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हम्पी वास्तुकला — विशेषताएं, इतिहास और विजयनगर साम्राज्य की भव्य धरोहर

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हम्पी वास्तुकला

हम्पी वास्तुकला — विशेषताएं, इतिहास और विजयनगर साम्राज्य की भव्य धरोहर

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हम्पी की वास्तुकला की संपूर्ण जानकारी — विट्ठल मंदिर, संगीतमय स्तंभ, पत्थर का रथ, लोटस महल और विजयनगर साम्राज्य की स्थापत्य विशेषताएं। जानें UNESCO विश्व धरोहर हम्पी के बारे में विस्तार से। हम्पी वास्तुकला — विशेषताएं प्रस्तावना भारत की धरती पर अनेक ऐसे स्थान हैं जो अपनी वास्तुकला, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्वभर ...

हम्पी वास्तुकला

हम्पी की वास्तुकला की संपूर्ण जानकारी — विट्ठल मंदिर, संगीतमय स्तंभ, पत्थर का रथ, लोटस महल और विजयनगर साम्राज्य की स्थापत्य विशेषताएं। जानें UNESCO विश्व धरोहर हम्पी के बारे में विस्तार से।

Table of Contents

हम्पी वास्तुकला — विशेषताएं

प्रस्तावना

भारत की धरती पर अनेक ऐसे स्थान हैं जो अपनी वास्तुकला, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के कारण विश्वभर में प्रसिद्ध हैं। इन्हीं में से एक है — हम्पी। कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित हम्पी एक ऐसा नगर है जो कभी विश्व के सबसे समृद्ध और शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक — विजयनगर साम्राज्य — की राजधानी हुआ करता था। आज यह नगर भले ही खंडहरों में तब्दील हो चुका है, लेकिन इन खंडहरों में भी एक अद्भुत जीवंतता है — एक ऐसी जीवंतता जो सदियों पुरानी शिल्पकला, वास्तुकला और मानवीय प्रतिभा की गवाह है।

हम्पी को सन् 1986 में UNESCO ने विश्व धरोहर स्थल (World Heritage Site) घोषित किया। यह मान्यता इस बात का प्रमाण है कि हम्पी की वास्तुकला केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि समस्त मानव सभ्यता के लिए एक अमूल्य धरोहर है। लगभग 4,187 वर्ग किलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में 1,600 से अधिक स्मारक, मंदिर, महल, जलाशय, बाजार और अन्य संरचनाएं मौजूद हैं।

हम्पी की वास्तुकला केवल पत्थरों को तराशने की कला नहीं है — यह एक समग्र दृष्टिकोण है जिसमें धर्म, दर्शन, खगोल विज्ञान, अभियांत्रिकी और सौंदर्यशास्त्र का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस लेख में हम हम्पी की वास्तुकला की उन विशेषताओं का विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे जो इसे विश्व की महानतम वास्तुकला परंपराओं में से एक बनाती हैं।

हम्पी का ऐतिहासिक संदर्भ

हम्पी की वास्तुकला को समझने के लिए पहले उस ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को जानना आवश्यक है जिसमें इसका निर्माण हुआ। विजयनगर साम्राज्य की स्थापना सन् 1336 ईस्वी में हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम नामक दो भाइयों ने की थी। ये दोनों भाई पहले काकतीय साम्राज्य के अधीन काम करते थे और बाद में दिल्ली सल्तनत के अधीन भी रहे। किंतु संत विद्यारण्य के मार्गदर्शन में उन्होंने हिंदू धर्म की पुनर्स्थापना के लिए एक स्वतंत्र राज्य की नींव रखी।

विजयनगर साम्राज्य लगभग तीन शताब्दियों तक — 1336 से 1646 ईस्वी तक — दक्षिण भारत पर शासन करता रहा। इस दौरान चार प्रमुख राजवंशों ने शासन किया — संगम वंश, सालुव वंश, तुलुव वंश और अरविदु वंश। इनमें से तुलुव वंश के शासक कृष्णदेवराय (1509-1529 ईस्वी) को सबसे महान शासक माना जाता है। उनके शासनकाल में विजयनगर साम्राज्य अपनी सांस्कृतिक, आर्थिक और वास्तुकला संबंधी उपलब्धियों के शिखर पर था।

उस काल में हम्पी नगर की जनसंख्या पांच लाख से अधिक थी और यह विश्व के सबसे बड़े नगरों में गिना जाता था। पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस ने अपने यात्रा वृतांत में हम्पी को रोम नगर जितना बड़ा और उससे भी अधिक समृद्ध बताया था। नगर में चौड़ी सड़कें, भव्य बाजार, विशाल मंदिर और सुंदर महल थे।

सन् 1565 ईस्वी में तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर साम्राज्य को दक्कन सल्तनतों के संयुक्त मोर्चे से करारी हार का सामना करना पड़ा। इस युद्ध के बाद हम्पी नगर को लूटा और जलाया गया। कहा जाता है कि छह महीने तक यह नगर जलता रहा। इस विध्वंस के बावजूद हम्पी की वास्तुकला का एक बड़ा हिस्सा आज भी अपनी भव्यता के साथ खड़ा है, जो उसकी निर्माण गुणवत्ता और स्थायित्व का प्रमाण है।

हम्पी की वास्तुकला शैली — सामान्य परिचय

हम्पी की वास्तुकला एक विशिष्ट और मिश्रित शैली का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें मुख्य रूप से द्रविड़ शैली का प्रभुत्व है, किंतु साथ ही इंडो-इस्लामिक, होयसाल और चालुक्य वास्तुकला के तत्व भी देखने को मिलते हैं। यही मिश्रण हम्पी की वास्तुकला को एक अनूठी पहचान देता है।

द्रविड़ शैली का प्रभाव सबसे प्रमुख है। द्रविड़ वास्तुकला में ऊंचे और सुसज्जित प्रवेश द्वार (गोपुरम), पिरामिडनुमा शिखर, विशाल प्रांगण, मंडप (स्तंभों वाले हॉल) और गर्भगृह (मुख्य देवता का कक्ष) प्रमुख तत्व होते हैं। हम्पी के अधिकांश मंदिरों में ये सभी तत्व स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

इंडो-इस्लामिक तत्वों का समावेश विजयनगर काल की एक विशेष विशेषता है। यद्यपि विजयनगर एक हिंदू साम्राज्य था, किंतु वहां के शासकों ने पड़ोसी मुस्लिम सल्तनतों की वास्तुकला के कुछ तत्वों को भी अपनाया। इसमें मेहराब (arches), गुंबद (domes) और छत्र (छतरियां) जैसे तत्व शामिल हैं। लोटस महल और हाथी अस्तबल इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

स्थानीय ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग हम्पी की वास्तुकला की एक और महत्वपूर्ण विशेषता है। तुंगभद्रा नदी के किनारे बड़े-बड़े ग्रेनाइट के शिलाखंड प्रचुर मात्रा में उपलब्ध थे। इन्हीं शिलाखंडों को तराशकर हम्पी के भव्य मंदिरों और महलों का निर्माण किया गया। ग्रेनाइट एक अत्यंत कठोर और टिकाऊ पत्थर होता है, जिसके कारण हम्पी की संरचनाएं सदियों की मार झेलने के बाद भी अपेक्षाकृत सुरक्षित हैं।

विजयनगर काल की वास्तुकला में पंचायतन शैली भी दिखाई देती है जिसमें एक मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार छोटे मंदिर बनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कल्याण मंडप (विवाह मंडप) और महानवमी डिब्बा जैसी संरचनाएं विजयनगर वास्तुकला की विशिष्ट पहचान हैं।

मंदिर वास्तुकला की विशेषताएं

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हम्पी में मंदिर वास्तुकला का सबसे विस्तृत और वैभवशाली रूप देखने को मिलता है। यहां के मंदिर न केवल धार्मिक उपासना के केंद्र थे, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन के केंद्रबिंदु भी थे।

विरुपाक्ष मंदिर

विरुपाक्ष मंदिर हम्पी का सबसे प्राचीन और सबसे महत्वपूर्ण मंदिर है। यह भगवान शिव के एक रूप — विरुपाक्ष — को समर्पित है। इस मंदिर की सबसे आकर्षक विशेषता इसका विशाल गोपुरम है जो लगभग 50 मीटर (160 फीट) की ऊंचाई तक उठा हुआ है। यह गोपुरम नौ मंजिला है और इस पर असंख्य देवी-देवताओं, मिथकीय प्राणियों और पुष्प-आकृतियों की मूर्तियां उकेरी गई हैं।

मंदिर परिसर में कई मंडप हैं। इनमें से रंग मंडप विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें चित्रित छत है। इस छत पर विजयनगर काल की चित्रकला के दुर्लभ नमूने देखे जा सकते हैं जो शिव-पार्वती विवाह, दशावतार और अन्य पौराणिक कथाओं को दर्शाते हैं। मंदिर परिसर में एक लंबी बाजार गली है जो पंपा सरोवर तक जाती है। इस गली के दोनों ओर स्तंभ बने हुए हैं जो प्राचीन काल में दुकानों का काम करते थे।

विरुपाक्ष मंदिर में एक अद्भुत प्रकाशीय घटना भी देखने को मिलती है। मंदिर के अंधेरे कक्ष में जब बाहर से प्रकाश आता है तो दीवार पर गोपुरम का उल्टा प्रतिबिंब (inverted image) बनता है। यह एक प्राकृतिक कैमरा ऑब्स्क्यूरा प्रभाव है जिसे मंदिर के वास्तुकारों ने जानबूझकर डिजाइन किया था। यह प्राचीन भारतीय वास्तुकारों के वैज्ञानिक ज्ञान का प्रमाण है।

विट्ठल मंदिर और पत्थर का रथ

विट्ठल मंदिर हम्पी की वास्तुकला का सबसे उत्कृष्ट और भव्य उदाहरण माना जाता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के एक रूप — विट्ठल — को समर्पित है। इस मंदिर का निर्माण 15वीं शताब्दी में आरंभ हुआ और 16वीं शताब्दी में कृष्णदेवराय के शासनकाल में इसे पूर्णता प्राप्त हुई।

विट्ठल मंदिर की सबसे प्रसिद्ध संरचना है — पत्थर का रथ (Stone Chariot)। यह रथ वास्तव में एक मंदिर ही है जो गरुड़ (भगवान विष्णु का वाहन) को समर्पित है। इस रथ की विशेषता यह है कि यह पूर्णतः ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है और इसके पहिए वास्तव में घूम भी सकते थे। रथ के चारों ओर हाथियों की मूर्तियां बनी हैं और इसकी बाहरी दीवारों पर बारीक नक्काशी की गई है। यह पत्थर का रथ भारतीय मुद्रा के 50 रुपये के पुराने नोट पर भी अंकित रहा है जो इसकी राष्ट्रीय महत्ता को दर्शाता है।

विट्ठल मंदिर के संगीतमय स्तंभ (Musical Pillars) विश्वभर के पर्यटकों और शोधकर्ताओं को आकर्षित करते हैं। मंदिर के मुख्य मंडप में 56 स्तंभ हैं और प्रत्येक स्तंभ थपथपाने पर एक अलग संगीत ध्वनि उत्पन्न करता है। ये ध्वनियां भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात सुरों — सा, रे, ग, म, प, ध, नि — से मेल खाती हैं। आश्चर्य की बात यह है कि अंग्रेजी शासनकाल में जब अंग्रेज अधिकारियों ने यह जांचने के लिए कि इन स्तंभों में ध्वनि कहां से आती है, दो स्तंभों को काटकर देखा तो उन्हें भीतर कुछ नहीं मिला — स्तंभ ठोस पत्थर के थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह ध्वनि स्तंभों के आकार, आकृति और पत्थर की विशिष्ट संरचना के कारण उत्पन्न होती है।

विट्ठल मंदिर के तीन गोपुरम हैं — पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी। प्रत्येक गोपुरम पर देवी-देवताओं, गंधर्वों, अप्सराओं और पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे गए हैं। मंदिर परिसर में एक कल्याण मंडप भी है जहां देवताओं के विवाह समारोह आयोजित होते थे। इस मंडप के स्तंभों पर घोड़ों, हाथियों और मिथकीय प्राणियों की आकृतियां बनी हैं जो अत्यंत जीवंत और कलापूर्ण हैं।

हजारराम मंदिर

हजारराम मंदिर (जिसे हजार रामचंद्र मंदिर भी कहते हैं) विजयनगर के शाही परिवार का निजी मंदिर था। यह मंदिर भगवान राम को समर्पित है। इस मंदिर का नाम “हजार” इसलिए पड़ा क्योंकि इसकी दीवारों पर रामायण के हजारों दृश्य उकेरे गए हैं। मंदिर की आंतरिक और बाहरी दीवारें रामायण और महाभारत के दृश्यों से सजी हैं जो एक निरंतर कथा पट्टी (narrative frieze) के रूप में प्रस्तुत की गई हैं।

हजारराम मंदिर की बाहरी दीवारों पर नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः हाथियों की कतार, घोड़ों की कतार, स्वांग करते हुए लोगों की कतार और फिर देवी-देवताओं की आकृतियां बनी हैं। यह व्यवस्था न केवल कलात्मक है बल्कि एक प्रतीकात्मक संदेश भी देती है — पृथ्वी से स्वर्ग तक की यात्रा।

गोपुरम की संरचना और अलंकरण

हम्पी के मंदिरों में गोपुरम (मंदिर के प्रवेश द्वार पर बना ऊंचा मीनारनुमा ढांचा) एक अत्यंत महत्वपूर्ण स्थापत्य तत्व है। गोपुरम आमतौर पर आयताकार आधार पर निर्मित होते हैं और ऊपर की ओर पिरामिडनुमा आकार लेते हुए एक बेलनाकार (barrel-vaulted) छत पर समाप्त होते हैं। गोपुरम की प्रत्येक मंजिल पर देवी-देवताओं, गंधर्वों, यक्षों और विभिन्न पौराणिक पात्रों की मूर्तियां लगाई जाती हैं।

विजयनगर काल के गोपुरम अपनी विशालता और सूक्ष्म अलंकरण के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। इन गोपुरमों में चूने के प्लास्टर (stucco) की मूर्तियां लगाई जाती थीं जिन्हें चटख रंगों से रंगा जाता था। यद्यपि आज इन रंगों का अधिकांश हिस्सा नष्ट हो चुका है, किंतु कुछ स्थानों पर पुराने रंगों के अवशेष अभी भी दिखाई देते हैं।

राजकीय एवं नागरिक वास्तुकला

हम्पी में केवल मंदिर ही नहीं बल्कि राजकीय और नागरिक वास्तुकला के भी अनेक उत्कृष्ट उदाहरण मिलते हैं। ये संरचनाएं विजयनगर साम्राज्य की समृद्धि, राजकीय वैभव और शासन-व्यवस्था की झलक प्रस्तुत करती हैं।

लोटस महल (कमल महल)

लोटस महल को हम्पी की सबसे सुंदर और अनूठी संरचनाओं में से एक माना जाता है। यह दो मंजिला भवन “जेनाना एनक्लोजर” (महिलाओं के रहने का क्षेत्र) में स्थित है। इस महल की वास्तुकला में हिंदू और इस्लामी शैलियों का एक अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है।

महल की छत कमल की पंखुड़ियों जैसी बनी है — इसीलिए इसे लोटस महल कहा जाता है। इसमें नुकीले मेहराब (pointed arches) बने हैं जो इस्लामी वास्तुकला की देन हैं, किंतु समग्र रूप और अलंकरण हिंदू परंपरा के अनुसार है। कमल महल में हवा के आने-जाने की विशेष व्यवस्था की गई थी जिससे गर्मी के मौसम में भी भीतर का वातावरण ठंडा बना रहता था। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस महल का उपयोग राजकीय सभाओं के लिए होता था, जबकि अन्य इसे रानियों का विश्रामगृह मानते हैं।

हाथी अस्तबल (Elephant Stables)

हाथी अस्तबल विजयनगर साम्राज्य के शाही हाथियों के रहने का स्थान था। यह एक लंबी पंक्ति में बनी ग्यारह कक्षों की संरचना है। प्रत्येक कक्ष में एक या दो हाथी रखे जा सकते थे। इन कक्षों की छतें अलग-अलग शैलियों में बनी हैं — कहीं गुंबद है, कहीं बैरल वॉल्ट है और कहीं चपटी छत है। यह विविधता जानबूझकर की गई है और इस संरचना को एक विशेष सौंदर्य प्रदान करती है।

हाथी अस्तबल की वास्तुकला में इंडो-इस्लामिक शैली का प्रभाव सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। इसके मेहराब, गुंबद और सजावटी तत्व मुस्लिम स्थापत्यकला से प्रभावित हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि विजयनगर के शासक अपने पड़ोसी देशों की वास्तुकला से प्रेरणा लेने में संकोच नहीं करते थे।

रानी का स्नानागार (Queen’s Bath)

रानी का स्नानागार हम्पी की एक और अनूठी संरचना है। यह एक बंद आंगन के बीच में स्थित एक विशाल स्नान कुंड है। इसके चारों ओर मेहराबदार बरामदे बने हैं जिनमें कुल 24 कक्ष हैं। इन कक्षों में परफ्यूमयुक्त जल, फूलों की पंखुड़ियां और सुगंधित तेल रखे जाते थे जिनका उपयोग स्नान के दौरान किया जाता था।

स्नानागार की संरचना में एक विशेष जल-प्रवाह प्रणाली बनाई गई थी। कुंड में पानी भरने और निकालने की व्यवस्था पाइपों के माध्यम से की गई थी। कुंड की दीवारों पर सूक्ष्म अलंकरण है और छत पर झूलती हुई कमल की कलियों के आकार की सजावट है। यह स्नानागार उस काल के राजकीय विलास और परिष्कृत जीवनशैली का प्रमाण है।

महानवमी डिब्बा (दशहरा मंच)

महानवमी डिब्बा एक विशाल चबूतरा है जिस पर खड़े होकर विजयनगर के राजा नवरात्रि और दशहरा उत्सव के दौरान भव्य समारोहों का अवलोकन करते थे। यह चबूतरा तीन स्तरों में बना है और इसकी ऊंचाई लगभग 8 मीटर है। इसके चारों ओर की दीवारों पर अत्यंत जीवंत और विस्तृत नक्काशी की गई है।

इस नक्काशी में हाथी, घोड़े, ऊंट, शिकार के दृश्य, नृत्य करती हुई अप्सराएं, कुश्ती के दृश्य, संगीतकार, दूर देशों से आए दूत और विभिन्न पौराणिक आकृतियां शामिल हैं। इन दृश्यों के माध्यम से विजयनगर काल के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जीवन की एक जीवंत झांकी प्रस्तुत होती है।

जल प्रबंधन एवं अभियांत्रिकी

हम्पी की वास्तुकला केवल मंदिरों और महलों तक सीमित नहीं है। विजयनगर साम्राज्य ने जल प्रबंधन के क्षेत्र में भी अत्यंत उन्नत और परिष्कृत प्रणाली विकसित की थी। यह प्रणाली उस काल की अभियांत्रिकी कुशलता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है।

तुंगभद्रा नदी हम्पी के पास से बहती है और यह पूरे क्षेत्र के लिए जल का प्रमुख स्रोत थी। विजयनगर के अभियंताओं ने नदी से पानी लेकर नगर के विभिन्न हिस्सों तक पहुंचाने के लिए नहरों, जलाशयों और पाइपलाइनों की एक जटिल प्रणाली बनाई थी।

पुष्करणी (पवित्र तालाब) हम्पी की जल संरचना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये वर्गाकार या आयताकार कुंड होते हैं जिनमें उतरने के लिए चारों ओर सीढ़ियां बनी होती हैं। इन्हें स्टेपवेल भी कहा जाता है। हम्पी में कई पुष्करणियां हैं — जैसे कृष्ण मंदिर का पुष्करणी, विट्ठल मंदिर का पुष्करणी आदि। इनका उपयोग धार्मिक स्नान के साथ-साथ पीने के पानी और सिंचाई के लिए भी होता था।

हम्पी में तुरत नहर (Turtha Canal) एक प्रमुख जल संरचना है जो तुंगभद्रा नदी से पानी लेकर पूरे नगर क्षेत्र में वितरित करती थी। इस नहर की लंबाई कई किलोमीटर थी और यह पहाड़ियों और घाटियों को पार करते हुए बनाई गई थी। इसके निर्माण में उस काल के अभियंताओं ने गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत का कुशलतापूर्वक उपयोग किया था।

इसके अतिरिक्त हम्पी में बांध और जलाशय भी बनाए गए थे जो वर्षाजल को संग्रहीत करते थे। इन जलाशयों से सिंचाई की व्यवस्था की जाती थी जिससे नगर के आसपास के खेतों में फसल उगाई जाती थी। यह जल प्रबंधन प्रणाली इतनी उन्नत थी कि आज के अभियंता भी इसकी सराहना करते हैं।

मूर्तिकला एवं शिल्पकला की विशेषताएं

हम्पी की वास्तुकला और मूर्तिकला एक-दूसरे से अभिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। यहां की प्रत्येक संरचना मूर्तियों और नक्काशी से इस प्रकार सजी है कि वास्तुकला और शिल्पकला के बीच की सीमा रेखा धुंधली हो जाती है।

हम्पी की मूर्तिकला में देवी-देवताओं की प्रतिमाएं सबसे प्रमुख हैं। यहां भगवान शिव, विष्णु, गणेश, कार्तिकेय, दुर्गा, लक्ष्मी और अनेक अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां मिलती हैं। इन मूर्तियों को बनाने में शिल्पकारों ने आगम शास्त्रों के निर्देशों का पालन किया है। प्रत्येक देवता के शारीरिक अनुपात, मुद्राएं, आभूषण और वाहन निश्चित नियमों के अनुसार बनाए गए हैं।

नरसिम्हा प्रतिमा हम्पी की सबसे विशाल एकाश्म (एक ही पत्थर से बनी) प्रतिमाओं में से एक है। यह भगवान विष्णु के अवतार नृसिंह (नर-सिंह) की प्रतिमा है जो लगभग 6.7 मीटर (22 फीट) ऊंची है। इस प्रतिमा में नृसिंह की भव्यता और क्रोध को बड़े कौशल से उकेरा गया है।

उग्र नरसिम्हा के पास ही स्थित लिंगम भी अत्यंत विशाल और प्रभावशाली है। यह शिव का प्रतीक है और इसे बड़े कौशल से ग्रेनाइट में तराशा गया है।

हम्पी की दीवारों पर पट्टिका कथाएं (frieze narratives) एक अनूठी विशेषता हैं। इन पट्टिकाओं में रामायण, महाभारत और अन्य पुराणों की कथाएं एक क्रमिक चित्र-माला के रूप में उकेरी गई हैं। इन्हें पढ़ना एक चलचित्र देखने जैसा अनुभव है — दाईं से बाईं ओर जाते हुए कथा का एक दृश्य से दूसरे दृश्य की ओर प्रवाह होता है।

पशु-पक्षी और प्रकृति का चित्रण भी हम्पी की शिल्पकला की विशेषता है। हाथी, घोड़े, शेर, मोर, हंस, कमल, केले के वृक्ष — ये सभी मूर्तिकला में प्रमुखता से उपस्थित हैं। हाथी हम्पी की वास्तुकला का एक विशेष प्रतीक है और यह लगभग हर संरचना पर किसी न किसी रूप में उपस्थित है।

वास्तुकला में प्रतीकवाद और धार्मिक भावना

हम्पी की वास्तुकला केवल भव्यता का प्रदर्शन नहीं है — इसके प्रत्येक तत्व में गहरा प्रतीकात्मक और धार्मिक अर्थ निहित है।

मंदिरों की दिशा और खगोलीय संरेखण एक महत्वपूर्ण पहलू है। विजयनगर के अधिकांश मंदिर पूर्व दिशा की ओर उन्मुख हैं ताकि उगते सूरज की पहली किरणें सीधे गर्भगृह में स्थित देवता की प्रतिमा पर पड़ें। यह एक धार्मिक परंपरा के साथ-साथ खगोलीय ज्ञान का भी प्रमाण है।

मंदिर का ब्रह्मांडीय प्रतीकवाद भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। हिंदू वास्तुकला में मंदिर को सुमेरु पर्वत (ब्रह्मांड का केंद्र माना जाने वाला पौराणिक पर्वत) का प्रतीक माना जाता है। मंदिर का शिखर सुमेरु की चोटी है, गर्भगृह पहाड़ की गुफा है और मंडप पृथ्वी का प्रतीक है। इस प्रकार मंदिर में प्रवेश करना ब्रह्मांड की गहराई में उतरने का प्रतीकात्मक अनुभव है।

हम्पी में शैव, वैष्णव और जैन — तीनों धार्मिक परंपराओं के मंदिर और स्मारक मिलते हैं। विजयनगर के शासक मुख्यतः वैष्णव थे किंतु उन्होंने शैव मंदिरों का निर्माण और पोषण भी किया। इससे उस काल की धार्मिक सहिष्णुता का पता चलता है।

वास्तु पुरुष मंडल का सिद्धांत भी हम्पी के मंदिरों के निर्माण में प्रयुक्त हुआ है। इस सिद्धांत के अनुसार भूमि को 64 या 81 वर्गों में विभाजित किया जाता है और प्रत्येक वर्ग किसी देवता को समर्पित होता है। मंदिर का निर्माण इन वर्गों के अनुसार किया जाता है जिससे पूरी संरचना एक ब्रह्मांडीय नक्शे का रूप ले लेती है।

हम्पी की वास्तुकला का तकनीकी पक्ष

हम्पी की वास्तुकला की सबसे चौंकाने वाली विशेषता इसका तकनीकी पक्ष है। सदियों पहले बिना आधुनिक उपकरणों के इतनी विशाल और परिष्कृत संरचनाओं का निर्माण करना अपने आप में एक चमत्कार है।

बिना चूने के पत्थर जोड़ने की तकनीक

हम्पी के अधिकांश मंदिरों में पत्थर के विशाल खंडों को जोड़ने में चूने या किसी अन्य जोड़ने वाले पदार्थ (mortar) का उपयोग नहीं किया गया है। इसके बजाय पत्थरों को इतनी सटीकता से तराशा और फिट किया गया है कि वे अपने भार और एक-दूसरे के साथ जुड़कर एक दृढ़ संरचना का निर्माण करते हैं। इस तकनीक को ड्राय स्टोन मेसनरी (Dry Stone Masonry) कहा जाता है। इसमें पत्थरों के बीच इतना कम अंतर होता है कि एक कागज भी नहीं घुसाया जा सकता।

कुछ स्थानों पर लोहे की क्रैम्पों (clamps) का उपयोग भी किया गया है जो पत्थरों के बीच खांचों में फिट की जाती थीं। ये क्रैम्पें पत्थरों को क्षैतिज दिशा में खिसकने से रोकती थीं।

संगीतमय स्तंभों का रहस्य

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, विट्ठल मंदिर के संगीतमय स्तंभ (Musical Pillars) विश्वभर के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के लिए एक पहेली बने हुए हैं। इन स्तंभों में श्रुति स्तंभ (Shruti Pillars) और गान स्तंभ (Gana Pillars) जैसे विशेष प्रकार के स्तंभ हैं। प्रत्येक मुख्य स्तंभ के चारों ओर छोटे-छोटे स्तंभ होते हैं और इन्हें थपथपाने पर अलग-अलग संगीत ध्वनियां निकलती हैं।

वैज्ञानिक विश्लेषण से पता चला है कि ये ध्वनियां पत्थर की आंतरिक संरचना, स्तंभों के आकार और उनकी मोटाई के कारण उत्पन्न होती हैं। इन स्तंभों को बनाने के लिए विशेष प्रकार के पत्थर का चुनाव किया गया था जिसमें ध्वनि-संचालन की विशेष क्षमता होती है। यह प्राचीन भारतीय शिल्पकारों के ध्वनिकी (acoustics) के गहन ज्ञान का प्रमाण है।

प्रकाश और छाया का वास्तुशिल्पीय उपयोग

हम्पी के मंदिरों में प्रकाश और छाया का उपयोग बड़ी कुशलता से किया गया है। मंदिरों के भीतरी भाग में एक विशेष प्रकार का अंधकार बनाए रखा जाता है जो धार्मिक वातावरण को गहन और रहस्यमय बनाता है। गर्भगृह में पहुंचने से पहले तीव्र प्रकाश से धीरे-धीरे अंधकार की ओर जाने की यात्रा एक आध्यात्मिक अनुभव का निर्माण करती है।

विरुपाक्ष मंदिर में पहले उल्लिखित कैमरा ऑब्स्क्यूरा प्रभाव इसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण है। मंदिर के एक विशेष कक्ष में एक छोटे से छेद के माध्यम से बाहर के गोपुरम का उल्टा और रंगीन प्रतिबिंब दीवार पर बनता है। यह सिद्धांत आज के फोटोग्राफी के मूल सिद्धांत के समान है और यह 14वीं-15वीं शताब्दी में इसका प्रयोग भारतीय वास्तुकारों की वैज्ञानिक दूरदृष्टि को दर्शाता है।

निर्माण सामग्री और उपकरण

हम्पी में उपयोग किए गए ग्रेनाइट पत्थर को स्थानीय पहाड़ियों और नदी के किनारे से प्राप्त किया जाता था। इन विशाल पत्थरों को काटने और तराशने के लिए लोहे के औजारों का उपयोग किया जाता था। पत्थरों को उनके स्थान तक पहुंचाने के लिए हाथियों, बैलों और मानव श्रम का उपयोग किया जाता था।

मंदिरों के ऊंचे स्थानों तक पत्थर पहुंचाने के लिए लकड़ी की रैंप (ढलान) बनाई जाती थी। इन रैंपों पर पत्थरों को खींचकर ऊपर ले जाया जाता था। बड़े मंदिरों के निर्माण में हजारों कुशल शिल्पकार और अकुशल मजदूर काम करते थे।

अन्य स्थलों से तुलना एवं विशिष्टता

हम्पी की वास्तुकला को उसके समकालीन और परवर्ती स्थापत्य परंपराओं के संदर्भ में देखने पर इसकी विशिष्टता और स्पष्ट होती है।

तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर की तुलना में हम्पी के मंदिर वास्तुकला की एक अलग परिपक्वता दर्शाते हैं। बृहदेश्वर मंदिर जहां एकाकी भव्यता में विश्वास करता है, वहीं हम्पी के मंदिर एक विशाल परिसर और समुच्चय की अवधारणा पर आधारित हैं। हम्पी में मंदिर, बाजार, जलाशय और रहवासी क्षेत्र एक साथ नियोजित हैं।

मदुरै के मीनाक्षी मंदिर से तुलना करने पर पाते हैं कि दोनों में विशाल गोपुरम और भव्य मंडप हैं, किंतु हम्पी के मंदिरों में जो ग्रेनाइट की कठोरता और सरलता है वह मदुरै की अपेक्षाकृत अधिक सजावटी शैली से अलग है।

खजुराहो के मंदिरों से हम्पी मूलतः भिन्न है। खजुराहो उत्तर भारतीय नागर शैली का प्रतिनिधित्व करता है जबकि हम्पी द्रविड़ शैली का। खजुराहो में शृंगार और कामुकता को मूर्तिकला का विषय बनाया गया है जबकि हम्पी में धार्मिक और महाकाव्य कथाएं प्रमुख हैं।

हम्पी की अनूठी विशेषता यह है कि यह एकमात्र ऐसा स्थान है जहां एक साथ मंदिर, राजमहल, बाजार, जलसंरचनाएं और अन्य नागरिक संरचनाएं इतने बड़े पैमाने पर और इतनी अच्छी तरह संरक्षित मिलती हैं। यह हमें विजयनगर काल के नगर नियोजन और वास्तुकला की समग्र दृष्टि को समझने का अवसर देता है।

संरक्षण एवं वर्तमान स्थिति

हम्पी की विरासत का संरक्षण एक बड़ी चुनौती है। 1565 में हुए विनाश के बाद से यह क्षेत्र काफी हद तक उपेक्षित रहा। 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश पुरातत्वविद् कॉलिन मैकेंजी ने इस क्षेत्र का सर्वप्रथम विस्तृत सर्वेक्षण किया और इसके महत्व को दुनिया के सामने रखा।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) हम्पी के संरक्षण में मुख्य भूमिका निभाता है। ASI ने यहां की कई संरचनाओं की मरम्मत और संरक्षण का कार्य किया है। किंतु ग्रेनाइट की विशाल संरचनाओं को मौसम की मार, वनस्पतियों की जड़ों और बढ़ते पर्यटन से होने वाले नुकसान से बचाना एक निरंतर चुनौती है।

UNESCO ने 1986 में हम्पी को विश्व धरोहर स्थल घोषित करने के बाद से इसके संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। UNESCO के दिशानिर्देशों के अनुसार हम्पी में किसी भी नए निर्माण पर कड़े प्रतिबंध हैं।

हालांकि, हम्पी के सामने कुछ गंभीर चुनौतियां भी हैं। पहली चुनौती है — अतिक्रमण। हम्पी के आसपास बसे गांवों की आबादी धीरे-धीरे पुरातात्विक महत्व के क्षेत्रों में घुसती जा रही है। दूसरी चुनौती है — पर्यटन का दबाव। लाखों पर्यटकों के कारण होने वाला क्षरण एक गंभीर समस्या है। तीसरी चुनौती है — प्राकृतिक क्षरण। मानसूनी बारिश, धूप और तापमान के उतार-चढ़ाव के कारण पत्थरों का क्षरण होता रहता है।

संरक्षण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण प्रयास है — डिजिटल दस्तावेजीकरण। विभिन्न संस्थाओं ने 3D स्कैनिंग और फोटोग्रामेट्री के माध्यम से हम्पी की संरचनाओं का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया है। यह सुनिश्चित करता है कि भले ही भविष्य में कोई संरचना क्षतिग्रस्त हो जाए, उसका एक पूर्ण डिजिटल अभिलेख उपलब्ध रहे।

उपसंहार

हम्पी की वास्तुकला मानव सभ्यता की उस असाधारण क्षमता का प्रमाण है जो सीमित संसाधनों और उपकरणों के बावजूद ऐसी रचनाएं कर सकती है जो शताब्दियों तक टिकी रहती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्यों को विस्मित और प्रेरित करती रहती हैं।

हम्पी की वास्तुकला में एक साथ अनेक स्तर हैं — धार्मिक भावना का स्तर, राजकीय वैभव का स्तर, तकनीकी कुशलता का स्तर, कलात्मक सौंदर्य का स्तर और सामाजिक संगठन का स्तर। ये सभी स्तर मिलकर एक ऐसी समग्र सभ्यता का चित्र प्रस्तुत करते हैं जो अपनी परंपराओं में गहरी जड़ें रखते हुए भी नवाचार और परिवर्तन के लिए सदैव तत्पर थी।

आज जब हम हम्पी के खंडहरों के बीच खड़े होते हैं और उन विशाल गोपुरमों, संगीतमय स्तंभों, पत्थर के रथ और सुंदर मूर्तियों को देखते हैं तो हमारे मन में एक साथ गर्व और विनम्रता दोनों का भाव जागता है — गर्व इस बात का कि हमारे पूर्वजों ने कितनी महान रचनाएं कीं, और विनम्रता इस बात की कि हम उस महानता की केवल एक झलक भर देख पा रहे हैं।

हम्पी केवल एक पर्यटन स्थल नहीं है — यह एक जीवंत पाठशाला है जहां वास्तुकला, इतिहास, धर्म, विज्ञान और कला एक साथ पढ़े जा सकते हैं। इसे संरक्षित रखना न केवल भारत का बल्कि समस्त मानव जाति का दायित्व है। क्योंकि हम्पी केवल विजयनगर साम्राज्य की विरासत नहीं है — यह पूरी मानव सभ्यता की उस अदम्य जिजीविषा का प्रतीक है जो पत्थरों में भी कविता रच देती है।


यह लेख हम्पी की वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं का एक व्यापक अवलोकन प्रस्तुत करता है। हम्पी इतना विशाल और विविध है कि इसकी संपूर्ण समझ के लिए अनेक खंडों की आवश्यकता होगी।

MCQ Questions — हम्पी वास्तुकला

1. हम्पी किस नदी के तट पर स्थित है?

  • A) कृष्णा नदी
  • B) कावेरी नदी
  • C) तुंगभद्रा नदी
  • D) गोदावरी नदी

उत्तर: C हम्पी कर्नाटक में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित है।


2. विजयनगर साम्राज्य की स्थापना किस वर्ष हुई थी?

  • A) 1206 ई.
  • B) 1336 ई.
  • C) 1498 ई.
  • D) 1565 ई.

उत्तर: B विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में हरिहर प्रथम और बुक्का राय प्रथम ने की थी।


3. हम्पी को UNESCO विश्व धरोहर स्थल किस वर्ष घोषित किया गया?

  • A) 1972
  • B) 1980
  • C) 1986
  • D) 1992

उत्तर: C UNESCO ने 1986 में हम्पी को विश्व धरोहर स्थल के रूप में मान्यता दी।


4. विट्ठल मंदिर किस देवता को समर्पित है?

  • A) भगवान शिव
  • B) भगवान गणेश
  • C) भगवान विष्णु
  • D) भगवान ब्रह्मा

उत्तर: C विट्ठल मंदिर भगवान विष्णु के एक रूप विट्ठल को समर्पित है।


5. हम्पी के पत्थर के रथ में किस देवता की प्रतिष्ठा है?

  • A) नंदी
  • B) गरुड़
  • C) हनुमान
  • D) वाहन सिंह

उत्तर: B पत्थर का रथ भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ को समर्पित एक मंदिर है।


6. विजयनगर साम्राज्य के सबसे महान शासक कौन माने जाते हैं?

  • A) हरिहर प्रथम
  • B) देवराय द्वितीय
  • C) कृष्णदेवराय
  • D) बुक्का राय प्रथम

उत्तर: C कृष्णदेवराय (1509-1529 ई.) को विजयनगर साम्राज्य का सबसे महान और प्रतापी शासक माना जाता है।


7. हम्पी में संगीतमय स्तंभ किस मंदिर में स्थित हैं?

  • A) विरुपाक्ष मंदिर
  • B) हजारराम मंदिर
  • C) विट्ठल मंदिर
  • D) कृष्ण मंदिर

उत्तर: C विट्ठल मंदिर के मुख्य मंडप में 56 संगीतमय स्तंभ हैं जो थपथपाने पर सुर उत्पन्न करते हैं।


8. तालीकोटा का युद्ध किस वर्ष हुआ था?

  • A) 1526
  • B) 1556
  • C) 1565
  • D) 1576

उत्तर: C 1565 ईस्वी में तालीकोटा के युद्ध में विजयनगर साम्राज्य को दक्कन सल्तनतों से पराजय मिली और हम्पी नगर नष्ट हो गया।


9. हम्पी की वास्तुकला में मुख्यतः किस पत्थर का उपयोग किया गया है?

  • A) संगमरमर
  • B) बलुआ पत्थर
  • C) चूना पत्थर
  • D) ग्रेनाइट

उत्तर: D हम्पी की संरचनाएं मुख्यतः स्थानीय ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित हैं जो अत्यंत कठोर और टिकाऊ होता है।


10. हजारराम मंदिर में किस ग्रंथ के दृश्य उकेरे गए हैं?

  • A) केवल महाभारत
  • B) केवल भागवत पुराण
  • C) रामायण और महाभारत दोनों
  • D) केवल रामायण

उत्तर: C हजारराम मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत दोनों के हजारों दृश्य एक कथा पट्टी के रूप में उकेरे गए हैं।


11. लोटस महल किस क्षेत्र में स्थित है?

  • A) मंदिर परिसर
  • B) जेनाना एनक्लोजर
  • C) बाजार क्षेत्र
  • D) सैनिक क्षेत्र

उत्तर: B लोटस महल जेनाना एनक्लोजर अर्थात महिलाओं के रहने के क्षेत्र में स्थित एक दो मंजिला भवन है।


12. विरुपाक्ष मंदिर का गोपुरम कितनी मंजिला है?

  • A) पांच मंजिला
  • B) सात मंजिला
  • C) नौ मंजिला
  • D) ग्यारह मंजिला

उत्तर: C विरुपाक्ष मंदिर का गोपुरम नौ मंजिला है और लगभग 50 मीटर की ऊंचाई तक उठा हुआ है।


13. हम्पी में “ड्राय स्टोन मेसनरी” तकनीक का क्या अर्थ है?

  • A) पत्थरों को केवल चूने से जोड़ना
  • B) पत्थरों को बिना किसी जोड़ने वाले पदार्थ के जोड़ना
  • C) पत्थरों को लोहे से जोड़ना
  • D) पत्थरों को मिट्टी से जोड़ना

उत्तर: B ड्राय स्टोन मेसनरी में पत्थरों को बिना चूने या किसी mortar के, केवल सटीक तराशाई और भार के आधार पर जोड़ा जाता है।


14. महानवमी डिब्बा किस उद्देश्य के लिए बनाया गया था?

  • A) राजा के आवास के लिए
  • B) हाथियों को रखने के लिए
  • C) नवरात्रि और दशहरा उत्सव देखने के लिए
  • D) सैनिकों के प्रशिक्षण के लिए

उत्तर: C महानवमी डिब्बा एक विशाल चबूतरा है जिस पर खड़े होकर राजा नवरात्रि और दशहरा उत्सव का अवलोकन करते थे।


15. विरुपाक्ष मंदिर में कैमरा ऑब्स्क्यूरा प्रभाव क्या दर्शाता है?

  • A) मंदिर की दीवारों पर रंगीन चित्रकारी
  • B) एक कक्ष में गोपुरम का उल्टा प्रतिबिंब बनना
  • C) स्तंभों पर प्रकाश का खेल
  • D) सूर्योदय पर देवता की प्रतिमा पर प्रकाश पड़ना

उत्तर: B विरुपाक्ष मंदिर के एक विशेष कक्ष में छोटे छेद से आने वाले प्रकाश द्वारा बाहर के गोपुरम का उल्टा प्रतिबिंब दीवार पर बनता है।


16. हम्पी में नरसिम्हा प्रतिमा की ऊंचाई लगभग कितनी है?

  • A) 3.5 मीटर
  • B) 6.7 मीटर
  • C) 10 मीटर
  • D) 15 मीटर

उत्तर: B हम्पी की नरसिम्हा (नृसिंह) प्रतिमा लगभग 6.7 मीटर (22 फीट) ऊंची एकाश्म प्रतिमा है।


17. हम्पी की वास्तुकला में “पुष्करणी” क्या होती है?

  • A) मंदिर का मुख्य द्वार
  • B) राजा का सिंहासन कक्ष
  • C) सीढ़ीदार पवित्र तालाब
  • D) मंदिर का भीतरी गलियारा

उत्तर: C पुष्करणी वर्गाकार या आयताकार सीढ़ीदार पवित्र तालाब होते हैं जिनका उपयोग धार्मिक स्नान और जल संग्रह के लिए होता था।


18. हम्पी की वास्तुकला में किस पुर्तगाली यात्री ने इसे रोम नगर जितना बड़ा बताया था?

  • A) वास्को द गामा
  • B) डोमिंगो पेस
  • C) फर्नाओ नुनिज
  • D) अल्बुकर्क

उत्तर: B पुर्तगाली यात्री डोमिंगो पेस ने अपने यात्रा वृतांत में हम्पी को रोम नगर जितना बड़ा और उससे भी अधिक समृद्ध बताया था।


19. हम्पी के हाथी अस्तबल में कितने कक्ष हैं?

  • A) सात
  • B) नौ
  • C) ग्यारह
  • D) तेरह

उत्तर: C हाथी अस्तबल में ग्यारह कक्ष हैं जिनकी छतें अलग-अलग शैलियों — गुंबद, बैरल वॉल्ट और चपटी छत — में बनी हैं।


20. विजयनगर साम्राज्य पर किस वंश ने सबसे लंबे समय तक शासन किया?

  • A) सालुव वंश
  • B) संगम वंश
  • C) तुलुव वंश
  • D) अरविदु वंश

उत्तर: B संगम वंश ने विजयनगर साम्राज्य पर सबसे लंबे समय तक शासन किया — 1336 से 1485 ईस्वी तक।

FAQs — हम्पी वास्तुकला

Q1. हम्पी कहां स्थित है और वहां कैसे पहुंचें?

हम्पी कर्नाटक राज्य के बेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के तट पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन होसपेट (Hosapete) है जो हम्पी से लगभग 13 किलोमीटर दूर है। निकटतम हवाई अड्डा बेल्लारी (60 किमी) और हुबली (150 किमी) है। बेंगलुरु से बस और ट्रेन दोनों द्वारा होसपेट आसानी से पहुंचा जा सकता है।

Q2. हम्पी घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है?

हम्पी घूमने का सबसे उपयुक्त समय अक्टूबर से फरवरी के बीच का है। इस दौरान मौसम सुहावना और ठंडा रहता है। मार्च से जून तक भीषण गर्मी पड़ती है और ग्रेनाइट की संरचनाएं बहुत गर्म हो जाती हैं। मानसून (जुलाई-सितंबर) में कुछ स्थान जलमग्न हो सकते हैं।

Q3. हम्पी में कितने स्मारक और संरचनाएं हैं?

हम्पी और उसके आसपास के क्षेत्र में 1,600 से अधिक स्मारक और संरचनाएं हैं जो लगभग 4,187 वर्ग किलोमीटर में फैली हुई हैं। इनमें मंदिर, महल, जलाशय, बाजार, अस्तबल, मठ और अन्य नागरिक संरचनाएं शामिल हैं। सभी प्रमुख स्थलों को देखने में कम से कम दो से तीन दिन लगते हैं।

Q4. हम्पी के संगीतमय स्तंभ वास्तव में संगीत कैसे उत्पन्न करते हैं?

विट्ठल मंदिर के संगीतमय स्तंभ ठोस ग्रेनाइट पत्थर से बने हैं। इन स्तंभों की विशेष आंतरिक संरचना, आकार और मोटाई के कारण थपथपाने पर अलग-अलग आवृत्तियों (frequencies) की ध्वनि उत्पन्न होती है जो भारतीय शास्त्रीय संगीत के सात सुरों से मेल खाती है। यह प्राचीन शिल्पकारों के ध्वनि विज्ञान के गहरे ज्ञान का परिणाम है।

Q5. हम्पी की वास्तुकला में इस्लामी प्रभाव क्यों दिखता है जबकि यह एक हिंदू साम्राज्य था?

विजयनगर के शासक व्यावहारिक और उदार दृष्टिकोण रखते थे। उन्होंने पड़ोसी मुस्लिम सल्तनतों के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंध बनाए रखे और उनकी वास्तुकला के कुछ तत्वों — जैसे गुंबद, नुकीले मेहराब और छत्र — को अपनी संरचनाओं में अपनाया। लोटस महल और हाथी अस्तबल इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

Q6. हम्पी का विनाश किसने और क्यों किया?

1565 ईस्वी में तालीकोटा के युद्ध में बीजापुर, बीदर, अहमदनगर और गोलकोंडा की दक्कन सल्तनतों के संयुक्त मोर्चे ने विजयनगर की सेना को पराजित किया। इसके बाद इन सल्तनतों की सेनाओं ने हम्पी नगर में प्रवेश करके उसे लूटा और जलाया। कहा जाता है कि नगर छह महीने तक जलता रहा।

Q7. क्या हम्पी में रात्रि विश्राम की सुविधा उपलब्ध है?

हम्पी गांव में कुछ बजट होटल और गेस्टहाउस उपलब्ध हैं। बेहतर सुविधाओं के लिए निकटतम होसपेट शहर (13 किमी) में रुकना उचित है जहां विभिन्न श्रेणियों के होटल उपलब्ध हैं। हम्पी में पर्यटन का मौसम होने पर अग्रिम बुकिंग करना उचित रहता है।

Q8. हम्पी की वास्तुकला और तमिलनाडु की द्रविड़ वास्तुकला में क्या अंतर है?

हम्पी की वास्तुकला द्रविड़ शैली पर आधारित है किंतु इसमें कुछ अतिरिक्त विशेषताएं हैं। हम्पी में इंडो-इस्लामिक तत्वों का समावेश है, ग्रेनाइट पत्थर की सरल और कठोर बनावट है, और नगर नियोजन की एक व्यापक दृष्टि है जिसमें मंदिर, बाजार और राजकीय भवन एक साथ नियोजित हैं। तमिलनाडु की शुद्ध द्रविड़ वास्तुकला में ये इस्लामी प्रभाव नहीं मिलते।

Q9. हम्पी के संरक्षण में वर्तमान में क्या प्रयास हो रहे हैं?

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और UNESCO मिलकर हम्पी के संरक्षण में कार्य कर रहे हैं। 3D स्कैनिंग और फोटोग्रामेट्री के माध्यम से डिजिटल दस्तावेजीकरण किया जा रहा है। अतिक्रमण रोकने के लिए कानूनी कदम उठाए जा रहे हैं और पर्यटकों की संख्या को नियंत्रित रखने के उपाय किए जा रहे हैं।

Q10. हम्पी को विश्व धरोहर का दर्जा मिलने के क्या लाभ हैं?

UNESCO की विश्व धरोहर सूची में शामिल होने से हम्पी को अंतरराष्ट्रीय पहचान और संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता मिलती है। इससे पर्यटन बढ़ता है जो स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए लाभकारी है। साथ ही यह दर्जा यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी विकास कार्य से पहले UNESCO के दिशानिर्देशों का पालन किया जाए, जिससे विरासत की रक्षा होती है।

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