लक्ष्मा गौड का जन्म निजामपुर (आन्ध्रप्रदेश) हुआ था। बचपन में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण जीवन का जो प्रभाव उन पर पड़ा वह में उनकी कला की आधार भूमि बन गया।
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1963 में उन्होंने गवर्नमेण्ट कालेज आफ फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स हैदराबाद से ड्राइंग तथा पेण्टिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। 1963 से 1965 तक बड़ौदा में भित्ति चित्रण का अध्ययन किया। इस अवधि में वे छात्रवृत्ति भी प्राप्त करते रहे।
इसके पश्चात् उन्होंने ग्राफिक कला का विशेष अध्ययन किया और बड़ौदा की ग्राफिक कार्यशाला का लाभ उठाया उन्होंने हैदराबाद 1965, 67, दिल्ली 1971, 76: बम्बई, 1972, टोक्यो वार्षिकी 1976, साओ पाओलो वार्षिकी 1977; वारसा, बुडापेस्ट तथा बेलग्रेड की आकृति-मूलक भारतीय चित्रकार प्रदर्शनियों 1974, सामूहिक प्रदर्शनियों लन्दन 1973 म्यूनिख 1974, हेम्बर्ग 1975 आदि में भाग लिया। उनके चित्र देश-विदेश के अनेक संग्रहों में हैं।
बड़ौदा के सांस्कृतिक वातावरण का उन पर व्यापक प्रभाव है। आकृतियों को सजीवता प्रदान करने की उनकी शैली मौलिक, नवीन तथा अनोखी है।
उनके अंकनों में एक प्रकार का जंगलीपन है जिसके माध्यम से वे मनुष्य की आन्तरिक कुरूपता तथा भौडेपन को उजागर करते हैं उनकी कृतियाँ आघात पहुँचाने के साथ-साथ हमें आनन्दित भी करती हैं।
उनकी कल्पनाएँ ग्रामीण तथा श्रृंगारिक पक्षों से विशेष रूप से जुड़ी रहती हैं। आन्तरिक अनुभूतियों तथा विकृतियों का वे मनोवैज्ञानिक ढंग से स्वप्न कल्पनाओं की भांति अंकन करते हैं। वे मुख्य रूप से ग्राफिक कलाकार हैं।





