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परिभाषा और मूल सिद्धांत
प्रमाण शब्द संस्कृत की ‘प्र’ (उत्तम) और ‘माण’ (माप) से बना है, जिसका अर्थ है सही और उत्तम माप। यह चित्रकला का वह मूलभूत अंग है जो चित्र में संतुलन, सामंजस्य और सौंदर्य स्थापित करता है। प्रमाण के बिना चित्र में विकृति आ जाती है और वह देखने में अस्वाभाविक लगता है।
प्रमाण तीन प्रकार के अनुपातों को समाहित करता है:
- आंतरिक अनुपात – एक ही आकृति के विभिन्न अंगों का परस्पर अनुपात
- बाह्य अनुपात – विभिन्न आकृतियों और वस्तुओं का परस्पर अनुपात
- स्थानिक अनुपात – चित्र में वस्तुओं की दूरी और परिप्रेक्ष्य का अनुपात
तालमान प्रणाली – प्राचीन भारतीय माप पद्धति
प्राचीन भारतीय शिल्प शास्त्रों, विशेषकर चित्रसूत्र, वृहत्संहिता, विष्णुधर्मोत्तर पुराण, और मानसार शिल्प शास्त्र में तालमान की विस्तृत व्यवस्था दी गई है।
अंगुल – मूल इकाई
भारतीय माप प्रणाली में अंगुल (अँगुली की चौड़ाई) मूल इकाई है। एक अंगुल लगभग 1.9 सेंटीमीटर माना जाता है।
ताल = 12 अंगुल व्याम = 96 अंगुल (दोनों हाथ फैलाने पर की दूरी)
विभिन्न प्रकार के तालमान
प्राचीन ग्रंथों में मानव आकृति के लिए विभिन्न तालमान बताए गए हैं:
1. दशताल (120 अंगुल) – देवताओं और उच्चकुलीन पुरुषों के लिए – सबसे लम्बा और भव्य
2. नवताल (108 अंगुल) – आदर्श मानव आकृति, राजाओं और महापुरुषों के लिए – सर्वाधिक प्रचलित
3. अष्टताल (96 अंगुल) – सामान्य पुरुषों के लिए – मध्यम कद
4. सप्तताल (84 अंगुल) – स्त्रियों और युवाओं के लिए
5. षट्ताल (72 अंगुल) – बालकों और किशोरों के लिए
6. पंचताल (60 अंगुल) – छोटे बच्चों के लिए
मानव शरीर का विस्तृत अनुपात (नवताल प्रणाली – 108 अंगुल)
शरीर के मुख्य विभाग
सिर से पैर तक का विभाजन:
- पूर्ण ऊँचाई = 108 अंगुल
- सिर से ठुड्डी तक (मुख) = 12 अंगुल (1 ताल)
- गर्दन = 4 अंगुल
- कंधे से नाभि तक = 24 अंगुल
- नाभि से जंघा तक = 12 अंगुल
- जंघा से घुटना तक = 18 अंगुल
- घुटने से टखना तक = 18 अंगुल
- पैर = 12 अंगुल
मुखमंडल का सूक्ष्म अनुपात
मुख को तीन समान भागों में बाँटा जाता है (प्रत्येक 4 अंगुल):
ऊपरी भाग: केशरेखा से भौंहों तक मध्य भाग: भौंहों से नासिका के अंत तक निचला भाग: नासिका से ठुड्डी तक
विशेष अनुपात:
- दोनों आँखों के बीच की दूरी = एक आँख की चौड़ाई
- मुख की चौड़ाई = 12 अंगुल
- नेत्र की लम्बाई = 2 अंगुल
- नासिका की लम्बाई = 4 अंगुल
- कान की लम्बाई = नाक की लम्बाई के बराबर
- होंठ की मोटाई = 1 अंगुल
भुजाओं और हाथों का अनुपात
- कंधे से कोहनी तक = 18 अंगुल
- कोहनी से कलाई तक = 18 अंगुल
- हथेली की लम्बाई = 12 अंगुल
- मध्यमा अँगुली = 4 अंगुल
- पूरी भुजा फैलाने पर = शरीर की ऊँचाई के बराबर
धड़ का अनुपात
- कंधों की चौड़ाई = 24 अंगुल (पुरुष), 20 अंगुल (स्त्री)
- छाती की चौड़ाई = 24 अंगुल
- कमर = 18 अंगुल (पुरुष), 16 अंगुल (स्त्री)
- नितम्ब की चौड़ाई = 24 अंगुल (स्त्री में अधिक)
स्त्री और पुरुष आकृति में अनुपात का अंतर
पुरुष आकृति (उत्तम पुरुष)
- चौड़े कंधे, संकीर्ण कमर (V आकार)
- लम्बे और मजबूत पैर
- सीधी और मजबूत गर्दन
- कुल ऊँचाई = 8 से 9 सिर की ऊँचाई
स्त्री आकृति (उत्तम नारी)
- संकीर्ण कंधे, चौड़े नितम्ब (घंटी आकार)
- लम्बी और कोमल गर्दन
- छोटे पैर (पुरुष की तुलना में)
- कोमल वक्र रेखाएँ
- कुल ऊँचाई = 7 से 8 सिर की ऊँचाई
आयु के अनुसार अनुपात में परिवर्तन
नवजात शिशु
- सिर = शरीर का 1/4 भाग (बहुत बड़ा)
- छोटे अंग, गोल शरीर
बालक (5-10 वर्ष)
- सिर = शरीर का 1/6 भाग
- अंग पतले और लम्बे होने लगते हैं
किशोर (11-18 वर्ष)
- सिर = शरीर का 1/7 भाग
- तीव्र वृद्धि काल
प्रौढ़ (18-60 वर्ष)
- सिर = शरीर का 1/8 भाग (आदर्श अनुपात)
- पूर्ण विकसित शरीर
वृद्ध (60+ वर्ष)
- शरीर में थोड़ा संकुचन
- झुकी हुई मुद्रा
- अंगों में शिथिलता
विभिन्न मुद्राओं में अनुपात
खड़ी मुद्रा (समपाद स्थानक)
- दोनों पैर एक साथ
- सीधा और संतुलित शरीर
- वजन दोनों पैरों पर समान
त्रिभंग मुद्रा
- शरीर तीन स्थानों पर मुड़ा – गर्दन, कमर, घुटना
- एक पैर पर वजन, दूसरा हल्का
- स्त्री आकृतियों में सर्वाधिक प्रयुक्त
- लावण्य और सौंदर्य का प्रतीक
बैठी मुद्रा (आसन)
- पद्मासन, वज्रासन, सुखासन में भिन्न अनुपात
- धड़ की लम्बाई कम दिखाई देती है
- पैरों की स्थिति के अनुसार परिवर्तन
लेटी मुद्रा (शयन)
- शरीर की लम्बाई पूर्णतः दृश्यमान
- गहराई और परिप्रेक्ष्य का विशेष ध्यान
पशु-पक्षियों का अनुपात
घोड़ा
- शरीर की लम्बाई = 2.5 गुना ऊँचाई
- सिर की लम्बाई = गर्दन की लम्बाई का आधा
- पैर की लम्बाई = शरीर की ऊँचाई के बराबर
हाथी
- ऊँचाई = 2 गुना लम्बाई (पैर से कंधे तक)
- सूंड = शरीर की ऊँचाई के बराबर
- कान = सिर के आकार के बराबर
शेर/बाघ
- लम्बाई = 3 गुना ऊँचाई
- पूंछ = शरीर की लम्बाई के बराबर
- सिर = शरीर की लम्बाई का 1/4 भाग
मयूर
- पूंछ = शरीर से 3-4 गुना लम्बी
- गर्दन = शरीर की लम्बाई के बराबर
वास्तुकला और भवन का अनुपात
मंदिर
- गर्भगृह: केंद्रीय और सबसे छोटा
- मंडप: गर्भगृह से बड़ा, भक्तों के लिए
- शिखर: गर्भगृह के ऊपर, ऊँचाई = आधार से 2-3 गुना
- द्वार: ऊँचाई = चौड़ाई का 2 गुना
महल और भवन
- स्तंभ: ऊँचाई = व्यास का 8-10 गुना
- द्वार और खिड़कियाँ: सुनहरा अनुपात (1:1.618)
- कक्ष: लम्बाई = चौड़ाई का 1.5 से 2 गुना
चित्र-पट में समग्र अनुपात
अग्रभूमि (Foreground)
- वस्तुएँ और आकृतियाँ बड़ी
- अधिक विस्तार
- गहरे और स्पष्ट रंग
मध्यभूमि (Middleground)
- मध्यम आकार की आकृतियाँ
- मध्यम विस्तार
पृष्ठभूमि (Background)
- छोटी आकृतियाँ
- कम विस्तार
- हल्के रंग
दूरी का नियम: वस्तु की दूरी दोगुनी होने पर आकार आधा हो जाता है।
सुनहरा अनुपात (Golden Ratio – 1:1.618)
यद्यपि यह पश्चिमी अवधारणा है, परन्तु भारतीय चित्रकला में भी प्राकृतिक रूप से इसका प्रयोग होता रहा है:
- मुख में आँखों की स्थिति
- शरीर में नाभि की स्थिति
- चित्र में मुख्य विषय की स्थिति
त्रुटियों से बचना – सामान्य गलतियाँ
प्रमुख अनुपात दोष:
- बड़ा सिर, छोटा शरीर – बाल सुलभ लगता है
- लम्बे हाथ, छोटे पैर – विकृत दिखता है
- संकीर्ण कंधे, चौड़ी कमर – असंतुलित
- एक आँख बड़ी, दूसरी छोटी – असममित चेहरा
- वस्तुओं का परस्पर गलत अनुपात – अवास्तविक दृश्य
प्रमाण की जांच की विधियाँ
ग्रिड पद्धति
- चित्र-पट को समान वर्गों में बाँटना
- प्रत्येक वर्ग में अनुपात की जांच
तुलनात्मक माप
- एक इकाई को आधार मानकर अन्य भागों को मापना
- उदाहरण: सिर को इकाई मानकर पूरे शरीर को मापना
दृश्य संतुलन
- चित्र को दूर से देखकर संतुलन की जांच
- किसी भाग का असंतुलन तुरंत दिखाई देता है
विभिन्न चित्रकला शैलियों में प्रमाण
अजंता शैली
- आदर्श अनुपात का पालन
- लम्बे और सुडौल शरीर
- नवताल प्रणाली का प्रयोग
राजस्थानी शैली
- बड़ी आँखें (बादाम के आकार की)
- लम्बी नाक
- पतली कमर
- कुछ अतिशयोक्ति के साथ
मुगल शैली
- यथार्थवादी अनुपात
- सटीक चित्रण
- पश्चिमी प्रभाव के साथ
पहाड़ी शैली
- कोमल और सुंदर अनुपात
- स्त्री आकृतियों में विशेष ध्यान
- राजस्थानी और मुगल का मिश्रण
प्रमाण का व्यावहारिक महत्व
- सौंदर्य: सही अनुपात से चित्र सुंदर और आकर्षक बनता है
- यथार्थता: वास्तविकता के करीब दिखाई देता है
- संतुलन: चित्र में दृश्य संतुलन और स्थिरता
- पहचान: चरित्र और वस्तु की सही पहचान
- व्यावसायिकता: कुशल चित्रकार का प्रमाण
आधुनिक काल में प्रमाण
आधुनिक चित्रकला में भी अनुपात का ज्ञान अत्यंत आवश्यक है:
- एनीमेशन: चरित्रों की निरंतर गति में अनुपात बनाए रखना
- डिजिटल आर्ट: सॉफ्टवेयर टूल्स द्वारा सटीक अनुपात
- फैशन डिजाइन: शरीर के अनुपात के अनुसार वस्त्र डिजाइन
- फोटोग्राफी: फ्रेमिंग और संयोजन में अनुपात
निष्कर्ष
प्रमाण चित्रकला की रीढ़ है। बिना सही अनुपात के, चाहे चित्रकार कितना भी कुशल क्यों न हो, उसका चित्र पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकता। प्राचीन आचार्यों ने तालमान प्रणाली के माध्यम से एक वैज्ञानिक और व्यवस्थित विधि प्रदान की, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। हर महान चित्रकार ने पहले प्रमाण में निपुणता हासिल की, फिर अपनी रचनात्मकता का प्रदर्शन किया।
Read More:
१. रूपभेद (रूपों की विविधता)
२. प्रमाण (माप और अनुपात)
३. भाव (भावनाओं की अभिव्यक्ति)
४. लावण्य योजना (सौंदर्य और अनुग्रह)
५. सादृश्य (समानता और यथार्थता)
६. वर्णिका भंग (रंगों का मिश्रण और प्रयोग)












