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कला का शाब्दिक अर्थ (Literal Meaning)
व्युत्पत्ति (Etymology)
‘कला’ शब्द संस्कृत की ‘कला’ धातु से उत्पन्न हुआ है। संस्कृत में ‘कला’ शब्द के कई अर्थ हैं:
कल् धातु से: जिसका अर्थ है – गिनना, संख्या करना, कौशल दिखाना
मूल अर्थ:
- अंश या भाग (जैसे चंद्रमा की सोलह कलाएं)
- निपुणता या दक्षता
- कौशल या योग्यता
- विशेष क्षमता
शाब्दिक परिभाषाएं
शब्दकोश के अनुसार:
- किसी कार्य को करने की विशेष योग्यता
- हुनर या कौशल
- किसी वस्तु को सुंदर बनाने की क्षमता
संस्कृत साहित्य में: कला को 64 कलाओं के रूप में वर्णित किया गया है, जिनमें संगीत, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला आदि शामिल हैं।
कला का व्यापक अर्थ (Broad Meaning)
दार्शनिक दृष्टिकोण
भारतीय दृष्टिकोण: भारतीय दर्शन में कला को आध्यात्मिक अनुभव से जोड़ा गया है। कला केवल सुंदरता का सृजन नहीं, बल्कि सत्य, शिव और सुंदर (सत्यम्, शिवम्, सुन्दरम्) की प्राप्ति का माध्यम है।
पाश्चात्य दृष्टिकोण: पश्चिमी दर्शन में कला को मानवीय अभिव्यक्ति और सौंदर्यबोध के रूप में देखा गया है। यह प्रकृति और जीवन की व्याख्या है।
व्यापक अर्थों में कला
1. मानवीय अभिव्यक्ति का माध्यम
कला मनुष्य के भीतर की भावनाओं, विचारों, अनुभवों और कल्पनाओं को बाहरी रूप देने का सशक्त माध्यम है। जो शब्दों में नहीं कहा जा सकता, उसे कला के माध्यम से व्यक्त किया जा सकता है।
2. सौंदर्य का सृजन
व्यापक अर्थ में कला सौंदर्य की रचना है। यह केवल दृश्य सौंदर्य तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रव्य, स्पर्शनीय और अनुभूति के सभी स्तरों पर सौंदर्य का सृजन करती है।
3. संस्कृति का वाहक
कला किसी समाज की संस्कृति, मूल्यों, विश्वासों और परंपराओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम है। कला में उस समय और समाज का प्रतिबिंब होता है।
4. सामाजिक दर्पण
कला समाज का दर्पण है। यह सामाजिक यथार्थ, समस्याओं, विषमताओं और परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करती है। कला सामाजिक चेतना जागृत करने का सशक्त माध्यम है।
5. संचार का साधन
कला भाषा की सीमाओं को पार करके संदेश देती है। यह सार्वभौमिक भाषा है जो सभी संस्कृतियों और देशों के लोगों को जोड़ती है।
6. जीवन का सौंदर्यीकरण
व्यापक अर्थ में कला केवल कैनवास या मंच तक सीमित नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में कला है – खाना बनाना, घर सजाना, कपड़े पहनना, बोलना – सब कुछ कलात्मक ढंग से किया जा सकता है।
7. आत्म-साक्षात्कार का मार्ग
कला आत्म-खोज और आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम है। कला के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर झांकता है और अपनी पहचान बनाता है।
8. मनोवैज्ञानिक आवश्यकता
मनुष्य में सृजन की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। कला इस प्रवृत्ति की पूर्ति करती है और मानसिक संतुलन प्रदान करती है।
कला के विभिन्न आयाम
व्यक्तिगत आयाम
- आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम
- व्यक्तित्व विकास का साधन
- भावनात्मक मुक्ति का रास्ता
सामाजिक आयाम
- सामाजिक बंधन और एकता का निर्माण
- सामाजिक परिवर्तन का उपकरण
- सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक
शैक्षिक आयाम
- ज्ञान और कौशल का विकास
- सृजनात्मकता का पोषण
- समग्र व्यक्तित्व निर्माण
आर्थिक आयाम
- रोजगार का स्रोत
- पर्यटन और व्यापार का माध्यम
- राष्ट्रीय धरोहर
कला का समग्र दृष्टिकोण
व्यापक अर्थ में कला जीवन से अलग कोई चीज नहीं है, बल्कि जीवन का ही सुंदर रूप है। कला वह है जो:
- सृजनात्मक है: नई चीजों का निर्माण करती है
- अभिव्यंजक है: भावों को प्रकट करती है
- सौंदर्यात्मक है: सुंदरता प्रदान करती है
- संप्रेषणीय है: संदेश देती है
- परिवर्तनकारी है: समाज और व्यक्ति को बदलती है
- मानवीय है: मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है
शाब्दिक और व्यापक अर्थ में अंतर
| शाब्दिक अर्थ | व्यापक अर्थ |
|---|---|
| कौशल या निपुणता | जीवन का सौंदर्यीकरण |
| तकनीकी योग्यता | मानवीय अभिव्यक्ति |
| सीमित परिभाषा | असीमित विस्तार |
| विशेष क्षेत्र | जीवन के सभी क्षेत्र |
| व्यावहारिक दृष्टिकोण | दार्शनिक दृष्टिकोण |
निष्कर्ष
कला का शाब्दिक अर्थ केवल कौशल और निपुणता तक सीमित है, लेकिन व्यापक अर्थ में कला मानव जीवन का अभिन्न अंग है। यह केवल चित्र बनाना या गाना नहीं है, बल्कि जीवन जीने का एक सुंदर तरीका है। कला व्यक्ति, समाज, संस्कृति और मानवता को जोड़ने वाली अदृश्य डोर है। शिक्षकों के लिए यह आवश्यक है कि वे कला के इस व्यापक अर्थ को समझें और बच्चों में कला के प्रति सम्मान और रुचि विकसित करें। कला शिक्षा का उद्देश्य केवल कलाकार बनाना नहीं, बल्कि संवेदनशील, सृजनशील और सौंदर्यबोधी मनुष्य बनाना है।












