तिशास्त्र की सबसे परिष्कृत और स्थायी उपलब्धियों में से हैं।

पंचधातु और Lost-Wax तकनीक

चोल कांस्य-ढलाई में परिष्कृत Lost-Wax (Cire Perdue या मधु उच्छिष्ट विधान) तकनीक का उपयोग किया जाता था। इसमें एक विस्तृत मोम मॉडल बनाया जाता, फिर उसे मिट्टी से ढककर सांचा बनाया जाता, मोम को पिघलाकर गुहा बनाई जाती, और उसमें पिघला हुआ कांस्य डाला जाता था।

इसमें ताँबे, जस्ते, टिन, चाँदी और सोने से बनी पाँच धातुओं की मिश्रधातु — पंचलोह — का उपयोग किया जाता था। क्योंकि ढलाई में मिट्टी का सांचा नष्ट हो जाता था, प्रत्येक कांस्य एक अद्वितीय कृति होती थी।

इस प्राचीन धातु शिल्प तकनीक को भारतीय कला परंपरा की सबसे जटिल और कुशल प्रक्रियाओं में गिना जाता है। यह वही परंपरा है जो CERN की नटराज मूर्ति में भी जीवंत है।

मूर्ति का स्वरूप

नटराज एक ज्वलंत प्रभामंडल के बीच नृत्य करते हुए दिखाए गए हैं। उनके ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू (हाथ का वाद्ययंत्र जिसने सृष्टि की प्रथम ध्वनियाँ बनाईं) है। ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि है (वह अग्नि जो ब्रह्मांड को विनाश करेगी)। नीचे के दाहिने हाथ से अभयमुद्रा बनाई गई है। उनके दाहिने पैर के नीचे एक बौने जैसी आकृति है — अपस्मार पुरुष (भ्रम, जो मानव जाति को भटकाता है)।

नटराज की छवि चोल काल में विशेष रूप से लोकप्रिय थी, जब शिल्पकारों ने कांस्य में बड़ी मात्रा में यह मूर्ति बनाई, जो 1.4 मीटर तक की ऊँचाई में थी और अक्सर धार्मिक जुलूसों और उत्सवों में ले जाई जाती थी।

विश्व कला में स्थान

एक प्रतीक के रूप में, शिव नटराज एक अद्भुत आविष्कार है। यह एकल छवि में शिव की भूमिकाओं को — ब्रह्मांड के निर्माता, संरक्षक और विध्वंसक — एकत्रित करती है और समय के अंतहीन चक्र की भारतीय संकल्पना को व्यक्त करती है।

प्रख्यात कला इतिहासकार Ananda K. Coomaraswamy ने नटराज के बारे में लिखा था (जिसका भावार्थ CERN की पट्टिका पर भी है): “यह ईश्वर की गतिविधि की वह स्पष्टतम छवि है जिसका कोई भी कला या धर्म दावा कर सकता है।”

नटराज के प्रत्येक अंग का प्रतीकात्मक अर्थ

नटराज की प्रतिमा में प्रत्येक तत्व एक गहरे दार्शनिक विचार का प्रतीक है। आइए प्रत्येक अंग को विस्तार से समझें:

1. डमरू (ऊपरी दाहिना हाथ)

ऊपरी दाहिने हाथ में घंटे के आकार का डमरू सृजन की लय और ब्रह्मांड की प्रथम ध्वनि ‘ओम’ का प्रतीक है। यह वह आदिम कंपन है जिससे सृष्टि की शुरुआत हुई। भौतिकी की भाषा में यह String Theory के उस विचार से मेल खाता है जिसमें ब्रह्मांड के मूलभूत कण कंपमान तार (vibrating strings) हैं।

2. अग्नि (ऊपरी बायाँ हाथ)

ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि ब्रह्मांड के विनाश या विघटन का प्रतीक है। यह वह ऊर्जा है जो पुराने को समाप्त करती है ताकि नए का जन्म हो सके। Big Bang के पश्चात् ब्रह्मांड की संभावित अंतिम अवस्था — Big Crunch या Heat Death — इसी अग्नि का वैज्ञानिक रूप है।

3. अभयमुद्रा (निचला दाहिना हाथ)

निचले दाहिने हाथ की अभयमुद्रा (भयहीनता की मुद्रा) भक्तों को सुरक्षा और आश्वासन प्रदान करती है। यह मुद्रा कहती है — “भयभीत मत हो, सृजन और विनाश का यह चक्र स्वाभाविक है।”

4. गजहस्त मुद्रा (निचला बायाँ हाथ)

निचला बायाँ हाथ सीने के पार गजहस्त मुद्रा में फैला है और उठे हुए बाएँ पैर की ओर संकेत करता है, जो मुक्ति और अनुग्रह का संकेत है। यह मार्ग दिखाता है — मोक्ष का मार्ग।

5. उठा हुआ बायाँ पैर

नटराज का उठा हुआ पैर मोक्ष या मुक्ति का प्रतीक है, जो जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति का प्रतिनिधित्व करता है — जो सनातन धर्म का परम लक्ष्य है।

6. अपस्मार पुरुष (दाहिने पैर के नीचे)

शिव का दाहिना पैर आमतौर पर अपस्मार पुरुष को कुचलते हुए दिखाया गया है — एक अर्ध-सत्ता जो अज्ञानता या अविद्या का प्रतीक है। यह इस बात का प्रतीक है कि जब तक हम अज्ञान को दबाकर नहीं रखते, हम आध्यात्मिक प्रगति नहीं कर सकते। वैज्ञानिक दृष्टि से यह उस पूर्वाग्रह और अंधविश्वास का प्रतीक है जिसे तर्क और ज्ञान के माध्यम से दूर किया जाता है।

7. अग्नि का प्रभामंडल (Prabhamandala)

अग्नि के घेरे के बीच किया गया नृत्य समय, ऊर्जा और चेतना की निरंतर गति का प्रतीक है। यह ब्रह्मांड की सीमाओं का भी प्रतीक है। आधुनिक भौतिकी में इसे ब्रह्मांड के Event Horizon से भी जोड़ा जा सकता है।

8. जटा और गंगा

शिव की जटाओं में गंगा नदी का प्रवाह दिखाया जाता है। यह ज्ञान और मोक्ष के प्रवाह का प्रतीक है। भौतिकी में यह Information Flow की अवधारणा से मेल खाता है जो आधुनिक क्वांटम सूचना सिद्धांत में महत्वपूर्ण है।

9. सर्प (काँसे की मूर्तियों में)

कोबरा का आकृति दोहराई जाती है और शिव के दाहिने बाँह से लटकती दिखाई देती है। सर्प काल (Time) और कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। यह उस अनंत ऊर्जा का प्रतीक है जो ब्रह्मांड में सर्वत्र व्याप्त है।

भारतीय प्रतीकात्मकता की यह गहराई ही वह कारण है जिसने CERN जैसे वैज्ञानिक संस्थान को इस छवि को अपने परिसर में स्थान देने के लिए प्रेरित किया।

परीक्षा उपयोगी तथ्य + 20 MCQ

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य

CERN और नटराज से संबंधित:

  • नटराज मूर्ति का अनावरण: 18 जून 2004
  • मूर्ति की ऊँचाई: 2 मीटर (कांस्य निर्मित)
  • मूर्ति किसने दी: भारत सरकार
  • अनावरणकर्ता: के.एम. चन्द्रशेखर (भारतीय राजदूत), डॉ. अनिल काकोडकर, डॉ. रॉबर्ट आयमार
  • CERN का पूरा नाम: Conseil Européen pour la Recherche Nucléaire
  • भारत का CERN में दर्जा: Associate Member State
  • CERN में भारत का सहयोग: 1960 के दशक से

Fritjof Capra से संबंधित:

  • पुस्तक: “The Tao of Physics” (1975)
  • प्रथम लेख: “The Dance of Shiva: The Hindu View of Matter in the Light of Modern Physics” (1972)
  • पत्रिका: Main Currents in Modern Thought
  • राष्ट्रीयता: ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी

नटराज कला से संबंधित:

  • चोल काल: 9वीं से 13वीं शताब्दी ई.
  • निर्माण तकनीक: Lost-Wax (Cire Perdue / मधु उच्छिष्ट विधान)
  • धातु: पंचलोह (ताँबा, जस्ता, टिन, चाँदी, सोना)
  • नृत्य: आनंद तांडव / नाडान्त
  • Coomaraswamy का मत: “It is the clearest image of the activity of God…”

20 महत्वपूर्ण MCQ

Q1. CERN में नटराज की मूर्ति का अनावरण कब किया गया?

(a) 18 मई 2004 (b) 18 जून 2004 ✓ (c) 18 जुलाई 2004 (d) 18 अगस्त 2004

Q2. CERN में नटराज की मूर्ति किसने भेंट की?

(a) तमिलनाडु सरकार (b) UNESCO (c) भारत सरकार ✓ (d) भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग

Q3. CERN में स्थापित नटराज की मूर्ति कितनी ऊँची है?

(a) 1 मीटर (b) 1.5 मीटर (c) 2 मीटर ✓ (d) 3 मीटर

Q4. “The Tao of Physics” पुस्तक किसने लिखी?

(a) Stephen Hawking (b) Fritjof Capra ✓ (c) Richard Feynman (d) Niels Bohr

Q5. CERN की नटराज मूर्ति के पास लगी पट्टिका पर किस पुस्तक के उद्धरण हैं?

(a) The Dancing Wu Li Masters (b) The Tao of Physics ✓ (c) A Brief History of Time (d) Quantum Reality

Q6. नटराज के ऊपरी दाहिने हाथ में क्या है?

(a) त्रिशूल (b) कमल (c) डमरू ✓ (d) वज्र

Q7. नटराज के ऊपरी बाएँ हाथ में क्या है?

(a) पद्म (b) अग्नि ✓ (c) डमरू (d) गदा

Q8. नटराज के दाहिने पैर के नीचे कौन-सी आकृति है?

(a) नंदी (b) गणेश (c) अपस्मार पुरुष ✓ (d) भैरव

Q9. नटराज की प्रतिमा परंपरा किस राजवंश ने विकसित की?

(a) पल्लव राजवंश (b) गुप्त राजवंश (c) चोल राजवंश ✓ (d) राष्ट्रकूट राजवंश

Q10. चोल काल की नटराज मूर्ति किस धातु से बनाई जाती थी?

(a) सोना (b) चाँदी (c) कांस्य (पंचलोह) ✓ (d) तांबा

Q11. Lost-Wax तकनीक को भारत में क्या कहते हैं?

(a) धातु उत्कर्षण विधि (b) मधु उच्छिष्ट विधान ✓ (c) कांस्य निर्माण विधि (d) धातु संचयन विधि

Q12. अभयमुद्रा किस हाथ से बनाई जाती है?

(a) ऊपरी बायाँ (b) निचला बायाँ (c) निचला दाहिना ✓ (d) ऊपरी दाहिना

Q13. नटराज का उठा हुआ बायाँ पैर किसका प्रतीक है?

(a) सृजन (b) विनाश (c) मोक्ष ✓ (d) काल

Q14. नटराज के नृत्य के कितने स्वरूप (पाँच कार्य) हैं?

(a) तीन (b) चार (c) पाँच ✓ (d) सात

Q15. CERN में भारत का सहयोग किस दशक से है?

(a) 1940 के दशक से (b) 1950 के दशक से (c) 1960 के दशक से ✓ (d) 1970 के दशक से

Q16. CERN का पूरा नाम क्या है?

(a) Central European Research Network (b) Conseil Européen pour la Recherche Nucléaire ✓ (c) Center for European Research in Nucleonics (d) Continental European Research in Neutrons

Q17. Fritjof Capra का 1972 का लेख किस पत्रिका में प्रकाशित हुआ था?

(a) Physics Today (b) Nature (c) Main Currents in Modern Thought ✓ (d) Scientific American

Q18. नटराज के अग्नि प्रभामंडल को क्या कहते हैं?

(a) ज्वालामंडल (b) प्रभामंडल ✓ (c) तेजोमंडल (d) आभामंडल

Q19. Ananda K. Coomaraswamy किस क्षेत्र के विद्वान थे?

(a) भौतिकी (b) रसायन विज्ञान (c) कला इतिहास ✓ (d) खगोलशास्त्र

Q20. चोल काल के नटराज में अपस्मार पुरुष किसका प्रतीक है?

(a) पाप (b) अज्ञानता ✓ (c) मृत्यु (d) क्रोध

FAQs

प्रश्न 1: नटराज की मूर्ति CERN में क्यों है?

नटराज की मूर्ति CERN में इसलिए है क्योंकि भारत सरकार ने 2004 में यह मूर्ति CERN के साथ अपने दीर्घकालिक वैज्ञानिक सहयोग के उपलक्ष्य में भेंट की थी। साथ ही यह मूर्ति इस गहरे रूपक को भी प्रकट करती है कि शिव के ब्रह्मांडीय नृत्य (तांडव) और CERN में अध्ययन किए जाने वाले उपरमाणविक कणों के नृत्य में गहरी समानता है।

प्रश्न 2: क्या CERN का नटराज मूर्ति रखना वैज्ञानिक दृष्टि से उचित है?

हाँ, बिल्कुल। CERN ने स्वयं स्पष्ट किया है कि यह मूर्ति एक कलात्मक और दार्शनिक रूपक है। जिस प्रकार नटराज का नृत्य सृजन और विनाश के अंतहीन चक्र को दर्शाता है, उसी प्रकार CERN में उपरमाणविक कण निरंतर उत्पन्न और विनष्ट होते रहते हैं। यह विज्ञान और कला के बीच के संबंध का एक सुंदर उदाहरण है।

प्रश्न 3: Fritjof Capra कौन हैं और उन्होंने नटराज को भौतिकी से कैसे जोड़ा?

Fritjof Capra एक ऑस्ट्रियाई-अमेरिकी भौतिकविद् हैं जिन्होंने 1975 में “The Tao of Physics” लिखी। उन्होंने 1972 में एक लेख में पहली बार विस्तार से समझाया कि नटराज का नृत्य — जो सृजन-विनाश के चक्र को दर्शाता है — वास्तव में क्वांटम भौतिकी में उपरमाणविक कणों की उसी प्रक्रिया का प्रतीक है जहाँ कण निरंतर उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं।

प्रश्न 4: नटराज की मूर्ति किस काल में बनाई जाने लगी?

नटराज की प्रतिमा परंपरा मुख्यतः चोल काल (9वीं से 13वीं शताब्दी ई.) में विकसित और परिष्कृत हुई। यद्यपि शिव के नृत्य रूप का उल्लेख और चित्रण इससे पहले भी मिलते हैं, किंतु जो स्वरूप आज पूरे विश्व में प्रसिद्ध है, वह चोल काल के कांस्य शिल्पकारों की देन है।

प्रश्न 5: नटराज में कितने हाथ होते हैं और उनका अर्थ क्या है?

नटराज की मानक प्रतिमा में चार हाथ होते हैं। ऊपरी दाहिने में डमरू (सृजन की ध्वनि), ऊपरी बाएँ में अग्नि (विनाश), निचले दाहिने में अभयमुद्रा (भयहीनता का वरदान), और निचला बायाँ हाथ गजहस्त मुद्रा में उठे हुए पैर की ओर संकेत करता है जो मोक्ष का मार्ग बताता है।

प्रश्न 6: क्या भारत और CERN का संबंध आज भी है?

हाँ। भारत CERN का Associate Member State है। Large Hadron Collider (LHC) परियोजना में भी भारतीय वैज्ञानिकों और संस्थानों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत के अनेक विश्वविद्यालय और शोध संस्थान CERN के साथ सहयोग कर रहे हैं।

प्रश्न 7: क्या नटराज की CERN वाली मूर्ति मूल चोल प्रतिमा है?

नहीं। CERN में स्थापित मूर्ति आधुनिक काल में भारत में बनाई गई है, लेकिन उसी परंपरागत Lost-Wax (मधु उच्छिष्ट विधान) तकनीक से जो चोल काल में उपयोग की जाती थी। यह एक नई मूर्ति है जो प्राचीन भारतीय कला परंपरा को सम्मान देते हुए बनाई गई है।

निष्कर्ष: जहाँ विज्ञान और कला मिलते हैं

CERN के प्रवेश द्वार पर खड़ी नटराज की वह 2 मीटर ऊँची कांस्य प्रतिमा केवल एक मूर्ति नहीं है। यह उस संवाद का प्रतीक है जो हजारों वर्षों से मनुष्य के मस्तिष्क और उसकी आत्मा के बीच चलता आया है — एक ओर कला की भाषा में, दूसरी ओर विज्ञान की भाषा में।

भारतीय कलाकारों ने सैकड़ों वर्ष पहले कांस्य में जो सत्य उकेरा — कि ब्रह्मांड सृजन और विनाश का एक अंतहीन नृत्य है — वही सत्य आज Large Hadron Collider के आँकड़ों में, क्वांटम फिजिक्स के समीकरणों में, और Higgs Boson की खोज में प्रकट होता है।

जब एक वैज्ञानिक CERN के उस चौक से गुजरता है और नटराज की उस मूर्ति पर नजर डालता है, तो शायद उसे एहसास होता है कि विज्ञान और अध्यात्म, पश्चिम और पूर्व, प्राचीन और आधुनिक — ये सब वास्तव में उसी एक महासत्य को समझने के अलग-अलग मार्ग हैं जिसे नटराज ने अपने नृत्य में हजारों वर्ष पूर्व अभिव्यक्त किया था।

जैसा कि Capra ने कहा — “ब्रह्मांडीय नृत्य का यह रूपक प्राचीन पौराणिकता, धार्मिक कला और आधुनिक भौतिकी को एकीकृत करता है।”

और यही है — भारतीय कला की वास्तविक महानता।

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