रामकिंकर वैज | Ramkinkar Vaij

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शान्तिनिकेतन में “किकर दा” के नाम से प्रसिद्ध रामकिंकर का जन्म बांकुड़ा के निकट जुग्गीपाड़ा में हुआ था। बाँकुडा में उनकी आरम्भिक शिक्षा हुई।  सन् 1925 में माडर्न रिव्यू के संस्थापक रामानन्द चटर्जी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और शान्ति निकेतन के कला भवन में उन्हें नन्दलाल के पास छोड़ आये।  वहाँ आदर्शवादी, सरल तथा ...

शान्तिनिकेतन में “किकर दा” के नाम से प्रसिद्ध रामकिंकर का जन्म बांकुड़ा के निकट जुग्गीपाड़ा में हुआ था। बाँकुडा में उनकी आरम्भिक शिक्षा हुई। 

सन् 1925 में माडर्न रिव्यू के संस्थापक रामानन्द चटर्जी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और शान्ति निकेतन के कला भवन में उन्हें नन्दलाल के पास छोड़ आये। 

वहाँ आदर्शवादी, सरल तथा उल्लास का वातावरण था। नन्दलाल बसु से कला सीखने के साथ-साथ उन्होंने धन अर्जित करना भी प्रारम्भ किया। 

उन्होंने चित्रकला के साथ मूर्तिकला भी सीखी और इन दोनों का अपने स्वभाव के अनुसार विकास किया शान्ति निकेतन के अन्य कार्यक्रमों (संगीत, 1 नाटक तथा कविता, में भी वे आनन्द लेते थे। 

शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त वे मूर्ति शिल्प विभाग के अध्यक्ष बना दिये गये। यहाँ उन्होंने माडलिंग के प्रति गम्भीर रूख अपनाया। 

1935 से उनकी रचनात्मक प्रतिभा का विकास हुआ और 1940 तक उन्होंने अनेक चित्रों तथा मूर्तियों की रचना की जिनमें सुजाता, संथाल परिवार, कन्या तथा कुत्ता, अनाज की ओसाई आदि विशेष प्रसिद्ध हैं। 

उनकी पहली एकल प्रदर्शनी नई दिल्ली में 1942 में हुई। उनकी अन्य प्रदर्शनियाँ इण्डियन सोसाइटी आफ ओरिएण्टल आर्ट कलकत्ता, रिएलिटीज नूवेल पेरिस (1950-51) एशियन कला प्रदर्शनी टोक्यो आदि में हुई। 

उन्होंने नई दिल्ली में रिजर्व बैंक के लिये 24′ ऊँची दो विशाल प्रतिमाओं का भी निर्माण किया। कुछ समय तक वे ललित कला अकादमी के नामित कलाकार भी रहे तथा 1976 में अकादमी के फेलो निर्वाचित हुए। 

रामकिंकर रियेलिटीज नूवेल पेरिस तथा इण्डियन स्कल्पटर्स ऐसोसियेशन कलकत्ता के सदस्य भी रहे। उनकी कलाकृतियाँ ललित कला अकादमी, राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय तथा देश-विदेश के संग्रहों में हैं। 

1925 से 1962 तक वे शान्ति-निकेतन में रहे। वे फक्कड, कभी भी न थकने वाले, न चिढ़ने वाले तथा चिन्तामुक्त स्वभाव के थे। वे सदैव हँसमुख रहते थे ओर धन अथवा यश से उनमें कोई विकार नहीं आया।

वे प्रधानतः मूर्तिकार थे। सीमेण्ट, प्लास्टर तथा पत्थर से उन्होंनें अनेक मूर्तियाँ बनायी है और प्रायः प्रफुल्ल जीवनी शक्ति से भरपूर तथा विकासशील जीवन के विषयों को ही उन्होंने मूर्तिमान् किया है।

ये अच्छे चित्रकार भी थे। आरम्भ में उन्होंने लघु चित्र बनाये किन्तु शीघ्र ही उन्होंने तैल रंगों को अपना लिया और अनेक प्रयोग किये व्यक्ति चित्र, डिजाइन, लताएँ. भवन, प्राकृतिक दृश्य आदि सभी का उन्होंने चित्रण किया है। 

व्यक्ति-चित्रों में उन्होंने चित्रित व्यक्ति का स्वभाव भी उतार दिया है। संयोजनों, विशेष रूप से दृश्य-चित्रों में विस्तार, वातावरण तथा ढाँचों की स्थूलता को प्रभावशाली रूपों में प्रस्तुत किया है। 

उन्होंने दैनिक जीवन को तूलिका-रेखा चित्रों (ब्रश ड्राइंग्स) के द्वारा अंकित किया है।

1935 से वे आधुनिक कलाकृतियों का सृजन करने लगे थे इसी से अन्तिम दिनों में नन्दलाल बसु और रामकिंकर के बीच कुछ मतभेद भी हो गया था। नन्दलाल किंकर दा की आधुनिक प्रवृत्ति को पसन्द नहीं करते थे।

रामकिंकर का जल रंगों का कार्य विनोद बिहारी मुखर्जी से मिलता-जुलता है। उनका चित्रकला तथा मूर्ति शिल्प का समस्त कार्य प्रकृति के अत्यन्त समीप है। 

वे अपने चारों ओर के तत्काल के वातावरण और लोगों का ही अकन करते थे इसी से उन्होंने संथाल लोगों के जीवन तथा वीरभूमि की प्राकृतिक शोभा का ही चित्रण किया है। 

उनमें न निराशावादिता थी न कोई मनोवैज्ञानिक दबाव अथवा कुण्ठा ।

मानवाकृति में वे गति पर अधिक ध्यान देते थे तथा संयोजन में स्थितियों और मुद्राओं का और इन्हें वे जीवन के स्पन्दन के साथ लयात्मक रूप में अंकित करते थे। 

उनके अधिकांश चित्रों में प्रभाववादियों के प्रकाश, सेजान के अन्तराल, घनवादियों के तल एवं पारदर्शिता तथा पूर्वी देशों की लिपि की जीवन्तता का सुन्दर समन्वय हुआ है।

अगस्त 1980 को इस महान् कलाकार का निधन हो गया।

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