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रवि वर्मा | Ravi Verma Biography

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रवि वर्मा

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रवि वर्मा का जन्म केरल के किलिमन्नूर ग्राम में अप्रैल सन् 1848 ई० में हुआ था। यह कोट्टायम से 24 मील दूर है। वे राजकीय वंश के थे और त्रावणकोर (तिरुवोंकुर) के प्राचीन राज-परिवार से सम्बन्धित थे। उनके चाचा को चित्रकला का बड़ा शौक था। उन्हीं के कारण रवि वर्मा की भी रुचि इस ओर बढ़ी।  ⏰ ...

रवि वर्मा

रवि वर्मा का जन्म केरल के किलिमन्नूर ग्राम में अप्रैल सन् 1848 ई० में हुआ था। यह कोट्टायम से 24 मील दूर है। वे राजकीय वंश के थे और त्रावणकोर (तिरुवोंकुर) के प्राचीन राज-परिवार से सम्बन्धित थे। उनके चाचा को चित्रकला का बड़ा शौक था। उन्हीं के कारण रवि वर्मा की भी रुचि इस ओर बढ़ी। 

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आरम्भ में उन्होंने तंजौर शैली के चित्रकार अलागिरि नायडू से कला की शिक्षा प्राप्त की जो त्रिवेन्द्रम के महाराजा द्वारा दरबार में लाये गये थे। रवि वर्मा जब चौदह वर्ष के हुए तो तत्कालीन राजकीय चित्रकार रामास्वामी नायडू से कला का अध्ययन किया। 1866 ई० में उन्होंने वहाँ की महारानी लक्ष्मी बाई की छोटी बहन से विवाह किया। 

1868 ई० में महाराजा ने थियोडोर जेन्सन नामक एक ब्रिटिश चित्रकार को दरबार में आमन्त्रित किया। महाराजा के द्वारा कहने पर उन्होंने भी रवि वर्मा को यूरोपीय तकनीक की शिक्षा दी। 

रवि वर्मा ने उसे बड़े मनोयोग से सीखा विवाह के द्वारा राजकीय परिवार से सम्बन्धित होने के कारण रवि वर्मा स्थानीय ब्रिटिश रेजीडेण्ट के सम्पर्क में आये जिन्होंने मद्रास में सन् 1873 ई० में हो रही चित्र प्रदर्शनी में भाग लेने हेतु रवि वर्मा को प्रोत्साहित किया बकिंघम के ड्यूक ने जो उस समय मद्रास के गवर्नर थे, रवि वर्मा से अनेक चित्र खरीदे। 

जब प्रिंस ऑफ वेल्स सन् 1875 में त्रिवेन्द्रम आये तो वहाँ के महाराजा ने रवि वर्मा के चित्र उन्हें भेंट किये। 1880 की पूना प्रदर्शनी और 1892 की वियना तथा शिकागो की कला प्रदर्शनियों में भी उनके चित्रों की प्रशंसा हुई बड़ीदा तथा मैसूर के महाराजाओं ने अपने यहाँ उनसे अनेक चित्र बनवाये धीरे-धीरे उनके चित्रों की इतनी माँग बढ़ी कि उसे पूरा करना कठिन हो गया। 

बड़ौदा के तत्कालीन दीवान राजा सर माधवराव के परामर्श से राजा रवि वर्मा ने पूना में एक मुद्रणालय स्थापित किया जिसके कारण उनके चित्र प्रत्येक भारतीय हिन्दू के घर में पहुँच गये।

इसके पश्चात् किलिमन्नूर में रहते हुए वे जीवन के अन्तिम क्षणों तक चित्र बनाते रहे। 1 अक्टूबर सन् 1906 को उनका देहावसान हो गया।

रवि वर्मा की कला

रवि वर्मा ने चित्रकला की शिक्षा थियोडोर जेन्सन नामक यूरोपीय चित्रकार से प्राप्त की थी उनके दूसरे शिक्षक मदुरै के अलागिरि नायडू थे जो तिरवाँकुर के महाराजा के आश्रय में यूरोपीय शैली में काम करने वाले कुशल चित्रकार थे। 

रवि वर्मा के चित्र बहुत लोकप्रिय हुए। इस लोकप्रियता का कारण चित्रों का धार्मिक होना था। रवि वर्मा तथा यूरोपीय शैली में काम करने वाले अन्य भारतीय चित्रकारों का काम कभी भी कला की दृष्टि से बहुत ऊँचा नहीं बन पड़ा। 

डा० आनन्द कुमार स्वामी का कथन है कि रवि वर्मा की अच्छी से अच्छी कृतियाँ भी दूसरी श्रेणी के ऊपर नहीं उठ सकी हैं; फिर भी यूरोपीय प्रभाव ने भारत वासियों को ऐसा चका- चौंध कर दिया था कि उनकी त्रुटियों की ओर किसी का ध्यान ही न गया। 

अनेक राजा-महाराजाओं ने उनकी कृतियों से अपने महल सजाये श्रेष्ठ कलाकृतियाँ न होते हुए भी यूरोपीय कला शैली के प्रचार के उद्देश्य से अंग्रेज अधिकारियों ने उन्हें बढ़ावा दिया। वे किसी ऐसी मौलिक शैली के विकास में असमर्थ रहे जिसे भारतीय कहा जा सके और अन्य कलाकार उसकी परम्परा का अनुकरण कर सकें।

रवि वर्मा की आलोचना में यह कहा जाता है कि उनके चित्र नाटकीय हैं। यह बात बहुत अंशों तक सही है। रवि वर्मा पर तत्कालीन नाटक मण्डलियों का प्रभाव पड़ा था। उन्होंने प्राचीन वेश-भूषाओं की खोज की थी और उत्तर-भारत का भ्रमण भी किया था, किन्तु अपनी खोज में वे सफल नहीं हुए थे, अतएव उन्होंने तत्कालीन लोक-जीवन तथा नाटक- मण्डलियों से प्रेरणा ग्रहण की और बहुत कुछ उसी आधार पर प्राचीन देवी-देवताओं तथा पुराणों से सम्बन्धित चित्र बनाये। 

रवि वर्मा का प्रयास व्यक्तिगत था, पाश्चात्य विचार-धारा उन पर हावी थी, फिर भी उनके प्रयत्नों की अवहेलना की जा सकती। उन्होंने हमारा ध्यान अतीत के आदर्श महापुरुषों की ओर आकर्षित किया। वे धार्मिक होते हुए भी अन्तर्राष्ट्रीय विचारों वाले थे, इसीलिये उन्होंने भारतीय विचारधारा और पश्चिमी शैली के समन्वय से एक नवीन स्वरुप की सम्भावना व्यक्त की थी। 

क्या आज भी अनेक भारतीय चित्रकार भारतीय विषयों को पाश्चात्य शैलियों में अंकित नहीं कर रहे हैं? किन्तु फिर भी उनकी कला ऐसी नहीं है जिस पर भारतवासी गर्व कर सकें। उनके चित्रों को मुद्रित कर देने से भी उनकी कला का स्तर गिरा है क्योंकि उस समय के छापेखाने की स्थिति के अनुसार ये मुद्रित चित्र बहुत अच्छे नहीं हैं। 

फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि उन्होंने मुद्रित चित्रों का एक आरम्भिक स्तर निर्धारित किया और उसी के आधार पर भारतीय कैलेण्डर कला का विकास हुआ है। रवि वर्मा को काव्यमयी कल्पना से शून्य कहा जाता है पर बंगाल के भी अनेक कलाकारों की कृतियाँ अतिभावुकतापूर्ण हैं, कवित्वपूर्ण कल्पना से युक्त नहीं। 

रवि वर्मा तथा बंगाल के पुनरुत्थान काल के कलाकारों की कला आज अप्रासंगिक हो गयी है; अतः रवि वर्मा की कला का मूल्यॉकन उन्हीं के युग के परिप्रेक्ष्य में करना होगा। जब रवि वर्मा ने चित्रांकन आरम्भ किया था तब मुगल तथा राजपूत शैलियों का पतन हो चुका था; दिल्ली, लखनऊ, पटना तथा तंजौर आदि में पतित और सकर शैलियाँ प्रचलित हो गयी थी। 

उन्होंने तंजौर में ही चित्रांकन आरम्भ किया था अतः भारतीय कला क्षेत्र में तेल माध्यम के वे अग्रदूत के रूप में सामने आते है जहाँ तक विषय-वस्तु का सम्बन्ध है, बंगाल का पुनरुत्थान आन्दोलन देश की स्वतंत्रता के लिये संघर्ष के उम्र वातावरण के मध्य उत्पन्न हुआ था अतः भारत के अतीत के लिये उसमें एक स्वाभाविक श्रद्धा थी; किन्तु रवि वर्मा उससे पहले के युग के हैं। 

उस समय अंग्रेजी साहित्य और सभ्यता का भूत बुरी तरह भारतीय सामन्त वर्ग पर सवार था। ऐसे वातावरण में भारत के प्राचीन विषयों को लोकप्रिय बनाने का सराहनीय कार्य रवि वर्मा ने किया था। रवि वर्मा पर केरल की साहित्यिक परम्पराओं का प्रभाव था जिनमें सुन्दर, हृष्ट-पुष्ट शहरी कुलीन नायिका के आदर्श पर साहित्य-रचना की जाती थी। यही आदर्श रवि वर्मा की शकुन्तला आदि नारी-आकृतियों में प्रकट हुआ है। 

केरल के जो नारी सौंदर्य के प्रतिमान है ये बंगाल के नहीं हो सकते। रवि वर्मा ने यूरोपीय अकादमिक पद्धति को अपने ढंग से बदला भी है। उनके संयोजन बहुत सुन्दर है और उनमें लयात्मकता है। 

सुकेशी, श्रीकृष्ण और बलराम, सागरमानभंग, रावण सीता और जटायु, मत्स्यगन्धी, शकुन्तला, इन्द्रजीत की विजय, हरिश्चन्द्र, फल बेचने वाली. गरीबी, चाँदनी में सुन्दरी, हंस दूत, मोहिनी-रुक्मांगद केरल सागरतट, उदयपुर दुर्ग आदि उनके कुछ प्रसिद्ध चित्र हैं। इनके अतिरिक्त उन्होंने भारत के अनेक राजा-महाराजाओं तथा सामन्तों के व्यक्ति-चित्र अंकित किये और स्वर्ग तथा नरक के दृश्यों का भी अंकन किया।

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