आप गुजरात के प्रसिद्ध चित्रकार थे । आपने बम्बई में कला की शिक्षा ग्रहण की और वहां आप पर पाश्चात्य शैली का प्रभाव पड़ा। आगे चलकर आपने भारतीय शैलियों में प्रयोग किये और अपनी कला को भारतीयता की ओर मोड़ा ।
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आपका जन्म 1892 में सौराष्ट्र (गुजरात) में भावनगर में हुआ था । आपके पिता आपको इंजीनियर बनाना चाहते थे किन्तु आपकी रूचि चित्रकला में होने के कारण उन्नीस वर्ष की आयु में आपने सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट्स में प्रवेश लिया। 1916 तक आप वहां रहे ।
1917 में ” बिल्व मंगल” शीर्षक चित्र पर आपको बम्बई आर्ट सोसाइटी की वार्षिक कला प्रदर्शनी में सर्वश्रेष्ठ कृति का स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। आपने प्रायः तैल पद्धति से महापुरूषों के व्यक्ति-चित्रों से अपना व्यावसायिक जीवन आरम्भ किया, साथ ही अहमदाबाद से “कुमार” नामक पत्रिका का प्रकाशन किया तथा 1930 ई० में घर पर ही कला शिक्षण केन्द्र की स्थापना की ।
आपके शिष्यों में कनु देसाई, सोमालाल शाह, रसिकलाल पारीख, आदि प्रमुख हैं। आपने अजन्ता के चित्रों की प्रतिलिपियां भी की थीं और गुजराती भाषा में अजन्ताना कला मण्डप, भारतीय चित्रांकन, कलाकारनी संस्कार-यात्रा तथा कला चिन्तन नामक पुस्तकें प्रकाशित कीं।
आप भारत की अनेक कला-संस्थाओं से सम्बद्ध रहे तथा भारत सरकार ने आपको पद्मश्री से विभूषित किया। 1953 में आपने रूस की सांस्कृतिक यात्रा की थी 1954 में 4 सितम्बर को उद्घाटित होने वाली ललित कला अकादमी में आप सौराष्ट्र राज्य के प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए थे।
आपने हिमालय की घाटी तथा बम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी, कच्छ आदि का विस्तृत भ्रमण किया था। आपने “Heroes and Heroines of Shri K.M. Munshi ” शीर्षक से 35 रंगीन चित्रों का एक आकर्षक चित्राधार भी प्रकाशित किया था। 1977 में आपका निधन हो गया।





