ग्राफिक चित्रकार कृष्ण रेड्डी का जन्म (1925 ) दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश में हुआ था। बचपन में वे माँ के साथ घूम-घूम कर ग्रामीण क्षेत्रों के दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों और ग्रामीण जीवन में कलाओं के अनिवार्य प्रयोग को देखा करते थे।
इससे उनमें कला के संस्कार बनने आरम्भ हुए। छोटी आयु से ही उन्होंने पत्थरों और मिट्टी से रंग बनाना आरम्भ कर दिया था।
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बड़े होने पर 1940 में वे कला की शिक्षा के लिए शान्ति निकेतन चले गये और सात वर्ष तक वहाँ आचार्य नन्दलाल बसु जैसे आचार्यों से कला की शिक्षा ली।
शान्ति निकेतन में अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेने के पश्चात् वे स्लेड स्कूल आफ आर्ट लन्दन पहुँचे और उसके बाद पेरिस गये।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पेरिस में कलाकारों का जमघट | लगा रहता था और वहाँ के बड़े-से-बड़े कलाकार के स्टुडियो में जाकर चित्रांकन सीखा जा सकता था।
कृष्ण रेड्डी ने वहाँ अनेक आधुनिक शिल्पियों के सम्पर्क से यूरोपीय तथा भारतीय कला के सम्बन्ध में एक नयी दृष्टि प्राप्त की।
1947 से 1950 तक वे “कला क्षेत्र” मद्रास के ललित कला महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष रहे और 1970-1971 में केलीफोर्निया विश्वविद्यालय में कला-विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर थे।
पेरिस में रहकर रेड्डी ने ग्राफिक तकनीक सीखा। वहाँ की प्रसिद्ध कार्यशाला एतेलिये-17 में उन्होंने 1951 ई० तक कार्य किया और अपनी योग्यता से केवल एक छात्र न रहकर वे वहाँ एक सहयोगी कलाकार बन गये।
कृष्ण रेड्डी ने वहाँ अम्लाकन (एचिंग) में निपुणता प्राप्त की। इस विधि द्वारा निर्मित छापा चित्रों में हमें उच्च तकनीक, कल्पना की उड़ान, संगीतमय व्यवस्था आदि गुण मिलते हैं।
उन्होंने फोटो, रेखाकंन तथा छापा- चित्र तकनीक का मिला-जुला प्रयोग भी किया है। ये किसी क्रिया के ही अमूर्त संस्करण हैं। इन चित्रों से संवेदन के पश्चात् निश्चित दिशा में ही कल्पना दौडती है।
रेड्डी के छापा-चित्र उभरी हुई रेखाओं तथा अर्थपूर्ण रंगों द्वारा बने होते हैं। इनके विषय सार्वभौमिक है जैसे, मछली, लहर, इठलाती नदी, किसी स्थान का विहंग दृश्य, पुजारी आदि ।
रेड्डी ने इनके अतिरिक्त राजनीतिक व्यंग्य के भी चित्र बनाये हैं। इन चित्रों के सभी रूप स्वाभाविक प्रतीत होते हैं जिनमें सूक्ष्म विवरणों की प्रचुरता आश्चर्यकारक है। वे वस्तुओं के पीछे छिपे भावों की तह तक पहुँच कर ही चित्रांकन करते हैं।
इस प्रकार वे किसी रूप अथवा घटना का बाहरी सादृश्य अंकित न करके उसे अपनी कलात्मक अन्तर्दृष्टि के अनुसार ही चित्रित करते हैं।
श्री रेड्डी ने चित्र-तल का अनेक प्रकार से पट्टियों में विभाजन किया है तथा अक्ष रेखा (दृश्य-चित्रों की क्षितिज रेखा की स्थानापन्न अन्य चित्रों की तल विभाजक मध् य रेखा) कभी ऊँची, कभी नीची, कभी बार्थी अथवा दार्यी ओर बनायी गयी है और इसी से संलग्न अनेक विवरणों सहित प्रत्येक चित्र का डिजाइन पृथक् विकसित किया गया है।
रेड्डी की आकृतियों में काई रहस्यात्मकता अथवा उत्तेजना नहीं है। इनमें केवल सौन्दर्य है।
पेस्टोरल सिंफनी, घुटनों के बल चलती अपू, जर्मिनेशन, लहर, तीन आकृतियाँ तथा मसखरा आदि इनके कुछ प्रमुख अम्लांकन छापा-चित्र हैं।
भारत सरकार ने रेड्डी को ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया है। 1977 से वे न्यूयार्क विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तथा ग्राफिक्स के डाइरेक्टर के पद पर कार्य कर रहे हैं।
उन्होंने विश्व में अनेक देशों में प्रदर्शनियाँ की हैं। संसार के 33 प्रमुख ग्राफिक चित्रकारों में उनकी गणना की गयी है। वे यदा-कदा भारत आते रहते हैं।
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