३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)

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भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति), Emotion (expression of feelings)

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परिभाषा और महत्व भाव चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण, प्राणवान और हृदयस्पर्शी तत्व है। संस्कृत में ‘भाव’ शब्द का अर्थ है – अनुभूति, संवेदना, मनोदशा या भावना। यह वह तत्व है जो चित्र में जीवन फूँकता है, उसे निर्जीव कागज से जीवंत कला में परिवर्तित करता है। बिना भाव के चित्र केवल एक यांत्रिक अनुकृति मात्र रह ...

भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति), Emotion (expression of feelings)

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परिभाषा और महत्व

भाव चित्रकला का सबसे महत्वपूर्ण, प्राणवान और हृदयस्पर्शी तत्व है। संस्कृत में ‘भाव’ शब्द का अर्थ है – अनुभूति, संवेदना, मनोदशा या भावना। यह वह तत्व है जो चित्र में जीवन फूँकता है, उसे निर्जीव कागज से जीवंत कला में परिवर्तित करता है।

बिना भाव के चित्र केवल एक यांत्रिक अनुकृति मात्र रह जाता है, चाहे उसका रूपभेद कितना भी सटीक और प्रमाण कितना भी सही क्यों न हो। भाव ही वह तत्व है जो दर्शक और चित्र के बीच एक अदृश्य संवाद स्थापित करता है, दर्शक के हृदय को स्पर्श करता है और उसमें भी वही अनुभूति जागृत करता है जो चित्रकार ने अनुभव की थी।

भारतीय नाट्यशास्त्र और चित्रकला में भाव

भारतीय चित्रकला में भाव की अवधारणा भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से गहराई से जुड़ी है। नाट्यशास्त्र में वर्णित रस सिद्धांत और भाव सिद्धांत चित्रकला में भी लागू होते हैं।

भरतमुनि का सूत्र: “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः” अर्थात् – विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।

नवरस – नौ प्रमुख रस

भारतीय कला में नौ रस मान्य हैं, जो विभिन्न भावों की पराकाष्ठा हैं:

1. शृंगार रस (प्रेम और सौंदर्य)

स्थायी भाव: रति (प्रेम)

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: आधी झुकी, कोमल दृष्टि, प्रेम से भरी
  • होंठ: हल्की मुस्कान, कोमल और आकर्षक
  • शरीर की मुद्रा: त्रिभंग (तीन जगह मुड़ा शरीर), लावण्यपूर्ण
  • हाथ: कोमल मुद्रा, अभय या वरद मुद्रा
  • वेशभूषा: सुंदर और आकर्षक, आभूषणों से सजा

उदाहरण दृश्य: राधा-कृष्ण का मिलन, शिव-पार्वती का विवाह, नायक-नायिका के संयोग के दृश्य

रंग: गुलाबी, लाल, हरा (प्रेम और उल्लास के रंग)

2. हास्य रस (हँसी और विनोद)

स्थायी भाव: हास (हँसी)

चित्रण के तत्व:

  • मुख: खुला हुआ, दाँत दिखते हुए
  • आँखें: टेढ़ी, चमकदार, शरारत भरी
  • नाक: सिकुड़ी हुई
  • शरीर: लचीला, हल्का झुका या टेढ़ा

उदाहरण दृश्य: विदूषक के दृश्य, बाल लीलाएँ, हास्य प्रसंग

रंग: पीला, नारंगी (उत्साह और मस्ती के रंग)

3. करुण रस (दुःख और शोक)

स्थायी भाव: शोक (दुःख)

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: आँसू भरी, नीचे की ओर, सूजी हुई
  • भौंहें: ढीली, टेढ़ी
  • मुख: उदास, होंठ नीचे की ओर
  • हाथ: सिर पर, छाती पर, या लटके हुए
  • शरीर: झुका हुआ, शिथिल, निर्बल

उदाहरण दृश्य: सीता का वनवास, दशरथ का शोक, कौरव-पांडव युद्ध में मृत्यु के दृश्य

रंग: धूसर, काला, गहरा नीला (शोक के रंग)

4. रौद्र रस (क्रोध और प्रकोप)

स्थायी भाव: क्रोध

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: बड़ी और गोल, लाल, उभरी हुई
  • भौंहें: तनी हुई, टेढ़ी, ऊपर उठी
  • नाक: फूली हुई नथुने
  • होंठ: कड़े, दाँत दिखते हुए
  • हाथ: मुट्ठी बंधी, हथियार उठाए
  • शरीर: तना हुआ, आक्रामक मुद्रा

उदाहरण दृश्य: नरसिंह अवतार, काली का रौद्र रूप, परशुराम का क्रोध, दुर्योधन का क्रोध

रंग: लाल, गहरा लाल (क्रोध का रंग)

5. वीर रस (शौर्य और साहस)

स्थायी भाव: उत्साह

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: विशाल, निर्भीक, आत्मविश्वास से भरी
  • सीना: चौड़ा, तना हुआ
  • मुख: दृढ़, गंभीर
  • हाथ: हथियार धारण किए, आक्रामक मुद्रा
  • शरीर: पूर्ण विकसित, शक्तिशाली, सीधा

उदाहरण दृश्य: राम का रावण वध, कृष्ण का सुदर्शन चक्र, अर्जुन युद्ध में, झांसी की रानी

रंग: केसरिया, लाल, सुनहरा (वीरता के रंग)

6. भयानक रस (भय और आतंक)

स्थायी भाव: भय (डर)

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: बड़ी खुली, घबराई हुई, थरथराती
  • मुख: खुला, पीला पड़ा हुआ
  • हाथ: कंपायमान, रक्षा की मुद्रा में
  • शरीर: सिकुड़ा हुआ, पीछे हटता, कांपता
  • बाल: खड़े हुए (रोमांचित)

उदाहरण दृश्य: राक्षस के सामने, युद्ध का भयावह दृश्य, काल का रूप

रंग: काला, धूसर, गहरा बैंगनी

7. बीभत्स रस (घृणा और जुगुप्सा)

स्थायी भाव: जुगुप्सा (घृणा)

चित्रण के तत्व:

  • नाक: सिकुड़ी हुई
  • मुख: विकृत, होंठ मुड़े हुए
  • आँखें: संकीर्ण, दूर देखती
  • शरीर: पीछे हटता, दूर रहने का प्रयास

उदाहरण दृश्य: युद्धभूमि का भयावह दृश्य, मृत्यु के बाद का दृश्य

रंग: मटमैला, गंदा हरा, काला

8. अद्भुत रस (आश्चर्य और विस्मय)

स्थायी भाव: विस्मय (आश्चर्य)

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: बड़ी खुली, विस्मय से भरी
  • मुख: खुला, आश्चर्य में
  • भौंहें: ऊपर उठी
  • हाथ: चेहरे पर या ऊपर उठे

उदाहरण दृश्य: विराट रूप दर्शन, चमत्कार के दृश्य, अलौकिक घटनाएँ

रंग: पीला, सुनहरा, चमकीला (आश्चर्य के रंग)

9. शांत रस (शांति और वैराग्य)

स्थायी भाव: निर्वेद (वैराग्य)

चित्रण के तत्व:

  • आँखें: आधी बंद, ध्यानस्थ, शांत
  • मुख: गंभीर, शांत मुस्कान
  • शरीर: स्थिर, ध्यान मुद्रा में
  • हाथ: ज्ञान मुद्रा, ध्यान मुद्रा

उदाहरण दृश्य: बुद्ध की ध्यान मुद्रा, ऋषि-मुनियों की तपस्या, योगी

रंग: सफेद, हल्का नीला, हल्का हरा (शांति के रंग)

भाव अभिव्यक्ति के साधन

1. मुखमंडल के भाव (Facial Expressions)

आँखें – भाव की सबसे शक्तिशाली अभिव्यक्ति:

  • प्रेम: कोमल, नम, आधी झुकी
  • क्रोध: लाल, गोल, उभरी
  • भय: बड़ी खुली, थरथराती
  • दुःख: आँसू भरी, नीचे देखती
  • आश्चर्य: विशाल, गोल

भौंहें:

  • ऊपर उठी (आश्चर्य)
  • नीचे की ओर (क्रोध)
  • ढीली (दुःख)
  • टेढ़ी (व्यंग्य)

होंठ:

  • मुस्कुराते (हर्ष)
  • नीचे मुड़े (दुःख)
  • कड़े, दाँत दिखते (क्रोध)
  • खुले (आश्चर्य)

नाक:

  • सिकुड़ी (घृणा)
  • फूली नथुने (क्रोध)
  • सामान्य (शांति)

2. शारीरिक मुद्रा (Body Language)

खड़े होने की मुद्रा:

  • सीधा: गर्व, आत्मविश्वास
  • झुका: दुःख, हार
  • तना: क्रोध, चुनौती
  • त्रिभंग: प्रेम, लावण्य

बैठने की मुद्रा:

  • पद्मासन: ध्यान, शांति
  • वीरासन: वीरता
  • सुखासन: विश्राम, सुख

3. हस्त मुद्राएँ (Hand Gestures)

भारतीय कला में 24 से अधिक मुख्य हस्त मुद्राएँ हैं:

अभय मुद्रा: हाथ ऊपर उठा, हथेली सामने – आशीर्वाद, निर्भयता वरद मुद्रा: हाथ नीचे, हथेली सामने – वरदान, दान ज्ञान मुद्रा: अँगूठा और तर्जनी जुड़ी – ज्ञान, ध्यान अंजलि मुद्रा: दोनों हाथ जुड़े – प्रणाम, विनती कटि हस्त: हाथ कमर पर – गर्व, क्रोध तर्जनी उठाना: चेतावनी, आदेश

4. नेत्र भाव – दृष्टि की भाषा

प्राचीन ग्रंथों में 36 प्रकार के नेत्र भाव बताए गए हैं:

पद्मलोचन: कमल जैसे नेत्र – सौम्य, प्रेमपूर्ण विशाल नेत्र: बड़े गोल नेत्र – आश्चर्य, भय तिरछी दृष्टि: कोने से देखना – प्रेम, लज्जा, व्यंग्य स्थिर दृष्टि: एकटक – ध्यान, गंभीरता कंपित दृष्टि: थरथराती – भय, घबराहट

विभिन्न पात्रों में भाव चित्रण

देवी-देवताओं के भाव

विष्णु: शांत, करुणामय, सौम्य मुस्कान, अभय मुद्रा शिव: तीव्र, रौद्र (तांडव में), शांत (ध्यान में) दुर्गा: वीर रस, रौद्र रस, शत्रु के प्रति क्रोध सरस्वती: शांत, ज्ञानमय, सौम्य लक्ष्मी: कोमल, दयालु, शृंगार रस

नायक-नायिका के भाव

भारतीय काव्यशास्त्र में आठ प्रकार की नायिकाएँ बताई गई हैं, प्रत्येक के अलग भाव:

वासकसज्जा: प्रिय की प्रतीक्षा में सजी-संवरी – उत्सुकता, प्रेम विप्रलब्धा: प्रिय के न आने पर – दुःख, निराशा खंडिता: प्रिय के परस्त्री गमन पर – क्रोध, ईर्ष्या कलहांतरिता: मान करती – गर्व, क्रोध अभिसारिका: प्रिय से मिलने जाती – उत्साह, प्रेम

बालकों के भाव

शिशु: मासूम, कोमल, सरल भाव खेलता बालक: उल्लास, खुशी, शरारत रोता बालक: दुःख, असहायता जिज्ञासु बालक: आश्चर्य, प्रश्न

रंग और भाव का संबंध

प्रत्येक भाव के लिए विशेष रंग:

प्रेम/शृंगार: गुलाबी, लाल, हरा क्रोध/रौद्र: लाल, गहरा लाल दुःख/करुण: धूसर, काला, नीला शांति: सफेद, हल्का नीला भय: काला, गहरा बैंगनी वीरता: केसरिया, लाल हास्य: पीला, नारंगी

पृष्ठभूमि और वातावरण द्वारा भाव

रात का दृश्य: रहस्य, भय, या प्रेम तूफान: क्रोध, भय, अशांति शांत झील: शांति, प्रेम युद्धभूमि: वीरता, रौद्र, भय वन: शांति, तपस्या, या भय महल: शृंगार, वैभव

भाव चित्रण में सामान्य त्रुटियाँ

  1. अतिशयोक्ति: भाव का अत्यधिक प्रदर्शन – अवास्तविक लगता है
  2. अस्पष्टता: भाव स्पष्ट नहीं – दर्शक समझ नहीं पाता
  3. असंगति: चेहरे और शरीर के भाव में मेल नहीं
  4. रूढ़िबद्धता: हर भाव एक जैसा
  5. विरोधाभास: गलत रंग या पृष्ठभूमि

प्रसिद्ध उदाहरण – भारतीय चित्रकला में भाव

अजंता के भित्तिचित्र: करुणामय बोधिसत्व, दुखी राजकुमारी राजस्थानी लघुचित्र: राधा-कृष्ण के प्रेम भाव पहाड़ी शैली: नायक-नायिका के विविध भाव मुगल चित्र: राजाओं के गंभीर भाव, युद्ध के दृश्य

भाव का व्यावहारिक महत्व

  1. संवाद स्थापना: चित्र और दर्शक के बीच भावनात्मक संबंध
  2. कथा वाचन: कहानी को प्रभावशाली बनाना
  3. यादगार प्रभाव: भावपूर्ण चित्र लंबे समय तक याद रहते हैं
  4. मानवीयता: चित्र में जीवंतता और वास्तविकता
  5. कलात्मक उत्कृष्टता: भाव के बिना कला अधूरी है

आधुनिक संदर्भ में भाव

फिल्म और एनीमेशन: चरित्रों में भावों का सूक्ष्म चित्रण विज्ञापन: भावनात्मक अपील के लिए डिजिटल आर्ट: इमोजी और स्टिकर – आधुनिक भाव प्रदर्शन फोटोग्राफी: कैंडिड भाव पकड़ना

निष्कर्ष

भाव चित्रकला की आत्मा है। प्राचीन आचार्यों ने कहा है – “भावबिना चित्रं नास्ति” अर्थात भाव के बिना चित्र नहीं होता। एक चित्रकार तकनीकी रूप से कितना भी निपुण क्यों न हो, यदि उसमें भाव नहीं है तो वह केवल एक शिल्पकार है, कलाकार नहीं। सच्चा कलाकार वह है जो अपने चित्र में ऐसे भाव भर दे कि दर्शक उसे देखकर रो पड़े, हँस पड़े, या उसमें खो जाए। यही भाव की सच्ची शक्ति है।

Read More:

१. रूपभेद (रूपों की विविधता)
२. प्रमाण (माप और अनुपात)

३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)
४. लावण्य योजना (सौंदर्य और अनुग्रह)
५. सादृश्य (समानता और यथार्थता)
६. वर्णिका भंग (रंगों का मिश्रण और प्रयोग)

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