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मौर्य काल में मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास ( 325 ई.पू. से 185 ई.पू.) | Development of sculpture and architecture in Maurya period

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मौर्य काल में मूर्तिकला और वास्तुकला

मौर्य काल में मूर्तिकला और वास्तुकला का विकास ( 325 ई.पू. से 185 ई.पू.) | Development of sculpture and architecture in Maurya period

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मौर्यकालीन कला को उच्च स्तर पर ले जाने का श्रेय चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक को जाता है। अशोक के समय से भारत में मूर्तिकला का स्वतन्त्र कला के रूप में विकास होता दिखाई देता है।

मौर्य काल में मूर्तिकला और वास्तुकला

सिन्धु सभ्यता के पश्चात् भारतीय मूर्तिकला की अवस्था क्या हुई? इसका ज्ञान हमें इतिहास से नहीं होता, परन्तु मौर्य से पूर्व के कुछ नमूने शैशुनाक काल में हमें मूर्तियों के रूप में प्राप्त होते हैं जिनमें विशालकाय मूर्तियाँ मिली हैं।

इन मूर्तियों को मौर्यकालीन मूर्तियाँ नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इनका शारीरिक गठन, वस्त्राभूषण आदि इस काल की मूर्तियों से मेल नहीं खाते हैं।

शैशुनाक वंश के पश्चात् मगध पर नंद वंश का प्रबल साम्राज्य स्थापित हुआ, परन्तु यह वंश आगे चलकर अत्यन्त अत्याचारी हो उठा और जब उसके अत्याचारों की पराकाष्ठा हो गई तब चाणक्य की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य मगध के राजा नंद को हराकर मगध पर शासनारूढ़ हो गया और यहीं से मौर्य साम्राज्य का प्रथम चरण आरम्भ होता है।

मौर्यकाल आरम्भ होने से पूर्व ही उत्तरी भारत पर यूनानियों ने भी आक्रमण करने प्रारम्भ कर दिये थे। चन्द्रगुप्त ने चाणक्य की सहायता से इन ग्रीक लोगों को भी भारत से बाहर निकाल दिया और समस्त उत्तरी भारत का प्रबल शासक बन गया।

चन्द्रगुप्त मौर्य के समय में मूर्तिकला व वास्तुकला की बहुत उन्नति हुई। उसके दरबार में ग्रीक राजदूत “मैगस्थनीज” रहता था जिसने अपने प्रवास के वर्णन में लिखा था कि पाटलिपुत्र में चन्द्रगुप्त का विशाल प्रासाद एशिया के सूसा आदि के प्रसिद्धतम प्रासादों को भी मात करता था और स्थापत्य कला का उत्कृष्टतम नमूना था।

समुचित खुदाई के अभाव में इस भवन के भग्नावशेष प्राप्त नहीं हुए हैं। सम्भवतः यह प्रासाद लकड़ी आदि किसी नाशवान वस्तु का बना हुआ था, जो समय के अन्तराल के साथ ही साथ नष्ट हो गया।

उस समय विशाल भवनों के परकोटों, दरवाजों, महलों की दीवारों आदि पर मूर्तियाँ भी उकेरी जाती थीं। इस प्रकार उस समय भवन निर्माण कला व मूर्तिकला दोनों ही अन्योन्याश्रित थीं। अतः मौर्यकाल में वास्तुकला और मूर्तिकला दोनों की ही उन्नति हुई।

मौर्यकालीन कला को उच्च स्तर पर ले जाने का श्रेय चन्द्रगुप्त के पौत्र सम्राट अशोक को जाता है। अशोक के समय से भारत में मूर्तिकला का स्वतन्त्र कला के रूप में विकास होता दिखाई देता है।

उसने मात्र बारह वर्ष की अल्पायु में अपने पड़ोसी राज्य कलिंग पर विजय के पश्चात् प्रायश्चित्त स्वरूप बौद्ध धर्म का मार्ग ग्रहण कर अपने को लोक कल्याणकारी व कला प्रेमी सिद्ध करवाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

उसने अपने शासन काल में कई “स्तूप”, “विहार”, “स्तम्भ”” व “शिलालेख” बनवाये। अशोक की लोक-कल्याण की भावना इन शिलालेखों के रूप में व्यक्त होती है जिन पर उसने बुद्ध के उपदेशों को खुदवाया।

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अशोककालीन स्तम्भ कला

सम्राट अशोक के समय की कला के उत्कृष्टतम नमूने विशाल स्तम्भों के रूप में मिलते हैं। संसार की श्रेष्ठतम मूर्तियों में इनका स्थान है।

आज भी “सारनाथ का सिंह स्तम्भ’ जिसे स्वतन्त्र भारत की “महामुद्रा” के रूप में ग्रहण किया गया है, मौर्यकला की सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जा सकती है। सम्राट अशोक द्वारा बनवाये गये लगभग सत्रह स्तम्भों का पता चला है।

ये स्तम्भ- सारनाथ, साँची, चंपारन के लौरियों, नंदनगढ़, रमपुरवा, कौशाम्बी, इलाहाबाद, मुजफ्फरपुर के बखीरा ग्राम, रूम्मिन देई तथा निगलीवा ग्राम (नेपाल). बुद्धगया, पटना, फर्रुखाबाद आदि स्थानों पर प्राप्त हुए हैं।

वस्तुतः भारत में स्तम्भों का प्रचार वैदिक काल से माना जाता है, परन्तु मौर्यकाल से पूर्व के कुछ स्तम्भ तो हमें अवश्य मिलते हैं, जिनमें कोई धार्मिक उपदेश या कारीगरी में श्रेष्ठता अथवा पॉलिश जैसी कोई भी वस्तु प्राप्त नहीं होती।

अशोककालीन स्तम्भ मौर्यकालीन मूर्तिकला के सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। इन स्तम्भों पर अशोक ने अपने उदार विचार अंकित कराये। ये स्तम्भ “चुनार के लाल पत्थर” के बने हुए हैं जो लगभग 35 से 40 फुट ऊँचाई के हैं।

केवल दो भागों में ही इनका निर्माण किया गया है-

(1) समूचा गोल लाट,

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(2) परगहा।

जिनके शिरोभाग पर सिंह, गज, वृषभ आदि पशुओं की मूर्तियाँ हैं। इस सम्पूर्ण स्तम्भ पर ऐसी चमकदार पॉलिश अथवा “ओप” किया गया है जो आज भी नया जैसा प्रतीत होता है। दर्शक की दृष्टि कहीं ठहरती नहीं और ऊपर से नीचे तक फिसलती जाती है।

वस्तुतः यह ओप या पॉलिश मौर्यकालीन मूर्तिकला की अपनी ही एक विलक्षणता है और मौर्यकाल के बाद की कृतियों पर यह ओप नहीं दिखाई देता है। मानो अचानक शिल्पियों के लिए वह रहस्य बनकर लुप्त हो गया हो।

कुछ विद्वानों का विचार है कि यह “वज्रलेप” नामक मसाले का प्रभाव है जो ओप ही नहीं पैदा करता वरन् पत्थर की रक्षा भी करता है।

कुछ विद्वानों के अनुसार- यह चमक पत्थर की घुटाई करने से पैदा हुई है। यह ओप भारतीय मूर्तिकला की एक ऐसी विशेषता है जो संसार में अपना सानी नहीं रखती है।

स्तम्भ की बनावट

इन स्तम्भों के लाट गोल व नीचे से ऊपर तक चढ़ाव-उतारदार हैं जिनकी ऊँचाई लगभग 40 फुट तक है और वजन हजार से बाहर सौ मन तक होता है। स्तम्भों के ऊपर के परगहे के पाँच भाग किये जा सकते हैं

  • (1) चौकी कंठे के ऊपर गोलाकार या चौकोर आकार की चौकी बनी रहती है।
  • डोडी कमलकेसर
  • ‘चौकी’
  • “बैठकी
  • पंखुड़ियाँ
  • परगहा
  • मेखला
  • कमलनाल
  • लाट
  • (2) कंठा- बैठकी के ऊपर फिर “कंठा” बना होता है।
  • (3) बैठकी मेखला के ऊपर लोटे हुए कमल की आकृति अथवा उल्टे कमल की आकृति जिसकी पंखुड़ियों की आलंकारिक आकृति को “बैठकी” अथवा “घंटाकृति” कहते हैं। मेखला यह इकहरी व दुहरी बनी रहती है जो लाट के ठीक ऊपर सबसे पहले आती है।
  • (4) शीर्ष चौकी के ऊपर एक या एकाधिक पशुओं की मूर्तियाँ बनी होती हैं।

मेखला पर मनकों” अथवा “डोरी” का उभारदार अलंकरण किया हुआ रहता है। इसी प्रकार कंठे में भी अलंकरण किया हुआ मिलता है अथवा सादा भी रहता है। इसके ऊपर की चौकी पर पशुओं, पशु-पक्षियों की आकृतियाँ बनाई गई है।

प्रायः सिंह, बैल, अश्व अथवा हाथी का अंकन हुआ मिलता है। “लौरिया नन्दनगढ़” के स्तम्भ की चौकी पर उभारदार उड़ते हुए हंस अंकित किये गये हैं तथा शीर्ष पर सिंह बनाया गया है।


“रमपुरवा” के स्तम्भ पर की चौकी गोलाकार है जिस पर पक्षी ऑके गये हैं। चौकी के ऊपर एक सिंह उकहूँ बैठा है।
“रमपुरवा” के दूसरे स्तम्भ शीर्ष पर बैल की आकृति है। इसके नीचे की गोलाकार चौकी पर कमल पुष्पों व कलिकाओं का सुन्दर अलंकरण किया गया है। आजकल यह बैल का स्तम्भ शीर्ष राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली के प्रवेश द्वार पर रखा है।


“संकाश्य” (संखिसा) के स्तम्भ शीर्ष का हाथी अभी भी सुरक्षित है। स्तम्भ भंग हो चुका है, साथ ही कहीं खो भी गया है। इन सभी स्तम्भों में से सारनाथ का स्तम्भ सर्वश्रेष्ठ माना गया है।


बखीरा ग्राम के सिंह शीर्ष स्तम्भ में सिंह की आकृति, स्तम्म शीर्ष पर बैल की आकृति कुछ अधिक भारी व बेडौल दिखती है जो रमपुरवा अन्य सिंह शीर्ष स्तम्भों से अधिक प्राचीन नजर आती है। सम्भवतया यह अशोकीय काल से पहले का है।

सारनाथ का स्तम्भ


वस्तुतः इन स्तम्भों की कला उत्तरोत्तर विकसित होती चली गई है और सारनाथ के स्तम्भ में जाकर अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई है।


सारनाथ का यह स्तम्भ अशोक कालीन मूर्तिकला का एक अभूतपूर्व उदाहरण है जिसके चारों दिशाओं में मुँह किये चार सिंहों की ओजपूर्ण मूर्तियों की संसार प्रसिद्ध कला के कारण इसे भारत के राष्ट्र-चिह्न होने का गौरव प्राप्त हुआ है।


संसार भर के कला-प्रेमियों व कला-समीक्षकों ने सारनाथ के इस स्तम्भ की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
सारनाथ का यह स्तम्भ अशोक के शासनकाल में भगवान बुद्ध प्रथम धर्मोपदेश के स्मारक के रूप में 242 ई.पू. से 282 ई.पू. के मध्य स्थापित किया गया।


इस स्तम्भ का परगहा पूरी तरह से सुरक्षित है, परन्तु इन पर बनी हुई सिंह आकृतियों के ऊपर पहले एक धर्म चक्र रखा हुआ था जो कि टूट चुका है।


इसकी गोल चौकी पर चार धर्म चक्र बने हुए हैं और उनके बीच-बीच में चार पशु- घोड़ा, हाथी, सिंह और बैल अंकित है जो चारों दिशाओं में दौड़ते हुए आँके गये हैं।


ये चारों पशु मूलतः भारतीय हैं और प्राचीन युग में चारों दिशाओं के प्रतीक माने जाते थे। इनमें से सिंह – शौर्य, निर्भीकता और स्फूर्ति का प्रतीक है।


गज चातुर्य, विचारशीलता और ऐश्वर्य का प्रतीक है। वृषभ – भूमि की उर्वरता का प्रतीक है। अश्व राज्य के विस्तार का प्रतीक है। अंतिम दोनों पशु आर्यों के प्रिय पशु हुआ करते थे।


इस चौकी के ऊपर चारों दिशाओं में मुँह किये हुए चार सिंहों की बड़ी ही ओजवान आकृतियों हैं जो अत्यन्त दर्शनीय है। संसार की कला में इतना प्राणवान अकन अन्यत्र मिलना दुष्कर है।


इनके प्रत्येक अंग को बड़ी ही कुशलता से बनाया गया है। कल्पना व वास्तविकता के सुन्दर सम्मिश्रण ने इन्हें संसार की सर्वोत्कृष्ट कलाकृतियों के समकक्ष ला खड़ा किया है। इन सिंहों की आकृतियों में कहीं भी उग्रता व हिंस्रता का भाव नहीं आ पाया है।


इनके फहराते हुए लहरदार केश बड़ी ही बारीकी से बनाये गये हैं। ये चारों सिंह पीठ से पीठ जोड़े बैठे हैं। इनके लहराते हुए बालों (अयाल) की लटें आलंकारिक विधि से बनाई गई हैं।


शरीर की बनावट गढ़ी हुई है तथा नापतौल में बिल्कुल एक समान हैं। पहले इनकी आँखों में मणि भी लगे हुए थे, परन्तु अब वे वहाँ नहीं लगे हुए हैं। इन सिंहों के ऊपर पहले धर्मचक्र रखा था जो अब टूट चुका है।


इस विशाल चक्र का व्यास दो फुट नौ इंच था तथा इसमें 32 अरे थे। अब यह परगहा सारनाथ के संग्रहालय में सुरक्षित है।


साँची के परगहे पर भी इसी तरह के चौमुखे सिंह हैं, परन्तु वे सारनाथ के स्तम्भ पर के परगहे के समान ओजपूर्ण नहीं हैं।


अशोकीय स्तम्भों का समय व कुछ मान्यतायें


उपर्युक्त वर्णित स्तम्भों में से कुछ स्तम्भ सम्भवतः अशोककालीन नहीं प्रतीत होते हैं बल्कि वे उससे पहले के बने हैं, क्योंकि स्वयं अशोक ने अपने सहसरॉव के अभिलेख में यह स्पष्ट रूप से कहा था कि- शिलालेख वहाँ भी खोदे जायें जहाँ स्तम्भ विद्यमान हैं।


कुछ मान्यताओं के अनुसार ये महाभारतकालीन राजसूय यज्ञ के ध्वज स्तम्भ भी हो सकते हैं जिसका सदुपयोग कर अशोक ने अपने धर्म प्रचार का साधन बनाया हो।


इनमें से कुछ स्तम्भों की शैली अशोकीय स्तम्भों से सर्वथा भिन्न और बहुत पहले की जान पड़ती है (बखीरा ग्राम)। कुछ पर लेख भी लिखे हुए प्राप्त नहीं हुए हैं (कौशाम्बी) परन्तु लुम्बिनी, निगलीवा, सारनाथ, बुद्धगया, साँची व अन्य अनेक स्थानों के स्तम्भ निश्चयपूर्वक अशोककालीन ही हैं।

विदेशी प्रभाव कुछ विद्वानों के अनुसार इन अशोकीय स्तम्भों व उसके समय में बनाये गये अन्य मूर्तिकला के नमूनों पर विदेशी प्रभाव काफी हद तक आ गया था।


अशोकीय स्तम्भों के परगहों की बैठकी के विषय में तथा वास्तु और मूर्तियों पर आने वाले कुछ अभिप्रायों के विषय में कतिपय विद्वानों का मत है कि वे ईरान की कला से आये हैं।


अशोकीय स्तम्भों में लौटे हुए कमल की पंखुड़ी की आकृति को कुछ लोग ईरान के अनुकरण पर बनाया हुआ मानते हैं। मि. स्मिथ और चार्ल्स फाबरी इसे ईरान से प्रभावित ‘घंटाकृति’ मानते हैं।


जबकि श्री रायकृष्ण दास, डॉ. आनन्द कुमारस्वामी, ई.वी. हैवेल आदि ने इस मान्यता को बिल्कुल भ्रामक सिद्ध कर दिया है। उनके अनुसार यह पूर्णतया भारतीय कल्पना है।


यह अभिप्राय भारतीय वास्तु में चिरकाल से चला आ रहा है और सारनाथ के स्तम्भ में वह पराकाष्ठा पर पहुँच गया है। उनके अनुसार- यह ‘नीलोत्पल’ है, जिसकी पंखुड़ियाँ नीचे की ओर झुकी हुई दिखाई जाती हैं।


इसी प्रकार कुछ अन्य अभिप्राय


(1) पंखदार सिंह,
(2) पंखदार वृषभ
(3) नर-मकर- जिसमें से कुछ के घोड़े जैसे पैर भी होते हैं और कुछ की पूँछें दोहरी होती हैं,
(4) नर-अश्व
(5) मेष-मकर,
(6) गज-मकर,
(7) वृष-मकर,
(8) सिंह-नारी,
(9) गरुड़-सिंह,
(10) मनुष्य के धड़ वाले पक्षी,

इसकी डोलाकार छत 12 फुट 3 इंच ऊँची है। दूसरी गुफा ‘कर्ण चौपड़’ है। यह एक विशाल कक्ष के रूप में है। इसकी दीवारें ओपदार व चिकनी हैं।


इनमें से “लोमसरिसी” की गुफा सर्वाधिक प्रसिद्ध है। (चित्र-52) इसके द्वार के मेहराब में हाथियों की पंक्ति बनी हुई है तथा भीतर की ओर दीवारों पर ओप भी किया हुआ है। तिथिक्रम में यह सबसे बाद की गुफा है, परन्तु वास्तु की दृष्टि से यह सर्वश्रेष्ठ है।


नागार्जुनी पहाड़ी पर स्थित गुहा समूह में सर्वाधिक बढी गुफा “गोपी गुफा” है। इसकी वास्तु-योजना सुरंग के समान है व छत ढोलाकार है। इस गुफा के एक लेख से यह ज्ञात होता है कि इसे अशोक के पौत्र दशरथ ने बनवाया था।

दशरथ के ही समय की दो अन्य उत्कीर्ण गुफाओं वदधिक’ व ‘वहिजक’ का पता चलता है। गया से पूर्व की ओर लगभग 25 मील दूर तथा राजगृह से 13 मील दक्षिण में स्थित सीतामढ़ी गुफा भी इसी वर्ग में रखी जा सकती है।
उपर्युक्त गुफायें चैत्य गुफा गृह लगभग 50 वर्षों की मौर्ययुगीन वास्तुकला गतिविधियों की परिचायक हैं। यद्यपि इन चैत्य गुफा की योजना अशोक के समय ही विकसित किया गया।

अशोककालीन मूर्तिशिल्प कला


अशोककालीन कतिपय स्वतन्त्र मूर्तियों के उदाहरण भी अत्यन्त उत्कृष्ट हैं। वस्तुतः इन मूर्तियों को ‘लोक कला’ की श्रेणी के अन्तर्गत रखा जाना ही अधिक उचित प्रतीत होता है, क्योंकि इन प्रतिमाओं को उनके आकार-प्रकार तथा शैलीगत विशेषताओं के कारण ही राज्याश्रित कला के अन्तर्गत नहीं रखा जा सकता है।


ये प्रतिमाएँ उड़ीसा पाटलीपुत्र वाराणसी, मथुरा, अहिच्छत्रा, विदिशा, कुरुक्षेत्र आदि देश के विस्तृत भू-भागों से प्राप्त हुई हैं।


इन प्रतिमाओं को ‘यक्ष-यक्षि’ नामक लोक देवी-देवताओं की मूर्तियों के रूप में पहचाना जाता है तथा शक्ति व शौर्य की प्रतीक समझी जाने वाली ये प्रतिमाएँ प्रायः सम्मुख व खड़ी मुद्रा में निर्मित की गई हैं।


भारी-भरकम शरीर वाली ये मूर्तियाँ स्ट्रेला क्रमरिश के अनुसार सिन्धु घाटी सभ्यता के अवशेषों में अपनी जड़ें ढूँढ़ती प्रतीत होती हैं। ये मूर्तियाँ मुख्यतया निम्न स्थानों से प्राप्त हुई हैं


मथुरा जनपद के झींग नगरा ग्राम से प्राप्त यक्ष की मूर्ति ।
मथुरा जनपद के ही बारोदा ग्राम से प्राप्त यक्ष की प्रतिमा
भोपाल के निकट बेसनगर से प्राप्त यक्षिणी की मूर्ति जो भारतीय संग्रहालय, कलकत्ता में सुरक्षित है।
विदिश या भिलसा से प्राप्त यक्ष की मूर्ति।


बेसनगर से प्राप्त यक्षी की प्रतिमा।


ग्वालियर जनपद ( पद्मावती, वर्तमान में पवाया) से प्राप्त लेखयुक्त यक्ष की प्रतिमा जो अब ग्वालियर संग्रहालय में संरक्षित है। पटना में दीदारगंज से प्राप्त ओपयुक्त यक्षिणी की प्रतिमा


पटना से ही प्राप्त एक अन्य लेखयुक्त यक्ष की मूर्ति जो भारतीय संग्रहालय में है।

वाराणसी के राजघाट से प्राप्त त्रिमुख यक्ष प्रतिमा जो अब भारत कला भवन, काशी में सुरक्षित है।
सोपारा (शूपरिक) से प्राप्त यक्ष की मूर्ति जो अब राष्ट्रीय संग्रहालय, दिल्ली में सुरक्षित है।
उड़ीसा के शिशुपालगढ़ से प्राप्त हुई कई अन्य यक्ष मूर्तियाँ जॉन मार्शल, आर.पी. चंदा, स्ट्रेला क्रैमरिश, आनन्द कुमार स्वामीवासुदेवशरण अग्रवाल आदि के अनुसार उक्त यक्ष मूर्तियाँ मौर्ययुगीन ही हैं।


इनमें संग्रहालय “चामर-धारिणी की ओपदार प्रतिमा अशोककालीन मूर्तिकला एक उत्कृष्ट उदाहरण है।


मूर्ति अशोककालीन मूर्तिकला परिपक्वता दिखाई देती यह चुनार के लाल बलुआ पत्थर जिसे कोरकर बनाया गया उस समय प्रकार मूर्तियाँ राज-प्रासादों में सज्जा के लिए रखी जाती थी।


प्रतिभा के अंग-प्रत्यंग सुडौल, भरे हुए गोलाई हैं, साथ इसमें सौष्ठव व लालित्य के होते मूर्ति के दाहिने हाथ चंवर है, केशराशि गुंथी हुई हाथ की कलाई चूड़ियाँ तथा कंगन हैं, गले मोतियों पहना हुआ है. कमर में पाँच लड़ियों वाली करधनी तथा में मोटे कड़े के आभूषण के अधो भाग वस्त्र को दिखाने लिए गहरी रेखायें बनाई गई हैं।


दीदारगंज की इस यक्षिणी नारी सौन्दर्य को मूर्तिमान करने में शिल्पकार सफल रहा है। नारी अवयवों का अपूर्व सौन्दर्य से परिपूर्ण है। उस समय के स्त्री-पुरुषों की वेशभूषा और अलंकार आदि भी प्रकाश पड़ता है।


भारतीय मूर्तिशिल्प एवं स्थापत्य कला अशोक के समय की बनवाई हुई कुछ ‘टेराकोटा की मृण्मूर्तियाँ भी प्राप्त हुई। हैं जो कला की दृष्टि से बहुत ही उत्कृष्ट हैं। इनमें से एक मूर्ति है- “शिव अथवा कोई यक्ष अपनी अर्धांगिनी सहित” जो कि बड़ी ही बारीकी व सुन्दरता से बनाई गई है।


इसी प्रकार की एक अन्य मूर्ति पटना में भी प्राप्त हुई है जो सोने के पत्तर पर ठप्पे से बनाई गई है। ये दोनों ही मूर्तियाँ मौर्यकाल के अंतिम प्रहर और आरम्भिक शुंगकाल की मानी गई हैं।


अशोककालीन मूर्तियों की यह विशेषता थी कि उसमें बहुत बारीकी व समानता थी और उसमें भद्दापन या भौंडापन आदि नहीं पाया जाता है। इसमें यथार्थता का पालन भी किया गया है।


अधिकतर मूर्तियाँ कोरकर बनाई गई हैं। नारी सौन्दर्य में सुन्दरता का पूरी तरह से पालन किया गया है जिनसे ‘मातृत्व का भान होता है।


पाटलीपुत्र में कुछ वर्षों पहले जो जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं, उन पर ओप भी है। सम्भवतः ये मूर्तियाँ अशोक के अन्य पौत्र ‘संप्रति’ के काल की बनवाई गई जान पड़ती हैं, क्योंकि पत्थर को ओपने की कला मौर्यकाल के साथ ही समाप्त हो जाती है।


इस प्रकार हम देखते हैं कि मौर्यकाल में मूर्तिकला, वास्तुकला की विशेष उन्नति हुई। मौर्य युग में जिस बौद्ध वास्तुकला का विकास हुआ, वह ब्राह्मण धर्म के मन्दिरों के वास्तु से सर्वथा भिन्न है।


तथापि मन्दिरों की दीवारों व तोरणों आदि पर अप्सराओं, गन्धर्व, सिद्ध और यक्षों आदि की मूर्तियों का निर्माण होता रहा, परन्तु मौर्यकाल के अंतिम प्रहर में जो मूर्तियाँ और मन्दिर बने उनके अवशेष समुचित खुदाई के अभाव में प्राप्त नहीं हो पाये हैं।

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