जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी | Jagannath Muralidhar Ahivasi

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जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी | Jagannath Muralidhar Ahivasi

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श्री अहिवासी का जन्म 6 जुलाई 1901 को ब्रज भूमि में गोकुल के निकट बल्देव ग्राम में हुआ था। जब आप केवल चार वर्ष के थे तभी आपकी माताजी का देहान्त हो गया। पिता की इच्छा थी कि आप पढ़ लिखकर कोई वकील या डाक्टर बनें किन्तु अहिवासी जी की रूचि वैष्णव भक्ति विषयक साहित्य ...

श्री अहिवासी का जन्म 6 जुलाई 1901 को ब्रज भूमि में गोकुल के निकट बल्देव ग्राम में हुआ था। जब आप केवल चार वर्ष के थे तभी आपकी माताजी का देहान्त हो गया। पिता की इच्छा थी कि आप पढ़ लिखकर कोई वकील या डाक्टर बनें किन्तु अहिवासी जी की रूचि वैष्णव भक्ति विषयक साहित्य एवं चित्रकला में थी। 

आपके पिता श्री मुरलीधर ध्रुपद तथा धमार के एक उच्च कोटि के गायक थे अतः स्वाभाविक रीति से पिता के संस्कारों का पुत्र पर प्रभाव पड़ा । अहिवासीजी के परिवारीजन उन दिनों गुजरात में पोरबन्दर नामक स्थान पर रहते थे और इनका बचपन भी वहीं व्यतीत हुआ। 

वहीं पर एक पाठशाला में आपको प्रवेश दिया गया । किन्तु इस शिक्षा में अहिवासी जी की रूचि न थी । अचानक उनके पिता के एक मुस्लिम मित्र ने बालक की प्रतिभा को पहचाना और उनका परिचय काठियावाड़ के एक मुस्लिम चित्रकार से करा दिया। इस नये वातावरण में उनकी प्रतिभा शीघ्रता से विकसित होने लगी और 13 वर्ष की अल्पायु में ही अहिवासीजी ने थर्ड ग्रेड की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। 

कुछ समय उपरान्त आपको काठियावाड़ के एक मुस्लिम स्कूल में कला शिक्षक की नौकरी मिल गयी । वहीं पर कार्य करते हुए अहिवासीजी ने एक अंग्रेज व्यक्ति का चित्र बनाया । 

यह इतना उत्कृष्ट था कि इसका उद्घाटन तत्कालीन गवर्नर के द्वारा कराया गया। इससे अहिवासी जी की ख्याति अल्प आयु में ही फैलने लगी। उनका इसी अवधि में विवाह भी हो गया और दो कन्याओं ने जन्म लिया।

सन् 1920 में अहिवासी जी ने व्यक्ति चित्रण में कुशलता प्राप्त करने के लक्ष्य से बम्बई जाकर सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स में प्रवेश ले लिया। बम्बई में ही गोकुल के एक गुसाई जी का मन्दिर था, वहीं आप रहने लगे । 

वहां अनवरत साधना और परिश्रम से चार वर्ष का पाठ्यक्रम केवल दो वर्ष में ही पूर्ण कर लिया। साथ ही अवकाश के समय केतकर कला संस्थान में भी लाकर कला का अध्ययन किया, किन्तु सहसा 1922 में पिताजी का देहान्त हो जाने के कारण अध्ययन बीच में ही रोक कर पोरबन्दर लौटना पड़ा और वहीं एक मन्दिर में भजन-कीर्तन करने लगे। 

उनके घर के निकट ही बम्बई सरकार की चित्रकला की उच्च परीक्षाओं की समिति के तत्कालीन अध्यक्ष डाक्टर डी० जी० व्यास रहते थे। उन्हीं के साथ अहिवासी जी जून 1925 में बम्बई लौट आये । बम्बई में उनका परिचय जे० जे० स्कूल के तत्कालीन डाइरेक्टर श्री ग्लेडस्टोन से हुआ। 

उन्होंने अहिवासीजी को म्यूरल चित्रण की छात्रवृत्ति देकर प्रोत्साहित किया। परिणामस्वरूप श्री अहिवासी ने 1926 में डिप्लोमा परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान एवं स्वर्ण पदक प्राप्त किये । अगले वर्षों में अहिवासी जी को डाली कर्सेट जी पदक एवं मेयो पदक भी प्राप्त हुए । 

1926 में उन्हें बम्बई आर्ट सोसाइटी का रजत पदक भी मिला। 1930 में अहिवासी जी जे० जे० स्कूल में ही चित्रकला के भारतीय परम्परागत कला शैली विभाग में अध्यापक नियुक्त हो गये और 1950 में विभागाध्यक्ष बना दिये गये । 

वहां आपने 1957 ई० पर्यन्त कार्य किया और अनेक मेधावी शिष्यों को शिक्षा दी जिनमें से बाइ० के०शुक्ल. दिनेश शाह, दिनेश बख्शी, प्रद्युम्न ताना, कृष्ण हैब्बर, लक्ष्मण पै तथा अब्दुल रहीम अप्पा भाई आलमेलकर प्रमुख हैं। 1956 में वहां से आप वाराणसी चले आये और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में 1957 से 1966 पर्यन्त ललित कला एवं संगीत महाविद्यालय में आचार्य के पद पर कार्य किया। 1974 में आपका निधन हो गया।

अहिवासी जी परम्परागत भारतीय कला के मूर्धन्य कलाकारों में गिने जाते थे और आपके चित्रों की देश-विदेश में पर्याप्त प्रशंसा हुई । अनेक देशों के राजकीय तथा व्यक्तिगत संग्रहों में आपके चित्र पहुंचे हैं। आपने राष्ट्रपति भवन, संसद भवन तथा उत्तर प्रदेश के विधान भवन में भी चित्रांकन किया। 

आपके द्वारा रचित “मीरा का मेवाड़ त्याग” नामक चित्र यूनेस्को द्वारा सारे संसार में प्रदर्शित किया गया और भारत सरकार ने खरीद कर वह चीन जन-तंत्र को भेंट कर दिया। आपके रेखा चित्रों के संग्रह रेखाजंलि से आपकी रेखा की शक्तिमत्ता तथा प्रवाह का ज्ञान होता है। 

ब्रज की वैष्णव कला की सहज उल्लास वृत्ति, शिल्प विधान तथा लोकाश्रित रूप-योजना के साथ -साथ परम्परागत भारतीय सौन्दर्य चेतना एवं आधुनिक कला-दृष्टि के समन्वय की विविध झांकी अहिवासी जी के शिष्य कलाकारों की कृतियों में प्राप्त होती है। 

भित्ति चित्रण तकनीक के अध्ययन हेतु अहिवासी जी ने अजन्ता, ऐलोरा, एलीफेण्टा, बाघ, बादामी तथा सित्तनवासल गुफाओं की यात्रा की थी। इनकी अनुकतियों पर आपको ललित कला अकादमी द्वारा 1956 में स्वर्ण पदक प्रदान किया गया था। शिमला प्रदर्शनी तथा इंग्लैण्ड की रायल आर्ट सोसाइटी की प्रदर्शनी में भी आपको विशेष ख्याति मिली। 

जिस समय आप सर जे० जे० स्कूल बम्बई में कला का अध्ययन कर रहे थे उस समय दिल्ली के दरबार हाल के अलंकरण के लिए सर जे० जे० स्कूल से कलाकारों को बुलाया गया था। यहां आपने 25 -8″ के व्यास के अर्द्ध वृत्त में चित्रलेखा का जो अंकन किया था उसकी सर्वत्र भूरि-भूरि प्रशंसा की गयी थी और वहां के तत्कालीन प्रधानाचार्य श्री ग्लेडस्टोन सोलोमन विशेष प्रभावित हुए थे।

अहिवासी जी कवि, संगीतज्ञ तथा कृष्ण भक्त थे आप अभिनव कला केन्द्र बम्बई के अध्यक्ष, गुजरात साहित्य सम्मेलन जूनागढ़ तथा कलकत्ता के सभापति एवं ब्रज भाषा प्रेम के कारण ब्रज साहित्य सम्मेलन मेरठ के सभापति भी रहे। आपने अनेक भजन-संग्रहों का भी सम्पादन किया। 

आपके प्रसिद्ध चित्र हैं चित्र लेखा, बासन्ती, सन्देश, मीरा का मेवाड़ त्याग, मैया मैं नहिं माखन खायो, स्वामी हरिदास, महर्षि व्यास, पाणिनि मार, चामरधारिणी, गान्धर्व संगीत, महाभारत, गुरु शरणे तथा श्री कृष्णनामाभिधान आदि।

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