आधुनिक भारतीय कलाकारों में रोमाण्टिक के रूप में प्रतिष्ठित कलाकार गोपाल घोष का जन्म 1913 में कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता स्वयं एक अच्छे कलाकार थे अतः बचपन से ही गोपाल को अच्छे संस्कार प्राप्त हुए कलागुरु अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रेरणा से गोपाल को आगे बढ़ने का उत्साह मिला।
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आगे चलकर वे जयपुर स्कूल आफ आर्ट्स में प्रविष्ट हुए और 1935 में वहाँ से कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। 1937 में दो मित्रों के साथ घूम-घूम कर देश भर के मन्दिरों तथा दृश्यों का अंकन और प्रदर्शन किया। फिर दक्षिण भारत की ओर आकर्षित हुए और मद्रास स्कूल आफ आर्ट में प्रविष्ट हो गये।
1938 में वे यहाँ से डिप्लोमा प्राप्त कर पुनः कलकत्ता लौटे तथा कुछ समय पश्चात् गवर्नमेण्ट स्कल ऑफ आर्टस कलकत्ता में कला के प्राध्यापक हो गये। 1948 से 1954 तक वे इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरियण्टल आर्ट में भी कला शिक्षक रहे ।
गोपाल घोष कलकत्ता ग्रुप के बोहीमियन कलाकार माने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न शैलियों में कार्य किया है और पश्चिम की आधुनिक कला-प्रवृत्तियों से भी प्रभावित हुए हैं। उन्होंने प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया है रेखाओं की सादगी और जीवन्तता उनके चित्रों की मुख्य विशेषताएँ मानी जाती हैं।
चित्रों में अद्वितीय तूलिका प्रयोग और टेक्सचर है। वे भारतीय आधुनिक प्राकृति दृश्य-चित्रण के जन्मदाओं में से हैं। उनकी रंग योजनाएँ अत्यन्त समृद्ध है।
उनके जल रंग-चित्रों में चीनी दृश्य चित्रों के समान सौन्दर्य है। उन्होंने लोक-जीवन तथा प्रकृति के जो चित्र बनाये हैं उनमें वातावरण की सूझ-बूझ, रूपाकारों की अनुभूति का लयात्मक एवं आकर्षक संयोजन हुआ है। फिर भी उनकी कला-कृतियों में रंगों की तुलना में रेखाओं का सौन्दर्य अधिक प्रभावित करता है।






