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भूपेन खक्खर | Bhupen Khakhar

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भूपेन खक्खर

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भूपेन खक्खर का जन्म 10 मार्च 1934 को बम्बई में हुआ था। उनकी माँ के परिवार में कपडे रंगने का काम होता था। पिता की बम्बई के भूलेश्वर में कपड़े की छोटी-सी दुकान थी। भूपेन जब चार वर्ष के थे, पिता की मृत्यु हो गयी।  ⏰ जून 2026 से पहले LT Grade Art की तैयारी ...

भूपेन खक्खर

भूपेन खक्खर का जन्म 10 मार्च 1934 को बम्बई में हुआ था। उनकी माँ के परिवार में कपडे रंगने का काम होता था। पिता की बम्बई के भूलेश्वर में कपड़े की छोटी-सी दुकान थी। भूपेन जब चार वर्ष के थे, पिता की मृत्यु हो गयी। 

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भूपेन की बडी बहिन विवाहिता थीं। उनकी ससुराल वालों ने भूपेन के परिवार को अपनी फैक्ट्री में काम देकर आर्थिक सहायता की। विषम आर्थिक परिस्थितियों में भूपेन का बचपन व्यतीत हुआ । उन्हें माँ बहुत चाहती थीं।

विषम परिस्थितियों के बावजूद भूपेन की शिक्षा चलती रही। 1953 में इण्टरमीडिएट उत्तीर्ण करने के समय भूपेन जल-रंगों में चित्र बनाया करते थे और कभी-कभी इधर-उधर के दृश्यों को भी चित्रित करने चले जाते थे। 

बाद में उन्होंने जे० जे० स्कूल आफ आर्ट की सांयकालीन कक्षाओं में ग्राफिक विधि का अध्ययन किया और अपने ग्राफिक चित्रों की प्रदर्शनी की। उन्हें इन पर कुछ पुरस्कार भी मिले जिनसे भूपेन बहुत प्रोत्साहित हुए ।

अर्थशास्त्र में बी० ए० उत्तीर्ण करने के पश्चात् जे० जे० स्कूल में प्रवेश ले लिया। बी० ए० में वे तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे किन्तु बी० कॉम० में उन्होंने सम्पूर्ण विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इससे भूपेन को बहुत आत्मिक बल मिला।

1958 में भूपेन की मित्रता प्रद्युम्न ताना से हुई जो बंगाल शैली में कार्य करते थे। 

वे आधुनिक कला को पसन्द नहीं करते थे। किन्तु भूपेन उनके अतिरिक्त रजा, पदमसी और सामन्त के भी प्रशंसक थे। 1960 में भूपेन रामकुमार के दृश्य-चित्रों से बहुत प्रभावित हुए जो “इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इण्डिया’ में छपे थे। 

उनकी भेंट गुलाम मुहम्मद शेख से भी हुई जिन्होंने भूपेन को बड़ौदा जानेको कहा किन्तु पारिवारिक कारणों से यह सम्भव नहीं हो पाया।

1961 में भूपेन की एक चार्टर्ड एकाउन्टेण्ट्स की फर्म में नौकरी लग गई किन्तु 1962 में उन्होंने उसे छोड़ दिया और बड़ौदा विश्वविद्यालय के कला विभाग में प्रवेश ले लिया। वहाँ उन्होंने कला-आलोचना का द्विवर्षीय पाठ्यक्रम उत्तीर्ण किया।

1963 में भूपेन की भेंट बड़ौदा आये हुए एक अंग्रेज पॉप चित्रकार से हुई जिनका नाम जिम डोनावैन था। जिम के प्रभाव से भूपेन ने भारत में प्रचलित फ्रेंच कला परम्पराओं को छोड़ दिया और जन-जीवन के चित्र सीधी-सादी शैली में अंकित करने लगे। 

भूपेन ने बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं, देवताओं की छपी हुई छवियों तथा कैलेण्डरों से कोलाज बनाना आरम्भ कर दिया। एक ही वर्ष में उन्होंने बाजारू चित्रों का अच्छा संग्रह भी कर लिया। 

अपनी कलाकृतियों में भूपेन ने पोस्टकार्ड, चार्ट, कॅलेण्डर, लघु-चित्र, सिनेमा सेटिंग तथा चाय की दुकानों में टंगे रहने वाले चित्रों आदि का प्रचुर उपयोग किया है।

1965 से भूपेन ने अपनी कृतियों की प्रदर्शनी लगाना प्रारम्भ किया देश-विदेश में उनकी प्रशंसा हुई और उन्हें अच्छे ग्राहक भी मिले। 1976 में उनसे बाथ अकादमी में अध्यापन के लिये भी आग्रह किया गया था।

उन्होंने पहले अपने चित्रों में दैनिक जन-जीवन की घटनाओं का चित्रण किया, फिर निम्न मध्य वर्ग के जीवन का चित्रण करने लगे। इसके उपरान्त उन्होंने समाज के उस वर्ग का अंकन आरम्भ कर दिया है जिसे कभी-भी चित्रित नहीं किया गया। 

bhupen-khakhar-1934-2003
Bhupen-Khakhar-1934-2003

1968 के पश्चात् बने उनके चित्रों में वही रंग लगाये गये हैं जो वेश-भूषा अथवा भवनों की दीवारों आदि में भारतीय लोग प्रयोग में लाते हैं। 

खक्खर ने अपनी कला में लोकप्रिय छपे हुए चित्रों तथा कलैण्डरों का जो प्रयोग किया है, वह पहले किसी भी कलाकार ने नहीं किया। इनमें लोक प्रचलित देवी-देवताओं के चित्र प्रमुख हैं। 

वे इन छपी हुई. आकृतियों को काटकर केनवास के एक मुख्य अभिप्राय के आस-पास चिपका देते हैं। लाल इनामेल के रंग से पृष्ठ-भूमि को इकसार रंग देते हैं। 

यह रंग कहीं-कहीं चिपकाये हुए चित्र के किसी भाग पर बहकर भी आ जाता है. इससे चित्र को सम्पूर्ण संयोजनका ही एक भाग बनने में सहायता मिलती है। वे आकृतियों को इस प्रकार चिपकाते हैं कि उससे उनमें एक नयी विकृति और आश्चर्य कारक नया प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। 

इनमें ये दर्पणों के टुकड़े चिपकाने तथा सुन्दर लिपि भी लिखने लगे हैं। खक्खर के इन चित्रों में सर्वाधिक प्रभावशाली श्रीनाथ जी के आधार पर बने संयोजन है। 

Bhupen-khakhar-1934-2003.
Bhupen-khakhar-1934-2003.

इनमें वे चित्र के केन्द्र में एक बड़ी आकृति तथा चारों ओर छोटी-छोटी अनेक आकृतियाँ चिपका देते हैं। कभी-कभी वे उस प्रकार के नेत्र भी चिपका देते हैं जो श्रीनाथ जी की प्रतिमा में लगाये जाते हैं। 

खाली स्थानों पर वे छोटे-बड़े आकारों में राम-राम आदि लिख देते हैं। आकृति न बनाकर अथवा विभिन्न आकृतियों को परस्पर सम्बन्धित न करके अक्षर आदि लिखने की प्रवृत्ति पेरिस में चले आकृति विरोधी “दादावादी” आन्दोलन के समान है।

खक्खर द्वारा चित्रित समाज तथा चित्रों की रंग-योजनाएँ पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं। वे इन विषयों को सदैव नये ढंग से प्रस्तुत करते हैं सरल संयोजनों में वे भारतीय ग्रामीण सामान्य अथवा औसत जीवन का चित्रण करते हैं जिसमें उस जीवन की त्रासदी और सौन्दर्य दोनों निहित है। 

भूपेन के चित्रों को देखकर लगता है कि उनकी नियति में एक स्थिरता आ गयी है; वह अब बदलने वाली नहीं है। उनके चित्रों में निकट की वस्तुओं के साथ-साथ दूर की वस्तुओं के कुछ विवरण इस प्रकार अंकित रहते हैं मानों वे सबसे अधिक निकट है। 

वे अपने चित्रों में इस युक्ति से दूर और पास की वस्तुओं में एक सम्बन्ध बना देते हैं जो किसी व्यंग्य अथवा विडम्बना की और इंगित करता है। 

उनके एक नये चित्र “तुम सभी को खुश नहीं रख सकते” में मुख्य पात्र चित्र के दर्शकों की ओर नग्न पीठ किये अंकित है और वह गधे के साथ खड़े दो व्यक्तियों की ओर देख रहा है। 

ऐसा करके चित्रकार ने मूर्ख लोगों द्वारा की जा रही षड्यन्त्रकारी गतिविधियों की ओर संकेत किया है। भूपेन खक्खर को साहित्य से भी लगाव है और वे एक लोकप्रिय गुजराती कन्याकार भी हैं। 

भूपेन को आधुनिक भारतीय पॉप (पापूलर) कलाकार भी कहा जाता है। भारत के कई नगरों के अतिरिक्त ब्राजील, रूस, यूगोस्लाविया, इंग्लैण्ड, आदि में उनकी अनेक प्रदर्शनियाँ हुई हैं। वे अपने पुराने व्यवसाय (चार्टर्ड एकाउण्टेन्सी) के लिये भी कुछ समय निकाल लेते हैं।

भूपेन खक्खर के चित्र

Bhupen-khakhar (Untitled) Etching on paper
Bhupen-khakhar (Untitled) Etching on paper
bhupen-khakhar-painting
bhupen-khakhar-painting
BHUPEN-KHAKHAR (Seva)
BHUPEN-KHAKHAR (Seva)
'ययाति' 1987- भूपेन खाखर
‘ययाति’ 1987- भूपेन खाखर

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