📲 FREE Art History PDF Notes पाएं!  👉💬 WhatsApp Join करें | ✈️ Telegram Join करें

जोगीमारा गुफा — सम्पूर्ण जानकारी | इतिहास, भित्तिचित्र, अभिलेख और पर्यटन

admin

जोगीमारा गुफा

जोगीमारा गुफा — सम्पूर्ण जानकारी | इतिहास, भित्तिचित्र, अभिलेख और पर्यटन

By admin

Published on:

Follow Us

जोगीमारा गुफा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित भारत की सबसे प्राचीन भित्तिचित्र गुफा है। जानें इसका इतिहास, सुतनुका की प्रेमकथा, ब्राह्मी अभिलेख, सीताबेंगरा नाट्यशाला और कैसे पहुँचें — सम्पूर्ण जानकारी हिन्दी में। जोगीमारा गुफा — सम्पूर्ण जानकारी प्रस्तावना भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ हर पत्थर, हर पहाड़ी और हर गुफा किसी न किसी ...

जोगीमारा गुफा

जोगीमारा गुफा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित भारत की सबसे प्राचीन भित्तिचित्र गुफा है। जानें इसका इतिहास, सुतनुका की प्रेमकथा, ब्राह्मी अभिलेख, सीताबेंगरा नाट्यशाला और कैसे पहुँचें — सम्पूर्ण जानकारी हिन्दी में।

जोगीमारा गुफा — सम्पूर्ण जानकारी

प्रस्तावना

भारत एक ऐसी भूमि है जहाँ हर पत्थर, हर पहाड़ी और हर गुफा किसी न किसी इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए है। यहाँ की धरती पर हजारों वर्षों की सभ्यता, संस्कृति और कला के अवशेष बिखरे पड़े हैं। इन्हीं अनमोल धरोहरों में से एक है — जोगीमारा गुफा। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में रामगढ़ की हरी-भरी पहाड़ियों के बीच स्थित यह गुफा भारतीय कला, इतिहास और पुरातत्व की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है।

जोगीमारा गुफा को भारत की सबसे प्राचीन भित्तिचित्र गुफा माना जाता है। इसके भीतर की छत पर बने रंगीन चित्र लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के बताए जाते हैं, जो अजन्ता की विश्वप्रसिद्ध चित्रकारी से भी सैकड़ों वर्ष पुराने हैं। यही कारण है कि इस गुफा को भारतीय भित्तिचित्र परम्परा का उद्गम स्थल कहा जाता है। यहाँ न केवल चित्रकला के प्राचीनतम नमूने मिलते हैं, बल्कि ब्राह्मी लिपि में लिखे गए अभिलेख भी पाए गए हैं जो मागधी प्राकृत भाषा में हैं और जिनमें एक देवदासी और एक शिल्पकार की प्रेमकथा का वर्णन है।

इस गुफा के आसपास का सम्पूर्ण क्षेत्र ऐतिहासिक और पौराणिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्ध है। यहाँ सीताबेंगरा नाट्यशाला, लक्ष्मण गुफा, हाथीपोल सुरंग और रामगढ़ पहाड़ी जैसे अनेक महत्त्वपूर्ण स्थल एक साथ मौजूद हैं। महाकवि कालिदास ने अपने अमर काव्य “मेघदूत” में जिस “रामगिरि” का उल्लेख किया है, वह यही रामगढ़ पहाड़ी मानी जाती है। इस प्रकार जोगीमारा गुफा केवल एक पुरातात्त्विक स्थल नहीं है, यह भारत की उस महान सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक है जो हजारों वर्षों से निरन्तर प्रवाहमान रही है।

भौगोलिक स्थिति एवं पहुँच का मार्ग

जोगीमारा गुफा भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले में स्थित है। यह गुफा रामगढ़ की पहाड़ियों पर, पुता गाँव के समीप, लगभग 70 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। रामगढ़ पहाड़ी को स्थानीय लोग “रामगिरि” या “देवपहाड़ी” के नाम से भी जानते हैं।

भौगोलिक दृष्टि से यह स्थल अम्बिकापुर शहर से लगभग 45 से 50 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में, बिलासपुर शहर से लगभग 180 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में और खोड़री नामक स्थान से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर है। यह स्थान राष्ट्रीय राजमार्ग 130 से जुड़ा हुआ है, जिसके बाद एक छोटा पहाड़ी रास्ता रामगढ़ की ओर जाता है।

पहाड़ी के नीचे पहुँचने के बाद गुफाओं तक पहुँचने के लिए यात्रियों को एक विशेष प्राकृतिक सुरंग से गुजरना पड़ता है जिसे स्थानीय भाषा में “हाथीपोल” कहते हैं। यह सुरंग लगभग 180 फीट (55 मीटर) लम्बी और 15 से 20 फीट ऊँची है। इसका नाम इसलिए हाथीपोल पड़ा क्योंकि यह इतनी चौड़ी है कि एक हाथी भी इसमें से आसानी से गुजर सकता है। सुरंग के प्रवेश द्वार पर चट्टान से पानी निकलता रहता है जो इस स्थल की सुन्दरता में चार चाँद लगा देता है। कुछ विद्वानों का मानना है कि यह सुरंग पानी के लम्बे समय तक बहने से प्राकृतिक रूप से बनी है, और इसमें मानवीय खुदाई का कोई प्रमाण नहीं मिलता।

सुरंग से बाहर निकलते ही एक पत्थर से बना पगडंडी मार्ग मिलता है जो एक मौसमी झरने और एक प्राकृतिक झील के पास से गुजरता हुआ पहले सीताबेंगरा गुफा और फिर जोगीमारा गुफा तक पहुँचता है। यह पैदल मार्ग बहुत ही सुरम्य और प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

जोगीमारा गुफा का निर्माण काल लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व, अर्थात मौर्यकाल में माना जाता है। अधिकांश विद्वान इस बात से सहमत हैं कि इन गुफाओं का निर्माण मौर्य सम्राट अशोक के शासनकाल में हुआ था अथवा उनके काल के आसपास हुआ था। यहाँ प्राप्त ब्राह्मी लिपि के अभिलेख इस काल-निर्धारण के मुख्य आधार हैं।

आधुनिक काल में इन गुफाओं की खोज एक रोचक घटना से जुड़ी है। वर्ष 1848 में कर्नल आउस्ले नामक एक अंग्रेज अधिकारी शिकार के दौरान अचानक इन गुफाओं तक पहुँच गए और उन्होंने इनका पहला आधुनिक विवरण तैयार किया। इसके बाद 1874-75 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संस्थापक अलेक्जेण्डर कनिंघम के सहायक जे. डी. बेगलर ने इस स्थल का दौरा किया, गुफाओं की फोटो खींची और विस्तृत विवरण तैयार किया। कनिंघम ने 1877 में ब्राह्मी अभिलेखों की प्रतिलिपियाँ प्रकाशित कीं। इसके बाद 1903-04 में ASI के पुरालेखविद् डॉ. थियोडोर ब्लाख ने इस स्थल का गहन अध्ययन किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट ASI की वार्षिक रिपोर्ट 1903-04 में प्रकाशित कराई। यही रिपोर्ट इन गुफाओं को विश्व के विद्वानों के सामने व्यापक रूप से प्रस्तुत करने का आधार बनी।

ऐतिहासिक दृष्टि से यह पूरा क्षेत्र उस प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर स्थित था जो गंगा घाटी को दक्षिण के दक्कन क्षेत्र से जोड़ता था। इसीलिए यहाँ व्यापारियों, कलाकारों और धार्मिक यात्रियों का आवागमन होता था और यह स्थल एक महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक केन्द्र के रूप में विकसित हुआ।

गुफा की संरचना एवं वास्तुकला

जोगीमारा गुफा
जोगीमारा गुफा

जोगीमारा गुफा का आकार अपेक्षाकृत छोटा है। यह गुफा लगभग 10 फीट लम्बी, 6 फीट चौड़ी और 6 फीट ऊँची है। आकार में यह आयताकार है। यह एक प्राकृतिक गुफा है जिसकी भीतरी दीवारों और छत को छेनी से चिकना बनाया गया है ताकि उस पर चित्रकारी की जा सके। गुफा के बाहर कोई विशेष निर्माण या बेंच आदि नहीं हैं। भीतर जाकर बैठने और विश्राम करने की व्यवस्था इस गुफा की मूल संरचना का हिस्सा प्रतीत होती है।

जोगीमारा गुफा के ठीक निकट सीताबेंगरा गुफा स्थित है। सीताबेंगरा गुफा आकार में जोगीमारा से बड़ी है। यह गुफा भीतर से एक हॉल जैसी है जो आगे से 12 फीट और पीछे से 17 फीट चौड़ी है। इसकी कुल गहराई लगभग 45 फीट और ऊँचाई 6 से 5.5 फीट के बीच है। गुफा के सामने पत्थर की बेंचों की पंक्तियाँ हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि ये बेंचें दर्शकों के बैठने के लिए थीं और यह गुफा एक प्राचीन नाट्यशाला के रूप में प्रयोग होती थी।

सीताबेंगरा और जोगीमारा के अलावा इसी पहाड़ी पर लक्ष्मण गुफा भी स्थित है। स्थानीय मान्यता के अनुसार राम के वनवास काल में लक्ष्मण इसी गुफा में रहते थे और वहाँ से राम और सीता की रखवाली करते थे।

पूरे क्षेत्र में अनेक छोटी-छोटी अर्धचन्द्राकार गुफाएँ भी हैं। इन सबको मिलाकर रामगढ़ पहाड़ी एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण पुरातात्त्विक परिसर बन जाती है जिसे “रामगढ़ गुफाएँ” के सामूहिक नाम से भी जाना जाता है।

भित्तिचित्र — भारत की प्राचीनतम चित्रकला

जोगीमारा गुफा की सबसे बड़ी विशेषता और इसकी अन्तर्राष्ट्रीय पहचान का आधार यहाँ के भित्तिचित्र हैं। ये चित्र भारत के ही नहीं बल्कि एशिया के प्राचीनतम रंगीन भित्तिचित्रों में से एक माने जाते हैं। इन चित्रों का महत्त्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि भारतीय चित्रकला की परम्परा में छत पर चित्र बनाने का यह पहला ज्ञात उदाहरण है। अजन्ता, एलोरा और बाघ जैसी गुफाओं के विश्वप्रसिद्ध भित्तिचित्र जोगीमारा के इन चित्रों से सैकड़ों वर्ष बाद के हैं।

चित्रों का काल निर्धारण

इन चित्रों का निर्माण काल मुख्यतः तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व माना जाता है। डॉ. ब्लाख ने यहाँ से प्राप्त अभिलेख के आधार पर इन्हें 300 ईसा पूर्व का बताया। विन्सेंट स्मिथ ने इन्हें पहली शताब्दी ईसा पूर्व का माना। अधिकांश विद्वानों की राय है कि ये चित्र पहली शताब्दी ईसा पूर्व से पुराने हैं क्योंकि इन पर भरहुत और साँची की मूर्तिकला का स्पष्ट प्रभाव दिखता है।

चित्रों के दो चरण

वर्ष 1914 में प्रसिद्ध चित्रकार और कला-विशेषज्ञ असित कुमार हाल्दार तथा क्षेमेन्द्रनाथ गुप्त ने जोगीमारा के चित्रों का गहन अध्ययन किया और उनकी प्रतिलिपियाँ तैयार कीं। उन्होंने पाया कि यहाँ चित्रकारी दो अलग-अलग चरणों में हुई है। पहले चरण के चित्र, जो तीसरी-दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के हैं, अत्यन्त कुशल और परिपक्व कलाकारों द्वारा बनाए गए हैं — इनकी रेखाएँ स्पष्ट, आकृतियाँ भावपूर्ण और तकनीक उत्कृष्ट है। दूसरे चरण के चित्र, जो कई सौ वर्ष बाद किसी अकुशल कलाकार द्वारा बनाए गए हैं, स्पष्ट रूप से निम्न गुणवत्ता के हैं। दूसरे चरण की रेखाएँ और रंग पहले चरण से एकदम अलग दिखते हैं। इस प्रकार यहाँ पुरानी कला पर नए चित्रों का अपरिपक्व पुनर्चित्रण स्पष्ट देखा जा सकता है।

चित्रों में प्रयुक्त रंग एवं माध्यम

इन चित्रों में खनिज और वनस्पति दोनों प्रकार के रंगों का प्रयोग हुआ है, किन्तु खनिज रंगों का प्रयोग अधिक है। मुख्य रूप से लाल रंग (लाल गेरू), काला रंग (“हर्रा” फल से प्राप्त), सफेद चूना, हरिन्जी (पीला-भूरा रंग) और हरे वनस्पति रंग का प्रयोग किया गया है। चित्रों की पृष्ठभूमि सफेद चूने की परत से तैयार की गई है और उस पर लाल रंग की मोटी रेखाओं से आकृतियाँ बनाई गई हैं। गुफा की छत को विभिन्न पैनलों में बाँटा गया है और प्रत्येक पैनल को लाल रंग की पट्टी से अलग किया गया है।

चित्रों के विषय

असित कुमार हाल्दार ने इन चित्रों के अवशेषों को सात प्रमुख भागों में वर्गीकृत किया है। कुछ विद्वान इन्हें आठ भागों में भी विभाजित करते हैं। इन चित्रों में निम्नलिखित विषय-वस्तु पाई जाती है —

पहले, मछलियों का चित्रण है जिसमें एक बड़ी मछली को लहरदार रेखाओं से बनाए गए नदी के पानी में दिखाया गया है। यह चित्र सम्भवतः गज-ग्राह की किसी पौराणिक कथा से सम्बन्धित है।

दूसरे, हाथियों का चित्रण है जिसमें कुछ मानव आकृतियाँ और हाथी एक साथ दर्शाए गए हैं। यह दृश्य किसी राजकीय अथवा उत्सव के प्रसंग का प्रतीत होता है।

तीसरे, वृक्ष के नीचे विश्राम करती मानव आकृतियाँ हैं। एक बड़े वृक्ष के नीचे कुछ लोग बैठे हुए हैं। वृक्ष की शाखाओं पर थोड़े-थोड़े पत्ते लाल रंग से बने हैं।

चौथे, नृत्यांगनाओं के चित्र हैं जिनमें महिला नर्तकियाँ विभिन्न नृत्य मुद्राओं में दिखाई गई हैं। यह चित्र गुफा के देवदासी निवास होने की मान्यता से मेल खाता है।

पाँचवें, गायन-वादन करती आकृतियाँ हैं जिनमें संगीतकार और वादक विभिन्न वाद्य यन्त्र बजाते हुए दिखाए गए हैं।

छठे, फूलों का चित्रण है जिसमें विशेष रूप से लाल रंग के लिली फूल उल्लेखनीय हैं।

सातवें, पशु-पक्षियों के चित्र हैं जिनमें विभिन्न पशु और पक्षी प्राकृतिक शैली में बनाए गए हैं।

इसके अलावा चित्रों के किनारों पर मकर (घड़ियाल जैसे जलजीव) और अन्य जलजन्तुओं का चित्रण भी है। एक पैनल में कृष्ण-लीला से जुड़ा प्रतीत होने वाला दृश्य भी है जो इस गुफा में हिन्दू धर्म के प्रभाव को दर्शाता है।

इन चित्रों की शैली अर्ध-विकसित अवस्था में है। आकृतियाँ भरहुत और साँची की मूर्तिकला परम्परा के समान हैं। इनमें अजन्ता की भावी उत्कृष्ट कला का प्रारम्भिक आभास स्पष्ट दिखता है। यही कारण है कि जोगीमारा के चित्रों को “अजन्ता चित्रकला का पूर्वज” कहा जाता है।

ब्राह्मी लिपि अभिलेख — सुतनुका और देवदीन्न की प्रेमकथा

जोगीमारा गुफा में जो ब्राह्मी लिपि का अभिलेख मिला है, वह भारतीय इतिहास में अपने प्रकार का अत्यन्त अनूठा और दुर्लभ उदाहरण है। यह अभिलेख गुफा के दक्षिणी भाग में, प्रवेश द्वार के अन्दर, छत पर बने चित्रों के नीचे की दीवार पर स्थित है। इसमें कुल पाँच पंक्तियाँ हैं जो मागधी प्राकृत भाषा में लिखी गई हैं। यह मागधी भाषा पालि से भी प्राचीन है और भोजपुरी तथा मैथिली जैसी आधुनिक भारतीय भाषाओं की पूर्वज मानी जाती है।

पुरालेख विशेषज्ञ रिचर्ड सैलोमन के अनुसार इस अभिलेख की लिपि का पुरालेखीय विश्लेषण इसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का सिद्ध करता है। प्राचीन भारतीय अभिलेखों में यह अपनी भाषा और विषय-वस्तु दोनों दृष्टियों से अत्यन्त असाधारण है। इस अभिलेख में विराम चिह्न के रूप में “दण्ड” (“|” या “||”) का प्रयोग किया गया है जो भारतीय भाषाओं में वाक्य के अन्त का सूचक चिह्न आज भी प्रयुक्त होता है।

अभिलेख का विषय

अभिलेख के कुछ अक्षर घिस जाने के कारण आंशिक रूप से नष्ट हो गए हैं। इसलिए इसके अनुवाद को लेकर विद्वानों में मतभेद है। अभिलेख की दो प्रमुख व्याख्याएँ प्रचलित हैं —

पहली व्याख्या के अनुसार यह एक प्रेम-अभिलेख है। इसमें “सुतनुका” नामक एक देवदासी का उल्लेख है जिससे “देवदीन्न” नामक एक युवक प्रेम करता था। देवदीन्न शिल्पकला में निपुण था। इस व्याख्या के अनुसार यह अभिलेख भारत का सबसे प्राचीन “प्रेम-लेखन” है — एक युवती और युवक के बीच प्रेम का लिखित साक्ष्य जो लगभग 2300 वर्ष पुराना है।

दूसरी व्याख्या के अनुसार यह एक सहयोग का विवरण है। इसमें देवदासी सुतनुका और चित्रकार-शिल्पकार देवदीन्न ने मिलकर इन दोनों गुफाओं का निर्माण अन्य लोगों की सेवा के लिए किया था। इस व्याख्या के अनुसार यह अभिलेख एक स्त्री और एक पुरुष कलाकार के संयुक्त कार्य का प्रमाण है।

कहा जाता है कि सुतनुका सीताबेंगरा नाट्यशाला में एक देवदासी थी और वह देवदीन्न से प्रेम करती थी। नाट्यशाला के अधिकारियों ने जब यह जाना तो उसे दंडित करके अलग रहने के लिए भेज दिया गया। इसी एकाकी जीवन में सुतनुका ने गुफा की दीवारों और छत पर ये भित्तिचित्र बनाए। यह कहानी एक ऐसी संवेदनशील स्त्री की व्यथा का प्रतीक है जिसने अपनी पीड़ा और प्रेम को कला के माध्यम से अमर कर दिया।

यह अभिलेख इसलिए भी विशेष महत्त्वपूर्ण है क्योंकि यह धार्मिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत और भावनात्मक विषय पर लिखा गया है। भारत में मिले अधिकांश प्राचीन अभिलेख राजकीय आदेशों, दान-पत्रों या धार्मिक विषयों पर हैं। जोगीमारा का यह अभिलेख एक सामान्य स्त्री की व्यक्तिगत भावना को व्यक्त करता है जो इसे अत्यन्त मानवीय और अनूठा बनाता है।

विद्वानों के विभिन्न मत

जोगीमारा गुफा के चित्रों और अभिलेखों को लेकर समय-समय पर अनेक भारतीय और विदेशी विद्वानों ने अपने मत प्रस्तुत किए हैं। इन मतों में विविधता है जो इस स्थल की बहु-आयामी प्रकृति को दर्शाती है।

डॉ. थियोडोर ब्लाख का मत — डॉ. ब्लाख ने जोगीमारा के चित्रों पर ग्रीक (यूनानी) कला का प्रभाव देखा। उनके अनुसार इन चित्रों की कुछ शैलियाँ यूनानी कला परम्परा से मिलती-जुलती हैं जो मौर्यकाल में यूनानी-भारतीय सम्पर्क के कारण सम्भव हो सकती थी।

राय कृष्णदास का मत — प्रसिद्ध कला-इतिहासकार राय कृष्णदास ने जोगीमारा के कुछ चित्रों को जैन धर्म से सम्बन्धित माना। उनके अनुसार यहाँ के कुछ प्रतीक और आकृतियाँ जैन धार्मिक परम्परा की ओर संकेत करती हैं।

असित कुमार हाल्दार का मत — विख्यात चित्रकार असित कुमार हाल्दार ने इन भित्तिचित्रों को प्राचीन मन्दिरों में रहने वाली देवदासियों से सम्बन्धित माना। उनके अनुसार यह गुफा एक देवदासी का निवास-कक्ष थी और यहाँ के चित्र उसी परम्परा की अभिव्यक्ति हैं।

विन्सेंट स्मिथ का मत — ब्रिटिश इतिहासकार विन्सेंट स्मिथ ने इन चित्रों का काल पहली शताब्दी ईसा पूर्व निर्धारित किया। उनका आधार यह था कि इन चित्रों की शैली साँची की मूर्तिकला से मिलती-जुलती है जो पहली शताब्दी ईसा पूर्व की है।

रिचर्ड सैलोमन का मत — आधुनिक पुरालेख विशेषज्ञ रिचर्ड सैलोमन ने अभिलेख के भाषिक और लिपि-सम्बन्धी विश्लेषण के आधार पर इसे तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व का माना और इसे भारतीय पुरालेख इतिहास में “अपनी भाषा और विषय-वस्तु में असाधारण” कहा।

कुछ अन्य विद्वानों का मत — कुछ विद्वान मानते हैं कि जोगीमारा गुफा वरुण देवता का मन्दिर थी। गुफा के पास मिले एक अन्य अभिलेख में वरुण देवता के मन्दिर का उल्लेख मिलता है। कुछ अन्य विद्वानों की राय है कि यह गुफा सीताबेंगरा नाट्यशाला में काम करने वाली नर्तकियों का श्रृंगार-कक्ष (प्रसाधन कक्ष) थी।

इन सभी मतों की विविधता यह दर्शाती है कि जोगीमारा गुफा एक बहुस्तरीय सांस्कृतिक स्थल है जो अनेक धर्मों, कला-परम्पराओं और सामाजिक जीवन के पहलुओं को एक साथ अपने भीतर समेटे हुए है।

सीताबेंगरा गुफा — भारत की प्राचीनतम नाट्यशाला

जोगीमारा गुफा के ठीक निकट स्थित सीताबेंगरा गुफा अपने आप में एक ऐतिहासिक चमत्कार है। इसे भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नाट्यशाला माना जाता है। “बेंगरा” शब्द “बंगला” का अपभ्रंश प्रतीत होता है अर्थात यह “सीता का बंगला” या “सीता का निवास” था।

इस गुफा की वास्तुकला अत्यन्त अनूठी है। गुफा के अन्दर का भाग एक विशाल हॉल जैसा है। सामने दो पंक्तियों में अर्धगोलाकार पत्थर की बेंचें हैं जो बैठने या लेटने के लिए पर्याप्त चौड़ी हैं। इन पंक्तियों के बीच में इतनी जगह है कि एक व्यक्ति आसानी से आ-जा सके। यह व्यवस्था किसी थिएटर के दर्शक-कक्ष जैसी प्रतीत होती है। गुफा की पिछली दीवार में कुछ खुदाई भी की गई है जो मंच जैसी प्रतीत होती है।

कुछ विद्वान मानते हैं कि कलाकार मंच पर प्रदर्शन करते थे और दर्शक ऊपर बनी दीर्घा से देखते थे। इस गुफा की संरचना यूनान के प्राचीन थिएटरों से भी मिलती-जुलती है। यदि यह वास्तव में नाट्यशाला थी तो यह विश्व के प्राचीनतम ज्ञात थिएटरों में से एक है।

हालाँकि कुछ अन्य विद्वानों का मानना है कि यह नाट्यशाला नहीं बल्कि किसी प्राचीन व्यापारिक मार्ग पर यात्रियों के लिए एक विश्राम-गृह (धर्मशाला) था और पत्थर की बेंचें सोने के लिए बनाई गई थीं।

पौराणिक मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान माता सीता इसी गुफा में निवास करती थीं, इसीलिए इसका नाम सीताबेंगरा पड़ा।

रामगढ़ पहाड़ी और कालिदास का सम्बन्ध

जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाओं से जुड़ी एक और अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस रामगढ़ पहाड़ी का सम्बन्ध महाकवि कालिदास से जोड़ा जाता है। कालिदास की कालजयी काव्य रचना “मेघदूत” में एक स्थान का उल्लेख है जिसे “रामगिरि” कहा गया है। इस रामगिरि पर्वत पर एक यक्ष को उसके स्वामी कुबेर द्वारा निर्वासित किया गया था और वह अपनी प्रियतमा को सन्देश भेजने के लिए मेघ को दूत बनाता है।

अनेक विद्वान मानते हैं कि कालिदास ने जिस “रामगिरि” का वर्णन किया है वह यही रामगढ़ पहाड़ी है। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता — घने वन, झरने, झील, पहाड़ियाँ — मेघदूत के वर्णन से अत्यन्त मेल खाती हैं। यहाँ तक कि यह भी कहा जाता है कि कालिदास स्वयं यहाँ कुछ समय रहे थे और उन्होंने इसी स्थान पर अपनी कुछ प्रमुख रचनाएँ लिखी थीं।

यद्यपि यह बात पूरी तरह प्रमाणित नहीं है और कुछ विद्वान रामगिरि की पहचान किसी अन्य स्थान से भी करते हैं, किन्तु इस क्षेत्र में कालिदास के साथ की यह लोकमान्यता अत्यन्त गहरी है। यहाँ के स्थानीय लोग इस पहाड़ी को “कालिदास की भूमि” के रूप में बड़े गर्व से याद करते हैं। इस सम्बन्ध ने जोगीमारा गुफा को केवल पुरातात्त्विक दृष्टि से नहीं, बल्कि साहित्यिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बना दिया है।

इसी पहाड़ी पर एक राम-जानकी मन्दिर भी है और अनेक प्राचीन हिन्दू मन्दिरों के खण्डहर बिखरे पड़े हैं। इस प्रकार यह पूरा क्षेत्र वैदिक, बौद्ध, जैन, रामायण और साहित्यिक — सभी परम्पराओं का संगम स्थल बन जाता है।

पुरातत्व विभाग एवं संरक्षण प्रयास

जोगीमारा गुफा के महत्त्व को देखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने इस स्थल के संरक्षण के लिए समय-समय पर अनेक प्रयास किए हैं।

1874-75 में बेगलर द्वारा पहली बार इस स्थल का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया गया। 1903-04 में डॉ. ब्लाख की विस्तृत रिपोर्ट के बाद इसे आधिकारिक रूप से राष्ट्रीय महत्त्व का पुरातात्त्विक स्थल माना जाने लगा। 1914 में असित कुमार हाल्दार और क्षेमेन्द्रनाथ गुप्त ने चित्रों की प्रतिलिपियाँ बनाकर उन्हें सुरक्षित किया जो आज अत्यन्त मूल्यवान साबित हो रही हैं क्योंकि मूल चित्र काफी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं।

सबसे महत्त्वपूर्ण संरक्षण कार्य 1962-63 में किया गया। ASI के केन्द्रीय मण्डल ने उस समय जोगीमारा गुफा की छत पर बने चित्रों का रासायनिक उपचार किया ताकि नमी और वातावरण के प्रभाव से उनकी रक्षा की जा सके। यह कार्य इसलिए आवश्यक हो गया था क्योंकि पहाड़ी वातावरण में नमी, वर्षा और जैविक कारकों से चित्र तेजी से नष्ट हो रहे थे।

वर्तमान में ASI ने दर्शकों की सुविधा के लिए गुफा के बाहर प्लेटफॉर्म और रेलिंग बनाई है। पत्थर से बना पैदल मार्ग भी बनाया गया है। हालाँकि इस दूरदराज क्षेत्र में स्थित होने के कारण यहाँ के संरक्षण कार्यों को उतनी प्राथमिकता नहीं मिल पाई है जितनी मिलनी चाहिए। चित्रों की स्थिति आज भी चिन्ताजनक है। मूल चित्रों के अवशेष मुख्यतः छत पर ही बचे हैं और वे भी काफी धुँधले पड़ गए हैं। दूसरे चरण के चित्रों ने मूल चित्रों को और अधिक क्षतिग्रस्त कर दिया है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन चित्रों को बचाने के लिए अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करते हुए तत्काल संरक्षण कार्य की आवश्यकता है। डिजिटल दस्तावेजीकरण और 3D स्कैनिंग जैसी आधुनिक विधियों से इस विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित किया जा सकता है।

पर्यटन एवं कैसे पहुँचें

जोगीमारा गुफा छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थलों में से एक है। यहाँ आने वाले पर्यटकों के लिए यह स्थल न केवल ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक रुचि का है बल्कि यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता भी अत्यन्त आकर्षक है।

सड़क मार्ग से — अम्बिकापुर से रामगढ़ तक राष्ट्रीय राजमार्ग 130 से लगभग 45-50 किलोमीटर की दूरी है। अम्बिकापुर से बस या टैक्सी द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है। खोड़री से गुफा तक केवल 5 किलोमीटर का रास्ता है।

रेल मार्ग से — निकटतम रेलवे स्टेशन अम्बिकापुर है जो सरगुजा जिले का मुख्यालय है। यहाँ से आगे सड़क मार्ग से जाना होता है।

वायु मार्ग से — निकटतम हवाई अड्डा रायपुर (स्वामी विवेकानन्द हवाई अड्डा) है जो यहाँ से लगभग 350 किलोमीटर दूर है। रायपुर से अम्बिकापुर तक सड़क या रेल मार्ग से जाया जा सकता है।

घूमने का उचित समय — अक्टूबर से मार्च का समय यहाँ आने के लिए सबसे उचित है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है और पहाड़ी रास्ते आसानी से तय किए जा सकते हैं। मानसून के दौरान (जुलाई-सितम्बर) यहाँ प्राकृतिक सौन्दर्य तो खूब रहता है लेकिन रास्ते कठिन हो जाते हैं।

क्या देखें — जोगीमारा गुफा के अलावा इसी क्षेत्र में सीताबेंगरा नाट्यशाला, लक्ष्मण गुफा, हाथीपोल सुरंग, राम-जानकी मन्दिर, प्राकृतिक झरना और झील अवश्य देखें। पूरे परिसर को घूमने में लगभग 3-4 घंटे लगते हैं।

उपसंहार

जोगीमारा गुफा केवल पत्थर और रंगों से बनी एक गुफा नहीं है। यह भारत की उस अनन्त सांस्कृतिक यात्रा का जीवित साक्ष्य है जो हजारों वर्षों से अनवरत चली आ रही है। यहाँ के भित्तिचित्र बताते हैं कि भारतीय कलाकार लगभग 2300 वर्ष पूर्व भी रंगों और रेखाओं के माध्यम से अपनी भावनाओं को उतनी ही कुशलता से अभिव्यक्त कर सकते थे जितनी अजन्ता और एलोरा के महान कलाकार।

यहाँ का ब्राह्मी लिपि अभिलेख बताता है कि प्रेम, भावना और मानवीय सम्बन्ध किसी युग की सीमा में नहीं बँधते। सुतनुका और देवदीन्न की कहानी आज भी उतनी ही जीवन्त और हृदयस्पर्शी है जितनी 2300 वर्ष पहले रही होगी। यह अभिलेख भारत के उन सामान्य लोगों की आवाज है जो इतिहास की पुस्तकों में राजाओं और महाराजाओं के पीछे अक्सर खो जाती है।

सीताबेंगरा नाट्यशाला बताती है कि भारत में नाट्यकला और प्रदर्शन कला की परम्परा कितनी गहरी और प्राचीन है। रामगढ़ पहाड़ी का कालिदास से सम्बन्ध इस स्थल को भारतीय साहित्य की भी धरोहर बनाता है।

दुर्भाग्यवश यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थल आज भी उपेक्षा का शिकार है। यहाँ के चित्र धीरे-धीरे नष्ट होते जा रहे हैं। जनसाधारण में इसके बारे में जागरूकता बहुत कम है। अजन्ता और एलोरा को जो अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता और संरक्षण मिला है, वह जोगीमारा को नहीं मिला है — जबकि जोगीमारा उन महान गुफाओं का भी पूर्वज है।

आवश्यकता है कि सरकार, ASI और स्थानीय प्रशासन मिलकर इस अमूल्य विरासत के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए ठोस कदम उठाएँ। आधुनिक तकनीकों से इसका डिजिटल संरक्षण किया जाए, पर्यटन सुविधाओं में सुधार हो और इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के प्रयास किए जाएँ।

जोगीमारा गुफा भारत की वह अनकही कहानी है जिसे आज पूरे विश्व को सुनने की जरूरत है।

20 MCQ प्रश्न — जोगीमारा गुफा


प्रश्न 1. जोगीमारा गुफा किस राज्य में स्थित है?

A) मध्य प्रदेश B) झारखण्ड C) छत्तीसगढ़ D) ओडिशा

उत्तर: C व्याख्या: जोगीमारा गुफा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित है।


प्रश्न 2. जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र किस काल के माने जाते हैं?

A) पहली शताब्दी ई. B) तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व C) पाँचवीं शताब्दी ई. D) दूसरी शताब्दी ई.

उत्तर: B व्याख्या: इन चित्रों का निर्माण काल लगभग 300 ईसा पूर्व अर्थात मौर्यकाल का माना जाता है।


प्रश्न 3. जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र किस पर बने हैं?

A) दीवारों पर B) फर्श पर C) छत पर D) प्रवेश द्वार पर

उत्तर: C व्याख्या: जोगीमारा गुफा में भित्तिचित्र सफेद पृष्ठभूमि पर गुफा की छत पर बने हैं।


प्रश्न 4. जोगीमारा गुफा का अभिलेख किस लिपि में है?

A) देवनागरी B) खरोष्ठी C) शारदा D) ब्राह्मी

उत्तर: D व्याख्या: यहाँ का अभिलेख मौर्यकालीन ब्राह्मी लिपि में मागधी प्राकृत भाषा में लिखा गया है।


प्रश्न 5. जोगीमारा के अभिलेख में किस देवदासी का उल्लेख है?

A) अम्बपाली B) सुतनुका C) देवयानी D) रम्भा

उत्तर: B व्याख्या: अभिलेख में सुतनुका नामक देवदासी और देवदीन्न नामक शिल्पकार के प्रेम का वर्णन है।


प्रश्न 6. जोगीमारा गुफा के चित्रों का 1914 में अध्ययन किसने किया?

A) अलेक्जेण्डर कनिंघम B) जे. डी. बेगलर C) असित कुमार हाल्दार और क्षेमेन्द्रनाथ गुप्त D) विन्सेंट स्मिथ

उत्तर: C व्याख्या: 1914 में असित कुमार हाल्दार और क्षेमेन्द्रनाथ गुप्त ने चित्रों का अध्ययन कर उन्हें सात भागों में वर्गीकृत किया।


प्रश्न 7. जोगीमारा गुफा की लम्बाई × चौड़ाई × ऊँचाई क्या है?

A) 12×8×8 फीट B) 15×10×8 फीट C) 10×6×6 फीट D) 20×10×10 फीट

उत्तर: C व्याख्या: जोगीमारा गुफा का आयाम 10 फीट लम्बी, 6 फीट चौड़ी और 6 फीट ऊँची है।


प्रश्न 8. जोगीमारा गुफा को किस गुफा चित्रकला का “पूर्वज” कहा जाता है?

A) एलोरा B) बाघ C) अजन्ता D) एलिफेंटा

उत्तर: C व्याख्या: जोगीमारा के चित्र अजन्ता से भी प्राचीन होने के कारण इन्हें अजन्ता चित्रकला का पूर्वज कहा जाता है।


प्रश्न 9. हाथीपोल सुरंग की लम्बाई कितनी है?

A) 50 फीट B) 100 फीट C) 300 फीट D) 180 फीट

उत्तर: D व्याख्या: हाथीपोल सुरंग लगभग 180 फीट (55 मीटर) लम्बी प्राकृतिक सुरंग है जिससे होकर गुफाओं तक पहुँचा जाता है।


प्रश्न 10. जोगीमारा गुफा के चित्रों में मुख्यतः किस रंग का प्रयोग हुआ है?

A) नीला और पीला B) हरा और काला C) लाल और काला D) सफेद और नारंगी

उत्तर: C व्याख्या: चित्र मुख्यतः लाल रंग से बने हैं और काले रंग का भी प्रयोग हुआ है, पृष्ठभूमि सफेद है।


प्रश्न 11. सीताबेंगरा गुफा को क्या माना जाता है?

A) भारत की सबसे प्राचीन मस्जिद B) भारत की सबसे प्राचीन नाट्यशाला C) भारत का सबसे प्राचीन बौद्ध विहार D) भारत का सबसे प्राचीन किला

उत्तर: B व्याख्या: सीताबेंगरा गुफा को भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे प्राचीन नाट्यशाला (थिएटर) माना जाता है।


प्रश्न 12. राय कृष्णदास के अनुसार जोगीमारा के चित्र किससे सम्बन्धित हैं?

A) बौद्ध धर्म B) हिन्दू धर्म C) जैन धर्म D) ग्रीक परम्परा

उत्तर: C व्याख्या: राय कृष्णदास ने जोगीमारा के कुछ चित्रों को जैन धर्म की परम्परा से सम्बन्धित माना है।


प्रश्न 13. जोगीमारा गुफा की आधुनिक खोज किसने और कब की?

A) कनिंघम, 1877 B) कर्नल आउस्ले, 1848 C) डॉ. ब्लाख, 1904 D) बेगलर, 1874

उत्तर: B व्याख्या: वर्ष 1848 में कर्नल आउस्ले ने शिकार के दौरान इन गुफाओं की पहली आधुनिक खोज की थी।


प्रश्न 14. जोगीमारा का अभिलेख किस भाषा में लिखा गया है?

A) संस्कृत B) पालि C) अपभ्रंश D) मागधी प्राकृत

उत्तर: D व्याख्या: यह अभिलेख मागधी प्राकृत भाषा में है जो पालि से भी प्राचीन और भोजपुरी-मैथिली की पूर्वज है।


प्रश्न 15. जोगीमारा गुफा अम्बिकापुर से लगभग कितनी दूरी पर है?

A) 100 किलोमीटर B) 200 किलोमीटर C) 45-50 किलोमीटर D) 10 किलोमीटर

उत्तर: C व्याख्या: जोगीमारा गुफा अम्बिकापुर से लगभग 45 से 50 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।


प्रश्न 16. डॉ. ब्लाख के अनुसार जोगीमारा के चित्रों पर किसका प्रभाव है?

A) चीनी कला का B) फारसी कला का C) ग्रीक (यूनानी) कला का D) रोमन कला का

उत्तर: C व्याख्या: डॉ. ब्लाख ने इन चित्रों पर ग्रीक अर्थात यूनानी कला का प्रभाव देखा जो मौर्यकालीन यूनानी-भारतीय सम्पर्क का परिणाम हो सकता है।


प्रश्न 17. जोगीमारा गुफा किस पहाड़ी पर स्थित है?

A) विन्ध्याचल पहाड़ी B) सतपुड़ा पहाड़ी C) रामगढ़ पहाड़ी D) मैकाल पहाड़ी

उत्तर: C व्याख्या: यह गुफा सरगुजा जिले में रामगढ़ पहाड़ी (रामगिरि) पर लगभग 70 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।


प्रश्न 18. जोगीमारा गुफा में चित्रण किन दो चरणों में हुआ?

A) पहले चरण में अकुशल, दूसरे में कुशल B) पहले चरण में कुशल (तीसरी-दूसरी शताब्दी ई.पू.), दूसरे में अकुशल C) दोनों चरण समान गुणवत्ता के D) केवल एक ही चरण में चित्रण हुआ

उत्तर: B व्याख्या: असित कुमार हाल्दार के अनुसार पहले चरण के चित्र उत्कृष्ट हैं जबकि दूसरे चरण में अकुशल कलाकारों ने उन पर पुनर्चित्रण किया।


प्रश्न 19. कालिदास की किस रचना में “रामगिरि” का उल्लेख है?

A) अभिज्ञानशाकुन्तलम् B) रघुवंशम् C) मेघदूत D) कुमारसम्भवम्

उत्तर: C व्याख्या: कालिदास के “मेघदूत” में उल्लिखित “रामगिरि” को अनेक विद्वान रामगढ़ पहाड़ी ही मानते हैं।


प्रश्न 20. ASI ने जोगीमारा के चित्रों का रासायनिक संरक्षण कब किया?

A) 1947-48 B) 1962-63 C) 1980-81 D) 2001-02

उत्तर: B व्याख्या: 1962-63 में ASI के केन्द्रीय मण्डल ने गुफा की छत के चित्रों का रासायनिक उपचार कर उन्हें नमी और क्षरण से बचाया।

10 FAQs — जोगीमारा गुफा

FAQ 1. जोगीमारा गुफा कहाँ स्थित है? जोगीमारा गुफा भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के सरगुजा जिले में रामगढ़ पहाड़ी पर स्थित है। यह अम्बिकापुर शहर से लगभग 45-50 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है और राष्ट्रीय राजमार्ग 130 से जुड़ी हुई है।

FAQ 2. जोगीमारा गुफा क्यों प्रसिद्ध है? यह गुफा भारत के सबसे प्राचीन भित्तिचित्रों के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ की चित्रकारी लगभग तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की है जो अजन्ता की गुफाओं से भी पुरानी है। साथ ही यहाँ ब्राह्मी लिपि में एक अनूठा प्रेम-अभिलेख भी मिला है।

FAQ 3. जोगीमारा गुफा के भित्तिचित्र किस विषय पर हैं? यहाँ के चित्रों में मछली, हाथी, मानव आकृतियाँ, नृत्यांगनाएँ, गायन-वादन करती आकृतियाँ, फूल-पत्तियाँ, पशु-पक्षी और जलजीव प्रमुख रूप से चित्रित हैं। एक पैनल कृष्ण-लीला से सम्बन्धित भी प्रतीत होता है।

FAQ 4. सुतनुका कौन थी? सुतनुका जोगीमारा गुफा के अभिलेख में उल्लिखित एक देवदासी थी जो सीताबेंगरा नाट्यशाला में कार्यरत थी। वह देवदीन्न नामक शिल्पकार से प्रेम करती थी। माना जाता है कि उसी ने इस गुफा में भित्तिचित्र बनाए।

FAQ 5. जोगीमारा गुफा और अजन्ता गुफा में क्या अन्तर है? जोगीमारा के चित्र अजन्ता से लगभग 500-600 वर्ष पुराने हैं। जोगीमारा के चित्र छत पर बने हैं और अर्ध-विकसित शैली में हैं, जबकि अजन्ता की चित्रकारी अत्यन्त परिष्कृत और विस्तृत है। जोगीमारा को अजन्ता चित्रकला की पूर्वज परम्परा माना जाता है।

FAQ 6. हाथीपोल क्या है? हाथीपोल रामगढ़ पहाड़ी में एक प्राकृतिक सुरंग है जो लगभग 180 फीट लम्बी और 15-20 फीट ऊँची है। इसी सुरंग से होकर जोगीमारा और सीताबेंगरा गुफाओं तक पहुँचा जाता है। यह इतनी चौड़ी है कि एक हाथी भी इसमें से गुजर सकता है, इसीलिए इसका नाम हाथीपोल है।

FAQ 7. जोगीमारा गुफा घूमने का सबसे अच्छा समय कौन सा है? अक्टूबर से मार्च के बीच का समय यहाँ घूमने के लिए सबसे उपयुक्त है। इस दौरान मौसम सुहावना रहता है, पहाड़ी रास्ते सुरक्षित होते हैं और गुफाओं तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।

FAQ 8. क्या जोगीमारा गुफा का सम्बन्ध रामायण से है? हाँ, स्थानीय मान्यता के अनुसार वनवास के दौरान भगवान राम, सीता और लक्ष्मण इन पहाड़ियों में रहे थे। सीताबेंगरा गुफा को माता सीता का निवास और लक्ष्मण गुफा को लक्ष्मण का विश्राम स्थल माना जाता है।

FAQ 9. क्या कालिदास का सम्बन्ध जोगीमारा से है? कालिदास के “मेघदूत” में उल्लिखित “रामगिरि” को अनेक विद्वान यही रामगढ़ पहाड़ी मानते हैं। यहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता मेघदूत के वर्णन से मेल खाती है। हालाँकि यह पूरी तरह प्रमाणित नहीं है, किन्तु यह मान्यता अत्यन्त प्रचलित और गहरी है।

FAQ 10. जोगीमारा गुफा का संरक्षण कौन करता है? जोगीमारा गुफा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है। 1962-63 में ASI ने यहाँ के चित्रों का रासायनिक उपचार किया था। दर्शकों की सुविधा के लिए प्लेटफॉर्म और रेलिंग भी बनाई गई है, हालाँकि विशेषज्ञ और अधिक संरक्षण प्रयासों की माँग करते हैं।

Related Post

Leave a Comment